बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हरि भटनागर का उपन्यास - एक थी मैना एक था कुम्हार (8)

पिछले अंक 7 से जारी..

शाम को जब कुम्हार घर पहुँचा, मैना कर्कश स्वर में किटकिट करती मिली। उसे अंदेशा हुआ ज़रूर कोई गड़बड़ है। और यह गड़बड़ ख़ुद उसी से हुई है- अँगूठा लगा के! पटवारी ने साज़िश रच के उससे अँगूठा ले लिया जिसमें उसका सर्वस्व था जो अब उसका नहीं रहा।

वह झोपड़े के बाहर पड़ी खाट पर बैठ गया, सिर थाम के।

कुम्हारिन झोपड़े से बाहर निकली तो भोला को इस तरह बैठा देखकर बोली- अरे, तुम कब आए? मैं तो गोपी की वजह से नहीं आ पाई, उसको दस्त लग गए थे, लस्त पड़ा है, लगता है धूप लग गई...

भोला उसी तरह बैठा रहा, कोई जवाब नहीं दिया, तो कुम्हारिन ने उसे झकझोर डाला- ये क्या है? मुँह क्यों लटकाए हो? साहब से भेंट हुई?

बहुत ही मरी आवाज़ में भोला ने कहा - साहब मरदूद आया ही नहीं। दुःख की बात तो ये कि बस्ती का एक आदमी पास न था। कल काकी थीं और मैं। आज काकी भी नहीं आ पाईं- ऐसे में भला मैं क्या कर लूँगा!

-हे भगवान! लगता है, किसी को अपनी ज़मीन से प्यार ही नहीं - कुम्हारिन बोली -ऐसे में गौरमिंट अपने हिसाब से सबको बेदख़ल कर देगी। हम लोग रह जाएँगे टापते। यकायक वह चुप हो गई, क्षणभर बाद आगे बोली - लेकिन - तुम्हें हार नहीं माननी है। एक अकेला आदमी भी भारी होता है हुकूमत को झुकाने में...

कुम्हार की आँखें खुली थीं लेकिन दिमाग़ शपथ-पत्र में डूबा था जिस पर उसने अँगूठा लगाया था। क्यों की उसने ग़ल्ती? बहकावे में क्यों आ गया???

और जब यह बात उसने कुम्हारिन से की तो लगा उस पर बिजली गिर पड़ी हो। काफ़ी देर तक वह अवाक्-सी रही, फिर बोली - तुमसे कहा था कि उसकी मीठी बातों में न आना; आख़िर आ ही गए!!! काहे के लिए किसी काग़ज़ पर अँगूठा लगा दिया - कहीं वह ज़मीन का काग़ज़ तो नहीं? हो सकता है, वह ज़मीन का काग़ज़ रहा हो- गहरे अफ़सोस में कुम्हारिन ने अपना मत्था पीट लिया।

यकायक कुम्हार के दिमाग़ में पता नहीं क्या आया, वह उठा और दौड़ता हुआ-सा पटवारी के घर जा पहुँचा।

पटवारी समझ गया कि भोला किसलिए आया है। उसने अपने को पूरी तरह ठण्डा और विनम्र रखा, पूछा -भोला, क्या हुआ? इत्ती रात में कैसे आना हुआ? खैरियत तो है?

भोला ने करुणार्द्र स्वर में कहा- मालिक, हम तो आप के गुलाम हैं, आप पे भरोसा करते हैं। ज़मीन के मामले में कहीं कोई गड़बड़ी न होने पाए, नहीं हम कहीं के न रहेंगे।

