बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

महावीर सरन जैन का आलेख - मदर टेरेसा जैसे संतों की सेवा-भावना

मदर टेरेसा जैसे संतों की सेवा-भावना

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

महान सेवा-भावी संत मदर टेरेसा के बारे में मोहन भागवत की साम्प्रदायिक टिप्पणी का भाजपा की मीनाक्षी लेखी ने बचाव किया है। मीनाक्षी लेखी के टिप्पण को पढ़कर मुझे उनकी मानसिकता पर तरस आ रहा है। अगर कोई महान व्यक्ति यह कहता है कि मैं महान नहीं हूँ, मैं सामान्य जीव हूँ, "मैंने कोई महत्तर सेवा नहीं की" अथवा "मैं कोई सेवक नहीं हूँ", उसके ऐसे वक्तव्य उसकी विनयशीलता के प्रमाण होते हैं। इस तरह के वक्तव्य महान साधक संत की विनयशीलता को प्रदर्शित करते हैं।

भारत के महान संत कबीरदास ने कहा कि मैंने तो केवल दो अक्षर ही पढ़ें हैं। उनकी इस आत्म-स्वीकृति के आधार पर मीनाक्षी लेखी जैसे लोग कबीरदास को मूर्ख बताने की मूर्खता कर सकते हैं। साधक संत की विनयशीलता के वचन उसकी आत्म-पराजय अथवा हीन-भावना की आत्म-स्वीकृति नहीं होते। वे उसकी आत्मिक-दृढ़ता तथा आत्म-चेतना की प्रतीति के बोधक होते हैं। मगर यह बोध मीनाक्षी लेखी जैसे लोगों को होना सम्भव नहीं है। इसका कारण यह है कि ऐसे लोग तो राजनीति की कुटिलता एवं पंकिलता से ग्रस्त होते हैं। वोट बटोरने के लिए धर्म को साधन बनाने वाले लोगों के प्रत्येक वक्तव्य का गुणगान करना और उसको महिमामंडित करना इनकी विवशता होती है

 

सामाजिक व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह ‘अहंकार’ का परित्याग कर, दूसरों के प्रति विनम्रता के साथ मृदुता का आचरण करे । समाज के एक कार्यकारी सदस्य के रूप में व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह भद्र एवं सभ्य व्यक्ति के रूप में मृदुता का व्यवहार करे जिससे दूसरों के मन को पीड़ा न पहुँचे। व्यक्ति को समाजनिरपेक्ष स्थिति में व्यक्तिगत साधना के धरातल पर भी अपने अहंकार का विसर्जन करना होता है। हृदय की कठोरता एवं क्रूरता को छोड़े बिना व्यक्ति का चित्त धार्मिक नहीं हो सकता। कारण यह है कि अध्यात्म-यात्रा की सबसे बड़ी रुकावट ‘मैं’ की है । ‘मार्दव’ अथवा विनयशीलता की कई अर्थ छायाएँ एवं स्तर हैं। एक दृष्टि से इसका का अर्थ है- मृदु, शिष्ट एवं विनम्र व्यवहार। इसके आगे जाकर इसका का अर्थ होता है- कठोरता का पूर्ण विर्सजन। इसके भी आगे जाकर इससे व्यक्ति के अन्तःकरण के उस गुण का बोध होता है जिसमें वह किसी भी प्राणी के दुःख को देखकर सहजरूप से करुणा से अभिभूत हो जाता है, प्रत्येक प्राणी को वह आत्मतुल्य एवं समभाव की दृष्टि से देखने का अभ्यस्त हो जाता है, उसका मन करुणा से आपूरित रहता है। मदर टेरेसा की विनयशीलता का यह स्तर था। शायद मीनाक्षी लेखी जैसे प्राणी इस स्तर को आत्मसात करने में समर्थ नहीं हो सकते। मदर टेरेसा का अन्तर्मन मार्दव से भावित था। उनके जीवन में विनयशीलता, निरभिमानता एवं उदारता थी। उनके चित्त में मैत्री का अजस्र स्रोत प्रवाहित था। विनम्रता एवं करुणा के शीतल जल-प्रवाह द्वारा उनमें मानवीय प्रवृत्तियों का विकास हुआ था। उनके चित्त की विनम्रता एवं करुणा ने दूसरों के दुख एवं पीड़ा को दूर करने के लिए उनको सेवा भावी बना दिया था। उनका सेवा-भाव उनके मन का सहज स्वभाव हो गया था। उनका सेवा-भाव वोट बटोरने के लिए नहीं था।

