बुधवार, 17 दिसंबर 2014

अनन्त आलोक की कहानी - पापड़ा

हिमाचली कहानी                 1
                           पापड़ा    

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                         अनन्त आलोक
परिवार के सभी सदस्यों के गले में दाँव (गाय को बांधने वाली रस्सी) डाल दिए गए हैं।  अब तो परिवार की ब्याही बिन ब्याही बेटियों घर के सभी  छोटे बड़े बच्चों, बूढ़ों को भी बांध दिया गया है। आज दूसरा दिन और तीसरी रात है , सभी रिश्तेदार मित्र प्यारे गांव भोज की महिलाएं, पुरूष सब के सब हाथ जोड़े बैठे हैं। नींद ने आंखों में डेरे जमा लिए हैं सभी की आँखें सूजकर गोरखे हो गए हैं। हालांकि नेपाल से इनका दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है। होठों पर कांकर बट गई है। ढाणे माणे , नगाड़े ,दमयानु और छनके ने कान बेहरे कर दिए हैं। ''ढण-मण ढण-मण ढणण ढणण छण-छण, तिकड़- तिकड़, तिकड-़तिकड़ '' बाजगी (बजाने वाले) के हाथों में छाले पड़ गए हैं। अर्ज पाते पाते रणिये तांत्रिक के मुंह का थूक सूख गया, गला बैठ गया है। बोलता  है तो मानोे फटा हुआ स्पीकर बज रहा हो, लेकिन कणिया डोली है कि अवतार लेने को तैयार ही नहीं !
    ''हिमाचल के जनपद सिरमौर के कुछ  ग्रामीण क्षेत्रों में मान्यता है कि दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति की सद्गति नहीं होती  और उसकी आत्मा भटकती रहती है, जो परिवार में दुख दर्द और क्लेश का कारण बनती है। उस आत्मा का आह्वान किया जाता है और वह एक व्यक्ति के शरीर में कुछ देर के लिए आती है। उस व्यक्ति को डोली कहा जाता है। आत्मा, हू-ब-हू दिवंगत व्यक्ति की तरह व्यवहार करती है और दुर्घटना को एकदम सही सही बखान भी करती है, इसे पापड़ा के नाम से जाना और माना जाता है।'' लेखक को समझाते हुए रणिये ने कहा।
   परिवार का ठगड़ा फोंकलू भइया तीन दिन से भूखा-प्यासा बैठा, अब थर-थर  कांपने लगा है। जैसे तैसे उठा और डोली के पाँव से लिपट कर रो पड़ा... हाथ जोड़ कर क्षमा याचना करने लगा। ''उदा उतोर पाप्पा ! उदा उतोर। ... आमे सोब तेरे गुणेगार ए....।''  ''अवतार रूप में आओ पाप्पा ! हमें माफ करो आवतार रूप में आओ , हमारा संकट दूर करो पाप्पा! हम सब पापी हैं , मैं भी पापी हूँ ...मेरा सारा
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कुड़बा पापी है ...हम सजा पाने के किए तैयार हैं! आओ पाप्पा आओ!'' तांत्रिक ने सझाया और रिश्तेदारों ने भी फोंकलू भइए की अर्ज में सुर मिलाया ....। इसके साथ ही एक मुड़्दघाटी शान्ति चारों ओर  फैल गई। नगाड़े, दमयानु और छनका कुछ देर की शान्ति के बाद  फिर से भन्नाने लगे। कणिया ने घुटनों में दिया मुंह उठाया और...
