बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हरि भटनागर का उपन्यास - एक थी मैना एक था कुम्हार (2)

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पिछले अंक 1  से जारी...

 

दोपहर को रोटी खाकर कुम्हार थोड़ी देर की नींद ज़रूर लेता था। इस वक़्त गमछे का तकिया बनाकर जब वह लेटा, कुम्हारिन सूप लेकर आ गई। उसे अनाज साफ़ करना था। अनाज ड्रम की तली में जा लगा था। चार साल के सूखे ने खेती की कमर तोड़ दी थी। छे बोरा अनाज कोई अनाज होता है, वह भी चार महीने में छिज गया था। आगे क्या होगा? -कुम्हारिन परेशान थी। ख़ुद कम से कम खाए, कुम्हार को भी दो रोटी कम दे; लेकिन गोपी को तो रोटी चाहिए थी। उसे कैसे रोके! बढ़ती उम्र का पौधा। दिन में दस बार रोटी माँगता था। और फिर बड़े मियां- उनका कितना पेट काटे?

ड्रम पल्टा तो एक कनस्तर अनाज था।

कुम्हार आँखें मीचे था पर सब उसे दीख रहा था। आँखें खोलकर भी क्या कर लेगा वह?

कुम्हारिन बोली- उधार पे उधार सामान दिये जा रहे हो, पैसे तो माँगो। पैसे माँगने से क्यों बचते हो?

कुम्हार ने साँस रोक ली।

-मुफत में आता हो तो चलो खैरात बाँट दो, लेकिन आदमी खैरात भी कितनी बाँटेगा! चार महीने से तुम घर में एक पैसा नहीं लाए। और उधार पर उधार सामान डाले जा रहे हो- हद है यह तो। कहो तो मैं चलूँ; लेकिन तू मुझे बोलने नहीं देगा। आँखें दिखाएगा, मारने की धमकी देगा।

कुम्हार की ज़ोरों की पलकें फड़कीं- क्या बके जा रही है यह! कब आँखें दिखलाईं इसे? कब धमकाया? जबरन कुछ भी बके जा रही है। समझती कुछ नहीं, बस लट्ठ लेकर पिल जाती है। पैसा लाओ, पैसा लाओ! कहाँ से लाऊँ पैसा? पैसा मिलना इतना आसान होता तो क्या कहने! हलवाई और चायवालों ने साफ़ कह दिया है थोड़ा रुक जाओ, पैसे दे देंगे! सो रुका हूँ। लड़ तो सकता नहीं। आगा-पीछा सब देखना पड़ता है। अपना कारोबार ही ऐसा है- क्या करें?

कुम्हारिन बोली- मैं पहले भी कह चुकी हूँ, तुम ज़रा अपना काम बदलो। ये नहीं कह रही कि कुम्हारी न करो। ख़ूब करो लेकिन दुनिया जैसी चल रही है, उस हिसाब से भी तो चलो। जब कुल्हड़ का चलन कम हो रहा है तो प्लास्टिक के बर्तन बेचो। उसका काट तो देखना ही होगा। पड़ोसियों को देखो, सबने कुम्हारी छोड़ दी। कोई रिक्शा चलाता है तो कोई आटो। कई तो कुली बन गए हैं। पेट के लिए हीला बदलना ही पड़ेगा। नहीं झींकते रहो, झंखते रहो, कोई पुछत्तर नहीं। लीला को देखो, गुड्डू को देखो, दूर क्यों जाते हो, अरविंद को देखो - सबने शहर में कई-कई झुग्गियाँ तान ली हैं। और जम गए हैं अच्छे से...

गहरी साँस छोड़ते हुए कुम्हार ने करवट बदली। खाट चरमराई। उफ! ये औरत तो आज अच्छे से बाँस करके रहेगी। बात तो वैसे सही कहती है लेकिन मैं भी तो मजबूर हूँ। धीरे-धीरे पटरी बदल लूँगा। एकदम से कैसे बदलूँ? इतना आसान भी नहीं है सब। हाथ का काम एक झटके में कैसे छोड़ दूँ, दूसरा नहीं जमा तो रह गए टापते। इसलिए रसे-रसे सब करूँगा। पहले भी मैं कह चुका हूँ। अभी चार साल से कुदरत ने भी बेरुखी दिखलाई है, बरखा भी नहीं हुई, ज़मीन का पानी पाताल में सरकता चला गया है, अब वह भी दम तोड़ रहा है... ऐसे में सारा खेल बिगड़ गया है; नहीं, सब रास्ते पर ठीक चल ही रहा था। गुज़ारे भर को मिल ही जाता था- आदमी को भला और कितना चाहिए?

