रविवार, 21 दिसंबर 2014

महावीर सरन जैन का आलेख - भाषा विज्ञान में विवेच्य भाषा: अभिलक्षण, परिभाषा एवं स्वरूप

भाषा विज्ञान में विवेच्य भाषा: अभिलक्षण, परिभाषा एवं स्वरूप

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

‘भाषा’ शब्द का प्रयोग सामान्य तथा पारिभाषिक दोनों रूपों में होता है। सामान्य अर्थ में ‘भाषा’ शब्द का बहुविध प्रयोग होता है। व्यवहार में, 'भाषा' को संप्रेषण का पर्याय समझा जाता है। ‘संचार एवं संप्रेषण’ का विवेचन करते हुए यह प्रतिपादित किया जा चुका है कि संप्रेषण के अनेक साधनों में से भाषा केवल एक साधन है। भाषा और संप्रेषण पर्याय नहीं हैं।

(आगे पढ़ें: संचार एवं संप्रेषण)

(http://www.rachanakar.org/2014/11/blog-post_47.html#ixzz3INK4r7Ap)

दर्शन एवं अध्यात्म में भाषा का प्रयोग भिन्न अर्थ में होता है। इन ज्ञानानुशासनों में भाषा के लिए संप्रेषणीयता का होना जरूरी नहीं है। इनमें अवाक् अथवा अवाचिक (non-verbal) स्थिति को भी भाषा माना जाता है।

भारतीय दार्शनिकों ने भाषा के चार ‘स्तर’ माने हैं।

1- परा

2- पश्यन्ती

3- मध्यमा

4- वैखरी

ऋग्वेद में कहा गया है कि-

‘‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुब्रह्मिणाट ये मनीषिणः।

गुहा त्रीणि निहिता नेंड्गयन्ति तुरीयं वाची यत् मनुष्या वदन्ति।।

(ऋग्वेद 1- 164 – 45)

वैखरी वाणी ध्वन्यात्मक होती है। वैखरी के द्वारा मनुष्य बोलते हैं। यह विभिन्न उच्चारण स्थानों में वायु के अवरोध से उत्पन्न होती है। इसमें वर्णों की सत्ता पृथक-पृथक रहती है तथा इसका सम्बन्ध वक्ता की श्वास प्रक्रिया के आहत होने से होता है। आहत माने फेफड़ों से आगत वायु का मुख विवर एवं / नासिका विवर में कहीं न कहीं अवरोध होता है; आघात होता है जिससे आवाज़ पैदा होती है। वैखरी अर्थात् उच्चारित। संस्कृत में वैखरी को समस्त विद्याओं को प्रशस्त करने वाली माना गया है। ‘‘वैखरी सर्वविद्यासतु प्रशस्ता।’’

भाषाविज्ञान में हम परा, पश्यन्ती एवं मध्यमा रूपों का अध्ययन नहीं करते हैं। ये रूप आहत नहीं होते,अनाहत होते हैं। इनका विवेचन दर्शन एवं मनोविज्ञान के अन्तर्गत होता है।

भारतीय मनीषियों ने अनाहत को ब्रह्म रूप कहा है। मध्य युग के संत साहित्य में यही अनहद-नाद है। अनहद का मूल तो अनाहत ही है अर्थात जिसमें फेफड़ों से आगत वायु आवाज़ पैदा नहीं करती। मगर संतों ने ‘अनहद’ शब्द का प्रयोग करके इसमें सीमातीत होने का अर्थ भी जोड़ दिया है। अनहद अर्थात जिसकी कोई हद अथवा सीमा न हो। ये वाणी रूप मनुष्य के अन्तर में निहित रहते हैं। मूलाधार में कुण्डलिनी में वर्तमान रहते हैं। जब कुण्डलिनी गतिशील अथवा ऊर्ध्वमुखी होती है तो स्पन्दन होता है। यह 'पश्यन्ती' है। वाक् की 'परा' एवं 'पश्यन्ती' ये दोनों अवस्थाएँ शब्द-ब्रह्म के ईश्वर-रूप की अवस्थाएँ हैं। मगर 'परा' में स्पन्दन नहीं है, 'पश्यन्ती' में स्पन्दन है। आचार्य क्षेमेन्द्र ने स्पष्ट किया है कि वैयाकरणों के मत से शब्द ब्रह्ममय पश्यन्ती का रूप ही आत्मतत्त्व है।

शब्द ब्रह्ममय पश्यन्ती रूपमात्मत्वमिति वैयाकरणाः

(प्रत्यभिज्ञाहृदय)

इनका विवेचन भाषाविज्ञान में नहीं किया जाता। हमने इनके सम्बंध में अपने एक लेख में, (लययोग एवं राजयोग के संदर्भ में), इन स्थितियों की अपेक्षाकृत विस्तार से चर्चा की है।

(भगवान शिव एवं शैव दर्शन

Lord Shiva and Shaivism(Link)Edit 

http://www.scribd.com/doc/133662684/Lord-Shiva-and-Shai)

मध्यमा को भाषा की मानसिक स्थिति के संदर्भ में समझा जा सकता है। यह ‘मनोभाषानिज्ञान’ का विषय है। बोलने से पहले वक्ता के मानस में विचार, भाव आदि का जन्म होता है। इसकी चर्चा ‘भाषा और विचार’ तथा ‘मनोभाषाविज्ञान’ के विवेचन के समय की जाएगी।

(भारतीय मनीषियों ने 'पश्यन्ती' और 'मध्यमा' का अंतर यह भी माना है कि पश्यन्ती मध्यमा की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म है। पश्यन्ती में 'प्रतिभा' की प्रधानता है जबकि मध्यमा में बुद्धि की प्रधानता है। पाश्चात्य चिन्तन बुद्धि और मन के अध्ययन तक सीमित है। भारतीय मनीषियों ने प्रतिभा को बुद्धि और मन दोनों से अधिक सूक्ष्म माना है। मन तो द्रव्य (substance) है और बुद्धि गुण (attribute) है। प्रतिभा बुद्धि से भी सूक्ष्म है। बुद्धि विश्लेष्य (analysandom) है जबकि प्रतिभा अविश्लेष्य है, उसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता। मन चञ्चल है और बुद्धि भी अस्थिर है। इनके विपरीत प्रतिभा में स्थिरता है। इस स्तर पर पहुँचने के लिए साधक को समाधिस्थ होना पड़ता है। इसलिए यह दर्शन और अध्यात्म का विषय है। यह सम्प्रज्ञात-समाधिस्थ योगियों के ही प्रत्यक्ष का विषय है। 'परा' तो साक्षात् ब्रह्मरूपा है। यह सम्प्रज्ञात-समाधिस्थ से भी ऊँची असम्प्रज्ञात समाधि की स्थिति है जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान की 'त्रिपुटी' संपृक्त होकर एक ही हो जाती है, साक्षात् ब्रह्मरूपा है जो अनिवर्चनीय है।)

भारतीय मनीषियों ने ‘मध्यमा’ और ‘वैखरी’ में भेद किया है। इनका अन्तर यह माना है कि मध्यमा ज्ञान-प्रधान है किन्तु वैखरी इच्छा-प्रधान है। भाषाविज्ञान वैखरी रूप का ही अध्ययन करता है। भाषा का ही अध्ययन करता है। इस प्रकार भाषाविज्ञान में न तो वाक् के ‘परा’,‘पश्यन्ती’ और ‘मध्यमा’ रूपों का अध्ययन किया जाता है और न ही संप्रेषण तथा संचार के सभी माध्यमों का अध्ययन किया जाता है।)।

इस प्रकार भाषा केवल मनुष्य जाति के संप्रेषण एवं संचार के अनेक साधनों में से केवल एक साधन है। भाषाविज्ञान में जिसका अध्ययन किया जाता है, वह विवेच्य 'भाषा' है। वैयाकरण आचार्य पाणिनी ने कहा है – “व्यक्तवाचां समुच्चारणे इति भाषा”। (सम्यक् प्रकार से उच्चारित व्यक्त वाणी को भाषा कहते हैं)। पतंजलि ने इसकी व्याख्या निम्न प्रकार से की है –

व्यक्तवाचस्तत्र प्रकर्षगतिर्विज्ञास्यते।

साधीयो ये व्यक्तवाच इति। के च साधीयः ?