            ''इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ उ हूं उं ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ  उ हूं उं ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ  उ हूं उं ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ    उ हूं उं ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ नाश कोर देंउगी नाश ! बादे कुड़बे रा नाश! बीज उगाला कोर देउंगी ! ''... सब का नाश कर दूंगी ! बीज ग्वाला कर दूंगी! कहते हुए कणिया के मुंह से शालु की चीखें छप्पर को चीरते हुए आकाश में गूंजने लगी तो पाँव के नीचे की मिट्टी खिसकने लगी। बैठी हुई पब्लिक उछल पड़ी । ऐसे लगा मानो सिर पर ठण्डे पानी के घड़े उड़ेल दिए हों! ''एनिए मार थोइ आं ... एनिए ! एजा बे मेरा खोसम! '' ... इस ने मारा है मुझे ...यही है मेरा घाती ! मेरा पति ही मेरा कातिल है ! तुझे तो मैं ! जिंदा नहीं  छोड़ूंगी!'' अपने पति धोंकलू की ओर उंगली करते हुए कणिए के शरीर में आई भिउरी की आत्मा ने आखर काटा ! दुखड़ा बयान किया और फिर से सिर घुटनों में दे दिया। भिउरी कहती जा रही है और रणिया समझाता जा रहा है।
     ''खुल के आ पाप्पा खुल के आ... तू साची हांमे झूठे! खुल के बोल , घोरो दी दुखती लागी रोइ ! तां याद लोइ कोरी ...!!  खुल के आ! तेरे नाव रा डांका लाय थोआ ।'' रणिये ने आत्मा का आह्वान करते हुए बतलाया  कि परिवार में बहुत कष्ट हैं तुम्हें याद किया है! और इन कष्टों से तुम ही छुटकारा दिला सकती हो!  तुम सच्ची हो और हम सब झूठे हैं ए देवी आत्मा खुल  कर आओ और अपने दिल की बात कहो, आज  तुम्हें किसी का कोई डर नहीं है, भय नहीं है...आओ ।
        ''हु-हु-हु-हु-हु-ह-ुहु-हु  उ इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ मूं कोसरा डोर ने आथी आं तो साफ साफ बुलुंगी... जोयर दिता मुखे जोयर !''... हां मुझे किसी का कोई डर नहीं मैं आज सब साफ बोलूंगी। मुझे जहर देकर मारा गया और मुझे मारने वाला और कोई नहीं! ये मेरा खसम धोंकलू है। इसी ने मारा है मुझे ! भिउरी
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ने आखर काटा तो भीड़ में खुसर फुसर शुरू हो गई। भिउरी ने धोंकलू की ओर उंगली करते हुए चेतावनी दी कि तेरे तो पूरे परिवार को कोढ़ लगाउंगी मैं!  तेरी सात पीढ़ियां कोढ़ी पैदा होंगी ये मेरा शाप हैं। तेरी सात पीढ़ियां हिरोशिमा नागासाकी की सात पीढ़ियों से भी बदतर न हो तो मेरा नाम नहीं...। '' रणिया आत्मा की एक एक बात लेखक को सहजता से बताए जा रहा था लेकिन यह बात बताते हुए वह भी भय से कांप उठा।
     पिछले एक वर्ष से बिस्तर पर पड़ा धोंकलू , परिवार के दो जनों का सहारा लेकर उठ बैठा और थरथराते हुए हाथ जोड़ कर क्षमा याचना करने लगा। ''मूं माफ कोरी शालु ! आं तेरा घाती ए ... मेरी जान छाड़ दे  माता! .... ढाल ताखे! आं पागल ओइ गिया था। ओकी शादी रा भूत लाग गिया था मूं दा!'' मुझे माफ करना भिउरी मैं अपना गुनाह कबूल करता हूँ , मैं ही तेरा कातिल हूँ .. मुझ पर दूसरे विवाह का भूत स्वार था और मैं पागल हो गया था भले बुरे का अन्तर ही भूल गया था मैं! कहते हुए धोंकलू कणिए के आगे गिड़गिड़ाया। धोंकलू को दूर दूर तक और अच्छे से अच्छे होस्पिटलों में दिखा दिया था लेकिन सभी ने हाथ खड़े कर दिए थे। किसी डॉक्टर को धोंकलू की बीमारी का कोई पता नहीं चला। लेखक सारा खेल देख कर दंग हो रहा था कणिये ने नहीं समझाया तो उसने पूछ लिया , जो बात समझ न आती वह  एकदम रणिये तांत्रिक से पूछ लेता है।
              ''हु-हु-हु-हु-हु-ह-ुहु-हु  उ इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ना रे ना तां ... माफी ! तां तोड़पाय तोड़पाय मारना मेरे, तां न छाड़ दी ! इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ।'' लेकिन भिउरी का क्रोध सातवें आमान पर था , उसने चीखते हुए ना में उंगली हिलाई और कहा तुझे माफी ! तुझे तो तड़पा तड़पा कर मारना है, तुझे नहीं छोड़ूंगी मैं ! अभी तो शुरूआत है।
