पुस्तक समीक्षा - देहरी के पार

SHARE:

पुत्रशोक में विह्वल पिता की करुण गाथा डॉ. विजय शिंदे ‘देहरी के पार’ विवेकी राय का उपन्यास है। चिर-परिचित ढंग और और अपनी उपन्यास शैली पर ...

image

पुत्रशोक में विह्वल पिता की करुण गाथा

डॉ. विजय शिंदे

‘देहरी के पार’ विवेकी राय का उपन्यास है। चिर-परिचित ढंग और और अपनी उपन्यास शैली पर अड़िग रहकर लिखा गया उपन्यास। अपनी करुण गाथा का चित्रण कर आंतरिक दुःख को हल्का करने का प्रयास। उपन्यास में खुद विवेकी राय अपना दुःख, दर्द, व्याकुलता, आक्रोश... सामने वाले को बता रहे हैं और सामने वाला भी मूक सुनते जा रहा है। सुनने वाले के सिर्फ कान जगे हैं। शरीर के बाकी अवयव अचेतन अवस्था में अपना अस्तित्व खो बैठे हैं। आंखों के आगे बार-बार अंधेरा छाने लगा है। निरंतर बहते आंसू, बार-बार आंखों की ओर उठती मुट्ठियां लेखक के दुःख में शरीक होना चाहती हैं। पुत्र वियोग में जलते-भुनते, तड़पते, आकुल-व्याकुल होते पिता की करुण गाथा का वर्णन करने वाला उपन्यास ‘देहरी के पार’ हिंदी का किसी लेखक द्वारा पुत्र वियोग में लिखा जाने वाला उल्लेखनीय उपन्यास है। समय की असोचनीय खिलवाड़ विवेकी का अंतर-बाह्य झकझोर देती है। पारिवारिक व्यवस्था चकनाचूर होती है। परिवार की जिम्मेदारियों का भार अपने बड़े पुत्र ज्ञानेश्वर पर सौंप निश्चित होकर साहित्य सेवा में जुटे विवेकी राय अकल्पनीय, अविश्वसनीय हादसे से आक्रंदित होते हैं। शिवरात्रि के दिन शिव-पूजा करके वापस लौटने वाले शिवभक्त बच्चे का परमात्मा में विलीन होना नकारते विवेकी राय भगवान की ओर प्रश्नांकित दृष्टि से ताक रहे हैं। अनुत्तर यात्रा, अस्तित्व, आभास, माया और उत्तर यात्रा इन पांच अध्यायों में विभाजित उपन्यास पाठक को अकल्पनीय घटना का वास्तव होना बताता है

 

सुबह-सुबह ही अनमने मन से अलसाए पिता दिन की शुरुआत करना चाहते हैं। लेकिन आंखों पर न जाने कौन-सा परदा है कि उन्हें लगता है समय रुक-रुककर अपने साथ छल-कपट कर रहा है। उन्हें लगता है कि अब उठे, जल्दी करें, नहाएं-धोएं। शिवरात्रि का दिन है, पूजा करें, लेकिन सिर्फ विचार और विचार, कृति कुछ भी नहीं। चारों ओर आलस छाया हुआ है। सबेरे ही उनकी छिपकली के साथ भिड़ंत होती है और पता नहीं कौन-सा भय मनपटल पर छाया रहता है, जो दिन भर उनका पीछा नहीं छोड़ता और रात्रि में उस भय का अंत होता भी है तो दिल पर एक गहरी चोट खरोंच के साथ। समय अपने नाखुनों से केवल पिता के ही नहीं, परिवार एवं आत्मीय जनों के हृदय पर कई खरोंचे उठाता हुआ क्रूरता के साथ अट्टहास करने लगता है। सभी भय चकित है।

