सोमवार, 24 नवंबर 2014

पुस्तक समीक्षा - बिहार : अतीत और वर्तमान

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(समीक्षा)

बिहार: अतीत और वर्तमान--एक वंदनीय प्रयास

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                                                 ---मनोज 'आजिज़'

बिहार एक अत्यंत समृद्ध और प्राचीन स्थान है।  यह मात्र एक भू-खंड या राजनैतिक इकाई नहीं है अपितु यह एक सांस्कृतिक धरोहर और मानवतावादी स्वर के उत्स का उद्गम स्थल भी रहा है। इन्ही उदात्त विचारों से परिचित कराने लिए 'बिहार: अतीत और वर्तमान' पुस्तक का संपादन किया गया है। इसमें कुल ग्यारह रचनाएँ हैं जो समय-समय पर बिहार एसोसिएशन, जमशेदपुर में विभिन्न विद्वानों द्वारा दिए गए भाषणों का संग्रह है। अधिकांश विद्वान तो स्वर्गीय हैं पर प्रस्तुत पुस्तक में इसका कोई विवरण नही है। यद्यपि अंत में लेखकों के संक्षिप्त परिचय दिए गए हैं। ये निबंध अधिकांशतः शोध-पूर्ण नहीं, बल्कि तथ्य-संग्रह हैं। विविध आयामों को दर्शाते हुए बिहार के सम्बन्ध में यह पुस्तक एक प्रारंभिक झलक है।

लेखकों में विशेष उल्लेख्य हैं--डॉ हरवंश राय ओबेरॉय, डॉ सुशील माधव पाठक, डॉ विश्वनाथ प्रसाद वर्मा, डॉ रामखेलावन पाण्डेय आदि। डॉ हरवंश राय का निबंध 'धर्म और दर्शन को बिहार का अवदान' एक पठनीय निबंध है। यह सर्व विदित है कि 'संस्कृत बिहार', रांची के संस्थापक डॉ ओबेरॉय का जीवन भारतीय दर्शन और संस्कृति के लिए समर्पित था। उन्होंने निबंध का प्रारम्भ ही धर्म और संस्कृति की व्याख्या से किया है। राम चरित मानस और कई  उद्धरण भी दिए गए हैं। वाल्मीकि आश्रम, भैंसा लोटन (चंपारण) में था और इसकी विशेष चर्चा इस रचना में की गयी है। इसी प्रकार विश्वामित्र, वशिष्ठ की चर्चा के क्रम में उन्होंने बक्सर का नाम लिया है। नन्द वंश, गुप्त वंश, मौर्य वंश का वर्णन करते हुए उन्होंने बौद्ध धर्म और जैन तीर्थंकरों का भी वर्णन किया है। उस समय झारखंड भी बिहार में ही था। अतः डॉ ओबेरॉय ने सिमडेगा स्थित 'राम रेखा धाम' की भी चर्चा की है। 

 

डॉ सुशील माधव पाठक का 'बिहार: एक सिंहावलोकन' निबंध भी रूचिपूर्ण है। उन्होंने 'करुष' नामक जनपद की चर्चा की है जिसमे आज भोजपुर और रोहतास जिले हैं। इतिहास के शिक्षक होने के नाते डॉ पाठक ने विभिन्न कालों में बिहार की राजनैतिक और सामाजिक स्थितियों का वर्णन किया है। आधुनिक युग को उन्होंने एक पैराग्राफ में ही सिमट दिया है जिसे और भी विस्तार दिया जा सकता था। 

डॉ विश्वनाथ प्रसाद वर्मा का निबंध 'राजनीतिक दर्शन को बिहार की देन' भी पठनीय है। डॉ वर्मा राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक थे किन्तु अमूमन अन्य विद्वानों की तरह उन्होंने केवल अपनी बात प्लेटो और सुकरात से नहीं शुरू किया। उन्होंने अथर्वेद के एक मन्त्र से अपना कथन प्रारम्भ किया है और गीता तक की भी चर्चा की है। भगवान बुद्ध के दर्शन पर उन्होंने प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया है कि हमारे यहाँ दो प्रकार के चिंतक थे। पहले परम्परावादी और दूसरे क्रन्तिकारी। डॉ वर्मा ने तर्कपूर्वक प्रो लिगोस रोम के इस दावे का खंडन किया है कि सहिष्णुता की शिक्षा सर्व प्रथम जॉन लुइस ने दी। उन्होंने बताया है कि सहिष्णुता पर बिहार में दार्शनिक दृष्टि से बहुत पहले विचार हुआ था और हमारे यहाँ सर्व-धर्म समवाय पर जोर दिया गया है। 

डॉ रामखेलावन पाण्डेय का निबंध 'हिंदी साहित्य को बिहार की देन' सम्पूर्णता के निकट नहीं लगता है। डॉ पाण्डेय द्वारा रचित हिंदी साहित्य का इतिहास पुस्तक की कुछ बातें इस निबंध में भी आई हैं। राजा जनक, विश्वामित्र, पुष्यमित्र आदि की चर्चा की गयी है जिनका हिंदी साहित्य से कोई सम्बन्ध खोज पाना मुश्किल लगता है। सिद्धों पर उन्होंने विस्तार से चर्चा की है किन्तु जायसी के बाद आज तक हिंदी साहित्य में कुछ भी लिखा गया या नहीं इसकी चर्चा नहीं है। डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी के एक उपन्यास की चर्चा है किन्तु नलिन विलोचन शर्मा जैसे प्रख्यात समीक्षक या राष्ट्रकवि दिनकर जैसे कवि की चर्चा इस निबंध में नहीं है। इसी प्रकार शंकर दयाल सिंह का भी निबंध है। शंकर दयाल जी राजपुरुष थे, साहित्य में भी रूचि लेते थे लेकिन बिहार के साहित्यकारों का नाम गिनाने के क्रम में उन्होंने कुछ हिंदी प्राध्यापकों का नाम गिना दिए हैं किन्तु आरा, छपरा, रांची, मुजफ्फरपुर या जमशेदपुर के तत्कालीन किसी साहित्यकार की चर्चा नहीं की है। इसका कारण जल्दबाजी हो सकती है। 

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कुछ निबंध निश्चित रूप से उपयोगी हैं और कुछ में बिहार के शिक्षा, दर्शन, अध्यात्म आदि के बदले केवल माहात्म्य चर्चा की गयी है। संपादक द्वय डॉ चन्द्र भूषण सिन्हा एवं डॉ त्रिभुवन ओझा ने संपादन में और संग्रहण में अच्छी भूमिका निभाई है और बिहार पर जानने वालों के लिए इस पुस्तक से बहुत से सूत्र और उद्गम प्राप्त होंगे जहाँ से वे बिहार के अतीत को और वर्तमान को अच्छी तरह से समझ सकते हैं। बिहार की वर्तमान स्थिति पर कुछ और आलेख लेकर इस पुस्तक को और भी समृद्ध किया जा सकता था। जमशेदपुर (झारखण्ड) से बिहार पर इस प्रकार की पुस्तक का प्रकाशन वाकई एक सुधि प्रयास है और ऐसे प्रयास स्वागत योग्य ही होते हैं। 

 

पुस्तक--बिहार: अतीत और वर्तमान

संपादक--  डॉ चन्द्र भूषण सिन्हा एवं डॉ त्रिभुवन ओझा

प्रकाशक-- दिनकर परिषद, बिहार एसोसिएशन, जमशेदपुर

मूल्य-- १५० रु मात्र

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