उसने फिर करवट ली। इस बार गमछा नीचे आ गिरा। उसने उसकी परवाह नहीं की। पाटी पर सिर रखे वह आँखें मीचे रहा। एड़ी में ज़ोरों की खुजली मची तब भी उसने सहन किया, खुजाल नहीं मिटाई। नहीं, जी कर रहा था कि अदवान से ज़ोरों से रगड़ दे। श्यामल के बाबू, किसन से वह बात करेगा। बात तो वह पहले से ही कर चुका है, उसने कहा भी था कि कोई न कोई हीला ढूँढ दूँगा, थोड़ा रुक जाओ... अभी फिर बोलूँगा तो यही बात कहेगा। उसने कहा था कि आटो चलाना सीख लो, मज़े ही मज़े रहेंगे। शहर में न जाओ, शहर के बाहर ही बाहर फेरे में काम सध जाएगा। यह बात अलग है कि बहुत सारे आटो हो गए हैं, तो होंगे ही, आबादी का विस्फोट है तो ख़ूब होंगे लेकिन सबका कुछ न कुछ मामला जम ही जाता है और जमेगा भी क्यों नहीं?

खुजली जब हद पार कर गई तो वह बाध से एड़ी रगड़ने लगा। जब रहा नहीं गया तो उठकर बैठ गया। आँखें मीचे ही रहा जैसे सो रहा है। नींद में अक्सर वह उठकर बैठ जाता है फिर लेट जाता है; लेकिन पत्नी है कि जान रही है कि झूठ-मूठ नींद का बहाना कर रहा है, जग रहा है और सभी बातें सुन-समझ रहा है।

यकायक उसने कहा- पानी तो पिला! क्या जान ही लेती रहेगी या चुप भी रहेगी?

-चुप ही तो हूँ?

-अच्छा तो चुप है तू।

-नहीं दीख रहा है तुझे?

-नहीं, नहीं, तू चुप है। कौन कह रहा है कि तू बोल रही है कुछ?

-फिर क्यों बोलता है चुपाई लगाने को। अगर मेरे बोले को जान लेना कहता है तो आगे से कुछ नहीं कहूँगी। चाहे कुछ हो जाए। मुझे क्या?

-मुझे क्या?- कुम्हार तड़का।

-हाँ, मुझे क्या। तू जैसे रखेगा, रहूँगी, मूँ नहीं खोलूँगी आगे से।

-मूँ नहीं खोलेगी आगे से- कुम्हार हँसा - रोज़ आफत मचाए है, कहती है मूँ नहीं खोलूँगी। और कैसे मूँ खोलेगी?

-तो ठीक है, तू जान तेरी गृहस्थी जाने। मैं जाती हूँ।

-कहाँ जाती है?- कुम्हार ने झूठा ग़ुस्सा दिखलाया।

-भाई के हियां।

-भाई के हियां?

-हाँ, भाई के हियां!

-कौन भाई?

-अब कौन भाई हो गया वह? ज़रूरत होती है तो उसे याद करते हो, वह दौड़ा आता है, अब कह रहे हो कौन भाई?

वह हँसा- अच्छा, अवध की बात कर रही है।

-नहीं, किसी और की कर रही हूँ।

-तो जा भाई के हियां। मैं यहाँ सब देख लूँगा।

-क्या देख लोगे हियाँ?

-काम-दंद और क्या?

-बड़ा काम-दंद है- लक्खों रुपय्ये आ रहे हैं, हुण्डी बरस रही है!- हुँ - कुम्हारिन व्यंग्य से हँसी।

-अच्छा, तो जा के दिखा भाई के हियां।

-जाऊँगी तो क्या कर लेगा?

-क्या कर लेगा? जानती नहीं है क्या?

-जानती हूँ, लंगड़ी को ले आएगा, यही न। ले आ तू लंगड़ी को, ज़रा मैं भी तो देखूँ?

बात हास्य में बदल गई। कुम्हार बेतरह हँसने लगा कि उसके पेट में बल पड़ गया। साँस रुकने-रुकने को हो आई।

कुम्हारिन बोली- इसी बल पे ला रहा था लंगड़ी को। ला न! कौन रोकता है तुझे। कर ले अपने मन की। वो भी सुख भोग लेगी यहाँ!

-अच्छा अब चुप तो कर- कुम्हार हाथ जोड़ता बोला और निढाल-सा ज़मीन पर लोट गया।

***

गोपी प्लास्टिक के ऑटो से खेल रहा है। इस खेल में वह ऑटो चालक है। पीछे तीन-चार सवारी बैठाले है। पहले वह मुँह से आवाज़ कर ऑटो स्टार्ट करता है, ऑटो स्टार्ट नहीं होता तो वह सवारी से कह रहा है- भाई रुकना, कहीं जाने की जरूरत नहीं। कभी-कभी गाड़ी गड़बड़ करती है, बस स्टार्ट होने ही वाली है, इंजन में कचरा आ गया है।

गोपी ज़मीन में लेट जाता है, ऑटो के नीचे उँगलियाँ डाल के बोलता है- हो जा ठीक भाई, सवारियों को परेशानी हो रही है।