येषां वाच्यकारादयो वर्णाः व्यंजन्ते।

व्यक्ता वाचि वर्णा येषां त इमे व्यक्तवाच इति।

(भाषा मनुष्यों के उस व्यापार को कहते हैं जिससे मनुष्य अपने उच्चारण के उपयोग में लाए जाने वाले शरीर के अवयवों से उच्चारित वर्णात्मक शब्दों से अपने विचारों को प्रकट कर सके।) इसमें भाषा की ध्वन्यात्मकता और विचारों को व्यक्त करने की क्षमता का बोधन होता है। इससे यह भी स्पष्ट है कि निर्रथक ध्वनियों के समुच्चय को भाषा नहीं कह सकते। उनमें विचारों को व्यक्त करने की सामर्थ्य अथवा क्षमता होनी चाहिए। अकेले ध्वनियाँ भाषा नहीं हो सकतीं। उनका सार्थक होना भी जरूरी है। इस परिभाषा से भाषा के सबसे महत्वपूर्ण अभिलक्षण प्रकट हो जाते हैं। मगर पशु और पक्षी भी आवाज करते हैं और अपनी बात अपने वर्ग के अन्य प्राणियों तक पहुँचा देते हैं। मनुष्य की उच्चारण के उपयोग में लाए जाने वाले शरीर के अवयवों से उच्चारित वर्णात्मक शब्दों से अपने विचारों को प्रकट करने वाली भाषा में कुछ ऐसे विशिष्ट लक्षण होते हैं जो मनुष्य की भाषा की ही विशेषता है। हम भाषाविज्ञान में चूँकि केवल मनुष्य की भाषा का ही अध्ययन करते हैं, इस कारण पहले मनुष्य भाषा के ध्वन्यात्मक एवं अर्थवान होने के लक्षणों के साथ-साथ अन्य व्यावर्तक लक्षणों को जानना भी जरूरी है जिससे कम से कम शब्दों में भाषा की परिभाषा दी जा सके।

भाषाविज्ञान तो संसार में बोली जाने वाली हज़ारों भाषाओं का अध्ययन करता है। इन भाषाओं की अपनी ध्वनियाँ होती हैं, अपने शब्द होते है, अपना व्याकरण होता है। भाषावैज्ञानिक संदर्भ में भाषा की परिभाषा पर विचार करते समय अलग अलग बोली जाने वाली हजारों भाषाओं में जो समान लक्षण मिलते हैं, उन आधारभूत समान्य अभिलक्षणों के आधार पर भाषा को पारिभाषित करते हैं। भाषा की परिभाषा करते समय उसके अनिवार्य एवं आधारभूत लक्षणों को ध्यान में रखना चाहिए। भाषा की प्रकृति और उसके प्रकार्य और स्वरूप की विवेचना अलग से करनी चाहिए। उदाहरण के लिए भाषा की प्रकृति नदी की धारा की तरह प्रवाहशील होने के कारण परिवर्तित होते रहना उसका स्वभाव है। भाषा के प्रकार्य की दृष्टि से उदाहरण के लिए भाषा विचारों की अभिव्यक्ति करती है अथवा भाषा समन्वित प्रभाव उत्पन्न करती है। भाषा के प्रकार्यों का अध्ययन करने की दृष्टि से विभिन्न ज्ञानानुशासन हैं। उदाहरण के लिए मनोभाषाविज्ञान, मानवजातिभाषाविज्ञान, समाजभाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान आदि। भाषा के स्वरूप की दृष्टि से प्रत्येक भाषा की अपनी विशेषताएँ होती हैं जिनका अध्ययन भाषा विशेष के भाषावैज्ञानिक अध्ययन करते समय किया जाता है। भाषाविज्ञान के भी अनेक सम्प्रदाय अथवा स्कूल हैं जो अपनी अपनी दृष्टि से भाषा को परिभाषित करते हैं। उदाहरण के लिए संरचनात्मक भाषाविज्ञान जिस प्रकार भाषा को परिभाषित करता है, उस प्रकार प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान नहीं करता। संरचनात्मक भाषाविज्ञान भाषा की संरचना पर बल देता है और प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान भाषा के अर्थ की संदर्भगत व्याख्या पर। ये अन्तर भाषा के अध्ययन करने वाली पद्धतियों और प्रक्रियाओं का है जिनके बारे में यथास्थान प्रकाश डालेंगे।

भाषाविज्ञान में विवेच्य एवं मान्य ‘भाषा’ की परिभाषा देने के पहले इसके अभिलक्षणों पर विचार करना उपयुक्त होगा।

भाषा के अभिलक्षण

भाषा का पहला अभिलक्षण - वाक्

भाषा संस्कृत की 'भाष्' धातु से व्युत्पन्न है। इसी कारण भाषा के वाणी, वाचा, वचन, बात, भाखा, लुगत आदि पर्याय मिलते हैं। भाषाविज्ञान वैखरी का अध्ययन करता है। भाषाविज्ञान में इस ‘वैखरी’ रूप भाषा का सामान्य अर्थ में प्रयोग नहीं होता। वाक् का अर्थ है-वाच् वचन अर्थात् ध्वनि, अभिव्यक्ति, उच्चारण, वाणी। आवाज़ें या ध्वनि तो पशु और पक्षी भी करते हैं। ये आवाज़े भाषा नहीं है। मनुष्य ही भाषा का निर्माण और विकास कर सका है। मनुष्य की अनिच्छायत्त आवाज़ो और भाषा में अंतर है। इस सम्बंध में हमने विस्तार से अलग से विचार किया है।

(मानव भाषा का निर्माण एवं विकास। http://www.rachanakar.org/2014/10/blog-post_87.html#ixzz3GtPCdIHh)

भाषा-विज्ञान के अन्तर्गत मानव के उच्चारित रूपों का अध्ययन किया जाता है। भाषा मानव-कंठ से बोली जाने वाली ऐसी ध्वनियों के अनुक्रम से निर्मित इकाइयों का अध्ययन है जो अर्थवान होती हैं। वक्ता अपनी भाषा के माध्यम से अपने संदेश को अपने भाषा-समाज के सदस्य अथवा समूह को पहुँचाता है। संसार में ऐसा कोई मानव-समूह नहीं है जिसकी अपनी भाषा न हो। संसार की सभी भाषाएँ ध्वन्यात्मक होती हैं। ध्वनियों का उच्चारण मनुष्य की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया के कारण सामान्यतः फेफड़ों से बाहर आने वाली वायु को कहीं न कहीं आहत करके होता है। संसार में भाषाओं की संख्या तो हज़ारों में है मगर सभी भाषाओं के बोलने वालों के उच्चारण-यंत्र अथवा वाग्यंत्र (speech apparatus/ speech mechanism/ vocal organs) की रचना समान होती है। इस कारण भाषा का पहला लक्षण उसका वाक् रूप होना है।