कणिए के शरीर में आई भिउरी की आत्मा प्यास से भड़क उठी ! पानी का इशारा किया तो धोंकलू की माता चिंबड़ी उठी और पानी का लोटा और गिलास लेकर डरते डरते भिउरी के पास जाने लगी ... कि जोर की चीख से ठिठक गई।
       
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  ''हु-हु-हु-हु-हु-ह-ुहु-हु  उ इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ न रे ए ऽ ऽ ऽ न ! तू ओंडी ने आइ ! तेरी हाथों रो पाणी न पीणी मेरे मेरी शाशु ! तू ब साजी थी मूं मारदी ! भिउरी ने उसके हाथ का पानी पीने से साफ इन्कार कर दिया, कहने लगी तू तो इधर ही मत आना मेरी सास! तू भी  तो शामिल थी न! मेरी मौत के शड़यन्त्र में ... तूने ही तो खीर पटांडे बनाए थे! सुना था स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु होती है , तुमने ये साबित करके दिखा दिया। तूने तो मुझे मरती बार भी पानी नहीं पिलाया ...अब तेरे हाथ का पानी ! थू ...!''  भिउरी ने भरी सभा में उसकी पोल खोल कर रखी तो चिंबड़ी यूं गायब हुई ज्यों बिल्ली को देख चूहिया ! भीड़, कणिये के मुंह से आत्मा की एक एक बात सुन कर हैरान हो रही थी कि कैसे ये सब बातें जो परिवार के सिवा दिवारों को भी मालूम नहीं गिन गिन कर बता रही है और रणिया उसकी एक एक बात तरतीब से लेखक को बता रहा था।
''मेरी बिंची शुदाओ रे ए ऽ ऽ ऽ मेरी बिंची । अपणी बेटी रे हाथों रू पाणी पिणु मेरे ! उं हूं उुं ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ '' भीड़ में अकेली बैठी अपनी पांच वर्ष की बेटी बिंची को पहचानते हुए भिउरी ने इशारा किया और कहा कि मेरी बिंची से कहो कि मुझे पानी पिलाए ...मैं अपनी बेटी के हाथ का पानी पीना चाहती हूँ। ''उं हूं उुं ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ '' कणिए ने सांस ली। कुछ लोगों ने नन्हीं बिंची को खड़ा किया और उसे पानी का लोटा और गिलास ले कर उसकी  माँ के अवतार में कणिये के पास भेजा। अपनी नन्हीं बिटिया को अपने सामने देख भिउरी के चेहरे पर ज्यों धूप खिल उठी...अपलक अपनी बेटी को निहारती रही... फिर गहरी सांस लेते हुए बोली ''उंडी आ बे मेरी धी उंडी आ ... ।'' इधर आओ मेरी प्यारी प्यारी बिटिया इधर आओ मैं तुम्हारी माँ हूं। ...अपनी माँ के गले नहीं लगोगी! और बांह से पकड़ते हुए उसने बिंची को कस के  बांहों में समेट लिया । दोनों माँ-धी सुबक सुबक कर रो पड़ी.... ।  गंगा जमुनी अश्रुधार  बह निकली तो भीड़ भी नयन जल से अर्घ दिए बिन न रह सकी। निमाणी छुड़ाई मेरी धी... इन पापियों ने मुझ से निमाणी छुड़ाई... अभी तो मेरी नन्हीं तू केवल दो वर्ष की ही तो हुई थी  ! जब मुझ से छुड़ा दी गई  ! अभी तुमने  दूध पीना भी नहीं छोड़ा था कि...! बेटा में तो जीना चाहती थी , तुम्हें पढ़ाना लिखाना चाहती थी , बड़ा ऑफिसर बनाना था तुझे ....भिउरी ने रणिए के मुख से
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           शिकायत दर्ज करवाई । शानु सुबकती हुई, हाँ में हाँ मिलाती रही। पब्लिक से खचाखच भरा कमरा हूँ हूँ कर बड़े ध्यान से भिउरी की बातें सुन रहा था।
      अब तो गांव में बचे खुचे लोग  भी अपने दैनिक कार्य निपटा कर  चीख पुकार सुनते हुए आंगन में आ जमा हो गए थे। सभी एक दूजे का मुंह देख गिट-मिट गिट-मिट कर रहे थे। भिउरी ने बिंची को चूम चूम कर लाल कर दिया। जब उसका मन भर गया तो बिंची के हाथ से पानी पीया , एक रोटी खाई फिर जी भर कर फिर पानी पीया और खुश हो कर अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेर-फेर कर आशीष देती रही।
अब रणिये ने मोरचा सम्भाला। ''अब आखर काटो पाप्पा ! खुल कर बोलो ! क्या है तुम्हारे मन में ...खुल कर बोलो। तुम्हें किसी का कोई डर भय नहीं ! पूरा परिवार दुखी है ...पाप्पा, इसी लिए तुम्हें याद किया है। अपने मन की गांठें खोलो अब खुल कर बोलो। तुम्हारे साथ क्या हुआ हमें किसी को कुछ भी नहीं मालूम एक एक बात बताओ और परिवार को रास्ता लगाओ पाप्पा ! हाथ जोड़ कर अर्ज है।  
''हु-हु-हु-हु-ह-ुहु-हु  उ इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ह ह ह ह ह ह ह ह ह मूं बोलणो दियो  ब एबे ....आं न डोरदी कोसी दी न! डोर दी न आं ...