उपन्यास को पढ़ते वक्त पाठक भी अंत तक भयग्रस्थ रहता है, शंका-कुशंकाओं के बीच उलझता रहता है। बूढ़े पिता अपनी बहू और विभव के साथ तिपहियां टैंपों पर यात्रा करने लगते हैं। अनेक उलझनों, अटकावों के बीच से निकलता टैंपों बूढ़े पिता को बच्चे ज्ञानेश्वर से मिलाने तथा विनिता को अपने सिंदूर से मिलाने जा रहा है। शंकुतला राय के हाथों से पहुंची चिट्ठी छोटी आशंका से बड़ा जाल बुनने लगती है और बूढ़े पिता के सामने सुबह की छिपकली बार-बार प्रकट होती है। "सुबह-सुबह ही वह मनहूस छिपकली भिड़ गई और भीतर से पछारने लगी। तब तक यादों में उभरे एक रुद्रगण के गुंजलक में कसी चेतना चरमरा उठी और रही-सही कसर इस रहस्यावृत्त फरखत्ती ने पूरी कर दी।" (पृ. 16) वह कौन-सा ऐसा रहस्य था जो समय के पेट में समाए लेखक को सूचित कर रहा था? क्या इन घटनाओं को समझने वाला समय पर सचेत हो सकता है? अघटित से छुटकारा पा सकता है? ऐसा क्यों हो गया? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है? हंसते-खिलखिलाते परिवार की खुशी को बर्करार रखा जा सकता है? उपन्यास में वर्णित यथार्थ घटना कई परिवारों के साथ समय और प्रसंग बदलकर बार-बार घटित होती है, क्यों? दोष किसका? समय का, मनुष्य या वर्तमान युग का? किसे दोष दें – प्रकृति को या मनुष्य को? उपन्यास पढ़ते वक्त कई सवाल उभरकर ‘क्यों’ में बदल जाते हैं। जिस तरह पिता की छिपकली से भिड़ंत होकर दिन-भर भागमभाग के खेल खेलती है और पुत्र को अनाकलनीय शक्ति रेल्वे क्रॉसिंग की ओर खींचकर मालगाड़ी की ठोकर लगने के लिए मजबूर कर अप्राकृतिक मृत्यु का कारण बनती है; बिल्कुल उसी तरह उपन्यास को पढ़कर नितांत अकेलपन में ‘क्यों’ से भिड़ंत होकर हमें भी आहत करती है। संवेदना, करुणा, भावुकता आदि उस परिवार के साथ जताई जाती है। एकांत आंखें बिना पलक झपकाए ताक रही हैं... ‘क्यों? ऐसा क्यों हुआ? क्यों? ऐसा क्यों होता है? क्या भविष्य में भी ऐसी घटनाएं होती रहेंगी? दोषी – समय, प्रकृत्ति या मनुष्य?

 

प्रश्नचिह्न बड़ा आकार धारण करने लगता है। गोल-गोल घुमने लगता है और गहरी अतल गहराइयों में छानबीन शुरू होती है। अति प्राचीन मानव का चित्र सामने आता है। प्रकृति नामक ईश्वर समर्थक के रूप में नितांत मनहूस घड़ी में मनुष्य नामक जीवन का निर्माण करती है और तबसे उसके देवत्व को ग्रहण लग जाता है। यात्रा-दर-यात्रा समय-दर-समय यह चित्र वर्तमान युग के यांत्रिक युग तक पहुंचता है। तब महसूस होता है, आज प्रत्येक मनुष्य असुरक्षित है। मनुष्य अपने आस-पास मृत्यु के जाल बिछा चुका है। वह समतल ‘शांति’ शब्द के पीछे छिपकर अशांति के पहाड़ बनाने लगता है। नए-नए यंत्र, अस्त्र-शस्त्र ‘विकास’ के थुल-थुल आधार पर मानव को घेरने लगे हैं। दिन-प्रतिदिन विकास की चोटी को छुता मनुष्य मृत्यु... नहीं ‘अप्राकृतिक मृत्यु’ को आमंत्रित करता है।

