सोमवार, 26 जनवरी 2015

चंद्रेश कुमार छतलानी का आलेख - गणतांत्रिक शिक्षा

आज 26 जनवरी 2015, जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र का राष्ट्रपति बराक ओबामा हमारी ख़ुशी में शामिल होने आयें है, तो एक यह सोच अवश्यम्भावी होनी ही चाहिये कि हमारे अपने देश में इस ख़ुशी में कौन-कौन और क्या-क्या शरीक है| आज ही का दिन है जब यह विचार करने की आवश्यकता है कि कौन हैं जो देश की गणतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं और क्या ऐसी व्यवस्थाएं हैं, प्रक्रियाएं हैं, सेवाएँ हैं, जिम्मेदारी हैं और अधिकार हैं जो गणतांत्रिक हैं? और जो कुछ गणतांत्रिक नहीं है वो यदि भारत का अंग है तो जीवित कैसे हैं? हमारे देश की आधी आबादी पढ़ना-लिखना भी नहीं जानती हो, जिसे जीने का हक भी मुश्किल से हासिल हो रहा हो क्‍या लोकतंत्र में उसकी भागीदारी का कोई अर्थ है ?

हम कहते हैं कि देश की जनता राज करती है सारे देश में गणतंत्र है तो फिर ये “रूलिंग पार्टी” क्या बला है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले कई वर्षों से भारतीय लोकतंत्र के नाम पर एक शासन व्‍यवस्‍था राज कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे देश में लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट देने के कर्तव्य और वोट देने के ही अधिकार से लगाया जाता है, उसके पश्चात एक शासन प्रणाली आ जाती है?

कितने प्रश्न हैं, जिन्हें सुलझाना आवश्यक है, प्रश्न यह भी है कि सुलझाये कौन? इतना शिक्षित कौन है, देश के वो लोग जो केवल मंहगाई का रोना रोते रहते हैं या फिर वो लोग जो किसी न किसी तरह से भ्रष्टाचार कर देश का नुकसान कर रहे हैं? जो बचे हुए हैं वो मौन हैं|

तो मेरे अनुसार, सबसे पहले जो आवश्यकता महसूस की जानी चाहिए वो है गणतंत्र की शिक्षा की, हालाँकि यह दुःख का विषय है लेकिन इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी गणतंत्र की शिक्षा और शिक्षा में गणतंत्र दोनों की बेहद आवश्यकता है| शिक्षा में शासन पद्धति अपनी मनमानी करती आ रही है, उचित शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री से लगाया जा रहा है या फिर छोटा-मोटा शोध करने से, लेकिन जन-जन की शिक्षा जो जनतांत्रिक हो, उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है| शिक्षा में जब निर्णय लेने का अधिकार जनता को अर्थात सभी हितधारकों (stakeholders) को मिल जायेगा तभी शिक्षा में गणतन्त्र सफल है|

और रही बात गणतंत्र की शिक्षा की, पिछले कई वर्ष तो भारतीय गणतंत्र के नाम पर एक शासन व्‍यवस्‍था के रहे हैं, शासन जो लोकतंत्र के नाम पर राज करता है। हमारे देश में लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट देने के कर्तव्य और वोट देने के ही अधिकार से लगाया जाता है| उसके पश्चात एक शासन प्रणाली आ जाती है|

एक ख़ुशी का विषय यह है कि मौजूदा प्रधानमंत्री जन जन को देश की विभिन्न गतिविधियों से जोड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं| E-Governance का नाम उन्होंने Democratic Governance दिया है और इस दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल कर दी हैं| My Government परियोजना से जुड़ कर भारत का प्रत्येक नागरिक अपनी राय दे सकता है| लेकिन यह केवल एक कदम है, अभी मीलों का सफ़र बाकी है|

हमारे समाज के आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक रूपांतरण के लिए एक शांतिपूर्ण क्रांति लाने की क्षमता केवल शिक्षा में ही है। हमें सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित न रह जाए। इसमे सड़ी गली रूढि़यों और सामाजिक विषमता को उखाड़ फेंकने की ताकत भी होनी चाहिए।

1986 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय (अमेरिका) में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि ‘‘मैं नहीं समझता कि साक्षरता लोकतंत्र की कुंजी है, हमने देखा है, और मैं सिर्फ भारत की ही बात नहीं कर रहा हूं, कि कभी-कभी साक्षरता दृष्टि को संकुचित बना देती है, उसे विस्तृत नहीं बनाती।’’ यह हमारे देश की शिक्षा का हाल किसी न किसी तरह बयाँ कर ही रहा है, उचित शिक्षा की आवश्यकता तब भी राजीव गांधी ने अनुभव की थी और आज नरेंद्र मोदी भी कर रहे हैं|

सच तो यही है कि शिक्षा गणतांत्रिक हो और शिक्षा गणतंत्र को मज़बूत करे तभी वो सार्थक शिक्षा है| सार्थक शिक्षा के सभी पहलुओं पर ध्यान देने के महती आवश्यकता है और इसका एक महत्वपूर्ण पहलू है गणतंत्र की शिक्षा जो केवल सैद्धांतिक ही नहीं हो वरन व्यवहारिक भी हो| उसके पश्चात यह कहते हुए सच्ची ख़ुशी का अनुभव होगा – “मेरा गणतंत्र महान”|

- चंद्रेश कुमार छतलानी

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Regards,
Chandresh Kumar Chhatlani

http://chandreshkumar.wikifoundry.com

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