पटवारी ने उसका कंधा छूते हुए कहा- भोला, तू बलभद्दर पाँड़े के पास आया है, और उस पर भरोसा किया है और तू जानता है कि मैं ब्राह्मण आदमी हूँ। हमसे ग़लत बात कभी हुई न होगी, चूक की बात अलग है। इसलिए तुम निश्फिकर रहो। तुम सोच रहे होगे कि तुमसे जो अँगूठा लगवाया है, कहीं वह गड़बड़ तो नहीं। अरे भाई, लूटने के लिए तुम्हीं बचे थे क्या? यह ब्राह्मण जब तुम्हें वचन दे चुका है तो तुम्हारे साथ कोई धाँधली नहीं करेगा और न होने देगा। यह जान लो। इसलिए तुम किसी चिंता में न गलो। जाकर आराम से रोटी खाओ, चैन से सो। है न? काहे के लिए दिमाग़ में उल्टी-सीधी बातें लाते हो। यह भी जान लो- यह बात तुम किसी से कहना भी नहीं- लोग अपने अपने हिसाब से तुम्हें ज्ञान देंगे और तुम परेशान होगे और होना हवाना कुछ नहीं। इसलिए मेरा भरोसा करो और जाओ। खाना खाना हो तो हमारे साथ दो रोटी खा लो। बढ़िया कढ़ी बनी है, मीठी नीम की पत्तियाँ डली हैं, आओ दो रोटी इस ब्राह्मण की भी खा लो...

भोला यहाँ से जब निकला, उसका चित्त शांत था। किसी तरह की कोई दुविधा मन में न थी। अँधेरे में जब वह झोपड़े के पास पहुँचा, उसे बच्चू, श्यामल के बाबू और बूढ़े काका की आवाज़ें सुनाई पड़ीं। पत्नी की भी आवाज़ आ रही थी। लगता था जैसे वह कोई सफ़ाई दे रही हो और लोग हैं कि उसकी बात मान नहीं रहे हैं।

पास पहुँचते ही, कुम्हारिन ने कहा- ये लोग तुम्हें अगोर रहे थे। बच्चू कह रहा है कि तुमने...

-क्या तुमने? समझा नहीं? -कुम्हार ने भौंहें चढ़ाकर पूछा।

बच्चू ने यकायक तीखी आवाज़ में उससे पूछा -सुना है तुमने किसी काग़ज़ पर अँगूठा लगाया है?

-हाँ, लगाया है, क्यों? -कुम्हार ने शांत भाव से जवाब दिया।

-तुमने अँगूठा क्यों लगाया? - बच्चू का तीखा सवाल।

-समझा नहीं मैं?

-इसमें समझने की ऐसी कोई बात नहीं है। काग़ज़ पर तुमने अँगूठा क्यों लगाया, यह बताओ?

-हमने किसी काग़ज़ पर अँगूठा नहीं लगाया -कुम्हार साफ़ मुकर गया, आगे बोला-हुआ क्या यह बताओ?

-हुआ यह कि इससे हमारी ज़मीन चली जाएगी।

कुम्हार ने गर्दन हिलाते हुए श्यामल के बाबू से पूछा- क्यों भैया, यह बताओ, हम अपने काग़ज़ पर अँगूठा लगा सकते हैं कि किसी दूसरे के? दूसरे के काग़ज़ पर हमारा अँगूठा चलेगा?

श्यामल का बाबू गहरे सोच में पड़ गया, सहसा बोला - ये तो मैं इसे कब से समझा रहा हूँ, ये बंदा समझने को तैयार ही नहीं, बस जान खाए जा रहा है।

-कौन-सी बात नहीं समझ रहा हूँ -बच्चू आँखें निकालता, उसके मुँह पर ज़ोरों से चीखता -सा बोला- उल्लू समझते हो क्या? हमने इस आदमी पे भरोसा किया, सारा मामला इसके सुपुर्द किया लेकिन इसने जो गड़बड़ी कर डाली, वह हमें कहीं का न रक्खेगी!

-भोला भैया, तुमने क्या किया? -काका ने पग्गड़ उतारते हुए भोला से प्रश्न किया - सच्ची-सच्ची बताओ?