इस स्थापना पर आजकल कुछ विद्वान मतभेद व्यक्त करते हैं। उनका तर्क है कि अब विकसित भाषा समाज के सदस्य बोलने की अपेक्षा लिखित रूप से संदेश का आदान प्रदान अधिक करते हैं। इस कारण वाक् को भाषा का अनिवार्य लक्षण नहीं माना जा सकता। इस कारण भाषा के लिखित एवं उच्चारित स्वरूप के सम्बन्ध में विचार करना प्रासंगिक होगा। विचारणीय है कि लेखन कला भाषा है अथवा भाषा का लिखित स्वरूप है। ब्लूमफील्ड ने लेखन कला को दृश्य संकेतों द्वारा भाषा को लेखबद्ध करने का एक प्रकार माना है।

(Bloomfield, L. : Language, p.21, Motilal Banarsidaas, Delhi (1963))

एक अन्य भाषावैज्ञानिक ने लेखन कला की परिभाषा ‘‘भाषा के उच्चारित संघटक तत्त्वों को रेखाचिह्रों द्वारा अंकित करने का न्यूनाधिक अपूर्ण एवं याद्दच्छिक प्रयत्न मात्र’’ के रूप में दी है।

(Aguiliar, Oscar Luis Chavairia : Lectures in Linguistics, pp.6-7, Poona (19540)

भाषावैज्ञानिक भाषा और लेखन कला में भेद करता है जबकि सामान्य व्यक्ति ऐसा नहीं करता। सामान्य व्यक्ति अपने दैनिक व्यवहार में ‘उच्चारित भाषा’ एवं लिखित भाषा’ दोनों का प्रयोग करता है। सम्भवतः इसी कारण हॉकिट ने भाषा एवं लेखन दोनों को मूलतः अभिन्न रूप की दो भिन्न अभिव्यक्तियाँ स्वीकार किया है।

(Hockett, C.F. : A Course in Modern Linguistics, P.4, New York, (1962))

वे यह अवश्य स्वीकार करते हैं कि यद्यपि सामान्य आदमी आमतौर पर भाषा की अपेक्षा लेखन कला को मौलिक मानता है किन्तु स्थिति इसके विपरीत है। लेखन को भाषा का अनिवार्य लक्षण माना जाए अथवा नहीं – इस सम्बंध में भाषावैज्ञानिकों में मतभेद है। ए0 हाल ‘लिखित भाषा’ जैसी वस्तु का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। भाषा के स्वतन्त्र अस्तित्व का प्रतिपादन करते हुए वे लिखित भाषा के स्थान पर ‘लेखन कला’ शब्द का प्रयोग करना चाहते हैं, तथा उसे भाषा का प्रतिबिम्ब मानते हैं।

(Hall, Robert A. : Leave Your Language Alone, Linguistics, Ithaca (1950))

ग्लीसन को ‘लिखित भाषा’ के प्रयोग पर आपत्ति नहीं है। वे उच्चारित भाषा एवं लिखित भाषा का स्पष्ट भेद मानते हुए लिपि एवं भाषा में निकट सम्बन्ध मानते हैं। वे यह व्याख्या देते हैं कि किसी विशेषण का उल्लेख किए बिना जब भाषावैज्ञानिक सन्दर्भ में ‘भाषा’ शब्द का प्रयोग हो तो उस समय उसका अर्थ ‘मौखिक भाषा’ अर्थात् वाणी के माध्यम से विचारों के संप्रेषण के लिए होना चाहिए। लेखन कला पर आधारित संप्रेषण की सम्पूर्ण प्रणाली के लिए वे ‘लिखित भाषा’ के उपयोग को उचित समझते हैं।

(Gleason, H.A. : An Introduction to Descriptive Linguistics, P. 408, Revised edition , (1961))

फर्डिनेण्ड डी0 सोस्यूर मानते हैं कि हम भाषा के लिखित स्वरूप को उपेक्षा नहीं कर सकते, क्योंकि उच्चारित शब्द अपने लेखबद्ध रूप में इस तरह से आबद्ध हो जाता है कि लेखबद्ध शब्द उच्चारित शब्द का प्राधिकारी बन जाता है। तथापि वे भी यह स्वीकार करते हैं कि लेखन कला का अस्तित्त्व भाषा का प्रतिनिधित्व करने के लिए बना हुआ है तथा भाषविज्ञान का मूल उसका उच्चारित रूप ही होता है। उच्चारित शब्द की अपेक्षा उसके लेखबद्ध रूप को प्रधानता देने की परिकल्पना उसी प्रकार भ्रामक हैं जिस प्रकार यह मानना कि किसी व्यक्ति के प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने की अपेक्षा उसकी फोटो देखने से उसके विषय में अधिक जानकारी प्राप्त हो सकती है।

(Saussure, Ferdinand De. : Course in General Linguistics, Translated from French by Wade Baskin, pp. 23-24, New York (1959))

मनुष्य एवं उसके चित्र की ही भाँति भाषा एवं लेखन-व्यवस्था का अन्तर निरूपित किया जा सकता है। एक मनुष्य के अनेक चित्र लेने पर भी मनुष्य वही होता है, अन्तर उसके चित्रों में होता है। एक भाषा एकाधिक लिपियों में लिखी जा सकती है। अन्तर लिपियों के धरातल पर होता है, भाषा के नहीं। जापान में लिखने की तीन प्रणालियाँ प्रचलित हैं तथा चौथी का विकास हो रहा है। अरबी के स्थान पर सन् 1928 में जब तुर्की ने रोमन वर्णमाला को स्वीकार किया, तब भी वे उसी प्रकार बोलते रहे जैसे पहले बोला करते थे।

जिस प्रकार एक भाषा एकाधिक लिपियों में लिखी जा सकती है उसी प्रकार एक लिपि के द्वारा एकाधिक भाषाओं को लिखा जा सकता है। किसी लिपि का अध्ययन हम भाषा सापेक्ष सन्दर्भ में करते हैं। भाषा का अध्ययन करने के लिए लिपि का ज्ञान होना अनिवार्य नहीं है।

बालक अपनी भाषा बाल्यकाल में ही सीख जाता है। वह लिखना-पढ़ना बाद में सीखता है। घर पर रहकर सीखी हुई भाषा के आधार पर स्कूल में लेखन कला से परिचय प्राप्त करता है। ‘‘आज यद्यपि अनेक भाषाएँ अस्तित्व में हैं, तथापि उनकी अपनी अधिकृत पारम्परिक रेखा-चिन्ह युक्त लेखन-प्रणाली नहीं है।’’

(Gleason, H.A. : An Introduction to Descriptive Linguistics, pp. 10-11, New York (1962))

विभिन्न भाषाओं की लेखन-प्रणालियों में ऐसी कोई भी प्रणाली नहीं है जो किसी समय में बोली जाने वाली भाषा पर आधारित न रही हो।

लेखन कला का इतिहास अधिक से अधिक सात हजार वर्ष पुराना है, इसकी अपेक्षा भाषा (वाणी) का इतिहास बहुत प्राचीन है। इस तथ्य की ओर संकेत करते हुए अर्किबाल्ड ए0 हिल ने लिखा है:-

