बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

पखवाड़े की कविताएँ

आचार्य बलवन्त

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रंगों का पर्व
 
रंग-गुलाल से तर-ब-तर दो वर्गों के लोग आपस में भिंड़ गये।
बाबा ने नन्दू से पूछा, ‘ये कोहराम कैसा है बेटा?’
नन्दू ने बताया, ‘बाबा, आज होली है न,
लोग मना रहे हैं, खूब गा रहे हैं।
देखिए, अब आपसे मिलने आ रहे हैं।
नन्दू रंग-गुलाल लिए बाबा के पास आया,
सूखे होंठ और पकी दाढ़ियों  को सहलाया,
और बोला, ‘बाबा हमें आशीर्वाद  दीजिए
कि हम ऐसी होली कभी न मनायें,
ऐसी निकम्मी होली से हमेशा  बाज आयें,
फिर फफक-फफक कर रो पड़ा।
बोला – बाबा! अपने हाथों मुझे अबीर लगाइये न,
कोई फाग, बसन्त का आप भी गाइये न।
आँखों से पूरा व्यक्तित्व लाँछित था बाबा का,
वक्त की नियति और समय के क्रूर मज़ाक़ पर मुस्कराये,
अपने प्यारे नन्दू की अंगुलियाँ पकड़ अबीर लगाये
और दुआयें दी,
तुम्हारी  यही उमर हो, जब भी होली आये,
बाबा के सूखे होंठ चूमे और पकी दाढ़ियाँ सहलाये।
बाबा ने कहा, ‘बेटे ! मैंने  बड़ी दुनिया देखी इन अंधी आँखों से 
और बहुत पछताया कि कैसे हैं  ये लोग,
जो आँखें होते हुए भी देख नहीं पाते,
बार-बार सुनते हैं, समझ नहीं पाते।

 


 
आगे आओ

जाति पाँत की बातें छोड़ो
टूट रहे समाज को जोड़ो
गीत प्यार के मिलकर गाओ, आगे आओ।

जन-मन में उल्लास जगाकर
आपस का विश्वास जगाकर
दुःखी व्यक्ति का दिल बहलाओ, आगे आओ।

उम्मीदों की आशा बनकर
जीवन की अभिलाषा बनकर
सच्चाई का साथ निभाओ, आगे आओ।

कल की बातें कल पर छोड़ो
आज से रिश्ते-नाते जोड़ो
जीवन पथ पर कदम बढ़ाओ, आगे आओ।

मानवता के मान के लिए
मूल्यों के सम्मान के लिए
समरसता समाज में लाओ, आगे आओ।


     चेहरे
चेहरे पर हजार  चेहरे  हैं।
सब के सब उधार चेहरे हैं।
सूरत नज़र नहीं आती अब
इतने तार-तार चेहरे हैं।
गिरगिट जैसा रंग बदलते
जितने  चाटुकार चेहरे हैं।
जीवन की आपाधापी में
चेहरे पर सवार चेहरे हैं।
लोकतंत्र की बातें करते
जितने दागदार चेहरे हैं।
इन्हें देखकर डर लगता है
इतने गुनहगार चेहरे हैं।

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शंकर मुनि राय 'गड़बड़'

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रंगों का पर्व
 
रंग-गुलाल से तर-ब-तर दो वर्गों के लोग आपस में भिंड़ गये।
बाबा ने नन्दू से पूछा, ‘ये कोहराम कैसा है बेटा?’
नन्दू ने बताया, ‘बाबा, आज होली है न,
लोग मना रहे हैं, खूब गा रहे हैं।
देखिए, अब आपसे मिलने आ रहे हैं।
नन्दू रंग-गुलाल लिए बाबा के पास आया,
सूखे होंठ और पकी दाढ़ियों  को सहलाया,
और बोला, ‘बाबा हमें आशीर्वाद  दीजिए
कि हम ऐसी होली कभी न मनायें,
ऐसी निकम्मी होली से हमेशा  बाज आयें,
फिर फफक-फफक कर रो पड़ा।
बोला – बाबा! अपने हाथों मुझे अबीर लगाइये न,
कोई फाग, बसन्त का आप भी गाइये न।
आँखों से पूरा व्यक्तित्व लाँछित था बाबा का,
वक्त की नियति और समय के क्रूर मज़ाक़ पर मुस्कराये,
अपने प्यारे नन्दू की अंगुलियाँ पकड़ अबीर लगाये
और दुआयें दी,
तुम्हारी  यही उमर हो, जब भी होली आये,
बाबा के सूखे होंठ चूमे और पकी दाढ़ियाँ सहलाये।
बाबा ने कहा, ‘बेटे ! मैंने  बड़ी दुनिया देखी इन अंधी आँखों से 
और बहुत पछताया कि कैसे हैं  ये लोग,
जो आँखें होते हुए भी देख नहीं पाते,
बार-बार सुनते हैं, समझ नहीं पाते।

