मंगलवार, 13 जनवरी 2015

पुस्तक समीक्षा - देहरी के पार

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पुत्रशोक में विह्वल पिता की करुण गाथा

डॉ. विजय शिंदे

‘देहरी के पार’ विवेकी राय का उपन्यास है। चिर-परिचित ढंग और और अपनी उपन्यास शैली पर अड़िग रहकर लिखा गया उपन्यास। अपनी करुण गाथा का चित्रण कर आंतरिक दुःख को हल्का करने का प्रयास। उपन्यास में खुद विवेकी राय अपना दुःख, दर्द, व्याकुलता, आक्रोश... सामने वाले को बता रहे हैं और सामने वाला भी मूक सुनते जा रहा है। सुनने वाले के सिर्फ कान जगे हैं। शरीर के बाकी अवयव अचेतन अवस्था में अपना अस्तित्व खो बैठे हैं। आंखों के आगे बार-बार अंधेरा छाने लगा है। निरंतर बहते आंसू, बार-बार आंखों की ओर उठती मुट्ठियां लेखक के दुःख में शरीक होना चाहती हैं। पुत्र वियोग में जलते-भुनते, तड़पते, आकुल-व्याकुल होते पिता की करुण गाथा का वर्णन करने वाला उपन्यास ‘देहरी के पार’ हिंदी का किसी लेखक द्वारा पुत्र वियोग में लिखा जाने वाला उल्लेखनीय उपन्यास है। समय की असोचनीय खिलवाड़ विवेकी का अंतर-बाह्य झकझोर देती है। पारिवारिक व्यवस्था चकनाचूर होती है। परिवार की जिम्मेदारियों का भार अपने बड़े पुत्र ज्ञानेश्वर पर सौंप निश्चित होकर साहित्य सेवा में जुटे विवेकी राय अकल्पनीय, अविश्वसनीय हादसे से आक्रंदित होते हैं। शिवरात्रि के दिन शिव-पूजा करके वापस लौटने वाले शिवभक्त बच्चे का परमात्मा में विलीन होना नकारते विवेकी राय भगवान की ओर प्रश्नांकित दृष्टि से ताक रहे हैं। अनुत्तर यात्रा, अस्तित्व, आभास, माया और उत्तर यात्रा इन पांच अध्यायों में विभाजित उपन्यास पाठक को अकल्पनीय घटना का वास्तव होना बताता है

 

सुबह-सुबह ही अनमने मन से अलसाए पिता दिन की शुरुआत करना चाहते हैं। लेकिन आंखों पर न जाने कौन-सा परदा है कि उन्हें लगता है समय रुक-रुककर अपने साथ छल-कपट कर रहा है। उन्हें लगता है कि अब उठे, जल्दी करें, नहाएं-धोएं। शिवरात्रि का दिन है, पूजा करें, लेकिन सिर्फ विचार और विचार, कृति कुछ भी नहीं। चारों ओर आलस छाया हुआ है। सबेरे ही उनकी छिपकली के साथ भिड़ंत होती है और पता नहीं कौन-सा भय मनपटल पर छाया रहता है, जो दिन भर उनका पीछा नहीं छोड़ता और रात्रि में उस भय का अंत होता भी है तो दिल पर एक गहरी चोट खरोंच के साथ। समय अपने नाखुनों से केवल पिता के ही नहीं, परिवार एवं आत्मीय जनों के हृदय पर कई खरोंचे उठाता हुआ क्रूरता के साथ अट्टहास करने लगता है। सभी भय चकित है।

उपन्यास को पढ़ते वक्त पाठक भी अंत तक भयग्रस्थ रहता है, शंका-कुशंकाओं के बीच उलझता रहता है। बूढ़े पिता अपनी बहू और विभव के साथ तिपहियां टैंपों पर यात्रा करने लगते हैं। अनेक उलझनों, अटकावों के बीच से निकलता टैंपों बूढ़े पिता को बच्चे ज्ञानेश्वर से मिलाने तथा विनिता को अपने सिंदूर से मिलाने जा रहा है। शंकुतला राय के हाथों से पहुंची चिट्ठी छोटी आशंका से बड़ा जाल बुनने लगती है और बूढ़े पिता के सामने सुबह की छिपकली बार-बार प्रकट होती है। "सुबह-सुबह ही वह मनहूस छिपकली भिड़ गई और भीतर से पछारने लगी। तब तक यादों में उभरे एक रुद्रगण के गुंजलक में कसी चेतना चरमरा उठी और रही-सही कसर इस रहस्यावृत्त फरखत्ती ने पूरी कर दी।" (पृ. 16) वह कौन-सा ऐसा रहस्य था जो समय के पेट में समाए लेखक को सूचित कर रहा था? क्या इन घटनाओं को समझने वाला समय पर सचेत हो सकता है? अघटित से छुटकारा पा सकता है? ऐसा क्यों हो गया? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है? हंसते-खिलखिलाते परिवार की खुशी को बर्करार रखा जा सकता है? उपन्यास में वर्णित यथार्थ घटना कई परिवारों के साथ समय और प्रसंग बदलकर बार-बार घटित होती है, क्यों? दोष किसका? समय का, मनुष्य या वर्तमान युग का? किसे दोष दें – प्रकृति को या मनुष्य को? उपन्यास पढ़ते वक्त कई सवाल उभरकर ‘क्यों’ में बदल जाते हैं। जिस तरह पिता की छिपकली से भिड़ंत होकर दिन-भर भागमभाग के खेल खेलती है और पुत्र को अनाकलनीय शक्ति रेल्वे क्रॉसिंग की ओर खींचकर मालगाड़ी की ठोकर लगने के लिए मजबूर कर अप्राकृतिक मृत्यु का कारण बनती है; बिल्कुल उसी तरह उपन्यास को पढ़कर नितांत अकेलपन में ‘क्यों’ से भिड़ंत होकर हमें भी आहत करती है। संवेदना, करुणा, भावुकता आदि उस परिवार के साथ जताई जाती है। एकांत आंखें बिना पलक झपकाए ताक रही हैं... ‘क्यों? ऐसा क्यों हुआ? क्यों? ऐसा क्यों होता है? क्या भविष्य में भी ऐसी घटनाएं होती रहेंगी? दोषी – समय, प्रकृत्ति या मनुष्य?

