रविवार, 22 फ़रवरी 2015

विनीता शुक्ला की कहानी - मुंगेरी

मुंगेरी

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-विनीता शुक्ला

उस दिन जनपथ पर विचरते हुए, हम ‘गंजिंग’(लखनऊ के हजरतगंज एरिया में भ्रमण को, गंजिंग कहा जाता था) का भरपूर आनन्द ले रहे थे. मेरे साथ, मेरी प्रिय सहेली शिखा थी. मौसम सुहाना...उस पर हल्की- फुल्की बूंदाबांदी! पहले चिकेन- वर्क के कुरते खरीदे; फिर कड़क चाय के साथ, गर्मागर्म पकौड़ों का लुत्फ़ उठाया. शाम को एक रिसेप्शन में जाना था; लिहाजा कोई न कोई गिफ्ट भी देखनी थी. दुकानों पर मगजमारी के बाद भी, कुछ हाथ न लगा. हम दुविधा में थे. इलेक्ट्रॉनिक के सामान, टी- सेट, शो- पीस- सब खंगाल डाले, किन्तु मनमुताबिक तोहफा न ढूंढ सके...“वल्लरी...देख तो!” शिखा टोहका मारकर बोली. “क्या रे?!” बादलों की ‘स्कैनिंग’ करते हुए मेरी आंखें, दिग्भ्रमित सी थीं. मैंने हकबकाकर इधर उधर देखा. कुछ न समझ पाने का असमंजस, मेरे चेहरे पर झलक आया. शिखा को खीजकर, हाथ से इशारा करना पड़ा. इंगित दिशा में देखा तो आँखें चौड़ी हो गयीं.

वहां एक भव्य शो- रूम था. पारदर्शी दीवारों से जो झलक रहा था- उस पर एकबारगी यकीन करना मुश्किल था. शानदार कोच पर पसरी हुई स्त्री...हाथों में फाइल और उसके समक्ष नतमस्तक से खड़े मुलाजिम. मुलाजिमों की वर्दी पर, शो- रूम का नाम स्पष्ट रूप से अंकित...स्त्री उन्हें डपटती हुई सी लग रही थी. उत्तेजना में मेरी चीख ही निकल पड़ती! “मुंगेरी!!!” मेरे मुख से हठात, बस यही एक बोल फूट सका. ‘मुंगेरीलाल’ की- ‘फीमेल- वर्जन’ और इस ‘गेट अप’ में...नामी शो- रूम की सूत्रधार! हमें मानों २५० वोल्ट का झटका लग गया था!! बेसाख्ता ही मन, ‘फ़्लैश- बैक’ में जा पंहुचा. कॉलेज का पहला दिन. हमने बी. कॉम. प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था. कंप्यूटर- लैब के सामने ही, क्लास थी हमारी.

छात्र- छात्राएं आपस में, परिचय- सूत्र जोड़ते हुए ...’कहाँ से पास- आउट हो’....’तुम्हारा घर तो फलाने कॉलेज के पास है, फिर इधर कैसे?’...’ गोइंग फॉर सी. ए. ?’...’तो फिर कौन सी कोचिंग ज्वाइन की?’ वगैरा, वगैरा. इतने में मुंगेरी प्रकट हुई. बड़ी अदा से हाथ नचाकर बोली, “यहाँ तो बस टाइम पास है...मुझे तो भई, आई. आई. एम. के एग्जाम में बैठना है; इससे कम तो मैं- सोचती ही नहीं” चित्र- विचित्र वेशभूषा वाली, बड़बोली लड़की ने, हठात ही ‘जनता’ को चौंका दिया. सभ्यता के लिहाज़ से, लोग खुलकर तो न हँसे; लेकिन एक –दूजे को देख, मुस्करा जरूर दिए. इधर मुंगेरी उर्फ़ सविता शर्मा बकती रही, किसी की परवाह किये बिना. मुझसे रहा न गया. उसे खींचकर भीड़ से दूर ले गयी, “यह क्या बकबक है रे? इतनी बड़ी- बड़ी क्यों हांक रही है?!”