''अब मुझे कहने दो ... मैं सब सच सच कहूँगी। मुझे किसी का कोई डर नहीं है। तुम सब ध्यान से सुनना!.... हां तो सुनो! हमारे विवाह को पाँच वर्ष होने को आए थे लेकिन ...औलाद के नाम पर कुछ नहीं था। अब घड़ के तो कोई डाल नहीं सकता। ये सब तो उस प्रभु के हाथ की माया है।  सभी पण्डित वैद्य , तांत्रिक देख लिए थे। जो भी किसी ने कहा वो सब टूणा-टोटका कर छोड़ा लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। चिंता मुझे भी थी!... लेकिन किया क्या जा सकता था। जब कोई आस शेष न रही तो घर पर बातें होने लगी, इतनी बड़ी जमींदारी, इतना कारोबार किसके  लिए !... हमारे पास एक तो है, लेकिन बेटा! ...तुम्हारा तो वंश ही ....!
  मेरी सास ने भी अपने बेटे  के कान  भरे ! और ये उनकी बातों में आ गया। ...आखिर नई दुल्हन का कोरा कोमल और गठा हुआ वदन इसके खयालों में महकने
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लगा। ''शुणे बे ए ऽ ऽ ऽ ऽ  बादे मोरोद शुणे कोरी ! तुंए एशे इ उओं बादे मोरोद...। '' रणिए ने भिउरी की बात पूरी करते हुए समझाया ''सुनो ! सभी पुरूष ..ध्यान से सुनना ! तुम सब मर्द जात ऐसे ही होते हैं! ऐसा कोई मौका छोड़ना ही नहीं चाहते..... ।''
  भिउरी ने सांस ली , दो गिलास पानी के पीए और आगे आखर काटा
.'' एजा धोंकलू ...मेरा खोसोम , मूं पाछी जान दियों थिया... केरी माड़ी घोड़ी थी जू मेरा बोयरी बोणी गिया। इयो बोलदा लागा जे मेरे तो ओकी शादी कोरणी ए!  तू चाय एबे जीव बांइचाय उदी दे।'' '' ये मेरा खसम ! जो मेरे लिए जान देने को तैयार रहता था, मेरा दुश्मन बन गया। मुझे कहने गला कि मुझे तो दूसरी शादी करनी है तू जी या मर....! '' रणिया  भिउरी के सभी आखर एक एक कर समझाता जा रहा था। भिउरी के शब्दों में उसने आगे समझाया कि घर पर हर रोज झगड़े होने लगे। हंसता खेलता घर कलह का अखाड़ा बन गया। मैंने बहुत समझाया लेकिन धोंकलू नहीं माना!  मैं भी दसवीं पास ....इतनी आसानी तो मानने वाली न थी।  मैंने भी कह दिया देख धोंकलू अगर तू नहीं मानेगा तो मैं तुझे अन्दर करवा दूगीं ! मैं पूलिस में कम्पलेंट करवाउंगी। इतना तो तू जानता ही होगा कि एक पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह गैर कानूनी होता है।'' भिउरी कह रही है कि इस पर धोंकलू ठठा मार कर हंँस पड़ा। कहने लगा '' तू नहीं जानती क्या ! कि हिमाचल के जनपद सिरमौर के गिरिपार में बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन है। इतना ही नहीं भारत के हिमाचल के जनपद सिरमौर और किन्नौर के कुछ भागों में तथा केरल में तो बहुपतित्व प्रथा भी प्रचलन में है। बहुपत्नी प्रथा का उल्लेख तो हमारे   पौराणिक धर्म ग्रंथों में भी मिलता है। राजा दशरथ की तीन पत्नियां थीं । भगवान कृष्ण का उदाहरण हमारे सामने है।
   तुम्हें तो मालूम होना चाहिए कि मेरे पिता की भी दो पत्नियां थीं। पूरा परिवार एक तरफ हो गया तो मैं अकेली पड़ गई।
    अब मैंने भी सब ऊपर वाले पर छोड़ दिया था। फिर अचानक एक चमत्कार हुआ, मैं गर्ववती हो गई। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। पूरे भोज में खुशी की