--

जीजा सबसे सुंदर

 

हर दिन जो साली मुझको कहती रहती थी बंदर

होली आई लिख रही -''जीजाजी सबसे सुंदर'!


किस्मत बदली ऐसी यारों, पत्नी भी खुशहाल

घर में आया स्वर्ग उतरकर, सब हैं मालामाल।


जो कहती थी सोने तक मत आना घर के भीतर

फागुन भर कहती है पत्नी-'रहना घर के अंदर।


कविता मेरी सुनकर जो भाभी जाती थीं भाग

जबसे चढ़ा बसंत, लगी हैं गाने होली-फाग।


मौसम का बदलाव कि यारों कहतीं-'प्यारे देवर'

सबसे सुंदर तुमहीं जग में, बाकी भालू-बंदर।


सरहज की चिट्ठी है आई लिखतीं-'आयें आप'

फागुन भर ससुराल में रहकर खायें आलू-चाप।


'गड़बड़' दिल जो एक साल से सूख रहा था अंदर

फागुन के आने से यारों भरकर हुआ समुंदर।

--

 


आगे आओ

जाति पाँत की बातें छोड़ो
टूट रहे समाज को जोड़ो
गीत प्यार के मिलकर गाओ, आगे आओ।

जन-मन में उल्लास जगाकर
आपस का विश्वास जगाकर
दुःखी व्यक्ति का दिल बहलाओ, आगे आओ।

उम्मीदों की आशा बनकर
जीवन की अभिलाषा बनकर
सच्चाई का साथ निभाओ, आगे आओ।

कल की बातें कल पर छोड़ो
आज से रिश्ते-नाते जोड़ो
जीवन पथ पर कदम बढ़ाओ, आगे आओ।

मानवता के मान के लिए
मूल्यों के सम्मान के लिए
समरसता समाज में लाओ, आगे आओ।


     चेहरे
चेहरे पर हजार  चेहरे  हैं।
सब के सब उधार चेहरे हैं।
सूरत नज़र नहीं आती अब
इतने तार-तार चेहरे हैं।
गिरगिट जैसा रंग बदलते
जितने  चाटुकार चेहरे हैं।
जीवन की आपाधापी में
चेहरे पर सवार चेहरे हैं।
लोकतंत्र की बातें करते
जितने दागदार चेहरे हैं।
इन्हें देखकर डर लगता है
इतने गुनहगार चेहरे हैं।

 

होली की कविताएं

कवित्त

एक बार गये कृष्ण होली जो खेलन ब्रज

बेली एक गोरी प्रभु फिल्मी गीत गाइये।

मुरली-मधुर तान बहुते सुनाये अब

इल्लू-इल्लू गाके कुछ नई रीति लाइये।।

भांगड़े की धुन पर तुम्हं भी नचाउगी मैं

राधिका रमण प्यारे अवसर दिखाइये।

धाय-धाय अउंगी मैं तुम्हरे होटल प्रभु

एक बार मोहिं राजनीति में घुसाइये।।

                     ग्वाल-बाल बोले प्रभु माखन न खाना अब

                     माखन लगाय अब डालडा खिलाएंगे।

                    जमुना के तट पर रास नहीं होगा अब

                    हम ब्रजवासी तुम्हें दिल्ली पहुंचाएंगे।।

                    खेलना है होली गर, खेलो राजनीति की तू

                    छल औ कपट की अबीर से नहाएंगे।

                    खोरि-खोरि होरी इस देश को जलाके प्रभु

                    तोड़-ताड़ पार्टी तुम्हें मंतिरी बनाएंगे।।

                    