‘देख वल्ली ...पहले तो मैं एम. बी. ए. के बारे में, सीरियस नहीं थी; लेकिन शैलेश भैय्या! अरे वही- जो मेरे ताऊजी के लड़के हैं... मुझे प्रोवोक कर दिया. कहने लगे, “तुम लड़कियां कॉमर्स ऑप्ट तो कर लेती हो लेकिन टीचिंग से बेहतर, कोई करियर... फाइनली तुम्हारे हाथ नहीं लगता ...सिम्पली वेस्ट ऑफ़ टाइम एंड एफर्ट!”

“ लेकिन सवि, किसी के प्रोवोक करने से तू क्यों प्रोवोक होती है? शैलेश भैया के पापा- तेरे ताऊजी, ठेकेदारी से अच्छा, कमा लेते हैं. उनकी बात दूसरी है...बी प्रैक्टिकल सविता. तू ही बता - आई. आई. एम. और आई. ए. एस. की कोचिंग, अफोर्ड कर पाना आसान है?!”

“तूने सुना है- फर्स्ट इम्प्रैशन इज द लास्ट इम्प्रैशन...पहले से रुआब जमाकर रखो तो सब दबे रहते हैं. जहाँ ढील दी, सर पर सवार!”

“लो सुन लो इनकी! यहाँ कौन सा इम्प्रैशन मारने का कम्पटीशन हो रहा था जो तू...”

“तूने देखा नहीं वल्लरी, यहाँ ज्यादातर रईसजादों और रईसजादियों ने एडमिशन लिया है. आज नहीं तो कल, दे विल ट्राई टु डॉमिनेट अस. इसके पहले कि वे हमपे चढ़ बैठें, हमें...”

“ तू हमेशा निगेटिव ही क्यों सोचती है?! चल तुझे शिखा से मिलाती हूँ. बड़ी बिज़नेस फॅमिली से है...पर कितनी पोलाइट, कितनी सोबर!!” मैंने उकताकर उसकी बात, बीच में ही काट दी. “कुछ दिन बीतने दे...उसे अपनी ‘केंचुल’ से बाहर आते देर नहीं लगेगी” सविता के स्वर में कड़वाहट घुल गयी थी. मुझे चिढ़ हो आई. बहस करने का मन न हुआ. सवि को मानों, हठधर्मिता से प्यार था. अपने आगे वह किसी की न सुनती. कहासुनी के चलते, उसके ‘विचित्र परिधान’ के बारे में, पूछ न सकी. बाद में जाना कि किसी नकचढ़ी पड़ोसन ने उसे उकसा दिया था. वह उसे अपनी, डिज़ाइनर- ड्रेसें दिखा- दिखाकर, जलाती रहती. पड़ोसन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए, यह ‘अद्भुत’ पोशाक सिली गयी.

पोशाक की डिज़ाइन, जयप्रदा, माधुरी और श्रीदेवी के आउटफिट्स से ‘इन्फ्लुएंस्ड’ होकर, ‘अडॉप्ट’ की थी. तीनों की स्टाइल, एक ही ड्रेस में- चूं- चूं के मुरब्बे वाली तर्ज़ पर... ‘फनी’ तो लगना ही था! सविता के अजब- गजब आइडियाज़ से झल्लाकर, मैं अक्सर उससे उलझ पड़ती. फिर भी उसकी सनक, जस की तस. नकल न करके यदि वह, अपनी अक्ल से ड्रेस बनाती- तो कहीं अच्छी बना पाती. वह इस कला में माहिर जो थी. पर उसे तो पड़ोसन की बराबरी करनी थी! तंग आकर धीरे धीरे, उसे उसके हाल पर छोड़ दिया. समय बीतता जा रहा था. सवि के क्लास में, कभी कभार ही दीदार होते. आते ही वह, शान झाड़ने लगती कि अमुक- अमुक टीचरों से उसकी पहचान है. प्रायोगिक परीक्षाओं के लिए, क्लास अटेंड करने की जरूरत नहीं. उसे कभी भी कंप्यूटर पर, अभ्यास करने की अनुमति मिल सकती थी. हम जानते थे कि एक हद तक उसकी बात सही थी. कम्प्यूटर सर से, थोड़ी बहुत जान- पहचान, उसकी जरूर थी. फिर भी लिखित परीक्षा हेतु, सहायता व मार्गदर्शन दोनों चाहिए थे.

