रविवार, 22 फ़रवरी 2015

महावीर सरन जैन का आलेख - भाषा-संरचना – वर्णानात्मक भाषाविज्ञान एवं संरचनात्मक भाषाविज्ञान

भाषा-संरचना – वर्णानात्मक भाषाविज्ञान (Descriptive Linguistics) एवं संरचनात्मक भाषाविज्ञान (Structural Linguistics)

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

संरचनात्मक भाषाविज्ञान भाषा की संरचना को विवेच्य मानता है जबकि प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान भाषा के प्रकार्य को। भाषा की संरचना को विवेच्य मानने वाली दृष्टियाँ भाषा-व्यवस्था के निकट हैं। भाषा के प्रकार्य को महत्वपूर्ण मानने वाली दृष्टियाँ भाषा-व्यवहार से प्रेरणा प्राप्त करती हैं।

परम्परागत व्याकरण एवं आधुनिक संरचनात्मक भाषाविज्ञान

संरचनात्मक भाषाविज्ञान ने यह माना कि प्रत्येक भाषा की अपनी संरचना होती है। संरचनात्मक भाषाविज्ञान का लक्ष्य किसी भाषा की निजी व्यवस्थागत विशिष्टताओं को विश्लेषित करना है। इसके कारण बीसवीं शताब्दी में, परम्परागत व्याकरण से भिन्न भाषावैज्ञानिक विवेचन की पद्धति का आविर्भाव हुआ। पहले यूरोप की अधिकांश भाषाओं के परम्परागत व्याकरण इन भाषाओं की प्रकृति के अनुरूप न होकर लैटिन एवं ग्रीक व्याकरणों का अनुगमन करके लिखे जाते थे। इसी प्रकार हिन्दी के परम्परागत व्याकरण भी संस्कृत व्याकरण को आदर्श मानकर लिखे गए। संस्कृत भाषा की जो संरचना थी, उसके जो नियम संस्कृत व्याकरणों में निर्धारित किए गए थे, उन नियमों के साँचों में, हिन्दी के परम्परागत व्याकरणों में, हिन्दी भाषा के उदाहरणों को रख दिया जाता था। इस प्रकार परम्परागत व्याकरण में किसी क्लासिकल लैंग्वेज के व्याकरण के ढाँचे में आधुनिक भाषा के उदाहरणों को रख देने की प्रवृत्ति कार्य करती है। आज भी हिन्दी के परम्परागत व्याकरणों में संस्कृत की भाँति आठ कारक माने जाते हैं। संस्कृत में संज्ञा के कारकीय स्तर पर 8 भेद हैं। एक संज्ञा शब्द के एक ही वचन में कारकानुसार 8 भेद हो जाते हैं। किन्तु इस प्रकार की व्यवस्था संस्कृत में है। हिन्दी की व्यवस्था भिन्न है। हिन्दी में केवल दो कारक हैं – (1)अविकारी कारक (2) विकारी कारक। सम्बोधन को भी मिलाने पर तीन कारक। हिन्दी भाषा के परम्परागत व्याकरणों में, जिनको कारक चिह्न बताया जाता है, वे कारक नहीं अपितु परसर्ग हैं। इसी प्रकार लैटिन व्याकरण को आधार लेकर अंग्रेजी के जो व्याकरण लिखे गए थे उनमें प्रत्येक क्रिया के तीन पुरूष एवं प्रत्येक के एकवचन एवं बहुवचन भेद किए जाते थे। वस्तु स्थिति यह है कि ´होना´ (To be) क्रिया को छोड़करए शेष अन्य समस्त क्रियाओं के वर्तमान काल में दो रूप मिलते हैं तथा भूतकाल में केवल एक रूप मिलता है।

भाषा की संरचना – वर्णानात्मक भाषाविज्ञान (Descriptive Linguistics) एवं संरचनात्मक भाषाविज्ञान (Structural Linguistics)

वर्णानात्मक एवं संरचनात्मक भाषाविज्ञान भाषा के शब्दार्थ की विवेचना की अपेक्षा उसकी व्यवस्था और संरचना के नियमों को नियमबद्ध करने पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित रखता है। भाषा में शब्द और अर्थ द्रव्य (substance) है। सामान्य व्यक्ति भाषा में शब्द और अर्थ को महत्व देता है। उसके द्वारा हम अपने भाव और विचार को व्यक्त करते हैं। भाषा-संरचना को महत्व देने वाले भाषावैज्ञानिक यह मानते हैं कि भाषा में शब्द तो आसानी से परिवर्तित हो जाते हैं मगर भाषा-संरचना अपेक्षाकृत स्थिर तत्व है। जैसे नदी के तट पानी की धारा के प्रवाह को मर्यादित रखते हैं, उसी प्रकार भाषा-संरचना भाषा को बाँधकर रखती है। भाषा के दो पक्ष हैं। (1) भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था अथवा भाषा-संरचना (2) शब्दावली। व्याकरणिक व्यवस्था अथवा सम्बंध-दर्शी तत्वों को आबद्ध भी कहा जाता है। व्याकरणिक व्यवस्था अथवा सम्बंध-दर्शी तत्वों के नियम परिमित होते हैं। इसके विपरीत शब्दावली अथवा अर्थ-दर्शी तत्व को मुक्त कहा जाता है। इस कारण किसी भाषा की शब्दावली में शब्दों की संख्या अपरिमित होती है। हम देखते हैं कि भाषा का कोई शब्दकोश कभी भी अन्तिम नहीं होता। भाषा में नए शब्द प्रवेश करते रहते हैं। भाषा के व्याकरणिक नियमों में इतनी आसानी से परिवर्तन नहीं होता। ये अपेक्षाकृत स्थिर होते हैं।

