बुधवार, 14 जनवरी 2015

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - परीक्षा को कमजोरी न बनने दें

परीक्षा को कमजोरी न बनने दें
० सफलता काबिल के कदम चूमती है
परीक्षा का मौसम आते ही विद्यार्थियों के हृदय में जो सिहरन पैदा होने लगती है, उसे कोई और नहीं समझ सकता। तनाव और दबाव के चलते विद्यार्थी कई बार बीमार भी पड़ जाते है। आखिर परीक्षा भय पैदा करने वाला शब्द क्यों बन गया है? इसके पीछे मुख्य कारण दबाव के रूप में ही सामने आता रहा है। माता-पिता के उम्मीदों पर खरा उतरना, दोस्तों के बीच खुद को काबिल साबित करना, प्रतियोगिता के इस युग में अपने आप को सबसे आगे रखना, और इन सबसे बढ़कर परीक्षा में अच्छे अंक लाना, ताकि अच्छे कालेज में दाखिला मिल सके। इन सारे दबावों के बीच एक विद्यार्थी को अपना संतुलन स्थापित करना टेढ़ी खीर होता है। बच्चों की भावनात्मक कमजोरी अनेक बार परीक्षा को जीवन मरन का प्रश्न बना देती है। पालकों को परीक्षा के मौको पर अपनी जवाबदारी भी समझनी चाहिये, और हर छोटी बड़ी समस्या को हल करने के लिये बच्चों के साथ होने का अहसास उन्हें करना चाहिये। ऐसा करते हुए हम बच्चों के अंदर आने वाले अवसाद (डिप्रेशन) से उसे बचा सकते है। प्रायः यह देखा जा रहा है कि माता-पिता बोर्ड परीक्षाओं में शामिल हो रहे बच्चों के प्रति बड़े गंभीर होते है, जबकि स्थानीय परीक्षाओं वाले बच्चों पर वे कम ध्यान देते है। यह एक गलत सोच है। सभी परीक्षाओं को समान रूप से लेते हुए बच्चों को दिशा निर्देशित करना सही पहल मानी जानी चाहिये।
ऐसा नहीं है कि बोर्ड की परीक्षाएं पहले नहीं हुआ करती थी। बल्कि पहले इतना दबाव नहीं होता था। बहुत संघर्ष वाली प्रतियोगिताएं नहीं हुआ करती थी। बच्चों द्वारा कम अंक लाये जाने पर उन्हें अच्छे कालेज में दाखिला भी मिल जाया करता था। आंकड़ों की दुनिया में झांके तो पहले प्राप्तांकों और श्रेणी से निराश होकर बच्चे आत्महत्या की ओर कदम नहीं बढ़ाया करते थे। इसका मुख्य कारण यह है कि घर पर बच्चों के माता-पिता को समझाने बड़े बुजुर्ग हुआ करते थे, और वे ही बच्चों को भी उनके अनुकूल अंक न मिलने पर प्रेम और स्नेह से समझा लिया करते थे। परिणाम स्वरूप बच्चे दोबारा अच्छे अंक लाने के लिये अपनी पढ़ाई में लगन के साथ जुट जाया करते थे। देखा जाये तो आज के युग में सफलता के लिये अच्छे अंक ही एकमात्र आधार नहीं है, बल्कि बच्चे अपनी पसंद के अनुसार कैरियर का चुनाव कर सकते है। थ्री ईडियट्स का वह डायलॉग भले ही लोगों को महज डायलॉग लगा हो, पर यह सत्य है कि-‘बच्चों काबिल बनो, सफलता झक मारकर तुम्हारे पास आएगी।’ यदि इन पंक्तियों का सार जेहन में उतार लिया जाये तो परीक्षा का खौफ काफी हद तक कम हो सकता है। आज के समय में यह बात मानी जा सकती है कि अच्छे कालेज में प्रवेश के लिये अच्छे अंक भी जरूरी है, किंतु तनाव लेकर पढ़ाई करने से अच्छे अंक नहीं आएंगे, बल्कि बच्चे अवसाद से घिर जाएंगे।
बच्चों के मन से परीक्षा का भय समाप्त करने के लिये ही शैक्षणिक वातावरण को बदलते हुए सरकार ने सीसीई पैर्टन लागू किया, ताकि जहां बच्चे आसान से परीक्षा दे सके। सेमेस्टर आधार पर परीक्षा का आयोजन जहां बच्चों को सीमित पाठ्यक्रम के साथ वर्ष में दो बार परीक्षा में अंक लाने का अवसर प्रदान करता है, वहीं बच्चे भय मुक्त परीक्षा दे सकते है। देखने में तो यह आ रहा है कि सीसीई पैर्टन लागू करने के बाद भी परीक्षा का भूत बच्चों के सिर से नहीं उतर पा रहा है। यह भी कहा जा सकता है कि स्कूल में शिक्षक, घर पर माता-पिता और समाज का माहौल माकूल वातावरण नहीं बनने दे रहा है। अच्छे अंक और बेहतर परिणाम लाने के फेर में शिक्षक भी छात्रों पर दबाव बनाये रखते है। अभी सीसीई पैर्टन को सही रूप में लागू करने की जरूरत दिख रही है, ताकि बच्चे भयमुक्त वातावरण में परीक्षा दे सके। परीक्षा को बेहतर नौकरी के उद्देश्य से देखा जाना और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेना ही बच्चों के साथ माता-पिता की भी नींद उड़ा रखा है। जिंदगी में सफलता का इच्छा रखना और उसे पाने के लिये कोशिश करना अच्छी बात है, किंतु इस बात का सदैव ध्यान रखे कि सफलता का कोई शार्ट कर्ट नहीं होता। उसके लिये कड़ी मेहनत ही एकमात्र विकल्प है। घर के बड़ों को इस बात की शिक्षा बच्चों को अवश्य देनी चाहिये।