‘‘मानव समाज के आविर्भाव का इतिहास जितना प्राचीन है उतना ही भाषा का भी, किन्तु लेखन कला का इतिहास लगभग सात हजार वर्ष पुराना है। आज भी कोई मानव समुदाय भाषा-विहीन नहीं है। मगर अनेक वर्णमाला अथवा चित्रात्मक लिपि के लाभों से वंचित हैं। इसके अतिरिक्त साक्षर-समाज के सदस्य भी लिखना पढ़ना सीखने के कुछ वर्ष पूर्व ही अपनी भाषा सीख लेते हैं। समाज के प्रौढ़ व्यक्ति, यहाँ तक कि व्यस्क व्यावसायिक लेखक भी, अपने दैनिक जीवन में लेखन कार्य-व्यापार की अपेक्षा उच्चारित भाषा का पर्याप्त प्रयोग करते हैं। अन्ततः यह तथ्य है कि सारी लेखन-प्रणलियाँ वस्तुतः भाषेतर जगत के विचारों या वस्तुओं के प्रतिनिधित्व की अपेक्षा भाषा के उच्चारित रूपों को ही प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके कुछ अपवाद भी हैं, जैसे अरबी के अंक.........”।

(Hill, Archibald A. : Introduction to Linguistic Structures, p.2, New York (1958))

लगभग एक शताब्दी पूर्व सुसंस्कृत देशों के अनेक लोग लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे। साक्षरता केवल विशेष वर्ग के लोगों का विशेषाधिकार था। यद्यपि मिस्त्र एवं मेसोपोटामिया आदि देशों में लेखन कला काफी पहले से प्रचलित रही है किन्तु वर्तमान समय की अधिकांश भाषाओं में लेखन कला का उपयोग आज भी नहीं होता। मुद्रण कला के प्रचार-प्रसार के पहले साक्षरता कुछ ही लोगों तक सीमित थी। भाषाओं के इतिहास के आरम्भ से ही भाषाएँ ऐसे व्यक्तियों के द्वारा बोली जाती रहीं जिनको लिखना-पढ़ना नहीं आता था। ऐसे लोगों की भाषाएँ उतनी ही स्थायी, नियमबद्ध एवं समृद्ध हैं, जितनी कि साक्षर व्यक्तियों की भाषाएँ होती हैं।

आज भी संसार के कुछ भागों में यद्यपि काफी संख्या में निरक्षर लोग हैं तथापि ऐसा कोई मानव समाज नहीं है, जिनकी अपनी उत्तम भाषा न हो।

कृषकों की कथाओं में केवल कुछ सौ शब्दों का ही भंडार होता है अथवा असंस्कृत लोग केवल कर्णकटु या अपशब्दों का ही प्रयोग करते हैं, आदि धारणाएँ आज अवैज्ञानिक एवं कोरी कल्पना मात्र सिद्ध हो गयी हैं।

इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि भाषा का मूल अर्थ उसका उच्चारित रूप है। वस्तुतः भाषा वाक् प्रतीकों द्वारा विचारों को संप्रेषित करने का एक माध्यम है। लिखित रूप द्वारा हम वाक् प्रतीकों को दृश्यवान बनाते हैं।

भाषा का दूसरा अभिलक्षण – अर्थवान होना

भाषा में निरर्थक ध्वनियों का उच्चारण नहीं किया जाता। भाषा के अन्तर्गत ध्वनियों से निर्मित शब्द सार्थक होते हैं। भाषा का निर्माण जिन लघुतम इकाईयों से होता है, वे स्वयं अर्थहीन होती हैं। उनका कोई अर्थ नहीं होता। यह भाषा का वैशिष्टय है कि अर्थहीन इकाईयों के विशेष क्रम से मिलने पर सार्थक उच्चार खण्ड निर्मित हो जाते हैं। ‘‘भाषा में शब्द का प्रयोग अर्थ बतलाने के लिए ही होता है।’’

(अर्थे शब्द प्रयोगात्’) – पतंजलि – व्याकरण महाभाष्य, अनुवादक – चारुदेव शास्त्री, पृष्ठ 33, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली)

भाषा का अर्थ प्रतीकात्मक होता है जिसके बारे में आगे विचार किया जाएगा। सम्प्रति, यह कहना अभीष्ट है कि भाषा के शब्द एवं वाक्य सहज स्नायविक प्रतिक्रिया करने वाले न होकर बाधित उत्तेजक होते हैं।

संरचनात्मक भाषावैज्ञानिकों ने भाषा की व्यवस्था और संरचना को ही महत्व प्रदान किया तथा अर्थ की उपेक्षा की। संरचनात्मक भाषावैज्ञानिकों ने भाषा अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण किसी भाषा की विशिष्ट व्यवस्था और संरचना को जानना माना। इसके लिए उन्होंने अर्थ को बीच में लाए बिना उस भाषा की संरचनात्मक इकाइयों की वितरणगत स्थितियों को जानने पर ही अपनी सारी शक्ति लगा दी। संरचनात्मक भाषाविज्ञान की विवेचना के समय हम इसकी विस्तार से विवेचना करेंगे। प्रकार्यात्मक भाषा विज्ञान यह मानता है कि मनुष्य भाषा का उपयोग सामाजिक संप्रेषण के लिए करता है और इस कारण भाषा अध्ययन में अर्थ की अध्ययन या व्याख्या की उपेक्षा नहीं की जा सकती। भाषा के शब्द विशिष्ट सांस्कृतिक या प्रासंगिक मुद्दों को व्यक्त करते हैं। मनुष्य सामाजिक उद्देश्य के लिए भाषा का प्रयोग करता है। इस कारण अर्थ तथा प्रसंग का महत्व निर्विवाद है।शब्द के अर्थ को हम बिना संदर्भों या परिस्थितियों के नहीं समझ सकते। शब्दार्थ की व्याख्या के लिए उन संदर्भों एवं परिस्थितियों को जानना भी जरूरी हैं जिनमें किसी वक्ता ने प्रयोग किया है। व्यवस्थापरक-प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (SFL) की विवेचना के समय हम इसकी विस्तार से विवेचना करेंगे। यहाँ केवल यह कहना उद्देश्य है कि भाषा में जिन ध्वनियों को बोला जाता है, उनके अनुक्रम से बनने वाली इकाइयाँ अर्थयुक्त एवं / अर्थवान होती हैं। उपसर्ग एवं प्रत्यय (बद्ध रूपिम) अर्थयुक्त होते हैं; मुक्त रूपिम, शब्द, वाक्यांश, उपवाक्य, वाक्य आदि अर्थवान होते हैं।

भाषा का तीसरा अभिलक्षण – प्रतीक

भाषा के शब्द चिह्न नहीं, प्रतीक होते हैं। चिह्न का चिह्रित वस्तु से स्वाभाविक सम्बन्ध होता है। यह वस्तु का कोई लक्षण प्रकट करता है। प्रतीकार्थ का द्योतित वस्तु से प्राकृत सम्बंध नहीं होता। प्रतीक का अपनी वस्तु से माना हुआ सम्बन्ध होता है। सहज स्नायविक आवाज़ें प्रतीक नहीं है, क्योंकि ये प्राकृत हैं, सहज हैं, मानी हुई नहीं हैं। इसके विपरीत भाषा के शब्द वस्तु के वाचक हैं। जिस वस्तु के लिए जो शब्द जिस भाषा समाज के मनुष्यों के द्वारा मान लिया जाता है, उस भाषा समाज के भाषा-भाषी उस वस्तु को उस शब्द से पुकारने के अभ्यस्त हो जाते हैं। चिह्र इसी कारण प्राकृत एवं स्वाभाविक होता है, किन्तु प्रतीक अर्जित एवं मान्य होता है। प्रतीक कहने भर से दो अर्थ अपने आप स्पष्ट हो जाते हैं। पहला यह कि प्रतीक से यह स्पष्ट हो जाता है कि ये मनुष्य की ही विशेषता है और दूसरी यह कि प्रतीक अर्थ के बोध के लिए ही होते हैं। इनका अर्थ मनुष्यों द्वारा अपने भाषा समाज के सदस्यों द्वारा माना हुआ होता है। हम इस सम्बंध में अलग से चर्चा कर चुके हैं।