-काका! -बच्चू काका पर गरजा- तुम चुप्पै रहो। तुम नहीं जान पाओगे, इस कुम्हार ने हमें सड़क पर ला दिया है।

यकायक कुम्हारिन चटक पड़ी। हाथ उठाकर बच्चू से पूछा- कैसे ला दिया सड़क पे, ज़रा बताओ तो सई।

-अब तुम अपने मरद से पूछो जो सत्यानाश करके आया है- बच्चू ने आग में बारूद भर दी।

-हमारे मरद ने ऐसा कुछ भी नहीं किया- कुम्हारिन उसके बारूद पर पानी डालती-सी बोली- अगर उसने अँगूठा लगाया होगा तो अपने काग़ज़ पे। तुम्हारे काग़ज़ से उसका कोई साबिका नहीं-इत्ती अकल तुममें होनी चाहिए!

-ये भौजी! - बच्चू की आँखों में सहसा भयंकर ग़ुस्सा उतर आया -अकल बकल की बातें हमें न सिखाओ, तमीज से बात करो, बताय देता हूँ!

-तमीज से तू बात कर। औरतजात से कैसे बात की जाती है- ऐसे बात की जाती है?- कुम्हारिन फिर तड़ककर बोली।

यकायक कुम्हार बच्चू के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, बोला-तुम्हें किसी ने बरगला दिया है, हमने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे तुम्हारा अनिष्ट हो...

-अगर हो तो? आँखें निकालते हुए बच्चू ने पूछा।

-मुझे जान से मार डालना, बस! - कुम्हार बोला- इससे जादा मैं और कुछ नहीं कहूँगा।

-भोला! - बच्चू अब लड़ने पर उतारू हुआ जा रहा था।

भोला क्या कहे? उसने काका, श्यामल के बाबू के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा- हमने कोई ग़लती नहीं की। अगर इस पर भी भरोसा नहीं तो बताओ इसके लिए कौन-सी कसम खाऊँ जिससे बच्चू को तसल्ली हो।

कुम्हार रोने लगा।

-झूठे टेसुए न गिरा हरामखोर! बच्चू ने उस पर आग बरसाई।

-क्या बोला तू- कुम्हारिन तड़प के बोली- फिर से बोल!

-हरामखोर! दोगला- बच्चू ने मुँह आसमान की ओर करके तोप-सी दागी।

-तू होगा हरामखोर, दोगला- कुम्हारिन बदन पर मिर्चा-सी डालती बोली- भोले-भाले जात्रियों को लूटता है कमीन, तेरे तो कीड़े पड़ेंगे...

कुम्हार अब फूट-फूटकर रोने लगा। यकायक वह बेचैनी की हालत में अनमना-सा अँधेरे में बढ़ता गया, बढ़ता गया। अपने को निर्दोष साबित करने के लिए उसके पास एक ही रास्ता था- कुआँ जो उसके सामने था।

कुम्हारिन ज़ोरों से चिल्लाई। दौड़ी।

कुम्हार ने परवाह न की। वह कुएँ में कूद गया।

कुएँ से ज़ोरों की आवाज़ उठी।

सहसा कुम्हारिन ज़मीन पर लोट गई। बेतरह रोते, छाती पीटते वह चिल्लाई- हमारे मर्द को बच्चू ने कुएँ में ढकेल दिया। पुलिस को बुलाओ। हम अनाथ हो गए। कुम्हार को बचाओ!!! कुम्हार को बचाओ!!! हे भगवान!!!