ऑटो को आगे-पीछे करता है, इतने में गाड़ी स्टार्ट हो जाती है। वह बोला-हाँ भाई, गाड़ी स्टार्ट हो गई। हाँ, आपको कहाँ जाना है? पैसे निकालो। आपको कहाँ जाना है? फुटकर दो, आप के पास छुट्टे नहीं हैं? भाई, छुट्टा ले के बैठा करो, नहीं, दूसरी गाड़ी करो, क्या? हाँ, पैर अन्दर करो, ये बाई, तुझे बैठना नहीं आता तो काहे को बैठती है, भटसूअर से जाओ। हमारी गाड़ी खाली नहीं। ये उधारी नहीं चलने का, हटो, उतरो, भटसूअर देखो। देखते नहीं पेट्रोल महँगा हो रहा है, बो अपन से नगद माँगता, अपन कहाँ से देंगे?

कुम्हार-कुम्हारिन गोपी के इस खेल को देख रहे हैं। पिछले माह कुम्हारिन का भाई, अवध आया था, उसके हाथ में प्लास्टिक का बड़ा-सा ऑटो था। भारी स्नेह से भरकर वह गोपी से बोला था- ले, तेरे लिए ऑटो लाया हूँ। तू इससे खेल। अभी तो यह तेरा खिलौना है, बड़ा होगा तो तेरे लिए सचमुच का ऑटो मैं दूँगा। तू उसे चलाना और मेरा नाम रौशन करना कि अवध मामा का ऑटो चला रहा है। और गाड़ी भी तू बिल्कुल भन्नाट रखना कि लोग बैठने के लिए मर-मिटें। क्या???

कुम्हारिन बोली- जब आटो देना तब बोलना, अभी से क्या डींगें हाँक रहा है।

कुम्हार बोला- ख़ुद तो गधा हाँकता है, भानेज को आटो का सपना दिखला रहा है, वह भी झूठ का। गपोड़ी कहीं का, लफंटूस।

-यह झूठा सपना नहीं है, तुम देख लेना। हमारा यह छोरा सबसे अलग और सबसे तेज़ तर्रार होगा कि कोई बराबरी नहीं कर सकता इसकी। सच्ची कह रहा हूँ मैं।

-समय आने पर देखूँगा। अभी से क्या कुछ सोचें?- कुम्हार बोला।

लेकिन आज गोपी का यह रूप देखा तो वह दंग रह गया- अभी छोरा यह खेल कर रहा है तो आगे क्या करेगा? बिल्कुल आटोवालों जैसी आवाज़ और उन्हीं का-सा बोलने का अंदाज। ग़जब है!!!

कुम्हारिन निहाल थी। कानों पर हाथ रखती, माथे से उँगलियाँ चटखाती कुम्हार पर बरजती बोली- नजर न लगाओ हमारे बेटे को। कोई कमाल नहीं है। आज सारे बच्चे ऐसई हैं- नए ज़माने की हवा में पले। श्यामल का कौतुक देखोगे तो दाँतों तले उँगलियाँ दबा लोगे। श्यामल की मताई कह रही थी कि एक दिन बो दारू-खुट्टे की नकल कर रहा था जैसे सच्ची-मुच्ची में पी रखे हो।

कहते-कहते वह यकायक चुप हो गई। जैसे कोई बात याद हो आई हो। उसे ख़्याल आया कि अवध ने आज के दिन आने की कही थी। वह आ रहा है और घर में खाने को एक दाना नहीं। क्या देगी वह उसे खाने को?

कुम्हारिन के अंदर चल रही हलचल को जैसे कुम्हार ताड़ गया, बोला- तुम क्यों न्यौत देती हो। घर की हालत देख रही हो फिर भी आने की बोल देती हो। उस बखत चुपाई लगा जानी चाहिए थी तुम्हें!

-तुझे शरम नहीं आती ऐसी बातें सोचते। कोई आने को कह रहा है और मैं मना कर दूँ। तू क्यों बोला था उस बखत। उस बखत तो उससे आने की ज़िद कर बैठा था कि आ जा, मैं घर में रहूँगा और जब बो आ रहा है तो मुझ पर दोष मढ़ रहा है।

-क्या दोष मढ़ रहा हूँ?

-यही कि अच्छी बात अपने सिर, बुरी बात मेरे सिर।

गहरी साँस छोड़ता कुम्हार निरीह भाव से बोला- नहीं रे, ऐसा कुछ नहीं। किसी के सिर पर कोई दोष नहीं। तंगी है इसलिए सारा मामला खटास गया है। नहीं, कभी कोई दिक़्क़त थी? अपने घर तो कितने भी लोग आए, हमने सबका आदर-सत्कार किया। जो भी घर में रहा रूखा-सूखा, सब इज़्ज़त के साथ परोसा। अब हालात ऐसे हैं तो क्या करें। फिर भी देखते हैं, क्या होता है, आने दो अवध को। मैं लाला के पास जाता हूँ, वह कुछ न कुछ उधारी का चुकारा करेगा- विपत्ति में कोई किसी का साथ नहीं देगा तो वह भला आदमी कैसा! लाला ने हमेशा हमारी मदद की है और हमने लाला की...