(मानव भाषा का निर्माण एवं विकास। http://www.rachanakar.org/2014/10/blog-post_87.html#ixzz3GtPCdIHh)

भाषा का चौथा अभिलक्षण – यादृच्छिकता

भाषा के शब्द प्रतीक हैं। इस कारण अर्थवान उच्चरित खंडों का अपने वाच्य से प्राकृत सम्बन्ध न होकर याद्दच्छिक सम्बन्ध होता है। यादृच्छिकता का अर्थ है अपनी इच्छा से माना हुआ सम्बन्ध। शब्द द्वारा हमें उस पदार्थ या भाव का बोध होता है, जिससे वह सम्बद्ध हो चुका होता है। शब्द स्वयं पदार्थ नहीं है। हम किसी वस्तु को उसके जिस नाम से पुकारते हैं उस नाम एवं वस्तु में परस्पर कोई प्राकृत एवं समवाय सम्बन्ध नहीं होता। उनका सम्बन्ध स्वेच्छाकृत मान्य होता है। इसी कारण किसी भाषा के शब्द स्वतः स्फूर्त नहीं हैं। हम समाज में रहकर उन्हें सीखते हैं। इसकी विवेचना भी हम अलग से कर चुके हैं। 'प्रतीक' शब्द से भाषा का अर्थवान होने का तथा वाचक और वाच्य के माने हुए सम्बंध का स्वतः बोध हो जाता है।

(मानव भाषा का निर्माण एवं विकास। http://www.rachanakar.org/2014/10/blog-post_87.html#ixzz3GtPCdIHh)

भाषा का पाँचवा लक्षण – व्यवस्था एवं संरचना

किसी भाषा के बाह्य रूप को उसकी शब्दावली से जाना जा सकता है किन्तु उसकी आत्मा के दर्शन उसमें छिपी हुई संरचनात्मक व्यवस्थाओं को पहचानने पर ही होते हैं। भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था आबद्ध एवं निश्चित होती है। इस कारण प्रत्येक भाषा के व्याकरणिक नियम बनाये जा सकते हैं। भाषा की शब्दावली की कोई निश्चित सीमा नहीं होती। इसका कारण यह है कि शब्दावली भाषा में प्रविष्ट होती रहती है तथा लुप्त होती रहती है। यह भाषा के अन्दर सापेक्षिक दृष्टि से जल्दी बदलती है। इसके विपरीत भाषा का व्याकरण अपेक्षाकृत स्थिर रहता है। इसके बदलने की गति धीमी होती है। भाषा की व्याकरणिक व्यवस्थाओं को नियमबद्ध किया जाता है। मानव-भाषा का सबसे अधिक वैशिष्टय इस तथ्य में निहित है कि उसमें संरचनात्मक व्यवस्था होती है। कतिपय विद्वान व्यवस्था एवं संरचना का पर्याय रूप में प्रयोग करते हैं। सामान्य अर्थ में ये पर्याय हैं। उच्चारों के तत्त्वों का रूपावली सम्बंधी (paradigmatic) एवं विन्यासक्रमात्मक (syntagmatic) संदर्भों में अध्ययन करते समय इनका प्रयोग भिन्न अर्थों में किया जाता है। संरचना में तत्त्वों का क्रमिक सम्बंध होता है। इसमें एक तत्त्व जिस जगह आता है वह उसका स्थान कहलाता है। किसी निश्चित स्थान पर एक दूसरे को प्रतिस्थापन्न करने वाली भाषिक-इकाइयाँ रूपप्रक्रियात्मक सम्बन्ध का निर्माण करती हैं। अपने या अपने से ऊपर के स्तर की इकाई का निर्माण करने वाले संरचकों के रेखीय अध्ययन से विन्यासक्रमात्मक सम्बन्धों का पता चलता है। विशिष्ट अर्थ में ‘व्यवस्था’ का रूपावली सम्बंधी तथा ‘संरचना’ का विन्यासक्रमात्मक सम्बन्धी अध्ययन के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है।भाषा व्यवस्था के सम्बंध में यह भी कहा जा सकता है कि भाषा के उच्चारण में एक तत्व के द्योतक के स्थान पर उसी कोटि के दूसरे द्योतक तत्त्व को प्रतिस्थापन्न किया जा सकता है। प्रत्येक वाक्य में भाषा तत्त्वों का रेखीय अनुक्रम होता है। मूल रचना के बिना किसी परिवर्तन के प्रत्येक तत्त्व के स्थान में प्राप्त एक शब्द की जगह उसी कोटि के अन्य शब्दों को प्रतिस्थापन्न किया जा सकता है। ऐसा करने से वाक्य के अर्थ में अन्तर होता है, उसकी रचना में नहीं होता। उदाहरण के लिए हिन्दी भाषा का निम्न वाक्य देखें-

लड़का अपने घर गया। 'लड़का' को हिन्दी पुल्लिंग, एकवचन संज्ञा कोटि अथवा पुल्लिंग एकवचन पुरुषवाचक सर्वनाम से प्रतिस्थापन्न किया जा सकता है। इसी प्रकार 'घर' को स्थानवाचक या गंतव्यवाचक पुल्लिंग एकवचन संज्ञा से प्रतिस्थापन्न किया जा सकता है।

लड़का

रमेश

मोहन

मैं

तू

वह

अपने

घर

स्कूल

ऑफिस

कॉलेज

होटल

शहर

गया

भाषा व्यवस्था की एक अन्य विशेषता यह है कि भाषा के शब्दों के वर्ग (group/class) बनाए जा सकते है। संसार की अपरिमित वस्तुओं की अपेक्षा ये अधिक सरल, अधिक अनुमानित तथा आसानी से स्पष्टतः पृथक् हो सकने वाले होते हैं। प्रतिस्थापन्न करना भाषा का ऐसा गुण है जो इसे समस्त ‘मानवेतर प्राणियों की आवाज़ों से’ अलग कर देता है। तोता सायास अनिच्छायत्त ध्वनियों का उच्चारण करने में तो समर्थ हो सकता है, किन्तु वह जो कुछ सीखता है उसे वह एक साथ उच्चारित करता है। किसी एक शब्द के स्थान पर दूसरे शब्द को प्रतिस्थापन्न नहीं कर पाता। भाषा की व्यवस्था और संरचना के सम्बंध में तथा प्रत्येक भाषा की अपनी विशिष्ट व्यवस्था और संरचना के बारे में हम यथास्थान विस्तार से विवेचन करेंगे। इसकी संरचनात्मक भाषाविज्ञान की विवेचना के समय अपेक्षाकृत विस्तार से चर्चा की जाएगी।

भाषा की परिभाषा

भाषा के उपर्युक्त अनिवार्य एवं व्यावर्तक लक्षणों को ध्यान में रखकर हम भाषा की निम्न परिभाषा दे सकते हैं - “वाक् प्रतीकों की क्रमबद्ध व्यवस्था का नाम भाषा है”।

भाषा के प्रकार्य को ध्यान में रखते हुए परिभाषा निम्न प्रकार से दी जा सकती है –

“याद्दच्छिक वाक् प्रतीकों की क्रमबद्ध व्यवस्था से भाषा-समाज के सदस्य परस्पर विचारों, भावनाओं एवं संवेदनाओं का आदान-प्रदान करते हैं तथा यह सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवहारों के अभिव्यक्तिकरण का सशक्त माध्यम होती है”।

भाषा की सरल परिभाषा और भाषा के प्रकार्य को ध्यान में रखकर दी गई उपर्युक्त परिभाषा दोनों को मिलाकर उसकी व्याख्या का विस्तार निम्न शब्दों में कर सकते हैं –