 

धर्म साधना की अपेक्षा रखता है। धर्म के साधक को राग-द्वेषरहित होना होता है। धार्मिक चित्त प्राणिमात्र की पीड़ा से द्रवित होता है। तुलसीदास ने कहा- ‘परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई’। सत्य के साधक को बाहरी प्रलोभन मोहित करने का प्रयास करते हैं। मगर वह एकाग्रचित्त से संयम में रहता है। प्रत्येक धर्म के ऋषि, मुनि, पैगम्बर, संत, महात्मा आदि तपस्वियों ने धर्म को अपनी जिन्दगी में उतारा। उन लोगों ने धर्म को ओढ़ा नहीं अपितु जिया। साधना, तप, त्याग आदि दुष्कर हैं। ये संयम से सधते हैं। धर्म के वास्तविक स्वरूप को आचरण में उतारना सरल कार्य नहीं है। महापुरुष ही सच्ची धर्म-साधना कर पाते हैं। इन महापुरुषों के अनुयायी जब अपने आराध्य-साधकों जैसा जीवन नहीं जी पाते तो उनके नाम पर सम्प्रदाय, पंथ आदि संगठनों का निर्माण कर, भक्तों के बीच आराध्य की जय-जयकार करके अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। अनुयायी साधक नहीं रह जाते, उपदेशक हो जाते हैं। ये धार्मिक व्यक्ति नहीं होते, धर्म के व्याख्याता होते हैं। इनका उद्देश्य धर्म के अनुसार अपना चरित्र निर्मित करना नहीं होता, धर्म का आख्यान मात्र करना होता है। जब इनमें स्वार्थ-लिप्सा का उद्रेक होता है तो ये धर्म-तत्त्वों की व्याख्या अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए करने लगते हैं।

धर्म की आड़ में वोट बटोरने वाले धर्म के ठेकेदार अध्यात्म सत्य को आवरण से ढकने का बार-बार प्रयास करते हैं। इन्हीं के कारण चित्त की आन्तरिक शुचिता का स्थान बाह्य आचार ले लेते हैं। पाखंड बढ़ने लगता है। कदाचार का पोषण होने लगता है। भारत के समस्त महान साधकों ने माना है कि धर्मरूपी वृक्ष का मूल ‘विनय’ है और मोक्ष उसका फल है। अहंकार के आवरण को हटाये बिना अमृत-तत्व प्राप्त नहीं हो सकता। समस्त जीवों पर मैत्री भाव रखने एवं समस्त संसार के जीवों को समभाव से देखने की दृष्टि ‘मृदुता’ से विकसित होती है । मृदुता से उदारता, सहिष्णुता एवं दृष्टि की उन्मुक्तता का विकास होता है। सत्यानुसंधान के लिए यह बहुत आवश्यक है ।पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के विकास के लिए सभी सदस्यों में परस्पर प्रेम भाव, दूसरों के अस्तित्व की स्वीकृति तथा एक सदस्य का अन्यों के प्रति करुणा एवं मैत्रीभाव का होना आवश्यक है। ‘मार्दव’ से उपर्युक्त गुणों का विकास होता है। मदर टेरेसा के जीवन में हम ‘मार्दव’ से उपर्युक्त गुणों का विकास पाते हैं। इसी के कारण उनके मन में अनाग्रह, सहिष्णुता एवं उदारता के भाव थे। मदर टेरेसा ने अपने जीवन में सहन शक्ति का विकास किया था। उनके मन में समाज के सभी दुखी और साधनहीन लोगों के प्रति सहज अनुराग एवं मैत्री-भाव था।

