शशिकांत सिंह 'शशि' की व्यंग्य कहानी - अलार्म

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अलार्म व्यंग्य            सुबह के पांच बजे हैं। मुहल्ले के मुर्गे अभी नहीं जगे हैं। असलम मियां का मुर्गा एकबार जगा जरूर था लेकिन रात समझ क...

अलार्म

व्यंग्य


           सुबह के पांच बजे हैं। मुहल्ले के मुर्गे अभी नहीं जगे हैं। असलम मियां का मुर्गा एकबार जगा जरूर था लेकिन रात समझ के फिर सो गया। अलबत्ता , अरिफ मियां का मुर्गा बेचारा कर्त्तव्यनिष्ठ है लेकिन उसने भी अब बांग देने से तौबा कर ली है। उसे पता है कि आदमी अलार्म सुनकर ही जगेगा। मुर्गे चाहे अपना सिर पिट लें। मुर्गे का अंदाजा एकदम सही है। मकान नंबर सौ की रजनी देवी साढे चार बजे का अलार्म लगाकर सोती हैं। गायत्री मंत्र की ध्वनि से मकान गुंजरित हो जाता है। प्रातःकाल गायत्री मंत्र के श्रवण से सम्पूर्ण पाप भी कटेंगे तथा लगे हाथ नींद भी खुल जायेगी। रजनी देवी के उत्तम विचारों से उनके पति प्रभावित नहीं होते । वे अलार्म बजते ही बड़बड़ाते हैं- हो गया नाटक चालू। आदमी चैन से सो भी नहीं सकता। आदमी से उनका भावार्थ खुद से है। दूसरों को आदमी जरा मुश्किल से ही मानते हैं। रजनी देवी  नहा-धोकर किचन में घुस गईं। उन्हें सात बजे के पहले नाश्ता बनाना हैं। साढ़े सात बजे तो स्कूल की बस आ जाती है 


         स्कूल की बस छूट गई तो फिर रिक्शे का ही सहारा है। शिवाजी चौक से राणाप्रताप चौक तक जाने के ही बीस रुपये मांगेगा। मुंह फाड़कर कुछ भी मांग लेते हैं। स्कूल जाने में यदि देर हो गई तो 'हिटलर' महाराज तो तोप लेकर ही चढ़ जायेंगे। हिटलर नामधारी सज्जन उनके स्कूल के प्रिंसपल हैं। उनके सगे मां-बाप ने तो उनका नाम प्रताप सिंह रखा था लेकिन मास्टरों ने उससे मिलता-जुलता यूरोपीय नाम उनके लिए जुगाड़ किया है। रजनी देवी किचन में चली गई हैं लेकिन वहां भी उनको चैन नहीं है। बंटी को भी तो तैयार करना है। बंटी महाराज की उम्र पांच साल की हो गई लेकिन अभी तक खुद से नहा नहीं सकते। मम्मी ही चाहिए। उठने के पूर्व दो बार तो उनको बुखार होगा। नहीं मम्मी आज छोड़ दो आज स्कूल नहीं जाना है। बंटी को बिस्तर से उठाना अपने आप में एक पूर्ण काम है। बंटी को उठाकर रजनी देवी बाथरूम में घुस गई। नहाते-धोते पौन छः बज गये। ये घड़ी भी सुबह कुछ ज्यादा ही तेज दौड़ती है। दिन भर आराम करेगी। सुबह-शाम रेस लगाती है। खैर, बंटी को दूध-ब्रेड देकर, पति देव के नहाने का पानी गैस पर चढ़ाकर, रजनी देवी बालों में कंघी करने लगी हैं। कंघी करना भी इतना आसान काम नहीं है।