 

प्रश्नचिह्न बड़ा आकार धारण करने लगता है। गोल-गोल घुमने लगता है और गहरी अतल गहराइयों में छानबीन शुरू होती है। अति प्राचीन मानव का चित्र सामने आता है। प्रकृति नामक ईश्वर समर्थक के रूप में नितांत मनहूस घड़ी में मनुष्य नामक जीवन का निर्माण करती है और तबसे उसके देवत्व को ग्रहण लग जाता है। यात्रा-दर-यात्रा समय-दर-समय यह चित्र वर्तमान युग के यांत्रिक युग तक पहुंचता है। तब महसूस होता है, आज प्रत्येक मनुष्य असुरक्षित है। मनुष्य अपने आस-पास मृत्यु के जाल बिछा चुका है। वह समतल ‘शांति’ शब्द के पीछे छिपकर अशांति के पहाड़ बनाने लगता है। नए-नए यंत्र, अस्त्र-शस्त्र ‘विकास’ के थुल-थुल आधार पर मानव को घेरने लगे हैं। दिन-प्रतिदिन विकास की चोटी को छुता मनुष्य मृत्यु... नहीं ‘अप्राकृतिक मृत्यु’ को आमंत्रित करता है।

बढ़ती आबादी और उसी अनुपात में बढ़ते यंत्रों की संख्या देवता के प्रतिरूप मनुष्य को कीड़े-मकौड़े की जिंदगी जीने के लिए मजबूर करते हैं। मनुष्य अपने हाथों से बनाए अस्त्र-शस्त्र से जितना खुश है उतना ही दुःखी भी है। विजयी सेनाओं के पैरों तले रौंदी गई पराजित सैनिकों की जिंदगियां यंत्रों के पहियों को रंगती रही है। यंत्रों को कोई सुख-दुख नहीं। दुखी है सिर्फ मनुष्य यंत्रों की गुत्थियों के बीच फंसा मनुष्य अप्राकृतिक मृत्यु को भोग रहा है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को अप्रत्यक्ष रूप में मारने के लिए कारण बना है। वैसे कूटनीति, राजनीति और घिनौने कारनामों में प्रत्यक्ष रूप से मारामारी भी होती है लेकिन खुलेआम डर-सा लगता है। परंतु अब वह ‘समय’ दूर नहीं जिसमें मनुष्य सीधे-सीधे एक-दूसरे को मारेगा-काटेगा; भेड़-बकरियों के समान दूकानों पर उसका मांस बेचा जाएगा। जानवरों का मांस खाना बीभत्स और क्रूरता का लक्षण मानने वाला व्यक्ति भी मनुष्य का मांस चटखारे लेकर नमक-मिर्च लगाकर खाने लगेगा। तात्पर्य बढ़ती आबादी, यांत्रिकता और सत्ता-लोलपता में मनुष्यता नष्ट हो गई है।