***

पटवारी को जब यह ख़बर लगी कि कुम्हार कुएँ में कूद गया है, उस वक़्त वह अपने छोटे-से मंदिर में गमछा बाँधे, आँख मीचे, ज़ोर-ज़ोर से हथेलियाँ बजाता हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था- भारी ख़ुश हुआ और गला फाड़-फाड़कर पाठ करने लगा जिससे उसकी पत्नी डर गई कि अभी तक तो पांड़े ठीक थे, कुम्हार की ख़बर से ऐसा क्या हो गया कि गला फाड़-फाड़कर पाठ करने लगे। हथेलियाँ भी बहुत ज़ोरों से बजाने लगे... कहीं दिमाग़ तो नहीं चल गया। इधर जबसे ज़मीन का मामला शुरू हुआ है, ढंग से न खा रहे हैं, न पी और न सो! तीन बजे रात से ही उठ बैठते हैं और बाहर चक्कर लगाने लग जाते हैं, बोलो तो ऐसे चीख़ते हैं कि मत पूछो...

यकायक पटवारी उठा और दरवाज़े से बाहर निकलने को हुआ कि सामने पत्नी को खड़ा पाकर ज़ोरों से चीख़ पड़ा कि कमीन रास्ते में आ खड़ी हुई, हट किनारे हो- उसने बुरा-सा मुँह बनाया और बाहर खड़े आदमी से पूछने लगा कि मामला क्या था? आदमी ने जब यह बतलाया कि उसे सिर्फ़ इतना ही पता है कि कुम्हार कुएँ में कूद गया बस्ती के लोगों से तकरार के बीच- पटवारी अपरम्पार ख़ुशी से लहराने लगा- चलो बिना कुछ करे-धरे मामला अपने हत्थे आ गया। कलेक्टर के पास अब जाने की ज़रूरत भी नहीं- यह सोचता जैसे ही वह अंदर गया, हनुमान जी की फ़ोटो के आगे नमन के लिए झुका और कहा कि भगवान आपने मेरी प्रार्थना सुन ली, अब हम हनुमान गढ़ी पे लड्डू चढ़ाएँगे- जनेऊ से पीठ खुजलाते हुए उसने कमरे के कई चक्कर लगाए और जैसे ही बाहर पैर रखा-बाबू हाँफता खड़ा दिखा जो कह रहा था कि कुम्हार मरा नहीं, बच गया है। लड़ाई-झगड़े में पगला के कुएँ में कूद तो गया लेकिन बस्ती के लोगों ने मचिया डाल के उसे निकाल लिया। ताज़्ज़ुब कि उसे खरोंच तक नहीं आई।

पटवारी इस बात से बुझ-सा गया। उसने पत्नी को गालियाँ दीं जो बीच रास्ते में आ खड़ी हुई थी जिससे अशुभ हो गया। नहीं मामला बन गया था। यकायक उसने सोचा- कुम्हार मरे या जिए- काम तो अपना होना ही है- सौ फीसद! काहे को दुःखी होता है वह?

थोड़ी देर बाद बाबू चला गया और पटवारी इस सोच में डूब गया कि बस्ती में इतनी बड़ी घटना घट गई और पुलिस को ख़बर तक नहीं। हद्द है यह तो।

अगले ही पल वह थाने में था और उसके दस मिनट के बाद टी.आई. तोमर के साथ कुम्हार के झोपड़े के सामने। नीम के नीचे।

कुम्हारिन ने खाट पर लेटे कुम्हार को टी.आई. और पटवारी के आने की ख़बर दी।

कुम्हार को यह समझते देर न लगी कि मामला थाने तक पहुँच गया है। अब पुलिस बेवजह मुझे तंग करेगी और बच्चू को!

कुएँ में कूदने से कुम्हार को ऊपरी चोट कहीं भी न लगी थी। हाँ, दिल में हौल ज़रूर बैठ गया था। रह-रह लगता कहीं वह शांत न हो जाए। इस हौल को निकालने के लिए वह पूरी तरह आराम कर रहा था। धीरे-धीरे चलता वह टटरा सरकाता बाहर निकला और टी.आई. और पटवारी को झुककर राम-राम की।

टी.आई. तोमर मोटर साइकिल से टिका खड़ा था, उसी के बग़ल में था पटवारी बलभद्दर पाँड़े मुँह में पान ठूँसे।

टी.आई. ने पूछा -क्या हुआ भोला? कुएँ में तुम्हें किसने ढकेल दिया?