बढ़ती आबादी और उसी अनुपात में बढ़ते यंत्रों की संख्या देवता के प्रतिरूप मनुष्य को कीड़े-मकौड़े की जिंदगी जीने के लिए मजबूर करते हैं। मनुष्य अपने हाथों से बनाए अस्त्र-शस्त्र से जितना खुश है उतना ही दुःखी भी है। विजयी सेनाओं के पैरों तले रौंदी गई पराजित सैनिकों की जिंदगियां यंत्रों के पहियों को रंगती रही है। यंत्रों को कोई सुख-दुख नहीं। दुखी है सिर्फ मनुष्य यंत्रों की गुत्थियों के बीच फंसा मनुष्य अप्राकृतिक मृत्यु को भोग रहा है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को अप्रत्यक्ष रूप में मारने के लिए कारण बना है। वैसे कूटनीति, राजनीति और घिनौने कारनामों में प्रत्यक्ष रूप से मारामारी भी होती है लेकिन खुलेआम डर-सा लगता है। परंतु अब वह ‘समय’ दूर नहीं जिसमें मनुष्य सीधे-सीधे एक-दूसरे को मारेगा-काटेगा; भेड़-बकरियों के समान दूकानों पर उसका मांस बेचा जाएगा। जानवरों का मांस खाना बीभत्स और क्रूरता का लक्षण मानने वाला व्यक्ति भी मनुष्य का मांस चटखारे लेकर नमक-मिर्च लगाकर खाने लगेगा। तात्पर्य बढ़ती आबादी, यांत्रिकता और सत्ता-लोलपता में मनुष्यता नष्ट हो गई है।

रेल्वे क्रॉसिंग पर कुंड़ली मारे राह देख रहा ‘समय’ ज्ञानेश्वर के मुंह से पाठ पढ़वा रहा था। आगे जो अघटित घटने वाला था वह घट चुका था। ‘उत्तर यात्रा’ को पढ़ते वक्त लगता है कि समय रेल्वे क्रॉसिंग, रेलगाड़ी और ज्ञानेश्वर को बार-बार ‘ऍडजेस्ट’ कर रहा है। गाजीपुर वापसी के लिए लालायित ज्ञानेश्वर को बार-बार रोका जा रहा है। लालता बाबूजी के यहां मोटार साइकल रखना, वहां खाना-पीना, मेला देखना, सावित्रि का दो बार परिवार वालों के आने न आने की खबर लेने के लिए जाना और विश्वंभरपुर के लिए वापसी। अंत तक सुई की घड़ी आगे-पीछे, आगे-पीछे हो रही थी। सभी चीजें ‘ऍडजेस्ट’ की जा रही थी। इतना ही क्यों, रेल्वे क्रॉसिंग पर उतरकर पेड़ की छाया में बहन-भाई का कुछ समय के लिए जो वार्तालाप हुआ तब ‘समय’ को लगा होगा कि शायद ज्ञानेश्वर जल्दी आ पहुंचा। चलो, थोड़ा और वार्तालाप करें। वार्तालाप के पश्चात् गाड़ी लेकर रेल्वे क्रॉसिंग पार करता ज्ञानेश्वर समय का शिकार बन गया। ‘समय’ और ‘यंत्र’ के बीच उलझते मानवीय जीवन को पलक झपकते ही ध्वस्त किया गया। उस बूढ़े की लाठी को छीना, उस मां के आंचल को आंसुओं से भिगोया, उस बहू की मांग का सिंदूर छीना गया, उस भाई का छत्र छीना गया, उस बहन को बीच रास्ते में अकेला छोड़ा गया, बच्चों के भविष्य का निर्माणकर्ता अज्ञात में विलिन हो गया और सबसे करुण गाथा छोटी को ‘बासुरी’ देने वाला बासुरी वाला अज्ञात, अनाम गांव के लिए देहरी को लांघकर ‘देहरी के पार’ हो गया।