भारत में पाणिनी ने अपने ग्रंथ 'अष्टाध्यायी´ में अपने समय में उदीच्य क्षेत्र के गुरुकुलों में बोली जाने वाली मानक संस्कृत की व्यवस्था और संरचना को सूत्रों में नियमबद्ध किया। इनके व्याकरण के सम्बंध में ब्लूमफील्ड ने कहा है कि ´पाणिनी की अष्टाध्यायी में संस्कृत का जितना पूर्ण विवरण उपलब्ध है उतना पूर्ण विवरण संसार की किसी अन्य भाषा का उपलब्ध नहीं है’। पाश्चात्य भाषा चिन्तन की परम्परा में कोपेनहेगेन सम्प्रदाय में रास्क (जन्म 1787 ईस्वी) ने तुलनात्मक भाषाविज्ञान के अध्ययन में शब्दों की अपेक्षा व्याकरण का महत्व प्रतिपादित किया। इस परम्परा में विद्वानों ने जो अध्ययन किया वह ´ध्वनि नियमों' के नाम से जाना जाता है। इसकी विवेचना आगे की जाएगी। स्विटजरलैण्ड के सोस्यूर के भाषा संरचना एवं भाषिक प्रकार्य के अन्तर से सम्बंधित चिन्तन की विवेचना ´भाषा व्यवस्था' एवं ´भाषा व्यवहार' के प्रकरण में की जा चुकी है।

http://www.rachanakar.org/2014/12/language-system-language-transaction-or.html#ixzz3Mj3EbOdr

अमेरिकी सम्प्रदाय के बोआस (1858--1942) का अधिकांश जीवन अमेरिकी महाद्वीप के आदिम समाजों की संस्कृति के अध्ययन में व्यतीत हुआ। आपने ´हैंडबुक ऑफ अमेरिकन इंडियन लैंग्वेजिज़' के प्रथम खण्ड की भूमिका में ´अमेरिकी वर्णनात्मक भाषाविज्ञान सम्प्रदाय' की आधार शिला रखी। वर्णनात्मक भाषाविज्ञान में ´विश्लेषण की तकनीकों´ को शुरु करने की दृष्टि से बोआस एवं उनके शिष्य सपीर का महत्व सबसे अधिक है। इन दोनों ने अपने शिष्यों के साथ आदिम समाजों के क्षेत्रों में जाकर अध्ययन किया। इनके अध्ययनों से भाषाविज्ञान में निम्नलिखित परिवर्तन हुए तथा नवीन पद्धतियों एवं संकल्पनाओं ने जन्म लिया-

1.ऐतिहासिक भाषाविज्ञान एवं तुलनात्मक भाषाविज्ञान के स्थान पर एककालिक अथवा संकालिक भाषाविज्ञान को महत्व दिया जाने लगा।

2.शब्द एवं अर्थ की अपेक्षा भाषा के व्याकरण के नियमों को जानने पर बल प्रदान किया जाने लगा। इसके लिए ध्वनि के धरातल पर ध्वनियों के स्थान पर ध्वनिमिकों का तथा व्याकरण के धरातल पर परम्परागत व्याकरण के मॉडल में विवेच्य भाषा के उदाहरणों को रखने के स्थान पर उस भाषा की अपनी विशिष्ट व्यवस्था और संरचना के नियमों का अध्ययन करना अभीष्ट हो गया।

3. सामग्री के विश्लेषण और वितरणगत स्थितियों के आधार पर व्यवस्थागत इकाइयों को जानने के लिए नई तकनीकों का विकास हुआ।

4.भाषा के क्षेत्र में जाकर सूचक से भाषिक सामग्री प्राप्त करने पर बल दिया गया।

सूचक के उच्चारों को इन्टरनेशनल फोनेटिक एल्फाबेटिक लिपि में लिखना अनिवार्य हो गया।

5.यह माना गया कि प्रत्येक भाषा की द्वैध व्यवस्था होती है।

6.ध्वनिमिक व्यवस्था में ध्वनि विवेचन का महत्व समाप्त हो गया। उसके स्थान पर ध्वनिमिक अथवा स्वनिमिक अध्ययन किया जाने लगा। किसी भाषा में दो ध्वनियाँ का वितरण किस प्रकार का है – यह जानना महत्वपूर्ण हो गया। स्वनिमिक व्यवस्था के अध्ययन का मतलब पूरक वितरण एवं / अथवा स्वतंत्र परिवर्तन में वितरित ध्वनियों का एक वर्ग अर्थात ध्वनिमिक अथवा स्वनिम बनाना तथा व्यतिरेकी अथवा विषम वितरण में वितरित ध्वनियों को अलग अलग ध्वनिमिक अथवा स्वनिम के रूप में रखने की पद्धति का विकास हुआ।

7.रूपिम व्यवस्था में उच्चार की लघुतम अर्थवान अथवा अर्थयुक्त इकाइयाँ (रूप) प्राप्ति के बाद वितरणगत स्थितियों के आधार पर रूपप्रक्रियात्मक संरचना का अध्ययन होने लगा।

8.सूचक से प्राप्त भाषिक सामग्री को प्रमाणिक मानकर उसके आधार पर भाषा के प्रत्येक स्तर पर विश्लेषण एवं वितरणगत तकनीकों के आधार पर भाषिक इकाइयों को प्राप्त करना तथा उसके बाद उनकी श्रृंखलाबद्ध संरचना के नियम बनाना लक्ष्य हो गया।

उपर्युक्त विवरण का सार यह है कि अब भाषा की व्यवस्था और संरचना का अध्ययन करना ही साध्य हो गया। भाषा के अभिलक्षण के प्रसंग में भाषा व्यवस्था एवं संरचना के सम्बंध में विचार किया जा चुका है।

वर्णनात्मक भाषाविज्ञान का विकास संरचनात्मक भाषाविज्ञान में हुआ। अमेरिका में संरचनावादी भाषाविज्ञान का सूत्रपात ब्लूमफील्ड आदि विद्वानों ने किया। इस परम्परा को पहले वर्णात्मक भाषाविज्ञान के नाम के पुकारा गया। भाषा के कथ्य अथवा अर्थ के स्थान पर भाषिक-रूप अथवा आकृति के अध्ययन पर अधिकाधिक बल देते हुए इसका विकास संरचनात्मक भाषाविज्ञान के रूप में हुआ। ब्लॉक, ट्रेगर, हॉकेट आदि भाषावैज्ञानिकों ने इसको विकसित किया जिसकी परिणति जैलिग हैरिस एवं चॉम्स्की के कार्यों में हुई।