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लहर दौड़ गई । लेकिन मेरे परिवार में किसी को कोई खुशी नहीं हुई ! मानो कुछ हुआ ही नहीं।  लेकिन मैं अब निश्चिंत हो गई थी । मैं आश्वस्त थी कि अब खतरा टल गया है। कहते हुए कणिये की आँखें लगातार बरस रही थी रणिये ने विस्तार से समझाया और आगे की बात समझाने लगा ।
  भिउरी कह रही है कि मैं अपने आने वाले बच्चे के लिए सपने बुनने लगी और घर के काम में खो गई । मैं तो जैसे भूल ही गई थी कि कुछ हुआ भी था। नौ महीने कब बीत गए, पता ही नहीं चला और मेरी कोख से परी सी सुन्दर बेटी ने जन्म लिया। गांव भर में खुशियां मनाई गई। लोग कहने लगे ''भिउरी की पुकार  ऊपर वाले ने सुन ली ! बेटी हुई है तो अब बेटा भी हो जाएगा अगली बार। बैचारी भिउरी बहुत परेशान थी । है प्रभु तेरे घर में देर है पर अंधेर नहीं है।''  रणिये तांत्रिक ने भिउरी की एक एक बात समझाई। 
      रात के दो बज गए थे लेकिन भिउरी की आत्मकथा अभी बाकी थी...सभी सगे संबंधी रिश्तेदार, गांव के बच्चे, बड़े बूढ़े सब यूँ बैठे थे ज्यों सतसंग में भक्त लोग एकाकार हो गए हों। असंख्य जोड़ी  कान खड़े और आंखें उसके चेहरे पर गड़ी थीं।
    ''मेरी बिंची एक सालो री बे ओइ न रोई थी इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ  इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ  उऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ  आइ री इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ जोबे मेरे धोंकलू ए ओकी शादी कोर पाइ।'' कणिये ने भिउदी का बयान दर्ज करवाते हुए कहा ''मेरी बेटी अभी एक वर्ष की भी नहीं हुई थी कि धोंकलू ने दूसरी शादी कर ली। मेरा काल्जा फटने को हुआ ! मुझे लगा ज्यों धोंकलू मेरी  छाती को आर्मी शूज पहन कर रोंद रहा हो ... लेकिन मैं अपनी बेटी के लिए जीना चाहती थी।''
   ''धोंकलू ने दूसरी शादी कर ली थी ...लेकिन मैं भी मैं थी! ...चार  दिन तक दोनों को इकट्ठे नहीं सोने दिया! इन छोटे मोटे आंधी तूफानों से तो लड़ लेती लेकिन...  मुझे इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि मेरी जिंदगी में 'हुदहुद' आने वाला है.... जो सब कुछ बहा ले जाएगा! हाँ हुदहुद के आने से पहले  एक डरावनी शान्ति जरूर  छा गई थी।  पाँचवें दिन मेरी सास ने खीर पटांडे बनाए।
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पूरे परिवार ने पेट भर खाना खाया । धोंकलू ने अपने हाथों से मुझे खीर पटांडे थाली में डाल कर दिए। खीर में खूब शक्कर और खूब घी डाल कर मेरे पति ने दिया। मैंने भी उस दिन  सभी मन मुटाव भुला कर  पेट भर खाया। उस दिन मुझे जरूरत ही नहीं पड़ी कहने की! मेरा पति स्वयं ही आ कर मेरे कमरे में सो गया। न कोई लड़ाई न झगड़ा न तू तू न मैं मैं ...कोई न  नुकर नहीं। मेरी आंख लगी ही थी कि मेरे पेट में तीखा दर्द होने लगा। रणिये ने समझाया ही था कि भिउरी ने फिर चीख मारी  ''उ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ   आइ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ   उ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ   काल्जा खाया मेरा काल्जा खाया। मेरा काल्जा खाया एने पापिए। ''भिउरी ने जोर की चीख मारी और आगे बताया '' मेरा कलेजा खाया... मेरे ही पति ने मेरे कलेजा खा लिया...