‘‘परम्परित होते हुए भी परिवर्तनशील तथा याद्दच्छिक वाक् प्रतीकों की क्रमबद्ध व्यवस्थाओं की व्यवस्था का नाम भाषा है जिसे सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकतानुसार अपने में अभिव्यक्ति के यथासम्भव पूर्ण साधन के रूप में उस भाषा समाज से अर्जित कर मानवीय संप्रेषणीयता के लिए वाक्-व्यवहार की आदतों के समुच्चय के रूप में वक्ता अथवा वक्ता समूह उसका प्रयोग करता है तथा उस भाषा समाज का श्रोता अथवा श्रोता समूह सुनकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए उस भाषा में उत्तर देता है।’’

भाषा की प्रकृति एवं उसकी विशेषताएँ

(1)भाषा प्राकृतिक वस्तु नहीं है। इसकी प्रकृति सामाजिक है। समाज में रहकर इसका अर्जन होता है। इसी कारण भाषा केवल व्यवस्था ही नहीं है; यह सामाजिक जीवन में एक मनुष्य के द्वारा समाज के अन्य सदस्यों से भाषा-व्यवहार भी है। पुरानी पीढ़ी ध्वनिक्रमों से निर्मित शब्दों की मान्य अर्थवत्ता को अपने भाषा समाज की नयी पीढ़ी को प्रदान करती है। भाषा समाज की नयी पीढ़ी शब्दों के अर्थ को पुरानी पीढ़ी के संसर्ग से प्राप्त करती रहती है। इस प्रकार भाषा की याद्दच्छिकता का अभिप्राय यह है कि भाषा सामाजिक वस्तु है। समाज में शब्दों के परम्परित अर्थ मे प्रयुक्त होते रहने के कारण हमें शब्द एवं अर्थ का सम्बन्ध नित्य एवं समवाय प्रतीत होता है; तत्त्वतः शब्द एवं अर्थ का सम्बन्ध नित्य तथा समवाय नहीं है। शब्द वस्तु को प्रकट नहीं करता; उसके अर्थ को प्रकट करता है। एक भाषा के साहित्य का दूसरी भाषा में अनुवाद प्रक्रिया के समय विचार (बुद्धिस्थ अर्थ) बना रहता है। हम शब्द परिवर्तन करते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि शब्द एवं अर्थ में नित्य एवं समवाय सम्बन्ध नहीं होता।

शब्द एवं वस्तु की भिन्नता के कारण ही शब्द के अर्थ बदलते रहते हैं। एक शब्द का जिस काल में जो भाषा समाज जो अर्थ ग्रहरण करता है उस काल में उस भाषा समाज में उसका वही अर्थ होता है।

यदि शब्दार्थ ही पदार्थ होता तो चीनी कहने से जीभ को मीठेपन के स्वाद का अनुभव होता, भोजन कहने मात्र से पेट भर जाता, आग कहने से जीभ जल जाती। वस्तु या वाच्य तथा शब्द अथवा वाचक की भिन्नता हम प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकते हैं। जब कोई शिशु जन्म लेता है तो उसका कोई नाम नहीं होता। उस समय हम उसे जिस नाम से चाहें पुकार सकते हैं। उसका हम कोई भी नाम रख सकते हैं। जब परिवार के सदस्य उसका कोई नाम रख देते हैं तो वह उसी नाम से पुकारा जाने लगता है। प्रयोग के कारण कालान्तर में वह प्राणी तथा उसका मान्य नाम इतना अभिन्न प्रतीत होने लगता है कि उसकी अनुपस्थिति में भी उसके नाम को सुनने भर से उसका बोध हो जाता है। शब्दों के अर्थ इसी प्रक्रिया में रूढ़ होते हैं।

शब्द स्वंय पदार्थ नहीं है। शब्द से पदार्थ का नहीं, पदार्थ के बुद्धिस्थ अर्थ का बोध होता है। इस सम्बन्ध में भारतीय एवं पाश्चात्य विचारक एक मत हैं। डी0 सोस्यूर ने प्रतिपादित किया है कि प्रतिपादक शब्द एवं प्रतिपाद्य वस्तु के बीच एक प्रतिपाद्य भाव होता है, जो बुद्धिस्थ होता है। शब्द उस वस्तु को प्रकट नहीं करता, उस वस्तु के भाव को प्रकट करता है।

हम अन्यत्र विस्तार से यह चर्चा कर चुके हैं कि किस प्रकार भारतीय मनीषियों ने ‘स्फोट सिद्धांत’ में इसकी विवेचना की है। वक्ता की वैखरी वाणी सुनकर मध्यमा नाद उत्पन्न होता है। स्फोट से बुद्धिस्थ अर्थ का ग्रहण तदनन्तर बुद्धिस्थ अर्थ से बाह्य अर्थ का ग्रहण होता है।

इस दृष्टि से भाषा-व्यवस्था और भाषा-व्यवहार समानार्थक नहीं हैं। इसके सम्बंध में आगे विचार किया जाएगा।

“Language is a social institution”.

(Bach, Emmon: An Introduction to Transformational Grammars, p.3)

(2)भाषा का स्वरूप ध्वनिमय होता है।

“Spoken language consists of successions of sounds, emitted by the organs of speech, together with certain attributes.”

(Daniel Jones: An Outline of English Phonetics, p. l, Ninth Edition. (1962))

(3)भाषा में ध्वनियाँ विशेष क्रम से मिलकर प्रतीकों का निर्माण करती हैं। दूसरे शब्दों में भाषा अर्थ का बोध कराती है।

(A) The study of speech-sounds without regard to meanings is an abstraction, in actual use; speech-sounds are uttered as signals.

(Bloomfield: Languages, p. 139, New York (1933))

(B) The fact the language is made up of signs makes it necessary to consider it within the winder context of symbolic processes…………Since language is by far the most important and most articulate form of symbolic expression, it is bound to hold a key-position in any theory of signs.

(Ullmann, S.: Semantics: An Introduction to the Science of Meaning, pp. 13-15. (1962))

(4)ध्वनियों के क्रम से निर्मित वाचक का वाक्य से यादृच्छिक सम्बन्ध होता है।

(A) “A language is a system of arbitrary vocal symbols by means of which a society group co-operates”.

(Bloch and Trager: Outline of linguistic Analysis. p.5. (1942))

(B) “Language is a system of arbitrary vocal symbols by means of which members of a social group co-operate and interact”.

(Sturtevant, p.2 (1947))

(C) “There is no inherent, necessary relation or similarity between any given feature of a language and its meaning”.

(Hall, Robert A.: Introductory Linguistics, p.6.)

(5)भाषा ध्वनिक्रमिक होती है अर्थात् इसमें उच्चारित ध्वनियों का अनुक्रम होता है।

“…….a fundamental feature of spoken language is that it is linear.”