संरचनावादी दृष्टि की मान्यता है कि किसी भाषा के बाह्य रूप को उसकी शब्दावली से जाना जा सकता है किन्तु उसकी आत्मा के दर्शन उसमें छिपी हुई संरचनात्मक व्यवस्थाओं को पहचानने पर ही होते हैं। भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था आबद्ध एवं निश्चित होती है। इस कारण प्रत्येक भाषा के व्याकरणिक नियम बनाए जा सकते हैं। भाषा की शब्दावली की कोई निश्चित सीमा नहीं होती। इसका कारण यह है कि शब्दावली भाषा में प्रविष्ट होती रहती है तथा लुप्त होती रहती है। यह भाषा के अन्दर परिवर्तित होते रहने वाला तत्त्व है। इसके विपरीत भाषा का व्याकरण अपेक्षाकृत स्थिर तत्त्व है। इसक कारण भाषा की व्याकरणिक व्यवस्थाओं को नियमबद्ध किया जाता है। संरचनात्मक भाषाविज्ञान ने माना कि मानव भाषा का सबसे अधिक वैशिष्टय इस तथ्य में निहित है कि उसमें संरचनात्मक व्यवस्था होती है।

कतिपय विद्वान व्यवस्था (System) एवं संरचना (Structure) का पर्याय रूप में प्रयोग करते हैं। सामान्य अर्थ में ये पर्याय है। विशिष्ट अर्थ में दोनों में अन्तर हैं। भाषा की सम्बंध-दर्शी इकाइयों का रूपतालिकात्मक अथवा सहचारक्रमात्मक (Paradigmatic)एवं विन्यास क्रमात्मक (Syntagmetic) संदर्भों में अध्ययन करते समय इनका प्रयोग भिन्न अर्थों में किया जाता है।संरचना में इकाइयों की श्रृंखला होती है। श्रृंखला में एक इकाई जिस जगह आती है वह उसका स्थान कहलाता है। किसी निश्चित स्थान पर एक दूसरे को स्थानापन्न करने वाली भाषिक इकाइयाँ रूपतालिकात्मक सम्बन्ध का निर्माण करती हैं। अपने या अपने से ऊपर के स्तर की इकाई का निर्माण करने वाले संरचकों के रेखीय अध्ययन से विन्यासक्रमात्मक सम्बन्धों का पता चलता है। विशिष्ट अर्थ में व्यवस्था का रूपतालिकात्मक तथा संरचना का विन्यासक्रमात्मक सम्बन्धों के अध्ययन के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। हिन्दी भाषा के संदर्भ में, रूपतालिकात्मक सम्बंधों को रूपावली की निम्न तालिका से पहचाना जा सकता है –

लड़का

रमेश

धोबी

माली

अपने

घर

काम पर

अपने दोस्त के घर

जाता है।

जा रहा है।

गया।

जाएगा।

इस तालिका के प्रथम खण्ड में आए / लड़का रमेश धोबी माली/ भिन्न शब्द हैं। इनके अर्थ अलग हैं। मगर ये सभी शब्द सजीव पुल्लिंग एकवचन संज्ञा शब्द हैं। इस खण्ड में इसी कोटि का कोई शब्द रखा जा सकता है। इस कोटि के किसी शब्द से इनमें से किसी भी शब्द को स्थापन्न किया जा सकता है।

व्यवस्था रूपावली (Paradigm) का अध्ययन करती है, संरचना विविध स्तरों की इकाइयों के विन्यासक्रमात्मक सम्बन्धी विशेषताओं का उद्घाटन करती है। इस सम्बन्ध में आर. एच. रॉबिन्स ने संरचना एवं व्यवस्था का अन्तर प्रतिपादित किया है।

“संरचना मूलतः विन्यासक्रमात्मक सम्बन्धों के अध्ययन के लिए प्रयुक्त होता है। व्यवस्था रूपतालिकात्मक सम्बंधों का अध्ययन करती है। संरचना में इकाइयों के विन्यासक्रमात्मक अन्तर्ससम्बंधों का अध्ययन किया जाता है। व्यवस्था में किसी रचना में एक रूपावली में स्थापन्न होने वाले शब्द आदि तत्त्वों के रूपतालिकात्मक अन्तर्सम्बंधों का अध्ययन किया जाता है”।

(General Linguistics: An Introductory Survey, P.49 (1964))

भाषा की व्यवस्था को प्रो0 हिल ने तीन लक्षणों द्वारा समझाया है।

(1)प्रत्येक व्यवस्था की भाँति ही भाषा में भाषिक इकाइयों की आवर्ती साँचें में संरचना होती है। जब साँचें का कोई अंश दृष्टिगोचर होता है, तब सम्पूर्ण व्यवस्था के बारे में उसी विधि से अनुमान किया जा सकता है जिस विधि से दो कोण और एक पार्श्व रेखा के ज्ञात होने पर त्रिकोण बनाया जा सकता है।

(2)भाषा व्यवस्था के सम्बंध में यह भी कहा जा सकता है कि भाषा के उच्चारण में एक इकाई के द्योतक (शब्द) के स्थान पर उसी कोटि के दूसरे द्योतक (शब्द) को स्थानापन्न किया जा सकता है। प्रत्येक वाक्य में भाषिक इकाइयों की श्रृंखला होती है। मूल रचना के बिना किसी परिवर्तन के प्रत्येक कोटि की इकाई के स्थान में आने वाले एक शब्द की जगह उसी कोटि के अन्य शब्दों को स्थापन्न किया जा सकता है। ऐसा करने से वाक्य के अर्थ में अन्तर आता है, उसकी रचना में नहीं।

(3)भाषा व्यवस्था की एक अन्य विशेषता यह है कि भाषा के शब्दों को वर्गों में वर्गबद्ध किया जा सकता है। संसार की अपरिमित इकाइयों की अपेक्षा ये अधिक निश्चित, परिमित तथा आसानी से परस्पर पहचाने जा सकते हैं।