मुझे खीर में डाल कर जहर दे दिया .... मेरी आंखें बंद हो रही थी... तो ये दोनों मेरे सामने खड़े हाथ में हाथ लिए हँस रहे थे।  ''इ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ बिंची छुटी मेरी याणी । मेरी बेटी छुड़ाइ एने मूं शी। निमाइ छुड़ाइ मेरी बिंची निमाइ। '' रणिए ने आगे समझाया कि भिउरी कह रही है कि मेरी बेटी ....निमाणी रह गई ! मेरी बेटी मेरी याणी मुझ से छुड़ाई गई। इन्हें तो मैं कभी माफ न करूं ! भिउरी ने आँखें बड़ी बड़ी करते हुए दोनों मुट्ठियां भींचते हुए धोंकलू की ओर उंगली करते हुए कहा तू कानून से तो बच गया  ! लेकिन मुझ से कैसे बचेगा! और अपनी टांगों को भुजाओं में समेटते हुए सिर घुटनों में दे दिया। उसका रूदन अभी रूका नहीं था ...सुबक सुबक के रोने से उसका गला बार बार सूख रहा था।
    रणिए ने इशारा किया और नगाड़े दमयानु , छनका फिर से पर्वतों को कंपाने लगे। ''इ इ इ इ इ इ इ उ उ उ उ उ उ उ उ उ उ।'' भिउरी की चीख के साथ ही रणिये ने फिर इशारा किया और बाजगी फिर शांत हो गए। अब रणिए ने अर्ज पाई ''एबे गोल्ती फोल्ती माफ कोरी पाप्पा ...इनसान गोल्ती रा पुतला ओसो ...हामे बादे तेरे गुणेगार ए एबे रोस्ता दिए । कुड़बे दी सुख शान्ति दिए तेरी भेट पूजा देइली पाप्पा !'' ...''.अब गलती फल्ती माफ करना पाप्पा!  और परिवार को रास्ता देना ...इन्सान गलती का पुतला है ....हम सब तुम्हारे गुनेहगार हैं। जो भी दण्ड लगाएंगे हमें मंजूर है पाप्पा ! लेकिन घर में सुख शांति दे। हम सब तेरे चरणों में हैं पाप्पा!...
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''उ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ  हु ह ुहु हु हु हु हु हु कान खोल्यो शुणे बे रणिया!  कान शुज्गे कोंरी तोबे मुखे दोश न दिए।'' रणिए ने हाथ जोड़ भिउरी की बात सुनी और सुनाया '' कान खोल कर सुन ! रणिया !  तेरी गवाही पर इन को छोड़ रही हूं। नहीं तो मैंने तो ठान लिया था इनका बीज ग्वाला करने का! अब याद रखना और भूल जाए तो मुझे दोष मत देना । छठे महीने का मेरा हिस्सा देना ! फसल कमाई से ! और मेरी बेटी को तंग मत करना ! इसे खूब पढ़ाना लिखाना...''उ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ  हु ह ुहु हु एब मुखे देइ जाजत रणिया.....। एक जोर की चीख के साथ ही भिउरी ने रणिए से इजाजत ली और शांत हो गई। कणिए के कपड़े पसीने में तर हो चुके थे। उसने पानी के चार लोटे पीए और वहीं अचेत हो कर गिर गया। अब कमरे में भरी पब्लिक के बीच से खुसर फुसर की आवाजें आने लगी। जितने मुंह उतनी बातें।
                        ....................
 
अनन्त आलोक
साहित्यालोक ,ददाहू जिला सिरमौर
हिमाचल प्रदेश   173022

anantalok1@gmail.com

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  1. आदरणीय रवि जी , कहानी प्रकाशित करने के लिए हार्दिक आभार | जब भी कुछ नया लिखता हूँ तो सबसे पहले आपको ही भेजता हूँ जिससे रचना के किसी और नाम से प्रकाशित होने का भय नहीं रहता और संरक्षित भी हो जाती है ,पुनः आभार अपने अपार स्नेह दिया |

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