उपन्यास के अंत में नौलखिया कुतिया लड़खड़ाते पांवों से धीरे-धीरे उस स्थान की परिक्रमा करने का वर्णन है, जहां पर ‘उत्तर यात्रा’ के यात्री ने अंतिम पड़ाव डाला था। उसे देख संध्या, पछिमा हवा और आस-पास गलत तर्क-वितर्क लगाते हैं। सूरज कहता है, "यह नौलखिया उत्तर यात्रा के उस पवित्र यात्री के लिए अपने इन स्वरों में जय-जय का उद्घोष कर रही है, जो सामान्य अवश जीवों के भांति महाकाल के गह्वर में समाकर नष्ट नहीं हो गया है। वह नई आत्म-सज्जा में नई शक्ति के साथ देहरी के पार होकर ईश्वर के दिव्य चिन्मय राज्य की ओर बढ़ गया है।" (पृ. 202-203) उपन्यास के अंत में आई नौलखियां यह विश्वंभरपुर की नौलखियां नहीं जिसके दुलार से छुटकारा पाने के लिए ज्ञानेश्वर ने जलेबी देने का वादा किया था; यह वह नौलखिया है ‘जिसे’ दूसरे दिन गाजीपुर वापस आने का वादा ज्ञानेश्वर ने किया था। जो समय के फेरे में अटककर बहू के साथ गाजीपुर से विश्वंभरपुर के लिए टैंपों पर संवार हुआ था। घटना के बाद ‘वे’ (विवेकी जी) जब कभी रेल्वे क्रॉसिंग पर शरीर या अशरीर रूप में पहुंचे होंगे तब उनके पैर लड़खड़ाकर उस स्थान की परिक्रमा कर रहे होंगे। तब वे अपने बेटे की पवित्र यात्रा के लिए जय-जय घोष कर रहे हैं, यह सूरज का तर्क बिल्कुल सार्थक है।

उपन्यास में वर्णित घटना विवेकी राय के परिवार के साथ 7 मार्च, 1997 में घटित हो गई और उसके छः वर्ष बाद यह उपन्यास प्रकाशित हो चुका है। अपने भीतर समेटे दुःख को कागज के पन्नों पर उतारा गया है। बिना किसी को समर्पित किए या बिना भूमिका लिखे प्रकाशित प्रस्तुत उपन्यास पूरी तरह ज्ञानेश्वर को समर्पित है। भाषा, शैली या कला-सौंदर्य की चर्चा गौण है, प्रधान है भाव और विचार तत्त्व। भावना और विचार के धरातल पर एक पिता का बेटे के न रहने के बाद स्मृतियों में चलता संवाद ‘देहरी के पार’ में देखा जा सकता है। पता नहीं, इसे लिखते समय लेखक की आंखें करुणा के सागर में कितनी बार डुबकियां लगा चुकी है। यह उपन्यास अपनी कलम को आंसू और खून की स्याही से सींच-सींचकर लिखा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी साहित्य के लिए समर्पित विवेकी राय का प्रस्तुत उपन्यास पुत्रशोक में विह्वल पिता की करुण गाथा है।

 

समीक्षा ग्रंथ –

देहरी के पार (उपन्यास) – विवेकी राय, ग्रंथ अकादमी प्रकाशन, नई दिल्ली,

प्रथम संस्करण - 2003, पृष्ठ - 203, मूल्य – 200 ₹

image

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र)

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: पुस्तक समीक्षा - देहरी के पार
पुस्तक समीक्षा - देहरी के पार
http://lh6.ggpht.com/-f3dnCpkrgB0/VLTtxuXrJLI/AAAAAAAAc74/HepI3zMLrsM/image_thumb.png?imgmax=800
http://lh6.ggpht.com/-f3dnCpkrgB0/VLTtxuXrJLI/AAAAAAAAc74/HepI3zMLrsM/s72-c/image_thumb.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2015/01/blog-post_71.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2015/01/blog-post_71.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content