(Hill, Archibald A. : Introduction to Linguistic Structures, pp. 5-6, (1958)

संरचनात्मक भाषाविज्ञान मानता है कि प्रत्येक भाषा में द्वैध व्यवस्था होती है। उसमें एक ओर ध्वन्यात्मक व्यवस्था होती है तथा दूसरी ओर व्याकरणिक व्यवस्था। भाषा की ध्वनियाँ स्वतः अर्थहीन होती हैं। ध्वनियों का उच्चारण भौतिक घटनाएँ हैं तथा इस रूप में ये ध्वनिविज्ञान एवं भौतिक विज्ञान में विवेच्य हैं। प्रत्येक भाषा में ध्वनियों की अपनी व्यवस्था होती है। दो भाषाओं में ध्वनियाँ समान हो सकती हैं किन्तु उनका भाषाओं में प्रकार्य समरूप नहीं होता। इस कारण ध्वनियों की संरचनात्मक इकाइयों में भेद होता है। जब हम ध्वन्यात्मक व्यवस्था की विवेचना करते हैं तब हमारा तात्पर्य किसी विशिष्ट भाषा के ध्वनिमिकों से होता है। उदाहरण के लिए हिन्दी एवं तमिल में "क्" एवं "ग्" ध्वनियों का उच्चारण होता है। हिन्दी में इनका ध्वनिमिक महत्व है। तमिल में इनका ध्वनिमिक महत्व नहीं है। इसी कारण तमिल की लिपि में इनके लिए अलग अलग वर्ण नहीं हैं। प्रत्येक भाषा में अर्थहीन इकाइयों के विशेष क्रम से सार्थक इकाइयाँ बनती हैं। इन सार्थक इकाइयों के दो प्रकार होते हैं : (1) शब्दकोषीय (2) व्याकरणिक। शब्दकोषीय इकाइयाँ विचार तत्त्व को व्यक्त करती हैं। व्याकरणिक इकाइयाँ सम्बंध तत्त्व को व्यक्त करती हैं। व्याकरण भाषाविज्ञान के रूप का वह स्तर है जहाँ बद्ध व्यवस्थाएँ होती हैं। इस कारण उनके निश्चित नियम बनाए जा सकते हैं।भाषा की द्वैध व्यवस्था उसकी विशिष्टता को प्रकट करती है। इस सम्बन्ध में डॉ. पी. बी. पंडित ने लिखा है:

“ मानव भाषा एक अनन्य व्यवस्था है। इस व्यवस्था की दो उपव्यवस्थाएँ हैं : (1) ध्वनि घटकों की व्यवस्था (2) ध्वनि घटकों के साथ आवर्तनों की व्यवस्था; जिसको व्याकरण कहते हैं। मानव भाषा की व्यवस्था में यह द्वैत इतना स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि एक उप व्यवस्था को समझाने के लिए कभी दूसरी उपव्यवस्था का आधार लेने की आवश्यकता नहीं। यह व्यवस्थागत द्वैत मानव भाषा का एक विशिष्ट लक्षण है। उच्चारण और अर्थ दोनों घटनाएँ भाषा व्यवस्था की बाहर से स्पर्शती घटनाएँ हैं”।

,

डॉ. प्रबोध बेचरदास पंडित– गुजराती व्याकरण में जाति और परिणाम (हिन्दी अनुशीलन, धीरेन्द्र वर्मा विशेषांक, पृष्ठ 2, वर्ष 13, अंक 1-2)

भाषा की ध्वनियों का उच्चारण विभिन्न वाक् अवयवों के द्वारा होता है। विभिन्न ध्वनियाँ मिलकर बड़ी इकाई बनाती हैं। यह बनने वाली इकाई उच्चारित ध्वनियों का रेखीय, क्रमिक किन्तु अविच्छिन्न प्रवाह होता है। यह इकाई उच्चारित ध्वनियों की श्रृंखला बनाती है। श्रृंखला में ध्वनियाँ एक के बाद दूसरी के क्रम में आती हैं। इनका अनुक्रम रहता है। इनको पृथक किया जा सकता है। ये विश्लेषित होने वाली इकाइयाँ मिलकर अक्षर, रूपग्राम, शब्द, वाक्यांश, वाक्य बनाती हैं। इनके स्तर होते हैं। प्रत्येक स्तर पर रचना की विशिष्ट व्यवस्था होती है। प्रत्येक स्तर की इकाई अपने से निम्न स्तर की एक अथवा एकाधिक इकाइयों से मिलकर बनती है। दूसरे शब्दों में निम्न स्तर की एक अथवा एकाधिक इकाइयाँ मिलकर बड़े स्तर की इकाई की रचना करती है। उदाहरण के लिए वाक्य स्तर की इकाई एक अथवा एकाधिक उपवाक्य / उपवाक्यों द्वारा बनती है। उपवाक्य स्तर की इकाई एक अथवा एकाधिक वाक्यांश /वाक्यांशों द्वारा, वाक्यांश स्तर की इकाई एक अथवा एकाधिक शब्द /शब्दों द्वारा, शब्द स्तर की इकाई एक अथवा एकाधिक रूपग्राम / रूपग्रामों द्वारा बनती है। हिन्दी भाषा के संदर्भ को ध्यान में रखकर इनको इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है –

संरचना स्तर

संरचित इकाई

संरचक (एक अथवा एकाधिक

वाक्यीय स्तर

वाक्य

उपवाक्य

उपवाक्यीय स्तर

उपवाक्य

वाक्यांश अथवा पदबंध

वाक्यांश अथवा पदबंध स्तर

वाक्यांश अथवा पदबंध

पद (सविभक्तिक शब्द)

पदीय स्तर

पद (सविभक्तिक शब्द)

