विनीता शुक्ला की कहानी - रक्तबीज

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रक्तबीज - विनीता शुक्ला अम्मा की खांसी, बेहिसाब बढ़ गयी. कैंसरग्रस्त फेफड़े, साँसों का बोझ नहीं सह पा रहे थे. “अकास बचवा, तनी हियाँ आवो” शब...

रक्तबीज

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- विनीता शुक्ला

अम्मा की खांसी, बेहिसाब बढ़ गयी. कैंसरग्रस्त फेफड़े, साँसों का बोझ नहीं सह पा रहे थे. “अकास बचवा, तनी हियाँ आवो” शब्दों को किसी भाँति ठेलकर, उन्होंने गुहार लगाई. उनका सामना करने की हिम्मत, बच्चे में कहाँ थी... उस कातर पुकार ने, फिर भी, उसे उनकी तरफ खींच लिया. मरणासन्न अम्मा के समक्ष, वह फूटफूट कर रोने लगा. उसे रोता देख, वे भी विचलित हो उठीं. आकाश उनके पैरों में, सर छुपाकर बैठ गया. सहसा दरवाजे पर आहट सी हुई. रुग्ण अम्मा की देह में, न जाने कहाँ से, इतनी ताकत आ गयी कि वे उठ बैठीं. आकाश विस्मित हुआ. आगन्तुक को उन्होंने, इशारे से भीतर बुलाया. झरोखे से परावर्तित हो पसरी, वृक्ष- छायाओं में, कोई मानवाकृति उभर आई.

आगंतुक का चेहरा अस्पष्ट सा था. जब वह अम्मा से बात करने को झुका तो खिड़की से छनता प्रकाश उसके मुख पर पड़ा. जाने क्यों उसे देख, अकुलाहट होने लगी. जिस ठसक के साथ, वो अंदर घुसा और बिस्तर से लगी कुर्सी पर बैठा- वह आकाश को हजम नहीं हुआ. एक अनजान का आना और उन बेचैन लम्हों का हिस्सा बनना, कुछ अजीब लगा. अम्मा ने कांपते हुए, उस व्यक्ति का हाथ, उसके हाथ पर रख दिया. आकाश की तीसरी इन्द्रिय, सक्रिय हो उठी...मन आशंका से डोल गया! अम्मा फंसे हुए गले से किसी भाँति, इतना ही बोल पायीं, “बचुआ ई तोहरे बापू...सुखराम” आकाश को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. अम्मा के पति यानी उसके पिता तो, बरसों पहले ही चल बसे थे...फिर ये नया किरदार?! यूँ अचानक...जीवन में उसकी घुसपैठ??!!

और उस घुसपैठ के साथ ही, अम्मा ने आँखें मूँद लीं- सदा के लिए!!! रहस्य खुला. रहस्य की परतों के साथ ही, कुछ बेरहम सच्चाइयाँ भी... वो कहाँ जानता था कि वह प्रौढ़ स्त्री, उसकी मां नहीं, बल्कि नानी थीं! कौन बताता उसे?! नानी मां के इक्का- दुक्का रिश्तेदार ही थे- जो उधर आते – जाते रहते. वे भी सिखाये –पढ़ाये ‘पट्टू’ की तरह एक ही बात दोहराते, “बुढापे की औलाद रहा हमार अकसवा... बाप के दरसन नाहीं पावा. बहुत छोट रहा, जब एहिके बप्पा सरग सिधारे. ओहिकी कउनो बात, याद नाहीं आवत एहिका” ...और फिर... कितने ही क्रूर रहस्य, एक के बाद एक, बेपर्दा होते रहे.