बासंती कवित्त

पिया परदेश भेष जोगिनी के बनि गयो

कारी कजरारी अंखियन में ललाई है।

बड़की गोतिनिया भसुर संग फाग खेले

छोटकी ननदिया करति चिहुलाई है।।

हार-भार सहि नहीं पाये सखि जोबना

कंगना चुभन लागे कोमल कलाई है।

'गड़बड़' मन ना विचार करे सजना

लहुरा देवरवा करत कविताई है।।

बूढ़-बूढ़ ससुर-भसुर नहीं लाज करें

ठेंगुरी चलत सासु देति मुस्कान हैं।

भरमत मन मोर नगर-नगर सखि

हहर-हहर उठे दिल में तुफान है।।

कहे सब लोग मोहि धीरज धरन के

समुझत नहीं मन जिया हलकान है।

'गड़बड़' पिया के सनेस जब मिले नहीं

कइसे कहत लोग जिला के जवान है।।

आये जो बसंत तब संत भी असंत भये

आम-अमराई चारपाई बनि जाति है।

कोकिला कुहुक उठती है भोरे-भिनुसार

कामिनी-किशोरी कविताई बनि जाति है।।

राग-रंग-रस फगुनाई में बहकि उठे

साली-सरहज इत-उत गरियाति हैं।

'गड़बड़' मन बनि अबीर-गुलाल उड़े

सबकी लुगाई भउजाई बनि जाती है।।

 

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मनोज 'आजिज़'

दो ग़ज़लें


ग़ज़ल

   

रातों की नींद कोई उड़ाता गया 

सितारों से बात मेरी करता गया 

खुद को आईने के पास खड़ा किया 

दरिया-ए-दिल फिर बहता गया 

आँखें तो कई दफ़ा पिघलीं मगर 

हर बार खुद ही सम्हलता गया 

सफ़र-ए-हयात में आए कई नदीम 

कोई भाया कोई जी चुराता गया 

आग अपने दिए ग़ैरों ने हवा 

चराग़े जश्न यूँ जलता-बुझता गया

ग़ज़ल
   

कल घर पे सब थे मस्ती थी
आज हंसी महँगी जो सस्ती थी
दीवारों से रंगत छूट रही है
लगी आह है जिनकी बस्ती थी
कुछ तो खिजां से जूझते हैं
यूँ तो बिखर जाते जिनकी हस्ती थी
अक्सर मोहल्ले में अनजान दिखते  हैं
वो दौर कुछ और था जब गश्ती  थी ।

पता-- इच्छापुर, ग्वालापारा, पोस्ट- आर.आई.टी.

       जमशेदपुर-१४ 

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डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'

नरेश ऋतुराज

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आ गए नरेश ऋतुराज हैं 

बिछ गया पहाड़ियों पर मखमली गलीचा,

बंदी जन सा पक्षियों का अनवरत गान 

सच ही नरेश ऋतुराज हैं महान

लाल लाल मोहक हैं टेसू के फूल 

प्रेमिल संगीत सूनो सरिता के कूल 

दिन सुधर रातें नशीली हैं 

लजवन्ती सरिता किशोरी सी 

छू नहीं प् रहा आज निज कूल 

फूल रहे लाल लाल टेसू के फूल। 

सौंदर्य नौका पर लज्जा के पाल 

कितनी है स्निग्ध आज पीपल की डाल 

द्रुम-दल झूम रहे हो कर निहाल 

दे रहा पवन भी हौले से ताल 

घोषणा निसर्ग की हो चुकी आज है 

आ गए नरेश ऋतुराज हैं। 

आदित्यपुर, जमशेदपुर

०६५७/२३७०८९२

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रमेशकुमार सिंह चौहान

भजन- धर्म बचावन को जग में प्रभु (मत्तंगयंद सवैया)