शब्द

शब्द स्तर

शब्द

रूपिम

प्रत्येक स्तर की संरचक इकाई/ इकाइयों के क्रम, विस्तार आदि की अभिरचनाएँ (Patterns) होती हैं। इन अभिरचनाओं की नियमबद्धता एवं परस्पर सम्बंधों के नियम उस स्तर की व्यवस्था को स्पष्ट करते हैं। विविध स्तरों की इकाइयों के परस्पर मिलकर अपने से बड़े स्तर की इकाइयों की रचना के नियम संरचना को स्पष्ट करते हैं। विविध स्तरों का परस्पर अधिक्रम होता है। अधिक्रम में एक स्तर में आनेवाली इकाइयों का संरचनात्मक मूल्य समान होता है। संरचनात्मक मूल्य से उस व्याकरणिक इकाई की पहचान होती है। एक स्तर की व्याकरणिक इकाई अधिक्रम में अपने से नीचे स्तर की व्याकरणिक इकाई/ इकाइयों की पहचान कराती है। उदाहरण के लिए अधिक्रम में वाक्य स्तर की इकाई की अभिव्यक्ति निम्न प्रकार से हो रही है –

कॉलिज में पढ़नेवाला लड़का धीरे धीरे अपने घर जा रहा है।

इस वाक्य स्तर की इकाई संरचनात्मक दृष्टि से वाक्यांशों से निर्मित है। संज्ञा वाक्यांश + क्रिया वाक्यांश।

संज्ञा वाक्यांश की रचना की अभिव्यक्ति > कॉलिज में पढ़नेवाला लड़का।

क्रिया वाक्यांश की रचना की अभिव्यक्ति > धीरे धीरे अपने घर जा रहा है।

संज्ञा वाक्यांश संरचनात्मक दृष्टि से पद-समूह द्वारा निर्मित है। पद समूह शब्द अथवा शब्दों से तथा शब्द रूपग्राम अथवा रूपग्रामों से।

संज्ञा वाक्यांश की अभिव्यक्ति केवल एक पद (सविभक्तिक शब्द) से भी हो सकती है। उदाहरण के लिए यदि वाक्य होता – लड़का जा रहा है। इसमें संज्ञा वाक्यांश की अभिव्यक्ति केवल एक पद (सविभक्तिक शब्द) ´लड़का' से हो रही है।

लड़का को मोहन, राम, श्याम से स्थानापन्न किया जा सकता है। इन शब्दों में से एक पद के स्थान पर दूसरा पद रखने से अर्थ में अन्तर आएगा; संरचना में नहीं। ´लड़का' पद को जिन जिन पदों से स्थानापन्न किया जा सकेगा वे सभी पद एक व्याकरणिक इकाई के संरचनात्मक मूल्य के द्योतक हैं। इसी प्रकार ´जा रहा है' के स्थान पर 'आ रहा है´, 'दौड़ रहा है´, ´सोच रहा है' आदि कोई भी रचना हो सकती है। सभी एक ही व्याकरणिक इकाई के द्योतक हैं।

इसी प्रकार प्रत्येक स्तर पर रचना के विस्तार के नियम होते हैं। उदाहरण के लिए संज्ञा वाक्यांश में ´लड़का' का विस्तार अनेक प्रकार से हो सकता है। उदाहरण के लिए देखें –

लड़का

अच्छा लड़का

मेरा लड़का

मोहन का लड़का

मेरे घर में रहनेवाला लड़का

मेरे घर के मेरे बच्चों को रोज पढ़ाने वाला लड़का

स्टोर से सामान खरीदकर तेजी से भागनेवाला लड़का

अच्छी तरह से सजधजकर तथा कोट पैंट पहनकर सीटी बजाते हुए मोटरसाइकिल दौड़ाता हुआ लड़का।

उपर्युक्त सभी उदाहरणों में संज्ञा वाक्यांश के अनिवार्य शीर्ष स्थान पर ´लड़का' है। अनिवार्य शीर्ष के पहले की रचनाएँ संरचना की दृष्टि से वैकल्पिक हैं। इसी आधार पर भाषा के आधार वाक्यों, आधार संरचनाओं एवं आधारभूत इकाइयों का निर्धारण किया जाता है। भाषा के शिक्षण के लिए भी यह जरूरी है। विशेष रूप से विदेशी एवं अन्य भाषा शिक्षण के संदर्भ में इसका महत्व बहुत अधिक है।

किसी भाषा के व्याकरण में स्तरों की श्रेणियों की सीमाएँ सर्वथा स्पष्ट एवं भेदक नहीं होती। भाषा में एक रचना जो वाक्य खाँचे में आ रही है वह रचना वाक्यांश खाँचे का एक भाग हो सकती है। एक खाँचे में जो पद है वही पद दूसरे खाँचे में वाक्य हो सकता है। हमने जो उदाहरण दिया - ´ कॉलिज में पढ़नेवाला लड़का धीरे धीरे अपने घर जा रहा है।' इस वाक्य खाँचे में ´लड़का' संज्ञा वाक्यांश के शीर्ष खाँचे में 'पद´ है। दूसरा उदाहरण देखें- एक व्यक्ति प्रश्न करता है –कौन आ रहा है? इस प्रश्न का उत्तर हो सकता है - 'लड़का´। इस उत्तर में 'लड़का´ वाक्य है। जो एक खाँचे में पद था वह दूसरे खाँचे में वाक्य हो गया। इस प्रकार व्याकरणिक इकाइयों का अधिक्रम सर्वथा निश्चित नहीं होता। जब उच्च श्रेणी की इकाई निम्न श्रेणी की इकाई का प्रकार्य करती है, तब स्तर इकाइयों के अधिक्रम के इस परिवर्तन को श्रेणी परिवृत्ति (rank shift) कहते हैं। उदाहरणार्थ, 'तुम दिन भर इधर उधर घूमा करते हो´ यह वाक्य स्तर की इकाई है। इस वाक्यीय इकाई की 'तुमको कोई काम नहीं है जो तुम दिन भर इधर उधर धूमा करते हो´ - वाक्य में उपवाक्य स्तर पर श्रेणी परिवृत्ति है।