सास जग गई हैं। उनके कराहने से पता चला। उनके जोड़ो में दर्द रहता है। जाड़े में तो जीना ही हराम समझो। सास को गर्म पानी देकर आंख-मुंह धोने के लिए कहकर, रजनी देवी कीचन में आ गईं। चपातियां सेंक रही हैं। साथ में पति देव को आवाज भी दे रही हैं । उनको भी तो आठ बजे जाना होता है। नहीं जगाया तो कहेंगे। खुद तो सुबह उठते ही तलवार भांजने लग जाती हो हमें जगाती भी नहीं । भई हम भी कमाते हैं। कमाऊ पति हैं। वाक्य में छिपा व्यंग्य छिपा ही रहे तो बेहतर। यदि अधिक जगाने की कोशिश की तो चिढ़कर चिल्लायेंगे। हद हो गई। हमें भी पता है कि ड्यूटी है। चैन से सोने दो चिल्लाओ मत। यानी चित्त भी उनकी और पट भी। यह एक सामान्य सा नियम है। रजनी देवी पति को आवाज देने के साथ-साथ बंटी को नाश्ता भी करा रही हैं। उन्हें भी पता है कि पति देव सात-सवा सात बजे तक जगेंगे ही । ससुर को चाय देकर और दवा खिलाकर रजनी देवी वापस किचन में आ गई हैं। उन्होंने नाश्ता खड़े-खड़े किचन में ही कर लिया। पति देव को आखिरी आवाज देकर और सूचित करके बस स्टैंड की ओर चल दीं। बंटी का हाथ थामे तेज कदमों से चल रही हैं। मुहल्ले के चेतन झा आ रहे हैं। रजनी देवी ने सिर पर आंचल रखकर प्रणाम किया ।


-' जीती रहो। बस का समय हो गया। कितनी मेहनत करती हो। भगवान सुखी रखें। '
  यह रोज के ही आशीर्वाद हैं। चेतन झा को यदि किसी दिन रजनी देवी ने प्रणाम नहीं किया तो किसी न किसी बहाने उनके ससुर के पास जाकर कहेंगे-
-' आजकल समय कितनी तेजी से बदल रहा है। भागते हुये आदमी को सुध ही नहीं कि पांव कहां पड़ रहे हैं। बेटी-बहुओं को तो बड़े-छोटों का लिहाज भी नहीं रहा। अभी सुबह ही आपकी बहू मिली थी। दुआ-सलाम भी नहीं। घर में कोई बात हो गई क्या ?'


    ससुर जी को यह बिल्कुल ही पसंद नहीं कि उनके बेटे-बहू की शिकायत लेकर कोई घर आये लेकिन जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो किसका-किसका मुंह रोकेंगे आप। तुरंत अपनी पत्नी अर्थात रजनी देवी की सास तक यह मामला चला जायेगा। अन्य धाराओं के साथ एक यह धारा भी जोड़ दी जायेगी। शाम में बी के सिंह के घर आने के बाद कोर्ट बैठेगी। मामले की सुनवाई के समय यह जरूरी नहीं कि प्रतिवादी मौजूद ही हो। वह मौजदू रहती भी नहीं हैं। एकतरफा आदेश सुना दिया जायेगा। पहले तो रजनी देवी को बहुत दुःख होता था कि दस दिन करो और एक दिन चूक हो गई तो उलाहने। अब उनको ंिचंता नहीं रहती।