इधर पति-पत्नी में जब यह बातें हो रही थीं, गोपी पता नहीं कब यहाँ से सरका और सीधे श्यामल के पास जा पहुँचा।

श्यामल दूध में रोटी मीड़ के खा रहा था। श्यामल की माँ ने जब गोपी को दूध-रोटी खाने के लिए कहा तो वह बोला-मेरा पेट भरा है, टन-टन बोल रहा है।

-अच्छा! -गौरी ने भेदभरी नज़रों से उसे देखा, पूछा- क्या खाया तूने आज?

-लिट्टी! गोपी ने ऐसा बहाना बनाया जो सीधे पकड़ में आ गया।

-लिट्टी बनाई है तेरी माँ ने! - गौरी ने उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देखा- चूल्हे के अंगार में पकाई या कण्डे में?

गोपी फिर सरासर झूठ बोल गया- कण्डे में। और कण्डा तो आपके घर से आया था।

-और कटोरी में घी भी मैंने दिया था न? -गौरी ने गोपी का कान पकड़ा- इधर आ। झूठ कब से बोलने लगा तू? बता?

गोपी सन्न।

-तू अपनी मताई के आगे बोलेगा जो तूने कहा।

गोपी सकते में आ गया। यकायक बिसूरने लगा। आँसू चू पड़े उसके। हिचकियों के बीच बोला- मौसी माँ, माँ ने मना किया था मूँ खोलने को, हमारे घर तो कल सुबह से चूल्हा नहीं जला!

गौरी सारी बातें महसूस कर रही थी। गहरी साँस भरके बोली- चुप रह तू। मैं सब जानती हूँ...

उसने गोपी को अपने हाथ से मीड़ी रोटी खिलाई फिर झोपड़े में जा घुसी। लौटी तो उसकी कमर पर बड़ी-सी डलिया थी जिसमें गेहूँ भरे थे। उसने कुम्हार- कुम्हारिन की आहट लेकर डलिया गोपी के आँगन में रखी और पिछवाड़े से हड़बड़ अपने झोपड़े में आ गई।

बड़े मियां को खुल्ला छोड़ने के लिए जब कुम्हारिन आँगन से निकली, सामने डलिया देखकर सन्न रह गई। समझ गई किसकी करतूत है यह!

वह सीधे गौरी के पास आई, बोली- ये गड़बड़ तू क्यों करती रहती है?

-कौन-सी गड़बड़ बहन? भोले अंदाज़ में गौरी ने पूछा।

-नहीं जानती है तू?

-नहीं! क्या हो गया? बोलो तो सई!

-इत्ती सीधी तू कब से हो गई?

-मैं समझी नहीं, क्या हो गया है बहन?

कुम्हारिन ने उसे सख़्त निगाहों से देखा, बोली-तू बदमाशी बहुत करने लगी है। ये ठीक नहीं है, कहे देती हूँ।

गौरी सिर खुजाने लगी- बहन, मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ। तुम सीधे-सीधे क्यों नहीं बोलती?

-मैं डलिया कूड़े में डाल दूँगी?

-कौन-सी डलिया? गौरी अनजान बनी रही।

-नहीं जानती तू? अनाज की डलिया जो तू चुपके से रख आई है।

-डलिया!- गौरी ने फिर उसी अंदाज़ में कहा- कौन-सी डलिया, तुम क्या कहे जा रही हो तब से? मैंने कोई डलिया नहीं रक्खी।

-तेरी करामात है सब। तेरी डलिया नहीं पहचानती क्या मैं?

यकायक बड़े मियां सामने आ खड़े हुए और उनकी तीखी सी-पो के बीच बात यहीं ख़त्म हो गई।

***

आज कुम्हार की मैना से ख़ूब बातें हुईं।

तड़के जब कुम्हार की नींद टूटी, उसने सबसे पहले नीम के नीचे अच्छे से झाडू लगाई और पानी का छिड़काव किया जिससे चारों तरफ़ सोंधी-सोंधी गंध फैली थी।

कुम्हारिन ने सूप में दाना रखा और चाक के पास रोज़ की तरह जमा दिया ताकि मैना आराम से चुग सके।

सुबह की पीली धूप जब चारों ओर ख़ुशबू की तरह फैली थी, कुम्हार लोकगीत की कोई दिलक़श कड़ी गुनगुना रहा था, तभी मैना जो काफ़ी देर से नीम में छुपी बैठी हज़ारों तरह के गीत गा रही थी, अचानक उड़कर चाक पर आ बैठी।

कुम्हार के मन में जो सवाल कई दिनों से उमड़-घुमड़ रहे थे, आज ज़बान पर आ गए। मैना ने अपनी आप-बीती उसके सामने बयाँ कर दी।