प्रत्येक स्तर की संरचना होती है तथा उसमें संभावित अभिरचनाओं का निश्चित समुच्चय होता है। किसी स्तर की इकाई के संरचकों के विन्यासक्रमात्मक सम्बन्धों की अभिरचनाएँ ही उस स्तर की संरचना का निर्माण करती हैं। संरचना जिन तत्त्वों से निर्मित होती है उनमें विन्यास की व्यवस्थाएँ होती हैं तथा उनमें क्रमिक सम्बन्धों की योजना होती है। “एक विशिष्ट संरचना संरचक इकाइयों के वर्गों का एक विशिष्ट संयोजन है”।

(Harris, Zellig S.: String Analysis of Sentence Structure, p. 7. (1964))

“एक संरचना संरचक इकाइयों के पारस्परिक विन्यास एवं क्रमिक सम्बन्धों का निरूपण करती है। किसी भी विश्लेषित स्तर पर व्याकरणिक इकाइयों की बद्ध व्यवस्थाएँ संरचना के संरचक इकाइयों के पारस्परिक निश्चित मूल्य बताने के लिए होती हैं”।

(Firth, J. R.: ´Ethnographic Analysis and Language with reference to Malinowski’s views' In ´Man and Culture', P.107 (1957))

“´इकाई' शब्द नहीं हैं। वे तो वर्गों की प्रतीकात्मक अमूर्तताएँ हैं जो संरचनात्मक श्रृंखला की स्थितियों में कार्य करने की क्षमता रखते हैं”।

(Firth, J. R.: A Synopsis of Language Theory – Studies in Linguistic Analysis, P. 17. (1957))

कुछ ´संरचक इकाइयाँ' संरचना के लिए अनिवार्य होती हैं एवं कुछ वैकल्पिक। ´लड़का कमरे में पढ़ रहा है' इस वाक्य में (1)संज्ञा वाक्यांश (2)अव्यय वाक्यांश एवं (3)क्रिया वाक्यांश हैं।

संज्ञा वाक्यांश (कर्ता)

अव्यय वाक्यांश (पूरक)

क्रिया वाक्यांश

लड़का

कमरे में

पढ़ रहा है।

इन तीनों में संज्ञा वाक्यांश एवं क्रिया वाक्यांश अनिवार्य हैं तथा अव्यय वाक्यांश वैकल्पिक है। अनिवार्य संरचकों के आधार पर ही उपवाक्य की मूल संरचनाओं का अध्ययन सम्पन्न किया जाता है।

इस प्रकार संरचनात्मक भाषाविज्ञान में जब व्यवस्था एवं संरचना का भेदक अर्थ में प्रयोग किया जाता है तब ´व्यवस्था' रूपावली का अध्ययन करती है तथा ´संरचना' से तत्वों के विन्यासक्रमात्मक सम्बंधी विशेषताओं का पता चलता है। जब व्यवस्था एवं संरचना में भेद नहीं किया जाता तब व्यवस्था एवं संरचना का समान अर्थ में प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए हॉकिट ने संरचना के स्थान पर व्यवस्था शब्द का प्रयोग किया है। हॉकिट ने कहा है कि भाषा की व्यवस्था जटिल होती है। अनेक स्तरों एवं उनके तत्त्वों की व्यवस्थाओं के संदर्भ में हम यह भी कह सकते हैं कि प्रत्येक भाषा ´जटिल व्यवस्थाओं´ की ´व्यवस्था' होती है। हॉकिट ने भाषा की पाँच उप-व्यवस्थाएँ मानी हैं जिनमें से तीन को केन्द्रीय के रूप में स्वीकार किया है –

व्याकरणीय व्यवस्था (The Grammatical System): रूपिमों का समूह और उनकी क्रम व्यवस्था।

स्वनिमिक व्यवस्था (The Phonological System): ध्वनिग्रामों अथवा स्वनिमों का समूह और उनकी क्रम व्यवस्था।

रूपस्वनिमिक व्यवस्था (The Morphophonemic System): व्याकरणिक एवं स्वनिमिक व्यवस्थाओं को परस्पर संबद्ध करने वाली संहिता। (संधि व्यवस्था)। इन्हें केन्द्रीय इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इनका उस भाषेतर वातावरण से, जहाँ भाषा का प्रयोग किया जाता है, प्रत्यक्षतः कोई संबंध नहीं होता।

(A Course in Modern Linguistics, P. 137, (1958))

प्रत्येक भाषा की अपनी अलग व्यवस्था एवं संरचना

भाषाओं में प्रत्येक स्तर भिन्नताएँ होती हैं। (1)ध्वन्यात्मक (2) ध्वनिमिक (3) ध्वनिमिकविन्यास (4) रूपग्रामिक (5) वाक्यविन्यासीय।

विभिन्न भाषा विभिन्न वाक् अवयवों का प्रयोग करते हैं। किसी भाषा में किसी अवयव का प्रयोग अधिक होता है तो किसी में दूसरे का। फ्रेंच भाषा में ओठों की आकृति ध्वनियों में भिन्नता ला देती है, किन्तु इरोक्यूओइस (Iroquois) में ओष्ठ्य ध्वनियों का इतना अभाव है कि इस भाषा के बारे में यह कहावत प्रसिद्ध है कि इसका बोलने वाला व्यक्ति भाषण प्रक्रिया के दौरान मुँह से सिगरेट पी सकता है। अरबी भाषा में उपलिजिह्वा अथवा ग्रसनी स्थान से ध्वनियों का उच्चारण होता है। किन्तु हिन्दी में इस स्थान से ध्वनियों का उच्चारण नहीं होता। कैन्टोनी में समस्त स्पर्श एवं संघर्षी ध्वनियाँ अघोष हैं तथा शेष ध्वनियाँ सघोष हैं। इसलिए वहा घोष-तंत्रियों की स्थिति व्यतिरेकी नहीं है। हिन्दी आदि भारतीय आर्य भाषाओं एवं अंग्रेजी आदि में घोषत्व-अघोषत्व व्यतिरेकी लक्षण हैं। हिन्दी आदि भारतीय भाषाओं में प्राणत्व व्यवच्छेदक है, किन्तु अंग्रेजी आदि यूरोपीय तथा तमिल आदि भारतीय द्रविड़ भाषाओं में यह व्यतिरेकी नहीं है। स्वर एवं व्यंजनों की संख्या भी भिन्न भाषाओं में भिन्न होती है। भारतवर्ष की आर्य भाषाओं में ही असमिया में 23, बंगला में 28, उडि़या में 31 एवं सिन्धी में 40 व्यंजन ध्वनिमिक हैं। इनके अतिरिक्त दो भाषाओं में कुछ ऐसी भी ध्वनियाँ पाई जाती हैं जो सूक्ष्म ध्वन्यात्मक भिन्नताएँ लिए हुए होती हैं। प्रत्येक भाषा में अधिखण्डीय ध्वनि तत्त्वों की योजना एवं उनकी व्यवच्छेदकता भी भिन्न होती है।