घर की बड़ी बेटी होने के कारण, वह परिवार की जिम्मेदारी, उठाये हुए थी. पिता की पेंशन से काम न चलता; सो घर के बरामदे से ही, सिलाई-क्लास चलाती थी. उससे लगे छोटे कमरे में, अपना एक बुटीक भी खोल लिया था. सिलाई बुनाई में वह, अपनी मां की तरह ही पारंगत थी, इसलिए धंधा चल निकला. मैंने उसे कई बार समझाने की कोशिश की कि बी. कॉम. से बेहतर, उसके लिए फैशन डिजाइनिंग रहता. लेकिन वह कहाँ सुनने वाली थी! उसे तो शैलेश भैय्या और दूसरे कजिन्स को, शैक्षिक योग्यताओं में मात देनी थी!! दिखावा करना और बड़े बड़े ख्वाब देखना, उसकी आदत में शुमार थे- लिहाजा कॉलेज में वह, मुंगेरी के नाम से; मशहूर हो गयी.

धीरे धीरे समय बीतता गया. कंप्यूटर प्रैक्टिकल्स के लिए उसे, मन मारकर कॉलेज आना ही पड़ता. उसका ‘शो– ऑफ’, उन गिने चुने मौकों पर भी जारी रहता. यूँ तो वह खासी लापरवाह थी पर एग्जाम के जब तीन ही महीने बचे तो वह आसमान से जमीन पर आने लगी. पढ़ाई को लेकर थोड़ा गंभीर हुई, “देख वल्लरी, तू तो स्कूल के दिनों से ही मेरे साथ है...इसलिए अपनी प्रॉब्लम सिर्फ तेरे से ही कह सकती हूँ”

“हाँ हाँ बोल...” “देख...घर की प्रोब्लेम्स के कारण, कॉलेज कम ही आ पाती हूँ- ये तेरे से बेहतर कौन जान सकता है” “ भूमिका बाँधने की जरूरत नहीं सवि...मतलब की बात कर...कम टु द पॉइंट- फ़ास्ट!” “वल्ली, मेरे को कोर्स का, कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा है...अब तक, सेकंड हैण्ड किताबें ही खरीद सकी हूँ; गाइड्स, मेड इजी या नोट्स...अगर कहीं मिल सकें- आई बैडली नीड, देट काइंड ऑफ़ स्टफ” “सवि नोट्स तो मैं बनाती नहीं. बुक में ही, आंसर्स अंडरलाइन कर लेती हूँ...या फिर रफ़ नोट बुक में, एकाध पॉइंट नोट कर लेती हूँ; और तू तो जानती है- मेरी हैण्डराइटिंग तो भगवान भी समझ नहीं सकते!!” “तब क्या करूं??” “लेट मी थिंक...अरे हाँ! शिखा को उसके कजिन से कुछ हेल्प मिली है...मैं उससे लेकर, कुछ पेपर्स फोटोकॉपी करवा लूंगी...और तुझे दे दूंगी”