रेल्वे क्रॉसिंग पर कुंड़ली मारे राह देख रहा ‘समय’ ज्ञानेश्वर के मुंह से पाठ पढ़वा रहा था। आगे जो अघटित घटने वाला था वह घट चुका था। ‘उत्तर यात्रा’ को पढ़ते वक्त लगता है कि समय रेल्वे क्रॉसिंग, रेलगाड़ी और ज्ञानेश्वर को बार-बार ‘ऍडजेस्ट’ कर रहा है। गाजीपुर वापसी के लिए लालायित ज्ञानेश्वर को बार-बार रोका जा रहा है। लालता बाबूजी के यहां मोटार साइकल रखना, वहां खाना-पीना, मेला देखना, सावित्रि का दो बार परिवार वालों के आने न आने की खबर लेने के लिए जाना और विश्वंभरपुर के लिए वापसी। अंत तक सुई की घड़ी आगे-पीछे, आगे-पीछे हो रही थी। सभी चीजें ‘ऍडजेस्ट’ की जा रही थी। इतना ही क्यों, रेल्वे क्रॉसिंग पर उतरकर पेड़ की छाया में बहन-भाई का कुछ समय के लिए जो वार्तालाप हुआ तब ‘समय’ को लगा होगा कि शायद ज्ञानेश्वर जल्दी आ पहुंचा। चलो, थोड़ा और वार्तालाप करें। वार्तालाप के पश्चात् गाड़ी लेकर रेल्वे क्रॉसिंग पार करता ज्ञानेश्वर समय का शिकार बन गया। ‘समय’ और ‘यंत्र’ के बीच उलझते मानवीय जीवन को पलक झपकते ही ध्वस्त किया गया। उस बूढ़े की लाठी को छीना, उस मां के आंचल को आंसुओं से भिगोया, उस बहू की मांग का सिंदूर छीना गया, उस भाई का छत्र छीना गया, उस बहन को बीच रास्ते में अकेला छोड़ा गया, बच्चों के भविष्य का निर्माणकर्ता अज्ञात में विलिन हो गया और सबसे करुण गाथा छोटी को ‘बासुरी’ देने वाला बासुरी वाला अज्ञात, अनाम गांव के लिए देहरी को लांघकर ‘देहरी के पार’ हो गया।

उपन्यास के अंत में नौलखिया कुतिया लड़खड़ाते पांवों से धीरे-धीरे उस स्थान की परिक्रमा करने का वर्णन है, जहां पर ‘उत्तर यात्रा’ के यात्री ने अंतिम पड़ाव डाला था। उसे देख संध्या, पछिमा हवा और आस-पास गलत तर्क-वितर्क लगाते हैं। सूरज कहता है, "यह नौलखिया उत्तर यात्रा के उस पवित्र यात्री के लिए अपने इन स्वरों में जय-जय का उद्घोष कर रही है, जो सामान्य अवश जीवों के भांति महाकाल के गह्वर में समाकर नष्ट नहीं हो गया है। वह नई आत्म-सज्जा में नई शक्ति के साथ देहरी के पार होकर ईश्वर के दिव्य चिन्मय राज्य की ओर बढ़ गया है।" (पृ. 202-203) उपन्यास के अंत में आई नौलखियां यह विश्वंभरपुर की नौलखियां नहीं जिसके दुलार से छुटकारा पाने के लिए ज्ञानेश्वर ने जलेबी देने का वादा किया था; यह वह नौलखिया है ‘जिसे’ दूसरे दिन गाजीपुर वापस आने का वादा ज्ञानेश्वर ने किया था। जो समय के फेरे में अटककर बहू के साथ गाजीपुर से विश्वंभरपुर के लिए टैंपों पर संवार हुआ था। घटना के बाद ‘वे’ (विवेकी जी) जब कभी रेल्वे क्रॉसिंग पर शरीर या अशरीर रूप में पहुंचे होंगे तब उनके पैर लड़खड़ाकर उस स्थान की परिक्रमा कर रहे होंगे। तब वे अपने बेटे की पवित्र यात्रा के लिए जय-जय घोष कर रहे हैं, यह सूरज का तर्क बिल्कुल सार्थक है।

उपन्यास में वर्णित घटना विवेकी राय के परिवार के साथ 7 मार्च, 1997 में घटित हो गई और उसके छः वर्ष बाद यह उपन्यास प्रकाशित हो चुका है। अपने भीतर समेटे दुःख को कागज के पन्नों पर उतारा गया है। बिना किसी को समर्पित किए या बिना भूमिका लिखे प्रकाशित प्रस्तुत उपन्यास पूरी तरह ज्ञानेश्वर को समर्पित है। भाषा, शैली या कला-सौंदर्य की चर्चा गौण है, प्रधान है भाव और विचार तत्त्व। भावना और विचार के धरातल पर एक पिता का बेटे के न रहने के बाद स्मृतियों में चलता संवाद ‘देहरी के पार’ में देखा जा सकता है। पता नहीं, इसे लिखते समय लेखक की आंखें करुणा के सागर में कितनी बार डुबकियां लगा चुकी है। यह उपन्यास अपनी कलम को आंसू और खून की स्याही से सींच-सींचकर लिखा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी साहित्य के लिए समर्पित विवेकी राय का प्रस्तुत उपन्यास पुत्रशोक में विह्वल पिता की करुण गाथा है।

 

समीक्षा ग्रंथ –

देहरी के पार (उपन्यास) – विवेकी राय, ग्रंथ अकादमी प्रकाशन, नई दिल्ली,

प्रथम संस्करण - 2003, पृष्ठ - 203, मूल्य – 200 ₹

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डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र)

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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