कुम्हार हाथ जोड़ता बोला- कुएँ में मुझे भला कौन ढकेलेगा, मालिक?

-अपने आप तो आज तक नहीं गिरा- टी.आई. कुटिलता से मुस्कुराता, सिर हिलाता बोला- कल रात यहाँ झगड़ा-टंटा किससे हो रहा था?

-कोई झगड़ा-टंटा नहीं हूजूर, ऐसई यहाँ के लोग मिलने की ख़ातिर आए थे...

-मिलने आए थे तो तू कुएँ में गिर गया? -टी.आई. आँखों में बदमाशी लाता बोला।

-कुछ नहीं साहब, ऐसई गफलत हो गई थी।

-गफलत कैसे हो गई? -टी.आई. गहरे उतरता बोला- ये लोग कहाँ रहते हैं?

-साब, शहर में रहते हैं- यहाँ उनकी ज़मीनें और घर हैं।

-तो दो जगह ठिकाने! -टी.आई. हँसा -यहाँ भी और वहाँ भी। इसके अलावा भी कहीं। क्या बात है? ज़मीन कब्जियाने का यह उम्दा रास्ता है, क्यों भाई पाँड़े जी?

पाँड़े मुस्कुराए भर, बोले कुछ नहीं जिसने बहुत कुछ कह दिया था।

टी.आई. कड़क आवाज़ में बोला- साफ़-साफ़ बताओ, नहीं बात बिगड़ जाएगी! दारू पी के झगड़ा-टंटा हुआ और कहते हो कुछ नहीं।

कुम्हार हाथ जोड़ता, झुककर बोला- साब, सच्ची बात है कि किसी ने दारू नहीं पी रक्खी थी। जिसकी कसम कहें हम खा सकते हैं। बस्ती के ही साथी थे जो ज़मीन के बारे में बात करने आए थे- बस ये बात थोड़ी गर्म हो गई थी और कुछ नहीं...

टी.आई. ने पटवारी की ओर देखा जिसका आशय था कि कुम्हार बात तो सही कह रहा है, अब तुम बताओ इसे किस रास्ते घेरें?

पटवारी कुटिलता से मुस्कुराया और खैनी की पीक थूकने के बहाने पीछे मुड़ गया, बोला कुछ नहीं। जैसे कह रहा हो कि रास्ते हज़ार हैं, अब आप पुलिसवाले हो, ख़ुद देखो। जिसने गड़बड़ की है उसे घेरना ज़रूरी है। बच्चू का नाम लो, वही टंटे की जड़ है, वही है जिसने मेरे ख़िलाफ़ आग लगाई...

-बच्चू कौन है?- टी.आई मुद्दे पर आया जिसके ख़िलाफ़ पटवारी कड़ी कार्रवाई चाहता था- यही था जो उसकी मंशा को तार-तार करने गया था और कुम्हार से लड़ पड़ा था- यकायक रूल से कॉलर के नीचे पीठ खुजलाते आगे बोला- ये वही कुली है जो रेलवे स्टेशन के पीछे झुग्गियों में रहता है।

-हाँ साब, वही है।- कुम्हार ने सहजता से जवाब दिया।

-ये बरखुरदार पहले भी फौज़दारी कर चुके हैं- टी.आई. ने जब यह कहा, कुम्हार उसकी बात काटता ज़ोरों से बोला- हुजूर, माफ़ करेंगे, उसने कभी कोई फौजदारी बगैरा नहीं की, ग़लत कहा जा रहा है!

टी.आई. गर्दन हिलाता, आँखों में रोष लाता बोला- अब तू बताएगा ग़लत- सही का भेद!

-नहीं मालिक- कुम्हार हाथ जोड़ता बोला- सच्ची बात कहने में हिचकना ग़लत होगा।

-और कौन लोग थे?- नाम ले?- टी.आई. कड़क अंदाज में बोला।

-साब, श्यामल का बाबू, बच्चू, बूढ़े काका थे और कोई नहीं...