एक गाँव, क़सबे, शहर या मुल्क़, आप जो भी चाहें नाम दें, उस गाँव, क़सबे, शहर या मुल्क़ में अपने परिवार के साथ मैं रहती थी। परिवार में मैं थी और मेरा मैना। जैसा कि आप जानते हैं, परिवार में बच्चे भी होते हैं, लेकिन बच्चे हमारे मेहमान होते हैं। जब तक वे चूजे होते हैं, हमारे वसीले, सहारे से रहते हैं। सज्ञान होते ही वे आत्म-निर्भर हो जाते हैं। हमसे पल्ला झाड़ लेते हैं। इसलिए पंछी का परिवार पति-पत्नी का होता है, उसमें बच्चे शामिल नहीं होते। एक तरह से यह पंछी जाति के नियम के ख़िलाफ़ होता है जब सज्ञान पंछी भी माँ-बाप के साथ रहे। यह कभी होता ही नहीं, इसलिए हम बच्चों की बात नहीं करते हैं। तो परिवार में मैं थी और मैना। एक बड़े से, घनघोर घने नीम के पेड़ में हमारा बसेरा था। घोंसला तो हम एक बार बनाते हैं लेकिन हर साल उसका नवनिर्माण-सा करते जाते हैं। नायाब क़िस्म की घास-फूस हम खोजते हैं जो हमारे सुख का बिस्तर बनती हैं। सुबह से अँधेरा घिरने तक हमारे घोंसले को सूरज का उजाला रौशन रखता है और अँधेरा घिरते ही जुगनुओं की टिमटिम। हम गोंद के सहारे जुगनुओं को जगह-जगह स्थिर कर देते हैं। अब आप सोच सकते हैं, कैसा झाँकी जैसा सुंदर होता होगा हमारा आशियाना। मज़बूत और सुरक्षित इतना कि आँधी-तूफान, सर्दी-गर्मी या घनघोर बारिश में लौह कवच रहता है। तो ऐसे सुंदर घोंसले में हम रहते थे। सुबह से शाम और शाम से सुबह के बदलाव हमारी दिनचर्या के अहम पहलू होते हैं। ये पाठशाला में लगने वाली कक्षाओं के विविध विषय हैं जिसमें प्रऔति की तरह-तरह की शिक्षिकाएँ हमें पाठ पढ़ाने आती हैं। हम अपने पाठ को बहुत ही ध्यान और तल्लीनता से याद करते हैं क्योंकि पाठ कभी दोहराए नहीं जाते। इसलिए ध्यान और तल्लीनता हमारे मूल मंत्र होते हैं। जो पंछी इनसे महरूम होते हैं, वे ज़िन्दगी से महरूम हो जाते हैं... तो ऐसी कक्षाओं के हम छात्र थे जिन्होेंने सभी दर्ज़े में अव्वल नम्बर पाए। उड़ान की शिक्षा हो या शिकार की या घोंसला निर्माण की या संगीत की- हम सभी में महारत हासिल कर चुके थे। लेकिन जैसा कि कहा जाता है, कभी-कभी चमत्कार होते हैं। हमारा मैना चमत्कारी जीव था। उसे गायन का वरदान हासिल था। ऐसा गाने वाला पंछी दूसरा न था। कोई उसकी बराबरी नहीं कर सकता था। तरह-तरह के गान गाता लगता झमाझम बारिश हो रही हो, बिजली कड़क रही हो, माँ लोरी गाकर बच्चे को सुला रही हो, प्रेमिका अपने प्रेमी को लुभा रही हो, चाँदनी घनीभूत हो रही हो... ऐसे-ऐसे भाव, कल्पनातीत कि कुछ कहा नहीं जा सकता, कोई कवित्त उसे ज़बान नहीं दे सकता...

तो उस गाँव, क़सबे, शहर या मुल्क़ में मैना का बड़ा नाम था। ऐसा गवैया किसी ने कहीं देखा नहीं। हर किसी की ज़बान पर उसका नाम। हर कोई उसका दीवाना। जो देखो वही उसकी तरफ़ खिंचा चला आ रहा हो। और मैना था कि उसे न खाने-पीने की फ़िक्र और न किसी चीज़ की चाह। बस गाना, गाना और गाना। और ऐसा कि लोग छाती पीट लेते, पाग़ल हो जाते, दीवाने हो जाते, बौरा जाते। मर-मिटते। तो उसका ऐसा था जस, हर तरफ़, हर दिशाओं में।

