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समीक्षा - सुखदेव की सुबह

सुखदेव की सुबह- यथार्थ का आईना

आचार्य बलवन्त

‘परिकथा’ नवंबर-दिसंबर, 2014 में प्रकाशित वरिष्ठ कहानीकार गोविन्द सेन की कहानी ‘सुखदेव की सुबह’ अच्छी लगी। कहानी जीवन के कई महत्त्वपूर्ण आयामों को परत दर परत उघाड़ती हुई आगे बढ़ती है। शब्द, शिल्प और शैलीगत सहजता अद्भुत है। प्रवाहमयता भी इसमें खूब है। शब्द-संयोजन लयात्मक आरोह-अवरोह से इस तरह आबद्ध है कि कदम-कदम पर काव्यात्मक छवियाँ जीवंत हो उठती हैं।

कहानी आरंभ से अन्त तक बाँधे रखती है। सुबह की सैर को महत्त्व देते हुए उसके विभिन्न पहलुओं की गहन पड़ताल करती यह एक परिपक्व कहानी कही जा सकती है। पर्यावरण के पोषक नीम, बबूल, पीपल और बरगद को अपनी यात्रा का सहचर बनाना लेखक की जागरूकता का परिचायक है। बनती-बिगड़ती व्यावसायिकता की दशा और दिशा का चित्रण अत्यंत प्रभावपूर्ण है। सरकार का साक्षरता अभियान भी आपके निरीक्षण-परीक्षण की परिधि में आ गया है। काव्यमंचों की वर्तमान स्थिति तो जगजाहिर है ही। उसके बिगड़ते स्वरूप के लिए उत्तरदायी आयोजकों, तथाकथित मंच-संचालक कवि कुमारों के प्रति भी आपका आक्रोश देखते बनता है। ‘कल नुमाइश में मिला वह चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान हूँ’ (दुष्यंत कुमार) से देश के आम आदमी की दशा का अंदाजा लग ही जाता है।

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं का बोझिल और विचारों से परे होना आप जैसे जागरूक रचनाकार को व्यथित करेगा ही। कविता से उसकी सरलता का गायब होना निश्चित रूप से चिन्ता का विषय है। धनाभाव के कारण अच्छी पुस्तकों के प्रकाश में नहीं आने को लेकर आपकी चिन्ता वाजिब है।

सात-आठ साल के लड़के का सिर झुकाए एक मोटे सूअर और उसके कुनबे से अपने हिस्से की रोटी के लिए संघर्ष करता देख महाकवि निराला के ‘भिक्षुक’ की याद आती है। कचरे के ढेर में लगी आग से अपने शरीर को तपाते व्यक्ति का चित्रण भी हृदय विदारक है। कथा-कीर्तन के नाम पर हो रही फिजूलखर्ची, वेतन को लेकर आये दिन हो रही अध्यापकों की हड़ताल, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति के नाम पर हो रही कमीशनखोरी तथा प्राकृतिक संसाधनों के अनियमित दोहन एवं दुरुपयोग की दारुणता से सुखदेव की सुबह की यात्रा का दुखदायी अन्त वर्तमान की भयावहता को भलीभाँति प्रकट करता है।

व्यावसायिक दृष्टि से बन रही फिल्मों के बालमन पर पड़ रहे दुष्प्रभावों का आपने प्रभावशाली चित्रण किया है। आये दिन हो रही रेप की अधिकांश घटनाओं में सगे-संबंधियों की संलिप्तता चिन्ताजनक है। कहानी में सूअर के द्वारा अपने ही बच्चे को खा जाने का इंगितार्थ व्यवस्था की विद्रूपता की ओर इशारा करता है।

भाषा का संस्कृति से संबंध सर्वविदित है। बिना अपनी भाषा के हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ाना तो दूर बचा भी नहीं सकते। जीवन की जड़ों को कमजोर करते पाश्चात्य शैली (अंग्रेजी माध्यम) के इन विद्यालयों के प्रति आम आदमी का बढ़ता रुझान चिन्ताजनक है। इसके दुष्परिणाम कितने घातक होंगे, कहा नहीं जा सकता।

पर्यावरण प्रदूषण एक ज्वलंत समस्या है। कुछ दिनों पहले स्वास्थ्य के जानकारों ने दिल्ली की सड़कों पर सुबह (सूर्योदय से पहले तक) नहीं टहलने की ताकीद देकर बुरी तरह बिगड़ चुके पर्यावरण के दुष्प्रभाव की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।

कहानी के अन्य पहलू भी रम्य और रोचक हैं। एक मौलिक, सहज, सारगर्भित और शिक्षाप्रद कहानी ‘सुखदेव की सुबह’ का साहित्य सुधियों के द्वारा स्वागत किया जायेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

आचार्य बलवन्त

विभागाध्यक्ष हिंदी

कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एण्ड साईंस

450, ओ.टी.सी.रोड, कॉटनपेट, बेंगलूर-560053

 Email- balwant.acharya@gmail.com

1 टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही रोचक और विद्वतापूर्ण समीक्षा, धन्यवाद...राजीव आनंद

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