ईबुक - साहित्यिक पत्रिका मंतव्य 2

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

हरे प्रकाश उपाध्याय के कसे हुए संपादन में सद्यः प्रकाशित मंतव्य का दूसरा अंक नीचे दिए विंडो में क्लिक टू रीड बटन पर क्लिक कर पढ़ें. बटन को प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

मंतव्य के अब तक केवल 2 अंक ही प्रकाशित हुए हैं, मगर तेवर तीन दशक पूर्व की साहित्यिक पत्रिका 'सारिका' नुमा है. मंतव्य अधिकांश हिंदी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को उनके कम्फर्टज़ोन से बाहर आने के लिए न केवल चुनौती देती हुई प्रतीत हो रही है, बल्कि एक नया सोपान गढ़ने को उद्यत भी है.

image

.

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

1 टिप्पणी "ईबुक - साहित्यिक पत्रिका मंतव्य 2"

  1. मंतव्य पत्रिका का भाग दो श्री रवि जी के रचनाकार के सहयोग से पढ़ा ,अनोखी रचनाएँ और विशुद्ध कवितायेँ ..निडर..बिंदास ..सत्य की अभिव्यक्ति बिना किसी लाग लपेट या आडम्बर
    ऐसी रचनाएँ जिन्हें बार बार पढने को दिल करे इस अनोखी पत्रिका के प्रस्तुतिकरण के लिए
    इसके संपादक श्री हरे प्रकाश उपाध्याय जी को हार्दिक बधाई और शुभ कामना

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.