टी.आई. ने पटवारी की ओर देखा जैसे कह रहा हो कि जल्द मैं मुद्दे पर आ रहा हूँ, परेशान न हो; फिर कुम्हार से सवाल किया- सुना है, ये लोग तुझे खतम करने आए थे?

कुम्हार ने पटवारी की ओर देखा जैसे कह रहा हो कि तुम्हारे ही कारण टंटा हुआ, तुम न अंगूठा लगवाते और न वह लड़ने आता। हम लोगों की गर्दन क्यों फँसवा रहे हो। वह भी झूठ में। टी.आई. को समझा दो, बात ख़तम हो- चुप खड़े हो और कुछ बोल नहीं रहे हो- क्या चाहते हो?- हम लोग कहीं के न रह पाएँ?- गहरी साँस भरता यकायक वह ज़ोरों से सिर हिलाकर टी.आई से बोला- बिल्कुल ग़लत! बिल्कुल ग़लत!!! सरासर झूठ!!! काहे को आप बात ग़लत जानिब में ले जा रहे हैं- ये लोग भला मुझे क्यों मारना चाहेंगे? हमने क्या बिगाड़ा है इनका?

टी.आई. ने कहा - तू किसी दबाव में सच्ची बात छुपा रहा है, साफ़ बोल, नहीं चल थाने!!!

कुम्हारिन अभी तक ओट में खड़ी सब कुछ देख-सुन रही थी। कहीं कोई ग़ल्ती नहीं, झूठै फँसा रहा है, ऊपर से थाने चलने की धमकी दे रहा है- यकायक सामने आकर ज़ोरों से बोली- काहे को थाने चलें!- उसने त्यौरी चढ़ाके टी.आई. से कहा- क्या किया है हमारे आदमी ने?

-अब तू ये कहती है कि क्या किया है आदमी ने?

-हाँ, ये कहती हूँ कि हमारे आदमी ने ऐसा कुछ नहीं किया जो ग़लत हो!

-तो कुएँ में इसे अल्ला मियां पटक गए?- टी.आई. ज़ोरों से हँसा।

पटवारी भी दबी हँसी हँसा।

-अल्ला मियां क्यों गिराएँगे। ये ग़लती से गिर गया, किसी को ढकेला नहीं, ख़ुद गिरा है। आप अब इस मजलूम को क्यों सता रहे हैं?

-सता रहा हूँ? क्या बोलती है?- टी.आई. रोष में भर उठा।

-बिल्कुल सता रहे हैं आप? छोटी जात को सता रहे हैं और ये सरासर बेइंसाफी है। पुलिस हो तो क्या? कुछ भी जुलम करोगे? हम आपके ख़िलाफ़ अपने थाने में मामला लिखवाते हैं कि आपने हमारे साथ बदसलूकी की, उल्टा-सीधा बोला, देखते हैं आप फिर क्या करते हैं?