(Dinesen, Francis P.: An Introduction to General Linguistics, p.7)

(6)भाषा व्यवस्थाओं की व्यवस्था है अर्थात् भाषा की व्यवस्था में अनेक उप-व्यवस्थाएँ समाहित होती हैं। भाषागत व्यवस्था एवं संरचना अत्यन्त जटिल एवं क्रमबद्ध होती है।भाषा की व्यवस्था जटिल होती है। अनेक स्तरों एवं उनके तत्त्वों की व्यवस्थाओं के संदर्भ में हम यह भी कह सकते हैं कि प्रत्येक भाषा जटिल व्यवस्थाओं की व्यवस्था होती है। हॉकिट ने भाषा की पाँच उप-व्यवस्थाएँ मानी हैं जिनमें से तीन को केन्द्रीय के रूप में स्वीकार किया है:- (1.) व्याकरणीय व्यवस्था: रूपिमों का समूह और उनकी क्रम व्यवस्था।(2.) ध्वनि प्रक्रियात्मक व्यवस्था: ध्वनिमिकों का समूह और उनकी क्रम व्यवस्था।(3.) सन्धि व्यवस्था: व्याकरणिक एवं ध्वनि प्रक्रियात्मक व्यवस्थाओं को परस्पर संबद्ध करने वाली संहिता।इन्हें केन्द्रीय इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इनका उस भाषेतर वातावरण से, जहाँ भाषा का प्रयोग किया जाता है, प्रत्यक्षतः कोई संबंध नहीं होता।

(Hockett, Charles F. : A Course in Modern Linguistics, P. 137, New York (1962))

(A) “……..a language is based on a system of rules…………”

(Chomsky, N.: Aspects of the Theory of Syntax, Preface, V)

(B) “Every human language is a system with a very complicated organization….”

(Hall, Robert A.: Introductory Linguistics, p.15)

(C) “Language is a system of system, all of which operate simultaneously, but we can distinguish, for the sake of analysis, the units and combinatory rules proper to each”.

(Dinesen, Francis P.: An Introduction to General Linguistics, p.8.)

(D) “This correlation of sound and meaning takes place through a system which is quite complex, inasmuch as it involves several levels of organization.”

(Hall, Robert A.: Introductory Linguistics, p. 31)

(7)प्रत्येक भाषा की अपनी व्यवस्था एवं संरचना होती है। प्रत्येक भाषा की अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मक, ध्वनिमिक, ध्वनिमिक-क्रमगठनात्मक, रूपिम, वाक्य विन्यासीय, प्रत्येक स्तर पर भाषाओं में परस्पर भिन्नता होती है। विभिन्न भाषाभाषी समान वाग्यंत्र का प्रयोग करते हैं। मगर किसी भाषा में किसी अवयव का प्रयोग अधिक होता है तो किसी दूसरे का। अरबी भाषा में उपलिजिह्म अथवा ग्रसनी स्थान से ध्वनियों का उच्चारण होता है। किन्तु हिन्दी में इस स्थान से ध्वनियों का उच्चारण नहीं होता। कैन्टोनी में समस्त स्पर्श एवं संघर्षी ध्वनियाँ अघोष हैं तथा शेष ध्वनियाँ सघोष हैं। इसलिए वहा घोष-तंत्रियों की स्थिति व्यतिरेकी नहीं है। हिन्दी आदि भारतीय आर्य भाषाओं एवं अंग्रेजी आदि में घोषत्व-अघोषत्व व्यतिरेकी लक्षण हैं। हिन्दी आदि भारतीय भाषाओं में प्राणत्व व्यवच्छेदक है, किन्तु अंग्रेजी आदि यूरोपीय तथा तमिल आदि भारतीय द्रविड़ भाषाओं में यह व्यतिरेकी नहीं है। स्वर एवं व्यंजनों की संख्या भी भिन्न भाषाओं में भिन्न होती है। भारतवर्ष की आर्य भाषाओं में ही असमिया में 23, बंगला में 28, उडि़या में 31 एवं सिन्धी में 40 व्यंजन ध्वनिग्राम हैं। इनके अतिरिक्त दो भाषाओं में कुछ ऐसी भी ध्वनियाँ पाई जाती हैं जो सूक्ष्म ध्वन्यात्मक भिन्नताएँ लिये हुए होती हैं। प्रत्येक भाषा में अधिखण्डीय ध्वनि तत्त्वों की योजना एवं उनकी व्यवच्छेदकता भी भिन्न होती है। भाषाओं में रूपिमिक एवं वाक्यविन्यासीय विशेषताएँ भी मिलती हैं। इस सम्बन्ध में ग्लीसन ने विवेचन करते हुए लिखा है कि ‘‘अंग्रेजी-भाषी वस्तुओं का वचन-भेद किए बिना उनके विषय में किसी भी प्रकार के विचार व्यक्त ही नहीं कर सकते। भले ही इस प्रकार के भेद करना सार्थक हो अथवा न हो, किन्तु उनकी भाषायी प्रकृति के लिए यह अनिवार्य है। इसके विपरीत, चीनी भाषा में वस्तुओं के एकवचन या बहुवचन का उल्लेख तभी किया जाता है, जब वक्ता उसकी सार्थकता समझता है।

(Gleason, H.A. : An Introduction to Descriptive Linguistics, pp. 7-8(1961))

कुछ भाषाओं में कर्ता और क्रिया के सम्बन्धों के आधार पर परिस्थितियों का विश्लेषण उस प्रकार नहीं किया जाता जैसा कि अंग्रेजी एवं हिन्दी में होता है। संरचनात्मक भाषाविज्ञान के विवेचन के समय इस प्रकरण पर विस्तृत चर्चा की जाएगी।

(A)” ……every language has its own grammar……”

(Hockett: A Course in Modern Linguistics, p.129)

(B) “Language is a form of order, a pattern, and a code.”

(Whitemouth, Joshua: Language, A Modern Synthesis, p.21)

(8)प्रत्येक भाषा सामाजिक सांस्कृतिक आवश्यकतानुसार अपने में यथासम्भव पूर्ण होती है। प्रत्येक भाषा अपने भाषियों की सामाजिक आवश्यकताओं एवं उनके जीवन सांस्कृतिक पक्ष को अभिव्यक्त करती है। प्रत्येक भाषा अपने बोलने वालों की सामाजिक सांस्कृतिक आवश्यकतानुसार अपने में पूर्ण होती है। हम किसी भाषा को दूसरी भाषा से निरपेक्षतः ‘अच्छी’ या ‘बुरी’ नहीं कह सकते। जब हम किसी भाषा को किसी दूसरी भाषा से ‘श्रेष्ठ’ या ‘अश्रेष्ठ’ बतलाते हैं तो वहाँ हमारा तात्पर्य भाषाओं की तुलना से इतना नहीं होता जितना भाषाओं के बोलने वालों की संस्कृतियों की तुलना से होता है। प्रत्येक भाषा उस भाषा समुदाय के लिए उतनी ही अच्छी या बुरी होती है जितनी कोई भी दूसरी भाषा अपने बोलने वालों के लिए हो सकती है। भाषा संस्कृति की वाहिका है। किसी सभ्य समाज अपने समाज के बोलने वालों की आवश्यकताओं को जिस सीमा तक पूर्ण कर देती है उसी सीमा तक वन्य एवं तथा कथित असभ्य समाज वाले भी अपनी भाषा या बोली के माध्यम से अपने मनोभावों एवं विचारों को परस्पर अभिव्यक्त कर लेते हैं। किसी समाज के सदस्यों का जिस प्रकार का सांस्कृतिक स्तर होगा, जिस पक्ष पर वह अधिक बल देते होंगे, जिस प्रकार की वस्तुओं का अधिक व्यवहार करते होंगे, उसी प्रकार के पक्ष एवं वस्तुओं को व्यक्त करने वाले शब्दों की उनकी भाषा में बहुलता होगी। ‘हिन्दी’ में ‘बर्फ’ या ‘हिम’ शब्द हैं किन्तु अंग्रेजी के “snow” एवं “ice” शब्दों की तरह भिन्न अर्थों को व्यक्त करने वाले भिन्नार्थक शब्द नहीं हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि अंग्रेजी भाषा अधिक श्रेष्ठ है। एस्किमों में बर्फ के विविध रूपों को द्योतन कराने के लिए भिन्नार्थक विविध शब्द पाये जाते हैं। इसका कारण यह है कि एस्किमों जाति में ‘बर्फ’ का महत्त्व अधिक है।ग्रामीण व्यक्ति कृषि एवं कुटीर उद्योगों से सम्बन्धित जितनी प्रचुर शब्दावली का प्रयोग करते हैं, उतनी शब्दावली का ज्ञान नगर में रहने वालों को नहीं होता। इसके विपरीत नगर में रहने वाले व्यक्ति आधुनिक औद्योगिक एवं यान्त्रिक जीवन से सम्बन्धित जितनी शब्दावली का प्रयोग करते हैं, उतनी शब्दावली का प्रयोग ग्रामीण जन नहीं करते।शहर का व्यक्ति ‘हल’ भर जानता है, किन्तु ग्रामीण व्यक्ति हल से सम्बन्धित ‘खिनौरी’, ‘ठेंठी’, ‘हँरिस’, ‘मूठ’, ‘हरपगहा’, ‘पगही’, ‘गासी’, ‘चैली’, ‘सैला’, ‘नरा’, ‘नारा’, ‘नारी’ आदि विविध शब्दों का प्रयोग करता है। इसी प्रकार शहर का व्यक्ति ‘बैल’ शब्द का अर्थ समझता है, किन्तु ग्राम का व्यक्ति बछड़े से लेकर बैल तक विविध आयु एवं अवस्थाओं के लिए बछवा, दूधपिऊ, लवारा, लिवाई, बछवा, अदन्त, उदन्त, दुदन्ता, चैदन्ता, छदन्ता, छद्दर, अठदन्ता, लद्दर, मठर आदि शब्दों का प्रयोग करता है। (हिन्दी भाषा-क्षेत्र के बघेली बोलनेवालों के आधार पर)। यही व्यक्ति जब पहली बार शहर आता है तो उसे अनेक अपरिचित शब्द सुनने को मिलते हैं।इस प्रकार प्रत्येक भाषा समाज का मनुष्य अपनी बौद्धिक चेतना एवं अपने सामाजिक जीवन की आवश्यकतानुसार पूर्ण साधन के रूप में ‘‘सामाजिक समूह के सदस्यों के साथ सहयोग तथा अन्तक्र्रियाएँ करता है’’।