 

धर्म का सबसे अधिक अहित उन ताकतों ने किया है जिन्होंने इसका इस्तेमाल वोट बटोरने के लिए किया है। इस कोटि के लोग मदर टेरेसा जैसे लोगों की सेवा-भावना का मूल्यांकन नहीं कर सकते। मदर टेरेसा जैसे लोगों की सेवा-भावना का मूल्यांकन करने के लिए अनाग्रह, सहिष्णुता एवं उदारता के गुणों से भावित होना जरूरी है। व्यक्ति का साम्प्रदायिकता के बंधनों से मुक्त होकर धार्मिक होना जरूरी है।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव

बुलन्द शहर - 203001

12 blogger-facebook:

  1. BVAKVAS KA POST .......... PAHLE KHUD TERESA KE SEVAKARYO KA MULYAKAN KARO FIR BOLO VO SEVA KE NAME PE BAS DHARMANTARAN KARTI THI AUR SEVA BHI SIRF UNKI HI KARTI THI JO ISAYI BANTE THE VARNA NAHI KARTI THI KHUD VIDESHI LEKHAKO KE INTERVIEW AADI PADH LO KHUD PATA CHAL JAYEGA KI MADAR TERESA KHUD SABSE BADI DHONGI THI AUR JAB DHARMANATARAN KA BILL TATKALIN MORARJI DESHAYI LANE VALE THE TO MADAR TERESA USKA VIRODH KYO KI USKI CHHITTTHI BHI AAPKO MIL SAKTI HAI SO SEVA KARNEVALO KO DHARMA AUR RAJNITI KI KYA JARURAT AUR JAB VO KAR SAKTI HAI TO AGR BJP VALE KARE TO KYA GALAT HAI AKHIR VO US JHUTHE ITIHAS AUR PAKHAND KA HI TO KHANDAN KAR RAHE HAI HAI JO ANGREJO NE HAMARE ANDAR HBHARA HAI

    PROFESAR HOKAR BHI ITNI SAMAJH NAHI AUR CHALE HAI UPDESH DENE KHAIR ISME AAPKI GALTI NAHI HAI SAB MAIKALE KI SHIKSHA PADDHATI SE PADHAKAR USASE HI PRABHAVIT HAI SO AAP JAISE PROFESARO KO BHI SACHCHAYI HAJAM NAHI HO RAHI HAI JABKI PURI DUNIYA ME KOI BHI NETA DHARM NIRPESKSH NAHI HAI TO BJP VALE KYO HO ............ UNKI BHAVNAYE DUKHI HONE KA AAPKO KAST HAI AUR UNKE JARIYE JAB HAMARI BHAVANAE DUKHIT HOTI HAI TAB AAPLOGO KI LEKHANIYA KYO BAND RAHTI HAI ????????

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  2. BVAKVAS KA POST .......... PAHLE KHUD TERESA KE SEVAKARYO KA MULYAKAN KARO FIR BOLO VO SEVA KE NAME PE BAS DHARMANTARAN KARTI THI AUR SEVA BHI SIRF UNKI HI KARTI THI JO ISAYI BANTE THE VARNA NAHI KARTI THI KHUD VIDESHI LEKHAKO KE INTERVIEW AADI PADH LO KHUD PATA CHAL JAYEGA KI MADAR TERESA KHUD SABSE BADI DHONGI THI AUR JAB DHARMANATARAN KA BILL TATKALIN MORARJI DESHAYI LANE VALE THE TO MADAR TERESA USKA VIRODH KYO KI USKI CHHITTTHI BHI AAPKO MIL SAKTI HAI SO SEVA KARNEVALO KO DHARMA AUR RAJNITI KI KYA JARURAT AUR JAB VO KAR SAKTI HAI TO AGR BJP VALE KARE TO KYA GALAT HAI AKHIR VO US JHUTHE ITIHAS AUR PAKHAND KA HI TO KHANDAN KAR RAHE HAI HAI JO ANGREJO NE HAMARE ANDAR HBHARA HAI