हे सुख सागर दीन सखा प्रभु,
नाथन के तुम नाथ कहाते।
पाप बढ़े जग में जब कातर,
मेटि अधर्महि धर्म जगाते ।।
भक्तन के सुन टेर सदा प्रभु,
छोड़शेष रमा तुम धाते ।
धर्म बचावन को जग में प्रभु,
ले अवतार सदा तुम आते ।।1।। धर्म बचावन को जग में प्रभु ........
सीख तपो बल का प्रभु देवन
सृष्टिहि आदि सनन्दन आते ।
नारद के अवतार लिये प्रभु
भक्ति प्रभाव सबे बतलाते ।।
दत्त बने कपिलेश बने प्रभु,
ले नर और नरायण आते ।
आप कई अवतार लिये प्रभु,
भक्तन को सद मार्ग दिखाते ।।2।। धर्म बचावन को जग में प्रभु .......
ले हिरणाक्ष हरे महि को जब,
दारूण कशष्ट सभी जन पाते ।
देव सभी कर जोर तभी प्रभु,
गा गुण गानहि टेर लगाते ।।
ले अवतार वराह तभी तुम,
दैत्य पछाड़त मार गिराते ।
लेत उबार धरा तुम तो प्रभु,
सृष्टि धुरी फिर देत चलाते ।।3।। धर्म बचावन को जग में प्रभु ........
ठान लिये प्रतिशोधहि लेवन,
दैत्य हिरण्य किये बहु त्रासे ।
श्रीहरि नाम किये प्रतिबंधित,
यज्ञहि को बल पूर्वक मेटे ।।
त्रास बढ़े तब सृष्टिन रोवत,
आपहि श्री प्रहलाद पठाते ।
ताहि पिछे नरसिंग बने प्रभु,
मार हिरण्यहि पाप मिटाते ।।4।। धर्म बचावन को जग में प्रभु ........
लोकहि डूब रही जब चाक्षुश,                चाक्षुशः- एक मनवन्तर का नाम
सागर में सब लोक समाते ।
नीरहि नीर दिखे सब ओरहि,
सृष्टिन कालहि गाल समाते ।।
ले मछली अवतार तभी प्रभु,
सागर मध्यहि तैरत आते ।
धर्महि बीज धरे तुम नावहि,
सृष्टिन में तब धर्म बचाते ।।5।। धर्म बचावन को जग में प्रभु ........
सागर मंथन काज करे जब,
दानव देवन संगहि आते ।
वासुकि नागहि नेति खैचत
ले मदराचल सिंधु डुबोते ।।
बारहि बार मथे मदराचल,
सागर ही महि जाय समाते ।
कच्छप के अवतार लिये प्रभु,
ले मदराचल पीठ उठाते ।।6।। धर्म बचावन को जग में प्रभु ........
..
है निकलेे जब दिव्य सुधा घट,
देख सुरासुर है ललचाते ।
छेड़त लूटत धावत भागत,
दैत्य सुधा घट लूट भगाते ।।
पार नही जब देवन पावत
टेर लगा प्रभु आप बुलाते ।
मोहनि के अवतार लिये प्रभु
देव सुधा तुम पान कराते ।।7।। धर्म बचावन को जग में प्रभु ........
तीनहु लोकहि जीत जबे बलि
अश्वहि मेघहि यज्ञ कराते ।
वामन के अवतार लिये प्रभु
यज्ञहि मंडप में तुम आते ।।
मांग किये पग तीन धरा तुम
रूप  विराट धरे जग व्यापे ।
दो पग में धरनी नभ नापत,
ले बलि को हि पताल पठाते ।।8।। धर्म बचावन को जग में प्रभु ........
रावण पाप बढ़े जब व्यापक
देव धरा सब व्याकुल रोते ।
दारूण त्राहि करे जब देवन,
राम धनुर्धर आपहि आते ।।
वानर भालु लिये प्रभु संगहि,
रावण को तुम मार गिराते ।
मानव के मरजाद रचे प्रभु,
मानव को तुम कर्म सिखाते ।।9।। धर्म बचावन को जग में प्रभु ........
राक्षस कंस डहे जब द्वापर
लोग सभी अति कश्टहि पाते ।
देव मुनी जब टेर लगावत,
श्याम मनोहर हो तुम आते ।।
बाल चरित्र किये अति पावन,
ले मुरली मुख धेनु चराते ।
आपहि माखन चोर कहावत,
गोपन ग्वालिन को हरशाते ।।10।।धर्म बचावन को जग में प्रभु ........
प्रेम सुधा ब्रज में बरसावत
ग्वालन संगहि रास रचाते ।
पाप मिटावन कंसहि मारत
धर्म बचावन षंख बजाते ।।
अर्जुन के रथ हाकत आपहि,
ज्ञान सुधा प्रभु पान कराते ।।11।।धर्म बचावन को जग में प्रभु .