जब ऐसा जस और हर तरफ़ दीवानगी का आलम था तो ऐसे में एक ऐसा भी दीवाना था जो मैना को अपने क़ब्ज़े में रखना चाहता था। वह बहुत ही धनवान, मज़बूत इरादे का, कहें उस गाँव, क़सबे, शहर या मुल्क़ का राजा था। सब कुछ उसके क़ब्ज़े में था तो मैना उसके क़ब्ज़े से बाहर क्यों? यह एक ऐसा सवाल था जिसने उस राजा को परेशान कर दिया। उसने अपने मंत्री-संतरियों को हुक्म दिया कि मैना उसके दरबार में, महल में हो। और न होने पर वे अपना दण्ड ख़ुद अपने हिसाब से तै कर लें। इस तरह उसके मंत्री-संतरी सब ख़बरदार हो गए। राजा ने तिजोरियाँ खोल दीं और आँधी-तूफ़ान-सा मच गया अर्थात् योजनाएँ बन गईं, लोग तैनात हुए। पैसा पानी की तरह बहने लगा। राजा का हुक्म था कि कितना भी पैसा लगे, चिंता नहीं, बस काम हो। लेकिन अज़ीब आलम था, सब तरफ़ मैना का गान गूँज रहा था मगर मैना किसी को दिख नहीं रहा था। वह कहाँ छिपा बैठा है- कोई इस रहस्य को भेद नहीं पा रहा था। यह बात राजा को बताई गई, राजा अलफ। सबको दरबार में हाज़िर होने का हुक्म दिया जाता है। सब भयभीत-से कोर्निश बजाते हुए दरबार में हाजिर। राजा से प्रार्थना के अंदाज़ में निवेदन किया गया कि पंछी को पकड़ना आसान काम नहीं। आदमी हो तो उसे मिनटों में क़ैद कर लिया जाए। मैना रहा पंछी, वह क्षण-क्षण में इधर-उधर हो जाता है। मैना पकड़ा तो जाएगा, इसके लिए पर्याप्त समय और धन की जरूरत है ताकि काम को अंजाम दिया जा सके। राजा मान गया। पर्याप्त समय और धन मुहैया कराया गया। इस क्रम में सारे के सारे जंगल के जंगल उजड़ गए। पेड़-पालव जड़ से उखाड़ दिए गये। वह नीम का विशाल पेड़ जिसमें हमारा आशियाना था, छिन्न-भिन्न, तहस-नहस कर दिया गया। जब इतना कुछ हो गया तब पंछी को तो मिल जाना चाहिए था लेकिन पंछी ग़ायब तो ग़ायब। हाँ, उसके सुमधुर संगीत की गूँज हर तरफ़ ख़ुशबू की तरह फैली थी।

राजा मसनद से टिका बैठा है। मंत्री-संतरी उसके पैरों पर लोटे-से हैं। राजा को ग़ुस्सा आता है लेकिन जब मंत्री-संतरी पैरों पर हों तो कितनी देर ग़ुस्सा किया जाए। राजा सोच रहा है। मंत्री-संतरियों में इशारे चल रहे हैं। इशारों में कहा जा रहा है कि नई पकड़ योजना बता दी जाए, यही समय है। इसमें अरबों रुपए और बेहिसाब अमले की माँग थी।

-क्यों नहीं। रुपये और अमले दिए जाएँ- राजा का सख़्त आदेश।

नई पकड़ योजना विद्युत-गति से कार्य करती है। जब जंगल के सारे पेड़ सिरे से गिरा दिए गए तो पंछी कहाँ गया? ज़रूर जनता के बीच विद्रोही तत्त्व हैं जो गड़बड़ कर रहे हैं! इसलिए उन्हें दुरुस्त किया जाना बेहद ज़रूरी है। लिहाज़ा चीन्ह-चीन्ह कर लोगों को गिरफ़्तार किया जाने लगा। उन्हें सजाएँ दी गईं, उनके घर गिराए जाने लगे- इसके बाद भी गड़बड़। यह बुरी बात है। दमन तेज़ किया जाता है। पूरी की पूरी बस्तियाँ उजाड़ दी जाती हैं।

राजा प्रसन्न। बाग़ी जनता को ठिकाने लगाया जा रहा है। उसे राज में रहने का हक़ नहीं। उसने विश्वास खो दिया है...

राजा फिर दुःखी। इतना कुछ होने के बाद भी मैना हाथ नहीं आ रहा है- बहुत ही ख़राब बात है यह!

फिर दरबार में मंत्री-संतरी हाजिर। राजा से इस बार एक ख़ास अनुरोध किया गया। बताया गया कि एक योजनाकार है जो पहुँचा हुआ आदमी है। बिल्कुल चमत्कार जैसा। वह अपना काम कर देगा। राजा का आदेश हुआ। उसे दरबार में लाया गया। गंजा-सा नाटा आदमी। बड़ी-बड़ी आँखें, कहा जाए, वह समूचे शरीर से बोलता था। उसने एक नई योजना प्रस्तुत की। अरबों रुपये के व्यय वाली इस योजना को राजा ने सहर्ष मंजूरी दे दी।

मंत्री-संतरी चिंता में हुए कि कहीं यह योजनाकार हमें जुल न दे जाए, सीधे अकेले इतनी बड़ी रक़म न मार ले जाए और हम मुँह टापते रह जाएँ, फिर सोचा कि मंत्री-संतरियों से बच के कहाँ जाएगा? ऐसी पटखनी लगाएँगे कि बच्चू को छठी का दूध याद आ जाएगा- इसलिए सब शाँत रहे। देखते जाओ, आगे-आगे होता है क्या?