पाँसा पलट गया था। टी.आई. ने ऐसा सोचा न था कि ऐसा कुछ घट सकता है- उसने पटवारी को देखा जिसने इशारा किया कि बात यहीं ख़तम करना ज़रूरी है नहीं तो बिगड़ जाएगी- सहसा वह खाँसता भोला के पास आया, उसे नीम की आड़ में ले गया। उसे अभी भी भरोसा था कि उसकी बात भोला मान लेगा, कहने में क्या जाता है। बोला- क्या है, तोमर साहब तुम्हें नहीं, उन लोगों को दुरुस्त करना चाहते हैं जो तुम्हारे ख़िलाफ़ हैं, तुम्हें तंग करना चाहते हैं- मैं भी यही सोचता हूँ कि ऐसे गड़बड़ लोगों को रास्ते से हटा देने में ही भलाई है। ये रहेंगे तो कुछ न कुछ गड़बड़ी करेंगे इसलिए यही समय है, तुम लगा दो इन्हें ठिकाने! मुझे सब पता है कि कल रात में बच्चू तुम्हें मारने आया था- उल्टा-सीधा बोल रहा था। तुम ख़ुद कुएँ में कूद गए, नहीं वह तुम्हें ढकेलता। वैसे बात दोनों एक ही हैं! किसी ने तुम्हें तंग किया और तुम उसके दबाव में आए और कूद गए- नहीं तो वह तुम्हें किसी न किसी बहाने से आड़े-तिरछे अड़दब में डाल के ढकेल ही देता। मेरी सलाह है कि तुम उस कुली का नाम तोमर साहब को बतला दो और उसे जेल कराओ! फिर जो होगा, देखा जाएगा। साला नीच कहीं का, कपटी! साला स्टेशन पर यात्रियों को लूटता है, सोचता है यहाँ भी वह नंगई कर लेगा। मान लो कल को कुछ हो जाता- कौन ज़िम्मेदार होता- कच्ची गृहस्थी- तीन-तेरह हो जाती! बच्चे- पत्नी का मुँह देखो! चल साहब से बोल दे, हीलाहवाला छोड़- पटवारी उसकी बाँह पकड़कर आगे ठेलता बोला- ठीक है, जा, नाम ले ले!

कुम्हार थानेदार के सामने आता कि कुम्हारिन उसके पास आई। कुम्हार को पीछे ठेलती, ख़ुद आगे आ खड़ी हुई, तमककर बोली- कुम्हार को उल्टी-सीधी बातें क्यों पढ़ाते हो पटवारीजी? हम बिरादरी के लोग आपस में कुछ भी बोलें-चालें -दो-चार बर्तन होंगे तो टकराएँगे, इसका मतलब यह नहीं कि हम दुश्मन हो जाएँ एक-दूसरे के! बच्चू ने ऐसा कुछ नहीं कहा और न ऐसी कोई बात हुई। भोला पानी के लिए गया था, पैर फिसल गया... कुम्हारिन क्षण भर को रुकी, फिर आगे बोली -आपको तो कुम्हार की मदद के लिए आगे आना था, उल्टे थानेदार साहब को लेकर आए कि इसी बहाने तंग करो... ऐसा कुछ हुआ तो जान दे दूँगी...

पटवारी ने दोनों हाथ माथे से लगाए -तुम गलत समझ रही हो। मैं तो तुम्हारे हित के लिए आया हूँ और तुम्हारा हितैषी हूँ और रहे तोमर साहब तो ये कोई ख़राब आदमी थोड़ै हैं, जबरन थोड़ै कुछ करेंगे। बो तो बच्चू के लाने आए थे... ख़ैर, बात यहीं ख़त्म हो गई। भोला, तुम आराम करो, जाओ, झोपड़े में जाओ। मैं तोमर साहब को समझा लूँगा।

पटवारी ऊपर से ऐसा बोल ज़रूर रहा था अंदर बदमाशी करवट ले रही थी कि अपने दरवज़्ज़े ब्राह्मण का अपमान किया है, तुम्हें दर-ब-दर न किया, ब्राह्मण की औलाद नहीं, समय आन दे...

सहसा टी.आई. साहब से हाथ जोड़ता बोला-चलो टी.आई. साब! जान दो इसे। गरीब गुर्बा हैं, इन्हें माफ करना ही धर्म है। क्यों भाई भोला? चलूँ फिर। जल्दी कलेक्टर साहब के सामने पेशी करनी है तेरी। तैयार रहना, ठीक?

टी.आई. ने मोटर साइकिल स्टार्ट की और दोनों यहाँ से चलते बने।

कुम्हारिन ने मुँह बिचकाया जिसका तात्पर्य था कि आगे से ये बंदा भूल से यहाँ आने वाला नहीं।

***

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(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

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