गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

अशोक बाबू माहौर की कहानी - मैं दिलाऊँगी सम्मान

ल्की बौछारें ,हवा कभी मंद कभी तेज हो जाती ,कड़कती बिजली ,घनी रात ,डरावना सन्नाटा चारों तरफ .माँ आवाज लगाती "बेटी अनुप्रिया कहाँ है ,कहाँ चली गई ...." चिल्लाते -चिल्लाते गला भर आया थककर जमीन पर बैठ गई .

अनुप्रिया पीछे से आई डराती हुई माँ की आँखें बंद कर दी ."हाँ मैंने पहचान ली, तू अनुप्रिया है मेरी लाड़ली ,मुझे डरा नहीं सकती ."

         "माँ तुम इतनी चिल्लाती क्यों हो ?मैं कहीं नहीं गई ,यहीं थी ."अनुप्रिया हँसते हुए बोली .

         "चिल्लाऊँ नहीं तो क्या करूँ ?जमाना इतना बुरा आ गया है कि आदमी ,आदमी को नहीं पहचानता ,नारी क्या है ?नारी का सम्मान नहीं करता उस पर भूखे शेर कि तरह टूट पड़ता है ,समझ गई प्यारी लाडो."माँ ने उँगली  दिखाते जवाब दिया .

         "अरे माँ कुछ नहीं होता ,हम सही है तो दुनिया सही है ."अनुप्रिया फिर से बोली .

इस भूल में मत रहना ,हमेशा आगे -पीछे देखकर चलना चाहिए .तू समझती क्यों नहीं ?पिछले महीने पास वाले गाँव की बदमाशों ने क्या हालत बना दी थी .राम..राम..ऐसा किसी के साथ न हो ,मुझे डर लगता है .मैं तो जी ते जी मर जाऊँगी .बाद में कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता सब बेकार झूँठी छानबीन होती रहती है ."माँ समझाते उदारता पूर्वक बोली

           "ठीक है माँ ,मैं समझ गई ,कहीं नहीं जाऊँगी ."

           "माँ मेरा टिफिन जल्दी से लगा दे मुझे स्कूल के लिए देर हो रही है ."

           "लगाती हूँ ,इस साल पढ़ले ,अगले साल से घर बैठना ."माँ होंठ पीटते हुए बोली .

           "क्यों माँ ?"

           "क्योंकि ये स्कूल दसवीं तक है ,और मैं तुझे दूर भेजना नहीं चाहती ?"

अनुप्रिया उदास हो गई ,आँखों में आँसुओं के दो चार कतरे भी आ गए .खींजते हुए स्कूल चली गई .

           "मैं और पढूँगी माँ ,शहरों में लड़कियाँ कितना पढ़ती ."शाम होते ही अनुप्रिया फिर से बोली .

           "अनुप्रिया जिद्द मत पकड़ ,मैंने तुझसे कह दिया ,मेरी बात मान ले ."

अनुप्रिया जिद्द पकड़ कर बैठ गई .रोने लगी आँसू बूँदों की तरह टपकने लगे .

माँ से देखा नहीं गया क्योंकि वही घर की लाडली थी?

           "बेटी अनुप्रिया तू इतना जिद्द पकड़ती है तो तुझे यहाँ नहीं तेरे मामा के यहाँ भेजती हूँ वही तुझे स्कूल ले जाएगा वापस लाएगा .इतना ख़याल रखना मुझे परेशानी से न गुजरना पड़े ."माँ आँसू पौंछते हुए समझाई .

अनुप्रिया अपने मामा के यहाँ पढ़ने चली गई .वहाँ भी बैसा ही माहौल था .बहुत ही कम लड़कियाँ स्कूल जाती शायद वही डर उचक्के बदमाशों का .अनुप्रिया ने दो चार औरतों से पूछा भी .

अनुप्रिया मन लगाकर पढ़ती ,काफी मेहनत करती किन्तु एक उसमें सुई की तरह समाये जाती .गाँव की तरह यहाँ बुरा हाल है .हमारा समाज कब बदमाशों की जंजीरों से आज़ाद होगा .नारी कब तक घर में दुबकी बैठी रहेगी .वह और जुल्म नहीं सह सकती .मामा कब तक मेरी मदद करेंगे आखिर मुझे ही आगे आना होगा .दिखाना होगा नारी शक्ति क्या है?

अनुप्रिया ने एक बात गाँठ बाँधकर रख ली ,चुप रहने से कुछ नहीं होता .वह भी पुलिस अफसर बनेगी ,बदमाशों का सफाया करेगी .नारी को आगे लाएगी सम्मान दिलाएगी .

अब वह खूब मेहनत करने लगी .पढ़ाई पर दिन-रात एक कर देती पुलिस अफसर बनने की तैयारी में .मामा कभी उसे टोक भी देते अनुप्रिया अपनी सेहत का ध्यान रखा करो ,समय पर खाना खा लिया करो ,किन्तु उसके समझ कुछ नहीं आता एक ही बात घूमती रहती 'मुझे कुछ करना है ,आगे बढ़ना है .'

कुछ ही सालों में अनुप्रिया ने अपनी मंजिल हासिल कर ली ,जो सपने संजोये थे आज हकीकत में बदल गए .पुलिस अफसर की वर्दी मिल गई .सबको सोचने पर मजबूर कर दिया आखिर अनुप्रिया है तो क्या है ?माँ का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया .चारों तरफ उसने एक ही आवाज़ उठाई 'बेटी पढ़ाओ,आगे बढ़ाओ .'

गाँव में पुलिस चौकी खुल जाने से ,चोर उचक्के बदमाश धरे गए ,थाने की हवा भी खाई ,कुछ सुधर गए कुछ पलायन हो गए .अनुप्रिया नाम सुनते ही बदमाशों की साँसे चलने लगती.

गाँव का माहौल शांतिमय हो गया ,न किसी का डर ,न भय सारे लोग एक जुट होकर आगे बढ़े अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए सम्मान दिलाने के लिए.

गाँव में अनुप्रिया को देवी की तरह मानने लगे ,सभी जय जय कार करने लगे .सबके मुँह पर एक ही बात थी 'मुझे अपनी बेटी अनुप्रिया बनानी है ,चाहे कुछ भी हो '

 

अशोक बाबू माहौर

ग्राम-कदमन का पुरा,तहसील-अम्बाह

जिला -मुरैना (म.प्र.)476111 

ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. rajesh kr pathak10:22 pm

    Kahaani vistaar chahti hai....

    उत्तर देंहटाएं
  2. कथा काफी सिकुड़ गई है. समय के पैमाने पर खरा उतरने के लिए कुछ विस्तार होता, तो अच्छा होता.

    उत्तर देंहटाएं

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