इस नाटे, गंजे आदमी ने मंत्री-संतरियों से आदेश लिया कि काम शुरू किया जाए। मंत्री-संतरियों ने एक स्वर में कहा- काम शुरू किया जाए।

और फिर काम शुरू किया गया। इस नाटे, गंजे आदमी ने बड़ा-सा आसमान जितना ऊँचा तम्बू लगवाया। गज़ब का सुंदर। राजा के महल जैसा। मुल्क़ के गायकों को आमंत्रण भेजा। और संगीत सभा शुरू की गई। मैना को पकड़ने का यह एक बिल्कुल नया और अनोखा खेल था। अबाध गति से अहर्निश चलने वाली यह संगीत सभा थी। ऐसा संगीत कि आप देखते और सुनते रह जाएँ। मंत्र-मुग्ध। हज़ारों गायकों और वादकों का महासमर। एक तरफ़ संगीत, दूसरी तरफ़ लंगर। संगीत और श्रोताओं के लिए तरह-तरह के सुस्वादु व्यंजन। सब भारी प्रसन्न।

छः माह तक संगीत का महासमर जारी रहा, लेकिन अभी तक कोई निचोड़ निकलकर नहीं आ पाया था। राजा का धीरज जवाब दे गया। आँखों में ग़ुस्सा। तलवार म्यान से निकली हुई। नाटे, गंजे आदमी को महल में तलब किया गया। नाटा, गंजा आदमी निश्फिकर, शांत। राजा फाड़खाने पर उतारू। नाटे, गंजे आदमी ने राजा के पाँवों पर सिर रख दिया और विनती की कि मैना एक चमत्कारी पंछी है। इसे चमत्कार से ही पकड़ा जा सकता है, इसलिए हे राजन! परमज्ञानी, इस कार्य को अंजाम देने में समय जरूर लग रहा है लेकिन किसी भी क्षण काम हो जाएगा, इसलिए ज़रा भी मन खिन्न न करें, काम हो जाएगा...

राजा का ग़ुस्सा ढीला पड़ गया। तलवार म्यान में विश्राम के लिए चली गई। राजा रनिवास में।

एक माह के बाद फिर राजा भारी नाराज़। तलवार म्यान से बाहर। नाटा-गंजा आदमी फिर राजा के पाँवों में। उसने राजा से रोते हुए कहा कि उसके काम को उसके साथ का एक आदमी अटका रहा है। उस आदमी को ठिकाने लगाए जाने पर ही अपना काम आसानी से हो जाएगा।

यह आदमी एक बड़ा संगीतकार था। नाटा-गंजा आदमी ख़ुद एक संगीतकार था, लेकिन अपने सामने किसी दूसरे संगीतकार को चाहे वह कितना भी बड़ा हो, बराबरी या अपने से ऊपर रखना हेठी मानता था। उसके वजूद के लिए वह ख़तरा था, सो वह उसे रास्ते से हटाना चाहता था।

राजा ने पूछा- यह बात पहले क्यों नहीं बताई गई?

वह बोला - हुजूर, यही तो रोना है, आस्तीन में साँप वाली कहावत ग़लत थोड़े है। संगीतकारों, हमारे अमले से पूछ लीजिए- मैं तो संकोच में था कि हुजूर से क्या कहें, कहीं हुजूर ग़लत न समझ बैठें। हुजूर, इस आदमी ने महाराज का काम रोका जिसकी भारी सज़ा बनती है...

राजा का हुक़्म हुआ। उस पर अमल किया गया। नाटे, गंजे आदमी के सामने उस आदमी को फाँसी पर लटकाया गया जिसने राजा के काम में रोड़े अटकाए थे। उसके पूरे परिवार का क़त्ल कर दिया गया और फिर आग के हवाले।

इतना कुछ हो जाने के बाद भी फ़तह होती दिख नहीं रही थी। राजा के ग़ुस्से को बढ़ाने के लिए यह काफ़ी था, लेकिन नाटा, गंजा आदमी भारी निश्फिकर। पूरी तरह सामान्य। कोर्निश बजाते हुए बोला- हुजूर, उस आदमी का असर जब ख़त्म होगा, तभी अपना काम हो पाएगा। उस आदमी के असर को ख़त्म करने के लिए एक दूसरी बल्कि बहुत ही बड़ी संगीत सभा का आयोजन किया जाना ज़रूरी है जिसके रास्ते ही मैना की पकड़ सुनिश्चित है- कहकर नाटे, गंजे आदमी ने अरबों रुपयों की और समय की माँग की।