“थैंक्स यार...लेकिन फोटोकॉपी के पैसे” उसने झिझकते हुए पूछा. सविता का हाथ बहुत तंग था; यह बात मुझसे छुपी न थी. “कम ऑन सवि...मुझे इतना छोटा मत बना” उसे झिझक से उबारने के लिए, मुझे कहना पड़ा. “सब प्रोब्लेम्स का एक ही सलूशन- अपना एक बॉय फ्रेंड बनाओ और उससे सारे काम निकलवाओ” पास खड़ी हरिता ने जोरों से कहा. हरिता की बात सुन, दूसरी लड़कियां भी उधर आ गयीं...उनके साथ शिखा भी थी. “व्हाट यार?!” शिखा ने हल्के फुल्के मूड में पूछा. “मैंने इससे कहा कि नोट्स चाहियें तो कोई अच्छा सा बॉय फ्रेंड ढूंढो” हरिता, सविता की टांग खींचने पर आमादा थी. उसकी इस बात पर, सब कन्याओं के साथ, शिखा भी हंस पड़ी. सवि का चेहरा लाल हो गया. उसने झट पलटवार किया, “तेरी तरह आवारा नहीं हूँ हरिता! शरीफ घर की हूँ...और तू शिखा- मेरा मजाक बनाएगी...तेरी इतनी औकात??! बड़ी नोट्स वाली बनती है... नहीं चाहिए तेरे नोट्स!!”

“हाँ हाँ जा...शिखा के साथ बदतमीजी करने का, तुझे कोई हक नहीं! बिना बात अकड़ रही है... स्टाइल कहीं और जाकर मार!!” शिखा का अपमान, मुझसे सहन नहीं हुआ तो मैं पुराने सम्बन्धों को ताक में रखकर, सवि से झगड़ पड़ी. वह रुंआसी होकर, पैर पटकते हुए चली गयी. मामला शांत होने पर, मेरी स्थिति अजीब सी थी. एक तरफ सविता की सहायता न करने की ग्लानि और दूसरी तरफ मेरा अपना अहम्. माजरा समझने के बाद, शिखा ने भी कहा, “मुंगेरी बेचारी जरूरतमन्द है...तुम उसे मेरे नोट्स दे दो...आई डोंट माइंड हर एरोगेन्स” “नहीं शिखा”; इस बार मैं अड़ गयी थी, “वो जरूरत से ज्यादा रूड हो गयी है...शी इज नॉट अ बेबी...उसका बचकाना व्यवहार, अब सहन नहीं करूंगी. देयर इज़ अ लिमिट टु एवरीथिंग”

बात आयी गयी हो गयी. हम एग्जाम की तैय्यारियों में, व्यस्त रहने लगे. सवि के बारे में चिंता करना, मेरे लिए प्राथमिकता पर होता था; किन्तु इस घटना के बाद, वह मेरे दिल और दिमाग- दोनों से उतर गयी. मुझे लगा कि सविता, इस साल ड्राप ही कर देगी- क्योंकि उसकी तैय्यारी जीरो थी. हमारी अंतिम मुलाक़ात में उसने, जाते जाते कहा भी था, “मुझे ये बकवास एग्जाम नहीं देना...यह तो तुम आर्डिनरी लड़कियों के लिए है. ग्रेजुएट होकर, कौन सा कद्दू में तीर मार लोगी?!” लेकिन एग्जाम के पहले ही दिन, उसके ‘श्रीमुख’ के दर्शन हुए. मैंने उसे देखकर भी, अनदेखा कर दिया. संयोग से वह मुझसे एक ही सीट आगे बैठी थी. पेपर शुरू होने के पहले, वह पीछे को मुड़ी और मुझ पर तीखी नज़र डालते हुए बोली, “वल्लरी मेरी आंसर- शीट में, तांक –झाँक मत करना...बताये देती हूँ”

सुनते ही मेरे मन में, आग सी लग गयी. भला उसे आता ही क्या था- जो मैं उसकी नकल उतारती?! उसे कुछ कड़वा जवाब देने ही वाली थी कि पेपर बंटने लगे और मुझे अपनी जबान सी लेनी पड़ी. क्वेश्चन- पेपर मिलने पर मैंने, सवि को सरसरी निगाह से देखा और फौरन उधर से ध्यान हटा लिया. इधर मैं सवालों के जवाब लिखने में मशगूल थी और उधर इनविजलेटर सर, कमरे का दौरा कर रहे थे. पांच में से तीन प्रश्नों का उत्तर ही लिख पायी थी कि सर की गर्जना सुनाई दी, “ए लड़की...हाँ तुम! शो मी योर आंसर शीट” यह क्या...वे तो सविता को ही सम्बोधित कर रहे थे!! मुझे विश्वास न हुआ; पल भर को सवि, उत्तर- पुस्तिका कांख में दबाए रही; फिर सर की धमकी से डरकर, उन्हें थमा दी.