भाषाओं में रूपग्रामिक एवं वाक्यविन्यासीय विशेषताएँ भी मिलती हैं। इस सम्बन्ध में ग्लीसन ने विवेचन करते हुए लिखा है कि ‘‘अंग्रेजी-भाषी वस्तुओं का वचन-भेद किए बिना उनके विषय में किसी भी प्रकार के विचार व्यक्त ही नहीं कर सकते। भले ही इस प्रकार के भेद करना सार्थक हो अथवा न हो, किन्तु उनकी भाषायी प्रकृति के लिए यह अनिवार्य है। इसके विपरीत, चीनी भाषा में वस्तुओं के एकवचन या बहुवचन का उल्लेख तभी किया जाता है, जब वक्ता उसकी सार्थकता समझता है। कुछ भाषाओं में कर्ता और क्रिया के सम्बन्धों के आधार पर परिस्थितियों का विश्लेषण उस प्रकार नहीं किया जाता जैसा कि अंग्रेजी एवं हिन्दी में होता है।

संरचनात्मक भाषाविज्ञान के अध्ययन पद्धति की सीमाएँ

भारत के जो भाषावैज्ञानिक अमेरिका में सन् 1955 से लेकर सन् 1960 ईस्वी में रहकर तथा वहाँ से आधुनिक भाषाविज्ञान की पद्धति और प्रविधि को हृदयंगम करने के बाद भारत लौटे, उनके दिलोदिमाग पर वर्णानात्मक भाषाविज्ञान और संरचनात्मक भाषाविज्ञान पूरी तरह आच्छादित था। समर स्कूल ऑफ लिंग्विस्टिक्स की कक्षाओं में ये विद्वान यह रेखांकित करते थे कि भाषा अध्ययन का लक्ष्य किसी भाषा की विशिष्ट व्यवस्था और संरचना को विवेचित करना है। सन् 1958 की कक्षा में, हमने ध्वनियों के उच्चारण, परम्परागत व्याकरण के मॉडल के अनुरूप आधुनिक भाषा के व्याकरणिक रूपों का अध्ययन तथा शब्दों के अर्थ की मीमांसा को ही वांछनीय होना जाना था। मगर अब जो ज्ञान परोसा जा रहा था, वह अनजाना और नया था। उस ज्ञान का सार था कि किसी भाषा की ध्वनियों के उच्चारण की और शब्दों के अर्थ की मीमांसा करना भाषा अध्ययन का मूल लक्ष्य नहीं है। विवेच्य भाषा की ध्वनिमिक व्यवस्था और व्याकरणिक व्यवस्था को विवेचित करना ही अभीष्ट है। दो भाषाओं में दो ध्वनियों का उच्चारण होने में तथा उन भाषाओं में उनके प्रकार्यात्मक मूल्य को जानने में अन्तर है। हमें विवेच्य भाषा में ध्वनियों की वितरणगत स्थितियों को आधार मानकर अध्ययन करना चाहिए। किसी भाषा में जो ध्वनियाँ परस्पर अविषम वितरण में वितरित हों, उनको एक ध्वनिग्रामिक इकाई में समेटा जा सकता है। परस्पर विषम अथवा व्यतिरेकी वितरण में वितरित होने वाली ध्वनियाँ भिन्न ध्वनिमिकों का निर्माण करती हैं।

रूपग्रामिक खंडन अथवा विश्लेषण का सिद्धांत था कि किसी भाषा में प्राप्त ऐसे उच्चारों में, जिनमें कुछ अंश में समान ध्वनिमिकों का क्रम और समान अर्थ हो तथा कुछ अंश में भिन्न ध्वनिमिकों का क्रम और भिन्न अर्थ हो तो ऐसे उच्चारों को समान और भिन्न अंशों के बीच से खंडित कर दो। इस सिद्धांत के अनुसार हिन्दी में उदाहरण के लिए /लड़का, लड़के, लड़की, लड़कियाँ/ जैसे उच्चारों में समान अंश /लड़क्- / को आधार घटक मानते हुए हमने सन् 1960 में एक शोध निबंध लिख डाला। इसका विवरण निम्न है –

हिन्दी संज्ञा शब्द – पदग्रामिक विश्लेषण एवं वर्गबंधन (नागरीप्रचारिणी पत्रिका, मालवीय शती विशेषांक,वर्ष 66, अंक 2-3-4, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, 1961)।

इसका पुनर्प्रकाशन डॉ. उदय नारायण तिवारी की पुस्तक (भाषाशास्त्र की रूपरेखा) में हुआ (सन् 1963)।

इसके बाद उस कालखण्ड में हिन्दी के ‘व्याकरण’ अथवा ‘संज्ञा रूपों’ पर जो कार्य सम्पन्न हुए, उनमें इसी पद्धति को अपनाया गया। इस पद्धति से हिन्दी संज्ञा रूपों का अध्ययन करने के कारण उत्पन्न जटिलताओं का आभास मुझे तब हुआ जब मैंने डॉ. अशोक केलकर के निर्देशन में सम्पन्न डॉ. मुरारी लाल उप्रैतिः का शोध प्रबंध पढ़ा। इसका प्रकाशन सन् 1964 में ‘हिन्दी में प्रत्यय विचार’ शीर्षक से हुआ।