परीक्षा के भय को मन से निकाल फेंके और अपने सामर्थ्य को पहचाने। यही वही ताकत है जो आपको सफलता के सर्वोच्च पायदान पर पहुंचाकर गर्व से सीना चौड़ा कर दिखायेगी। कुदरत ने हर किसी के भीतर कुछ कर गुजरने की शक्ति प्रदान की है। आपकी आंखों में सूरज की रौशनी है, हृदय में चांद की शीललता है और बुद्धि में बृहस्पति की ऊर्जा है। अपने सामर्थ्य को पहचानते हुए उत्साह और ऊर्जा से भरे हुए अपने अंतर्निहित सोई हुए शक्तियों को जगाईए। जीवन एक चुनौती है, जिसे आपको स्वीकार करना है। सफलता किसी जंग से कम नहीं, उसका सामना कीजिए। मैं सब कुछ कर सकता हूं, अपने अंदर की उस आत्म विश्वास की दौलत को बटोरिये, मैं दावे के साथ कह सकता हूं ऐसी वास्तविक पहचान आपके परीक्षा के भय को पास भटकने नहीं देगी। एक नई प्रेरणा और नये लक्ष्य को लेकर आप जिंदगी के पन्नों को खोले और आनंद तथा उत्साह के साथ अपनी मंजिल का रास्ता तय करें।
मैं परीक्षा में पास नहीं हो सकता, अथवा मुझे फलाना विषय समझ में नहीं आता या मैं उच्च अंक लाने लायक बुद्धि नहीं रखता हूं इसका त्याग जरूरी है। अपने मन के अंदर घर बना चुकी निराशाओं को हटाये, और मन में आशा के दीप जलाये। निराशा हमारी सफलता की राह का कांटा है, वह हमारी आकांक्षाओं की हत्या करती है। वह हमारे आत्म गौरव के मुकुट को धूल धुसरित कर देती है। निराशा पैदा होने का अर्थ प्रगति में रूकावट है। निराशा का थैला अपने कंधे पर लटकाकर कोई भी व्यक्ति सफलता का कामना नहीं कर सकता है। आप जो भी काम करें, पूरे उत्साह और आशा के साथ करे। जहां निराशा में लिखी गयी हर पंक्ति मरने की प्रेरणा  देती है, वहीं आशा और उत्साह ने लिखी गई हर बात किसी महाकाव्य की चौपाई बन जाती है। उत्साहित व्यक्ति स्वस्थ मन का मालिक होता है और स्वस्थ मन हमेशा मील के पत्थर स्थापित करता है। मन के संबंध में रस्किन बांड ने बड़ी ही सुंदर बात कही है ‘मन डुबा तो नाव डुबी, सारा खेल मन से ही जुड़ा है, मन मजबूत तो जिंदगी मजबूत, मन कमजोर तो जिंदगी भी कमजोर। मन प्रेरक है, मन आधार है, मन नींव है, मन सूत्रधार है, मन सर्जक है, मन विसर्जक भी है।’ जरूरी यह है कि हम अपने मन को समझते, और उसे अपना आईना बनाये।
परीक्षा में खरा उतरने के लिये सर्वप्रथम विषयों से दोस्ती कर लें। सभी विषयों को समान रूप से लेते हुए समय का आबंटन करें। अब प्रत्येक विषय के कठिनाई को छांटकर अलग करते हुए उसका समाधान घर पर बड़े भाई-बहनों की सहायता से या फिर शिक्षकों से कराने के लिये समय तय कर लें। सैद्धांतिक और प्रायोगिक विषयों के लिये नीति का निर्धारण पुराने प्रश्न पत्रों के आधार पर करने का प्रयास करें। बार-बार पढ़े और पढ़े हुए अंश को लिखें। प्रत्येक विषय को प्रेरक बनाने के लिये अपने अनुसार प्रश्नों के उत्तरों को बिंदुओं में तैयार करें और उन बिंदुओं को अलग पेपर में लिख लें। हो सके तो उन्हें अपने पास पॉकेट में रखे, और जहां कहीं समय मिले, उन्हें अवश्य पढ़ें। ऐसे छोटे छोटे प्रयास आपको हर प्रकार की समस्या से उबारते हुए सफलता अवश्य दिलाएंगे।


                                         प्रस्तुतकर्ता
                                       (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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