“व्हाट इज दिस...?” उन्होंने कॉपी से नकल के खर्रे निकाल, हवा में लहराए, “यू थिंक, यू कुड फूल मी सो इजिली...आउट!... आई से गेट आउट!!” इनविजलेटर के रौद्र रूप को देख, सविता की आँखें छ्लछला उठीं और वह तीर की तरह, बाहर निकल गयी...और मैं?! मेरा तो हाल बेहाल सा था! मन ही मन सवि की हालत की जिम्मेवार, स्वयम को ही मान रही थी. उसे पढ़ाई में मदद की जरूरत थी और मैं अपना ईगो लेकर बैठ गयी!! लेकिन फिलहाल तो मुझे, पेपर पूरा करना था. किसी तरह खुद को सहेजा और लिखने बैठ गयी.

उस दिन एग्जाम हॉल से निकलकर, सीधे घर चली आई. अपराध- भावना के तहत, सबसे आँखें चुराती फिरी. जैसे तैसे एग्जाम खत्म हुए. अच्छे नम्बरों से पास होने की, मुझे जरा भी ख़ुशी नहीं हुई. ‘मुंगेरी का एपिसोड’ खत्म हो गया; तो भी उससे उबर न पायी. अतीत को, एक ही झटके में जी लेने के बाद; शिखा और मेरी मनःस्थिति, सामान्य नहीं थी. ठंडी आह भरकर मैंने शिखा से कहा, “चल यहाँ से चलें...कहीं वो हमें देख न ले” और फिर वही हुआ, जिसका मुझे डर था! उसने वाकई हमें देख लिया था. और फिर...! सब कुछ भूलकर, वह दौड़ी चली आई और मुझे प्रगाढ़ आलिंगन में बाँध लिया. जबरन हमें अपने शो- रूम खींच ले गयी और फिर शानदार खातिरदारी की हमारी. तले काजू, कोल्ड- ड्रिंक, समोसे, लड्डू...वगैरा वगैरा.

मेरा बुझा चेहरा देखकर बोली, “वल्ली, व्हाई आर यू लुकिंग सो डल...पता है, तू बीती बातों को लेकर दुखी है; छोड़ भी...मिट्टी डाल उन पर! वह सब तो मैं, कबका पीछे छोड़ चुकी. जीवन में आगे बढ़ने के लिए, अतीत को पीछे छोड़ना होता है- तू ही तो कहती थी! कितनी बार समझाया था तूने कि मुंगेरीलाल के हसीन सपने मत देख, पर मैंने एक न सुनी!! उस दिन एग्जाम हॉल में पकड़े जाने के बाद...!” उसकी जबान थोड़ी लड़खड़ाई, पर जल्द उसने, अपने को सम्भाल लिया, “उस दिन तेरा ही ख्याल, मन में घूम रहा था...तू इतनी पक्की सहेली जो थी! उस दिन लगा- तू सच कहती थी. ख़्वाबों के पंख आसमान तक, तभी पसारो- जब तुम्हारे पैर जमीन से जुड़े हों... काम से फुर्सत नहीं मिलती थी; इसलिए फैशन डिज़ाइनिंग का, पार्ट- टाइम कोर्स जॉइन कर लिया. फाइनेंसियली स्टेबल होने पर, ग्रेजुएशन भी किया- एज अ प्राइवेट कैंडिडेट. धीरे धीरे अपने पसंदीदा करियर में, राइज करती गयी...तेरी बहुत याद आती थी; यू ओनली इंस्पायर्ड मी, टु गो फॉर देट!”

आगे कुछ कहने की जरूरत न थी. हम निशब्द थे. हाथों में हाथ...और मन की गांठें- एक एक कर, खुलती हुईं!!