-रमेशकुमार सिंह चौहान
नवागढ़जिला-बेमेतरा छ.ग.

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जयप्रकाश भाटिया

होली है,

आओ मिल कर खेलें होली ,रंग बिरंगी प्यारी होली,

प्यार और इकरार की होली, मस्ती और बहार  की होली।

साली को भी इंतज़ार है ,कब जीजा रंग लगाएगा ,

चंदू करता इंतज़ार कब भोला भंग पिलाएगा,

देवर लेकर के पिचकारी ,भाभी पीछे भागा  है,

देर से उठने वाला पप्पू सुबह सुबह ही जागा है ;

कहीं है बर्फी कहीं हैं लड्डू ,कोई गुजिया का मतवाला है,

आज कहीं कोई गैर नहीं है , हर कोई दिल वाला है ,

यारों की टोली ने भी देखो घर घर धूम मचाई  है,

नयी नवेली दुल्हन सी ,चन्दरी चाची शरमाई है,

शर्मा वर्मा  राजू सोनू, रंग रंगीले झूम रहे हैं,

नटखट बच्चे ले गुब्बारे बचने वालों पर टूट रहे हैं,

आओ ऐसे खेले होली-

जैसे कृषण  राधा की होली,

जैसे ग्वाल गोपीयों की होली,

रंग अबीर गुलाल की होली,

धमाल और धूम मचाती होली,

होली को न हुड दंग बनाओ,

प्यार से सबको गले लगाओ,

सभी ग़मों को भूल के यारो,

होली में अपना रंग जमाओ ,

आओ साथियों  घर से निकलो, आई होली की टोली है,

रंग में कोई भंग न डालो, बुरा ना  मानो  होली है,

सादर प्रणाम ----जय प्रकाश भाटिया

---

देवेन्द्र सुथार

 

 

आजकल की आफत

आजकल बेटा बाप से ज्यादा इंटेलिजेँट हो रहा है।
अमीरोँ का काम आजकल अर्जेन्ट हो रहा है।
यह देखकर तो गरीब बेचारा आजकल साइलेँट हो रहा है।
रिश्वत देकर आजकल काम भी हैण्ड-टू-हैण्ड हो रहा है।
भ्रष्टाचार के युग मेँ आजकल ईमानदार सस्पैँड हो रहा है।
प्रदूषण को भी मापे तो आजकल वो शाम के समय हण्ड्रेट परसेँट हो रहा है।
बढती चोरी-डकैती का धंधा भी मानो आजकल परमानेँट हो रहा है।
आरक्षण के कारण आजकल इंटेलिजेँट का मन भी इनोसेँट हो रहा है।
ऐसे मेँ मैँ कैसे कह दूं कि आजकल भारत मेँ डवलपमेँट हो रहा है।
--
 बेटियां
बहुत चंचल, बहुत खुशनुमा सी,
होती है बेटियां।
नाजुक सा दिल रखती है,
मासूम सी होती है बेटियां।
बात-बात पर रोती है,
नादान सी होती है बेटियां।
रहमत से भरपूर तो,
खुदा की नियामत है बेटियां।
अजीब सी तकलीफ होती है,
जब दूसरे घर जाती है बेटियां।
घर लगता है सुना-सुना
कितना रुला के जाती हैँ बेटियां।
खुशी की सी झलक और
बाबुल की लाडली होती हैँ बेटियां,
यह तो रब कहता है कि जब मैँ
बहुत खुश होता हूं,
तो दुनिया मेँ जन्म लेती है बेटियां।
जिँदगी मेँ आने से पहले ही,
दो घर सुधारती है बेटियां।
सच माने तो दुनिया इसी ने रची है,
हकीकत जाने तो बेटियोँ से जहां मेँ रवानगी है।

-देवेन्द्र सुथार,बागरा,जालौर।

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