    PROFESAR HOKAR BHI ITNI SAMAJH NAHI AUR CHALE HAI UPDESH DENE KHAIR ISME AAPKI GALTI NAHI HAI SAB MAIKALE KI SHIKSHA PADDHATI SE PADHAKAR USASE HI PRABHAVIT HAI SO AAP JAISE PROFESARO KO BHI SACHCHAYI HAJAM NAHI HO RAHI HAI JABKI PURI DUNIYA ME KOI BHI NETA DHARM NIRPESKSH NAHI HAI TO BJP VALE KYO HO ............ UNKI BHAVNAYE DUKHI HONE KA AAPKO KAST HAI AUR UNKE JARIYE JAB HAMARI BHAVANAE DUKHIT HOTI HAI TAB AAPLOGO KI LEKHANIYA KYO BAND RAHTI HAI ????????

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  3. प्रोफेसर महावीर सरन जैन जी,
    आपने अपने लेख में मदर टेरेसा की सदाशयता के संबंध में केवल इतना ही कहा है कि वह महान गुणों सेे संपन्न महिला हैं, साधनहीन लोगों के लिए उनके मन में करुणा और मैत्री-भाव था, मोहन भागवत की टिप्पणी सांप्रदायिक है और मीनाक्षी लेखी द्वारा उनका बचाव महज धृष्टता है.
    मैं केवल दो उदाहरण दे रहा हूँ. मैं उस समय डिग्री कॉलेज का छात्र था. एक दिन समाचार पत्रों में समाचार छपा कि दक्षिण बिहार के एक गाँव में एक ही दिन में 1500 आदिवासी ईसाई बना लिए गए केवल पानी के लिए. वह गाँव सूखा पीडि़त था. गाँव वालों को प्यास बुझाने तक को पानी उपलब्ध नहीं था. पानी केवल क्रिश्चियनों के पास था. उन्होंने आदिवासियों को तभी पानी पिलाया जब वे क्रिश्चियन धर्म स्वीकार कर लिए. मदर टेरेसा ने इसे कभी अमानवीय नहीं कहा.
    दूसरा उदाहरण कलकत्ता का है. उस समय मैं नौकरी में था. यह भी अखबारों में आया था. पत्रिकाओं में लेख छपे थे. एक असहाय दीन और बीमार लड़के को टेरेसा ने कलकत्ता के अपने क्रिश्चियन अस्पताल में भर्ती करवाया. उसकी बहुत शुश्रुषा की पर वह ठीक नहीं हो पा रहा था. उस लड़के को उस अस्पताल से बढ़ियाँ अस्पताल में ले जाने की मदर टेरेसा को सलाह दी गई पर टेरेसा तैयार नहीँ हुईं क्योंकि उनका एक क्रिश्चियन कम हो जाता (धर्मयुग में छपा विवरण.) प्रोफेसर साहब आपकी आँखों के सामने से भी ये खबरें गुजरी होंगी. इससे इनकार मत कीजिएगा.
    ओशो तो मदर टेरेसा को पाखंडी तक कहते है जिसके कई उदाहरण उन्होंने दिए हैं जो उनके प्रवचन-साहित्य में विखरे पड़े है.
    आपका लेख तो खुद राजनीतिक लगता है.