*****

 

नाम- विनीता शुक्ला

शिक्षा – बी. एस. सी., बी. एड. (कानपुर विश्वविद्यालय)

परास्नातक- फल संरक्षण एवं तकनीक (एफ. पी. सी. आई., लखनऊ)

अतिरिक्त योग्यता- कम्प्यूटर एप्लीकेशंस में ऑनर्स डिप्लोमा (एन. आई. आई. टी., लखनऊ)

कार्य अनुभव-

१- सेंट फ्रांसिस, अनपरा में कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य

२- आकाशवाणी कोच्चि के लिए अनुवाद कार्य

सम्प्रति- सदस्य, अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, लखनऊ

 

प्रकाशित रचनाएँ-

१- प्रथम कथा संग्रह’ अपने अपने मरुस्थल’( सन २००६) के लिए उ. प्र. हिंदी संस्थान के ‘पं. बद्री प्रसाद शिंगलू पुरस्कार’ से सम्मानित

२- ‘अभिव्यक्ति’ के कथा संकलनों ‘पत्तियों से छनती धूप’(सन २००४), ‘परिक्रमा’(सन २००७), ‘आरोह’(सन २००९) तथा प्रवाह(सन २०१०) में कहानियां प्रकाशित

३- लखनऊ से निकलने वाली पत्रिकाओं ‘नामान्तर’(अप्रैल २००५) एवं राष्ट्रधर्म (फरवरी २००७)में कहानियां प्रकाशित

४- झांसी से निकलने वाले दैनिक पत्र ‘राष्ट्रबोध’ के ‘०७-०१-०५’ तथा ‘०४-०४-०५’ के अंकों में रचनाएँ प्रकाशित

५- द्वितीय कथा संकलन ‘नागफनी’ का, मार्च २०१० में, लोकार्पण सम्पन्न

६- ‘वनिता’ के अप्रैल २०१० के अंक में कहानी प्रकाशित

७- ‘मेरी सहेली’ के एक्स्ट्रा इशू, २०१० में कहानी ‘पराभव’ प्रकाशित

८- कहानी ‘पराभव’ के लिए सांत्वना पुरस्कार

९- २६-१-‘१२ को हिंदी साहित्य सम्मेलन ‘तेजपुर’ में लोकार्पित पत्रिका ‘उषा ज्योति’ में कविता प्रकाशित

१०- ‘ओपन बुक्स ऑनलाइन’ में सितम्बर माह(२०१२) की, सर्वश्रेष्ठ रचना का पुरस्कार

११- ‘मेरी सहेली’ पत्रिका के अक्टूबर(२०१२) एवं जनवरी (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१२- ‘दैनिक जागरण’ में, नियमित (जागरण जंक्शन वाले) ब्लॉगों का प्रकाशन

१३- ‘गृहशोभा’ के जून प्रथम(२०१३) अंक में कहानी प्रकाशित

१४- ‘वनिता’ के जून(२०१३) और दिसम्बर (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१५- बोधि- प्रकाशन की ‘उत्पल’ पत्रिका के नवम्बर(२०१३) अंक में कविता प्रकाशित

१६- -जागरण सखी’ के मार्च(२०१४) के अंक में कहानी प्रकाशित

१८-तेजपुर की वार्षिक पत्रिका ‘उषा ज्योति’(२०१४) में हास्य रचना प्रकाशित

१९- ‘गृहशोभा’ के दिसम्बर ‘प्रथम’ अंक (२०१४)में कहानी प्रकाशित

२०- ‘वनिता’, ‘वुमेन ऑन द टॉप’ तथा ‘सुजाता’ पत्रिकाओं के जनवरी (२०१५) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

२१- ‘जागरण सखी’ के फरवरी अंक में कहानी प्रकाशित

पत्राचार का पता-

टाइप ५, फ्लैट नं. -९, एन. पी. ओ. एल. क्वार्टस, ‘सागर रेजिडेंशियल काम्प्लेक्स, पोस्ट- त्रिक्काकरा, कोच्चि, केरल- ६८२०२१

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