         स्कूल बस में बैठकर रजनी देवी एक चैन की सांस लेती हैं। कम से कम आधे घंटे तक कोई काम नहीं। बस को अब चाहे जितना मर्जी समय लग जाये। हिटलर कुछ नहीं कह सकते। बस लेट है तो वह क्या करें। बस को लेट होना ही है। शिवाजी चौक से राणाप्रताप चौक जाने में दो रेलवे फाटक आते है। एक न एक तो बंद रहेगा ही। एक बार बंद हो गया तो शहर भर की गाड़ियां वहीं आकर जमा हो जायेंगी। तेजी के चक्कर में कोई निकलेगा नहीं और सब के सब पुलिस के आने तक एक दूसरे को गालियां देते रहेंगे। स्कूल में बस पहुंचते ही रजनी देवी को असेंबली में पहुंच जाना है। अपनी क्लास अर्थात सातवीं ए के बच्चे लाइन में सीधे खड़े रहें । उनके हाथ प्रापर्ली जुड़े रहें। उनके मुंह से प्रार्थना के बोल प्रोपर्ली निकल रहे हों।-इतनी शक्ति हमें देना दाता...........। इन सबकी जिम्मेवारी उन्हीं की है। बच्चे लाइन में खड़े हो चुके हैं। रजनी देवी जल्दी से अपना बैग रखकर और बंटी को लाइन में खड़ा करके अपनी क्लास के बीच में घूमने लगीं। उधर स्टेज पर बच्चे गा रहे है। -इतनी शक्ति हमें...............। यह गोलू तो बस नालायक ही रहेगा। हाथ जोड़ना दस बार बता चुकी हैं लेकिन बस मुट्ठी जोड़कर खड़ा हो जायेगा। रजनी देवी ने उसके हाथों को प्रोपर्ली जोड़ा। असेंबली के बाद अपना विषय ज्योग्राफी केवल सात पीरियड पढ़ाना पड़ता है। प्राइवेट स्कूल की मजबूरी है कि वह सात से अधिक पीरियड एक दिन में नहीं दे सकते क्योंकि कुल पीरियड सात ही होते हैं।


        आज का दिन ही खराब है। सिक्स बी के क्लास मे अचानक हिटलर आ गये। रजनी देवी क्लास ले रही थीं। एक ओर दबकर खड़ी हो गईं। हिटलर चालू हो गये-
-'Good morning children . '
-'Good morning Sir.
-' O.K Let us see the map. Who will tell where is the Mount Everest ?


       ये सिक्स बी के बच्चे तो बस एक नालायक हैं। पिछले चार दिन से मैप ही बताया जा रहा है कि हिमालय कहां है। उसकी चोटियां कौन-कौन सी हैं लेकिन नाक कटाकर ही मानेंगे। एक भी हाथ खड़ा नहीं हुआ। प्रिंसपल ने घूरकर रजनी देवी को देखा।
-' See the condition. No one is ready to answer. Is it the proper teaching ? '


         रजनी देवी को ही नहीं पूरी मास्टर प्रजाति को पता है कि प्रिंसपल घूरे तो नीचे देखो। गलती हमेशा मास्टर की ही होती है इसलिए बिन सोचे बोलो-सॉरी सर। रजनी देवी ने भी बोल दिया। हिटलर तो घूरते हुये चले गये। बहरहाल इसके बाद कोई घटना नहीं घटी। बच्चों के होमवर्क चेक करने , डायरी लिखने, रिमार्क चेक करने, तथा लगे हाथ लंच करने का भी समय रेसेस भर का ही होता है। रेसेस में बंटी को भी देखना है कि उसने खाना खाया या नहीं।


        स्कूल से लौटते ही बंटी बिस्तर में घूस जाता है। बच्चा दिनभर का थका होता है। दादी उसे तेल लगाकर सुलाती है। बहू को देखते ही उनको नाना प्रकार के काम सूझते हैं। उन्होंने अभी तक चाय नहीं पी। जोड़ों में दवा किसी ने नहीं लगाई। ससुर ने भी अभी तक सूप नहीं पिया। उनके स्वेटर को किसी ने धूप में नहीं रखा। बी के सिंह का फोन आ गया।
-' मां को डॉक्टर से दिखा लाना। शाम का समय लिया है। '


        रजनी देवी को शाम के लिए चने भी भिगोने है। पतिदेव के कपड़े भी प्रेस करने के लिए देने है। पहले तो खुद ही प्रेस कर लेती थी लेकिन अब समय नहीं मिलता। बी के सिंह एक ड्रेस दो दिन से अधिक नहीं पहनते। उनके बॉस तो रोज चेंज करके आते हैं। बंटी जग गया है। उसे होमवर्क करने के लिए बिठाना है। आजकल मैथ में काफी विक हो गया है। बी के सिंह उसी दिन कह रहे थे-


-;तुम्हारे टीचर होने से क्या लाभ जब अपना बच्चा ही मैथ में पुअर हो गया। सारी दुनिया के लिए सोचोगी लेकिन अपने बच्चे के लिए समय नहीं है। थोड़ा बच्चे पर भी ध्यान दिया करो। '