डॉ. मुरारी लाल उप्रैतिः ने हिन्दी संज्ञा अविकारी कारक, एक वचन, पुल्लिंग संज्ञाओं में से / -आ, -इ, -ई, -उ, -ऊ, / इत्यादि को अविकारी कारक, एक वचन, पुल्लिंग की विभक्ति माना। उदाहरण के लिए, डॉ उप्रैतिः ने /लड़का, कोड़ा, दस्ताना, भतीजा, बगीचा, गाना, चरवाहा, रुपया/ इत्यादि आकारान्त संज्ञाओं में से /-आ/ को विश्लेषित या खंडित किया और /-आ/ को अविकारी कारक, एक वचन, पुल्लिंग की विभक्ति माना। इस पद्धति का अनुगमन करने के कारण हिन्दी के आकारान्त, इकारान्त, ईकारान्त, उकारान्त, ऊकारान्त इत्यादि सभी स्वरांत शब्दों के प्रातिपदिक व्यंजनान्त हो गए। इस पद्धति से विश्लेषण करने से हिन्दी संज्ञा अविकारी कारक, एक वचन, पुल्लिंग रूपिम (morpheme) के ढेर सारे उपरूप (allomorph) हो गए। इनकी वितरणगत स्थितियों की विवेचना ध्वन्यात्मक आधार पर करना असम्भव हो गया। वितरण बताने के लिए प्रत्येक उपरूप के आगे हजारों लाखों शब्दों की सूची प्रस्तुत करना अनिवार्य हो गया।इससे व्याकरण लेखन का उद्देश्य ही समाप्त हो गया।

मैंने यह उदाहरण इस कारण प्रस्तुत किया गया है जिससे संरचनावादी भाषावैज्ञानिकों के भाषा अध्ययन को ‘अर्थ को बीच में लाए बिना’ करने के आग्रह के दुष्परिणामों को समझा जा सके। इस प्रकार संरचनावादी भाषावैज्ञानिकों के भाषा अध्ययन को अर्थ निरपेक्ष पद्धति से करने के मोह के कारण अनेक विसंगतियों ने जन्म लिया।

इस संदर्भ में यह उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा कि भारतीय व्याकरणिक चिंतन ने यह माना कि भाषा का अध्ययन अर्थ की उपेक्षा करके नहीं किया जा सकता। भाषा के विवेचन के लिए भारतीय व्याकरणिक चिंतन ने आकांक्षा, योग्यता तथा आसक्ति तथा कुछ भारतीय भाषाविदों ने तात्पर्य के महत्व को स्वीकार किया। भारतीय चिंतन ने शब्दों के समूह मात्र को वाक्य नहीं माना। इस दृष्टि से भारतीय चिंतन में भी हमें दो भिन्न विचारधाराएँ मिलती हैं। मीमांसकों के अनुसार वाक्य में क्रिया ही प्रधान है। वाक्य के सभी पद क्रिया से अन्वित होते हैं। मीमांसकों की मान्यता संरचनात्मक भाषावैज्ञानिकों की अवधारणा के निकट है। मगर नैयायिकों ने बोध के लिए पदों का आकांक्षा, योग्यता एवं आसक्ति गुणों से युक्त होना आवश्यक माना। क्रियान्वित होते हुए भी पदों का अव्यवस्थित समूह वांक्षित अर्थ-बोध नहीं करा सकता। आकांक्षा, योग्यता आदि के आधार पर ही भाषा की वाक्य रचना की अर्थात्मा तक पहुँचा जा सकता है। इनका आधार न लेने पर केवल भाषा के वाक्यों की बाह्य संरचना (Surface structure) को ही जाना जा सकता है। इसका विवेचन चॉम्स्की के संदर्भ में किया जाएगा। भारतीय चिंतन की दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि उपयुक्त शब्दों की रचना जरूरी है। ‘अग्निना सिंचति’ इसका उदाहरण है। अग्नि और सींचना में परस्पर उपयुक्त अर्थ वहन करने की योग्यता का अभाव है। भाषा में जब हम एक पद का प्रयोग करते हैं तो अन्य पद की आकांक्षा रहती है। उदाहरण के लिए संज्ञा पद को क्रिया पद की आकांक्षा रहती है। योग्यता के कारण वाक्य में उपयुक्त पदार्थ की ही आकांक्षा रहती है। साकांक्ष एवं उपयुक्त पदार्थों की वाक्य में व्यवधानरहित उपस्थिति का होना भी जरूरी है। यह ज्ञान ही पदों की सन्निधिः है। यही आसक्ति है। भाषा प्रयोग में वक्ता की इच्छा और प्रकरण का भी महत्व है। इसके लिए भारतीय मनीषियों ने संस्कृत के ‘हरिरिष्टं ददाति’ एवं ‘हरिस्तपति’ वाक्यों के उदाहरण दिए हैं। इनमें ‘हरि’ के क्रमशः विष्णु और सूर्य अर्थ हैं। सूर्य के अर्थ में ‘तपति’ के ही अन्वित होने की योग्यता है। वाक्य में योग्यता एवं आकांक्षा के नियामक को कुछ भारतीय मनीषियों ने वक्ता की इच्छा और प्रकारण आदि में साकार होना माना है तथा इसके लिए पारिभाषिक शब्द के रूप में ‘तात्पर्य’ का प्रयोग किया है।

योग्यता पदार्थानाम् परस्पर सम्बंधबाधाभावः (साहित्य दर्पण, द्वितीय परिच्छेद)

वाक्यं स्यात् योग्यताकांक्षासक्तियुक्तः पदोच्चयः (साहित्य दर्पण, विमला टीका, पृष्ठ 24)

सन्निधिः आकांक्षितानाम् पदार्थानामेकबुद्ध्-युपारूढत्त्वम्

अव्यवधानेनान्वय प्रतीतियोग्युपस्थितिश्च सन्निधिः (काव्य प्रकाश)

प्रकृतान्वयबोधाननुकूल पदां व्यवधानमासक्तिः (परमलघु मंजूषा)

शब्द के अर्थ के महत्व को पाश्चात्य भाषावैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है। इसकी विवेचना अन्यत्र की जाएगी

 

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, भारत सरकार

123, हरि एन्कलेव

बुलन्दशहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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