(Sturtevant, E.H. : An Introduction to Linguistic Science, P.2, Yale University Press, New Haven (1947))

“….Whenever a human language has been accurately observed, it has been found to be so elaborated that its speakers can make a linguistic response to any experience they may undergo.”

(Hill, Archibald A.: Introduction to Linguistic Structures, p.7)

(9)भाषा की व्यवस्था सदैव तार्किक नहीं होती।

यह भी द्रष्टव्य है कि भाषा-परिवर्तन एवं भाषा-समाज में प्रयुक्त होने के कारण उसमें निहित व्यवस्था सर्वथा तार्किक नहीं होती। नदी की धारा का प्रवाह प्राकृत होता है। नदी के किनारे सर्वथा सुडौल नहीं होते, कहीं-कहीं बेढंगे भी होते हैं। यही बात भाषा की व्यवस्था के सम्बंध में भी कहीं जा सकती है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए हिन्दी से उदाहरण प्रस्तुत हैं। हिन्दी में सभी विशेषणों का रूपान्तरण विशेष्य के लिंग एवं वचनादि के अनुरूप नहीं होता। आकारांत विशेषणों का रूपान्तर होता है। अन्य प्रकार के विशेषणों का नहीं। आकारांत विशेषणों में केवल पुल्लिंग में ही वचन के अनुरूप रूपान्तर होता है, स्त्रीलिंग में नहीं होता। इसी प्रकार मुख्य क्रिया पुल्लिंग में वचन के अनुसार रूपान्तरित होती है, स्त्रीलिंग में नहीं होती। ‘जाता’ का बहुवचन में ‘जाते’ हो जाता है, किन्तु ‘जाती’ बहुचवचन में ‘जाती’ ही है। इसके विपरीत भूतकालिक सहायक क्रियाओं में पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग दोनों में वचन भेद होता है। ‘था’ का ‘थे’ तथा ‘थी’ का ‘थीं’ हो जाता है।भूतकालिक सहायक क्रियाएँ लिंगानुसार रूपान्तरित होती है, किन्तु इनमें पुरूष भेद नहीं होता। वर्तमान सहायक क्रियाओं में पुरूष भेद होता है, लिंग भेद नहीं होता। ‘है’ राम का भी अस्तित्व द्योतित करता है तथा सीता का भी।

(10)भाषा एक सांस्कृतिक व्यापार है। इस सम्बंध में विस्तार से मानवजाति-भाषाविज्ञान अथवा नृजाति-भाषाविज्ञान प्रकरण में विचार किया जाएगा।

“There are connections but not correlations or diagnostic correspondence between cultural norms and linguistic patterns. Although it would be impossible to infer the existence of crier chiefs from the lack of tenses in Hopi, or vice-versa, there is a relation between a language and the rest of the culture of the society which uses it.”

(Whorf, Benjamin Lee : “ The Relation of Habitual Thought and Behavior to Language, in L. Spire, A.I. Hallowell, S.S. Newman (Eds.), Language, Culture and personality, pp. 92-93 (1941))

(11) वाक् व्यवहार की आदतों का समुच्यच भाषा है। सामाजिक संदर्भों एवं विविध प्रयोजनों की सिद्धि के लिए प्रयोक्ता अपने वाक्-व्यवहार का निर्धारण करता है। इसे हॉलिडे आदि भाषावैज्ञानिकों ने भाषिक-प्रकार्यवाद से विवेचित किया है। इसे चॉम्स्की आदि भाषावैज्ञानिकों के संरचनावाद की प्रतिक्रिया माना जा सकता है। जिस प्रकार भाषा-व्यवस्था और भाषा-व्यवहार समानार्थक नहीं हैं उसी प्रकार भाषा-संरचना और भाषा-प्रकार्य भी समानार्थक नहीं हैं। इस सम्बंध में भी आगे विचार किया जाएगा।

(A) “A language is a complex system of habits. “

(Hockett: Course in Modern Linguistics, p.137)

(B) “Once acquired, language becomes a constant companion to all human behavior.”

(Lotz, John: Linguistics Symbols Make Man, in Frontiers of knowledge, L. Whiter Jr. (Editor) p.207, New York: Harper & Brother (1956))

(12) भाषा व्यक्ति को समाज से जोड़ती है।

“It is the possession of the individual, yet at the same time it is the bond which establishes society”.

(Lotz, John: Linguistics: Symbols Make Man, in Frontiers of Knowledge. L. White Jr. (Editor), p.207)

(13)भाषा मानवीय संप्रेषण की विधियों में सर्वाधिक सुनिश्चित विधि है।

“Language is the most explicit type of communicative behavior that we know of”. (Encyclopedia of the Social Sciences, Vol, p.78)

(14)भाषा के कारण ज्ञान का पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षण होता है। व्यक्ति को भाषा अपनी पूर्व पीढ़ी से प्राप्त होती है। यह भाषा का स्थिति पक्ष है।

(15)भाषा के परंपरागत स्वरूपों की श्रृंखला स्थित रहते हुए भी उसके प्रत्येक स्तर में सापेक्षिक परिवर्तन होता रहता है। यह भाषा का गत्यात्मक पक्ष है। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान इसी दृष्टि से भाषा का अध्ययन करता है।

“Languages change constantly, a fact that becomes most noticeable when we read texts a few centuries old”.

(Lehmann, W.P.: Historical Linguistics, An Introduction, p.1. (1962))

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

123 हरि एन्कलेव,

बुलन्द शहर -203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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