         रजनी देवी होमवर्क कराके, बच्चे को खेलने के लिए भेजकर  किचन में घुस गई। इसी बीच उन्होंन अपने लिए कॉफी बनाकर पी ली तथा एक-एक कप अपने सास ससुर को भी दे दिया। बंटी को शाम में वापस आकर पोगो देखना है। ससुर जी को आस्था के भजन सुनने है। मां जी को 'सिमर का सुसराल' देखना है। रजनी देवी को ससुर के लिए खिचड़ी, पतली, कम दाल वाली, सास के लिए चने की सब्जी और बंटी के लिए दो आलू के पराठें बनाने हैं। पतिदेव के लिए आटा छोड़ देना है। उनके आने पर गर्मागर्म चपाती बनती है। ठंडी चपाती में उन्हें मजा ही नहीं आता। आदमी परिवार रखे। इतनी मेहनत करे और रोटी ठंडी खाये तो क्या फायदा।


         रात के दस बज बंटी सो गया है। सास-ससुर खाना खाकर अपने कमरे में सोने चले गये है। रजनी देवी को भी नींद आ रही है लेकिन उन्हें जगना है। बी के सिंह जी अभी आये नहीं हैं। आज लेट हो रहा है। रोज नौ साढ़े नौ तक आ जाते थे। रजनी देवी तबतक अपने क्लास के बच्चों के क्लास वर्क के नोट बुक चेक कर रही हैं। स्कूल में समय ही नहीं मिलता। अभी दस नोट बुक भी चेक नहीं हुये थे कि बेल बज गई। बी के सिंह आ गये। किचन में जाकर रजनी देवी रोटियां बना रही हैं। बी के सिंह खाना खाकर सोने गये। रजनी देवी को औरत वाली भूमिका भी निभानी है। नहीं तो वही रटा-रटाया भाषण- तुमको अब पारिवारिक जीवन में मन ही नहीं लग रहा है। दिन भर बाहर रहती हो। मस्ती हो रही है। कोई मिल तो नहीं गया। मनोविज्ञान कहता है कि आदमी दिमगी तौर पर कहीं बिजी हो तो शारीरिक तौर पर भी वह साथ नहीं देता। ......उनकी यह शिकायत भी दूर करनी है। आखिर बी के सिंह मनोविज्ञान के पक्के जानकार जो ठहरे। रजनी देवी को सोने की कोशिश करनी नहीं पड़ती । गिरते ही नींद आ जाती है। बी के सिंह दिन भर की कोई घटना बता रहे होते हैं कि पत्नी सो जाती है। बड़बड़ाते हैं -भैंस की तरह नींद भगवान सबको दे।


              रविवार के दिन परिवार में विशेष चहल-पहल रहती है। बंटी और बी के सिंह जी नौ बजे तक सोते हैं। उठते ही ब्रेड पकौड़े का नाश्ता होना ही चाहिए। रोज की तरह वही घिसा-पिटा नाश्ता हो तो छुट्टी का मजा नहीं आता। रजनी देवी उस दिन किचन में दस बजे तक रहती हैं। उसके बाद सप्ताह भर के कपड़े धोने पड़ते हैं। वाशिंग मशीन में कपड़े जल्दी फट जाते हैं। उसी दिन बच्चे को पार्क लेकर भी जाना है। सास-ससुर को मंदिर भी जाना होता है। अर्थात रजनी देवी खुश होती हैं कि सप्ताह में एक ही रविवार होता है। 

 

                         
                                       शशिकांत सिंह 'शशि'
                                                                जवाहर नवोदय विद्यालय
                                                              शंकरनगर, नांदेड़, महाराष्ट्र
                                                                    पिन-431736
                                                          
                                                           skantsingh28@gmail.com

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रचनाकार: शशिकांत सिंह 'शशि' की व्यंग्य कहानी - अलार्म
शशिकांत सिंह 'शशि' की व्यंग्य कहानी - अलार्म
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