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    1. aap ekdum sahi kah kah rahe hai ye log ya to rajnitik vajah se ya fir apni vikriti mansikta se aise post karte hai vo bhi jhuthi jhuthi jisme koi bhi sachchayi nahi hai shayad ye log marksvadi honge jo isayiyo ki bhakti me lean hai khair ab internet ka jamana hai kisi ka kuchh bhi chupa nahi hai ........... teresa jaise pakhandi log aaj bhi aadivasiyo ka seva ke name pe dharmantaran karte hai jispe in profesaro ki lekhani nahi chalti shayad inko bhi koi sampradayik n ghosit kar de ha ha ha ........... sampraday ki paribhasha kaun nhi bolta hai any majhabo ke logo se jakar ye murkh profesar log puchhe ki kya vo dharmnirpeksh hai ??? bas dobara fir aise lekh nahi likhenge agr samajhadar honge to .......... any majhabo ki bhavanaye dukhit ho to inko bura lagta hai aur hinduo ki koi bhavnaye bhavnaye nahi hoti yani unko thes pahuche to in lekhako ki lekhani khatm ho jati hai ha ha ha

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    2. मोहन भागवत जी ने बिल्कुल सत्य कहा की मदर टेरेसा के सेवा के पीछे मुख्य उद्देश्य धर्मांतरण ही था ... आखिर मदर टेरेसा कई गरीब ईसाई देशो में अपनी सेवा क्यों नही करती थी ? क्यों उन्होंने भारत जैसे हिन्दू बहुल देश को ही चुना ?
      १-यदि मदर टेरेसा के सेवा के पीछे धर्मांतरण नही था तो उनके अस्पतालों में काम करने वाले सभी नर्से गले में क्रोस क्यों लटकाए रहते थी ? क्यों मिशनरी ऑफ़ चेरिटी के हर अस्पताल या आनाथालय के कैम्पस में सिर्फ ईसा मसीह की ही मूर्ति होती थी ? क्यों नही किसी हिन्दू देवी देवताओ की मुर्तिया होती थी ?
      २- धर्मांतरण बिल का सबसे ज्यादा विरोध मदर टेरेसा ने क्यों किया था ? क्यों उन्होंने मोरारजी देसाई को धमकी देते हुए पत्र लिखा था की वो धर्मांतरण बिल न लाये ? यदि मदर टेरेसा सेवाभावी थी तो उन्हें धर्मांतरण बिल से क्या समस्या थी ?
      ३- जो दलित या आदिवासी धर्मांतरण करके ईसाई बन जाते है उन्हें भी आरक्षण देने की मांग पर मदर टेरेसा ने अनशन क्यों किया था ?
      ४- अपनी पूरी जिन्दगी में मदर टेरेसा ने कभी किसी हिन्दू मन्दिर में क्यों नही गयी ?
      ५- मदर टेरेसा गरीबो और अमीरों में किस कदर फर्क करती थी उसका सबसे बड़ा उदाहरण आयरलैंड मामले से साबित होता है .. आयरलैंड में कट्टर ईसाई नियमो को लागु करने पर जनमत संग्रह हो रहा है .. ईसाई धर्म में गर्भपात और तलाक की एकदम मनाई है .. किसी भी हालत में कोई महिला गर्भपात नही करवा सकती .. चाहे उसकी जान को ही खतरा क्यों न हो ...मदर टेरेसा एक महीने तक आयरलैण्ड में रहकर लोगो को कट्टर ईसाई नियमो के समर्थन में वोट देने के लिए मनाया ...
      फिर बाद में जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा की आपके कई कान्वेंट में राजकुमारी डायना आती है और आपके साथ देखी जाती है उन्होंने खुद एक बार गर्भपात भी करवाया है और तलाक भी ले लिया है .. तो इस सवाल के जबाब में मदर टेरेसा कहती थी की वो राजकुमारी है उन्हें ये करने से कौन रोक सकता है .. मतलब इस महिला को गरीब ईसाई और आमिर ईसाई में नियम अलग दिखते थे ...
      ६- इसकी खुद की जन्मभूमि अल्बानिया कई महीनों तक भयंकर गृहयुद्ध में झुलसता रहा और आठ देशो में बंट गया .. हजारो लोग इस संघर्ष में मरे लेकिन ये अपने ही जन्मभूमि में सेवा करने नही गयी क्योकि वहाँ तो सब के सब पहले से ही ईसाई थे ..