राजा मुस्कुराया। उसने नाटे, गंजे आदमी की माँग मान ली।

उस गाँव, क़सबे, शहर या मुल्क़ के बीचोबीच बहुत ही विशाल, गगन-चुम्बी शामियाना लगाया गया। शामियाने के निर्माण के लिए देश-विदेश के आला दरज़े के कलाकारों को रातों-रात बुलाया गया जिन्होंने दिन-रात की मेहनत से शामियाना तैयार किया। रौशनी की जबरदस्त व्यवस्था की गई। मंच के पीछे का दृश्य ऐसा था जैसे आसमान से आकाश-गंगा उतर आई हो। बड़े-बड़े आरामदेह मसनद लगे, मुलायम-मुलायम गद्दे। मंच के दोनों तरफ़ साजिंदों का दल था। लाखों की तादाद में जनता इकट्ठा हुई थी मैना के गायन को सुनने के लिए। सबसे आगे की सफ़ में राजा, उसके पीछे मंत्री-संतरी। मंच के पीछे नाटा, गंजा आदमी, बेचैनी से दौड़ता हुआ-सा जैसे किसी को जल्द से जल्द मैना को मंच पर ले आने का हुक़्म दे रहा हो।

राजा भारी प्रसन्न। आज उसकी इच्छा पूरी हो जाएगी। उसके हाथ में फूल है जिसे वह रह-रह सूँघ लेता है। वह मंच की तरफ़ देख रहा है।

यकायक उसने मंत्री से पूछा- देर काहे की है?

मंत्री ने अपने नीचे के अफ़सर से और उस अफ़सर ने अपने नीचे के अफ़सर से पूछा। कई सीढ़ियाँ पार करता यह प्रश्न अंत में सीढ़ी के अंतिम पायदान के बंदे के पास पहुँचा जिसने घबड़ाकर मंच पर बेचैनी से दौड़-से रहे नाटे, गंजे आदमी से पूछा।

नाटा, गंजा आदमी अब एकदम शांत, निर्विकार, सहज भाव ओढ़े, धीरे-धीरे चलता राजा के पास आया। हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। मुस्कुरा कर बोला -सरकार, मैना मंच पर कुछ ही देर में आ जाएगा। वह गायन के लिए तैयार हो रहा है। बस थोड़ी-सी देर है हुजूर!

मंत्री-संतरियों में यह फुसफुस थी कि मैना को कैसे हस्तगत किया गया। किसी को भनक नहीं लग पाई थी इसलिए सब बेचैन थे। राजा से बच रहे थे कि पूछने पर क्या जवाब दें? यह नाटा, गंजा आदमी भी गज़ब का चंट है कि कुछ बतला भी नहीं रहा है। सीधे राजा से जुड़ गया है। इसे बाद में समझेंगे, लेकिन अभी क्या किया जाए? सभी काँप रहे हैं, पसीना-पसीना हो रहे हैं।

सबसे बड़े अर्थात् प्रधान मंत्री ने नाटे, गंजे आदमी के कान में धीरे से यह बात डाली कि मैना आख़िर कैसे हाथ लगा?

नाटा, गंजा आदमी आँखें चमका रहा है, कंधे उचका रहा है- ये रहस्य तो सीधे राजा साहब को बतलाना है, यह उनका हुकुम है!!!

-क-क-क क्या? प्रधान मंत्री हकला-सा गया, आँखें बाहर को निकल पड़ीं।

राजा ने नाटे, गंजे आदमी को प्रसन्न होकर अपने बग़ल बैठने का हुक़्म दिया। नाटा गंजा आदमी भला राजा के बग़ल बैठ कैसे सकता है! हाथ जोड़ता विनीत, तर जाने के-से भाव में राजा के पैरों में बैठ गया। राजा के पाँव दबाने लगा।

राजा और ख़ुश। मंत्री और संतरियों की हालत ख़राब।

राजा ने जब नाटे, गंजे आदमी से मैना के हस्तगत किए जाने की रणनीति के बारे में पूछा तो उसने बिछ जाने के अंदाज़ में कहा- हुजूर, राजाओं के राजा! राजाधिराज, हमने मैना को हस्तगत करने के लिए कोई नई नीति का इस्तेमाल नहीं किया। बस अपनी परम्परा को याद किया। परम्परा की स्मृति ही हमारा मूल मंत्र है। कहते भी हैं कि घर का भेदी लंका ढावे- हुजूर, यह बहुत सीधा -सा रास्ता था। हमने इसका इस्तेमाल किया और बस मैना अपने हाथ में।

राजा गदगद, प्रसन्न। हँसे जा रहा है, हँसे जा रहा है। यकायक उसने प्रधान मंत्री को हुक़्म दिया कि इस योजनाकार को ऊँचे ओहदे पर पदासीन किया जाए और मालामाल कर दिया जाए।

नाटा, गंजा आदमी राजा के चरणों में लोट गया

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

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