सोमवार, 26 जनवरी 2015

राजीव आनंद की 3 लघुकथाएँ - हतप्रभ, छोटी मम्मी एवं पाती


                                 हतप्रभ
    नेताजी 'समाज में समानता' विषय पर भाषण दे रहे थे। भाईयों और बहनों हमारे देश का संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है। समाज के सभी लोग एक समान है, न कोई बड़ा, न कोई छोटा, न कोई नीच जाति का और न कोई उंची जाति का।
    नेताजी के भाषण से लोगों को खुशी हुई, लोग अपने बीच ऐसे विचारवान नेता को पाकर धन्य महसूस कर रहे थे। नेताजी का भाषण देसरे दिन अखबारों की सुर्खियों में था। घर-घर में नेताजी के भाषण की चर्चा थी।
    नेताजी की बेटी, जो कॉलेज में पढ़ती थी, अपने पिता के विचारों से खासी प्रभावित हुई थी। उसने अपने पिता को बधाई दिया क्योंकि उनके भाषण की चर्चा उसके कॉलेज में भी जोर-शोर से हुई थी।
    बेटी ने अपने पिता से पूछा, पापा क्या हमलोगों को उंची जाति और नीची जाति का भेद करना चाहिए ?
    नेताजी ने कहा, नहीं बेटी, हम सब समान है, उंची-नीची जातियां तो हमलोगों न ही बनाया है जिससे समाज में दरार आ गयी है।
    कुछ सालों बाद नेताजी की बेटी ने बड़े ही गर्व से अपने पापा को बतायी कि वह घनश्याम दास से प्रेम करती है और उससे विवाह करना चाहती है।
    नेताजी ने अपना सिर ठोंक लिया और कहने लगे, बेटी मैं जो कहता हूँ वह सब वोट बंटोरने की कला है, उसे हमलोगों को व्यक्तिगत तौर पर पालन करने का नहीं है। मेरे जैसे खानदानी रईस की बेटी होकर तुम नीची जाति के लड़के से विवाह करना चाहती हो, लोग क्या कहेंगे ? हमारी उंची जाति के लड़के क्या मर गये है ? प्रेम-प्यार भूल जाओ बेटी, मैं तुम्हारी शादी बड़े धूम-धाम से किसी कुलीन लड़के से कराउंगा।
    बेटी अपने पापा की कथनी और करनी में यह अंतर देखकर हतप्रभ थी।

                                छोटी मम्मी
    चुनमुन और उसकी छोटी बहन मुन्नी अपनी चचेरी बहन सोनी के जन्मदिन का उत्सव मनाने में व्यस्त थें। बच्चों में वैसे भी गिफ्ट क्या-क्या आया इसकी जिज्ञासा होती है। जन्मदिन का उत्सव चल रहा था, उसी बीच चुनमुन और मुन्नी की छोटी मम्मी ने उन्हें गिफ्ट में मिले पेसिंल बॉक्स को मांगा और दूसरे कमरे में चली गयी। बच्चे बैलून फोड़ने और उसे उड़ाने में व्यस्त थे। थोड़ी देर बाद जब उत्सव समाप्त हुआ तो चुनमुन और मुन्नी को अपने-अपने पेंसिंल बॉक्स की याद आयी, टेबल पर रखा पेंसिल बॉक्स लेकर दोनों बच्चे चुममुन और मुन्नी अपने कमरे में चले आए।
    चुनमुन पेंसिंल बॉक्स को खोलकर देखने के बाद अपने पापा से बोला, पापा एक बात बोलिए पापा, छोटी मम्मी क्यों मेरी और मुन्नी के पेंसिल बॉक्स से पांच-पांच पेंसिल निकाल ली ?
    पापा ने पूछा, तुम्हें कैसे पता चला कि छोटी मम्मी ने ही पांच पेंसिल निकाल ली है। अरे छोटी मम्मी हमलोगों से पेंसिल बॉक्स मांग कर दूसरे कमरे में चली गयी थी फिर बाद में पेंसिल बॉक्स लाकर टेबल पर रख दी, जो हमलोग ले आए।
    चुनमुन और मुन्नी के पापा क्या जवाब देते, सो चुप हो गये।

                                  पाती
गांव में काम का आभाव रामरतन को सूरत जाने को विवश कर दिया था। रामरतन कोई चार-पांच महीने तक तो पैसे और पाती दोनों भेजता रहा लेकिन पिछले छह महीने से न तो पैसा और न ही कोई पाती ही भेजा था रामरतन अपनी पत्नी रमणी को।
    महीनों इंतजार के बाद जब रमणी को रामरतन की पाती नहीं मिली तो रमणी ढूंढ़ते हुए एक दिन मेरे पास आयी पाती लिखवाने। आकर रमणी ने कहा, देवरजी, एगो पाती लिख दो, कृष्णा के बाबूजी का छह महीने से कोई पाती नहीं आया है। पैसा न भी आए तो कोई बात नहीं, मजूरी कर के तो हम पेट पाल ही लेते हैं लेकिन दो शबद लिखकर हालचाल तो भेजना चाहिए था न कृष्णा के बाबूजी को।
    मैं मजाक में रमणी, जिसे में भउजी कहता था, कहा, का भउजी, छहे महीने में बेचैन हो गयी, मन नहीं लग रहा भउजी।
    फिर में कागज लेकर पाती यानी चिट्ठी लिखने बैठ गया, क्या-क्या लिखें भउजी ।
    भउजी मुस्करा दी, कही समझदार के लिए इशारा ही बहुत है, देवर जी। बात को विस्तार देने के लिए मैं पूछ बैठा-'दिल का हाल तो भउजी खुद ही बताना होगा'।
    भउजी शरमा गयी। फिर खुद को संतुलित करते हुए घर-गृहस्थी, पास-पड़ोस और गांव-जवार का पूरा हाल चाल बिस्तार से लिखवायी लेकिन भउजी का स्वाभिमान देखिए पैसे भेजने की बात नहीं लिखवायी। एक डेढ़ पन्ने की पाती में दिल दुनिया से लेकर दुनिया जहान की बातें मैंने लिख दिया।
    पाती जब मैं भउजी को देने लगा तो भउजी बोली, एक बार पढ़कर सुना दो, देवर जी।
    मैंने पाती पढ़कर सुना दिया। सुनकर भउजी बोली, एगो और बात जोड़ दो, देवर जी।
    मैंने पूछा, वो क्या ?
    भउजी बोली, पाती को 'ईमेलवा' समझना।
    ये क्या बोल रही हो भउजी ?
    भउजी बोली, अब उ जमाना लद गया देवर जी, जब 'पाती को तार समझना' कहते थे। हम तो सुन रखे हैं कि 'ईमेलवा' तुरंत मिल जाता है।
    मैंने कहा, जोड़ दिया भउजी।

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंडा
गिरिडीह-815301, झारखंड

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------