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    3. jo log tulsidas aur teresa ki tulna karte hai vo khud murkh hai ya unko khud kisi baat ka pura pata nahi hai ......... tulsi das seva ke name pe kabhi dharmantaran nahi kiye jabki teresa ..... ???? teresa jaise logo ko vahi mahan bata rahe hai jisko mahatma ghandhi nehru idira ghandhi sonia rahul ghandhi jaise mahan lagte hai ha ha ha

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    4. बेनामी9:21 am

      जय हिन्द, जय हिन्दू, हिन्दू बचाओ ......राष्ट बचाओ।

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    5. अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यक के विचार ही अच्छे लगते हैं। क्या यह सांप्रदायिकता के भाव से ओत-प्रोत नहीं हैं।

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    6. मैं यह जानना चाहूँगा की कॉंग्रेस, मार्कस्वाद, क्षेत्रीय पार्टियों ने अल्पसंख्यकों से वोट नहीं लिए और बदले में उन्हे क्या मिला। आजादी के लगभग 70 साल होने जा रहे हैं और देश में इनकी हालत दिन पर दिन बत्तर होती जा रहीं हैं जिन्होंने दलित, अल्पसंख्यक के नाम पर वोट लिए वो उनके लिए क्या किए..... आज भी उनकी हालात दयनीय हैं ...... केंद्र एवं राज्य सरकार ने ना जाने कितने वादे किए .... नीतियों का निर्माण किया लेकिन कुछ हुआ....... सबसे बड़ी कमी हैं हम उनकी ज़िंदगी जीते नहीं हैं ...........उन्हें महसूस करते नहीं है .......... उन्हें उचित मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन मिलता नहीं हैं और वे इन सारे सुख-सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं।

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  4. चाँद पर थूकने से थूक अपने मुख पर ही आता है उसी प्रकार महान लोगों की निंदा करने से उनका कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन करने वालों की ही हानि होती है | जैन साहब ने ठीक कहा विद्वान लोग आत्मश्लाघी नहीं होते वे तो विनम्र होते है ए और किसी भी उपकार का श्रेय कभी नहीं लेते तुलसी दास जी ने अपने बारे में कहा _- कवि न होऊँ न कवित प्रवीनु , सकल कला सब विद्या हीनू लेकिन वे संस्कृत के प्रकांड पंडित थे | मदर टरेसा पर भी यही बात लागू होती है |

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  5. 'भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जब मदर टेरेसा को कहा था कि तुम्हारा ये सेवा का कार्य तो अच्छा है पर तुम हिन्दुओ का धर्मांतरण करना छोड़ दो। तब मदर टेरेसा ने कहा था कि धर्म परिवर्तन के लिए ही तो सेवा कार्य करते है। कलकत्ता के अस्पतालों में मरीज तड़प-तड़प कर मर जाता था लेकिन उसे दवा तब तक नहीं मिलती थी जब तक वह अपना धर्म परिवर्तन नहीं कर लेता।..!!!!
    http://indiafacts.co.in/bullet-point-missionary-strategies-convert-hindus/

    अब ये भी कोई महानता के लक्षण है ???? इस ढोंगी टेरेसा को सिर्फ मिडिया मिसिनरी मार्क्सवादी और मल्टिनैशनल कम्पनियो
    ने या उसके लोगो ने महान बनाया है ताकि सेवा के नाम पे आदिवासियों हिन्दुओ आदि का धर्मान्तरण किया जा सके न इसके कर्म ने
    सो समझदारो से प्रार्थना है की वो किसी पे टिपड्डी करने के पहले खुद सारे तथ्यों को परखे फिर कुछ कहे ऐसे दिमाक की दही न बनाये

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  6. nice article,there are some truth which is unearthed.,

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