अपने ‘तथाकथित’ पिता के साथ, वह उनके गाँव तक गया. नइकी अम्मा से वहीं मिला. उसकी सगी मां की मौत के बाद; नइकी अम्मा उर्फ़ कजरी, बापू के जीवन में आई थी. उनके नैहर वाले, वहां अपना साम्राज्य जमाए थे. उसकी दिवंगत मां के बारे में अनाप- शनाप बकते रहते, “ऊ तो एकदम्मै बैलान(पागल) रही...तबहिन कुआं मां, छलांग मार दिहिस” “का जानी कसक बुद्धि रही...आपन बेटवा का भी, बिचार नाहीं कीन्हा”... वहां लोगों ने जो कुछ बताया, उसके अनुसार- आकाश की मां महुआ, एक पागल औरत थी जो धोखे से, सुखराम को ब्याह दी गयी. डेढ़ साल के बेटे के बाद, जब वह पुनः गर्भवती हुई; किसी कारण से उसका गर्भपात हो गया. इसके चलते पागलपन बढ़ता गया...और एक दिन...उसने कुँए में कूदकर, अपनी जान दे दी. बस एक ही स्त्री थी, जो इन बातों के खिलाफ थी. अर्धविक्षिप्त सी वह स्त्री, रिश्ते में आकाश की बुआ लगती थी.

उसने उसे एकांत में बुलाकर, एक पिटारी दी. पिटारी पर, मोटा ताला लगा था. बोली “ई तोहरी अम्मा की आख़िरी निसानी अहीं. तोहरे बापू का दिहैं खातिर, धरी रही...मुला सुखराम को ईसे, कउनो लेना देना नाहीं...तुमहीं ईका रख लिहौ” आकाश समझ नहीं पाया कि उसका क्या करे. बरसों से पिटरिया, यूँ ही बेकार पड़ी थी. इसी से कुंजी भी नदारद हो गयी. तो भी आकाश ने, उसको अपने सामान में छुपा लिया- जाने, किस मोह के चलते! इधर सुखराम बेटे को, सालों बाद पाकर निहाल थे. उनकी दूसरी पत्नी, केवल बेटियाँ जन सकी; बेटे की तो बात ही दूसरी थी! जो भी हो; सुखराम उसको १५ वर्ष की संवेदनशील उमर में, सौतेली मां से दूर रखना चाहते थे; लिहाजा वीरगंज के बोर्डिंग में डाल दिया.

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वीरगंज के फटीचर बॉयज हॉस्टल में, मेस भी वैसी ही फटीचर थी. उस पर तुर्रा ये कि रसोइयाँ भी छुट्टी पर गया था! आकाश झुंझला उठा.. सामने सड़क बन रही थी. चिपचिपाते गर्म कोलतार का फैलाव और दैत्यनुमा रोडरोलर की गश्त. इसके चलते, आसपास के ढाबे भी बंद...सारी गतिविधियाँ ठप्प! पिछवाड़े एक परचून की दूकान जरूर थी और उससे लगे फुटपाथ पर, बासी-मुरझाई सी तरकारियों का ठेला. वहीँ से लाकर कोई तहरी बना रहा था; कोई मैगी से ही काम चला रहा था. सब कमरों में, हीटर चालू. हीटर पर, कामचलाऊ खाना बन ही जाता है. आकाश का तो हीटर भी खराब था! लगता था कि रूखी ब्रेड पर जैम लगाकर ही काम चलाना पड़ेगा.

“आकाश...! ज़रा सुनो तो बॉस...” ‘क्या रे?!!” उसने खीजे हुए अंदाज़ में कहा. “अरे हजूर, हम तो आपको ऑमलेट और बिरयानी का न्योता देने आये थे और आप हो के हमहीं पे गरम हो रहे हो” अमन की बात सुनकर, आकाश के तेवर कुछ ढीले पड़े; लेकिन मन में कुछ खटकने लगा. अमन जैसे खुदगर्ज और काइयाँ इंसान की, बेबात मेहरबानी?! जरूर दाल में कुछ काला था. तो भी स्वादिष्ट खाने का लोभ, उसे अमन के कमरे तक ले गया. वहां जाते ही, मेहरबानी की वजह पता चली. अमन को कंप्यूटर फॉर्मेट करना था और इस मामले में वह कच्चा था. जानकार आदमी को बुलाने के लिए, अच्छे- खासे पैसे लगते. टैक्सी का किराया- सो अलग.

और आकाश...वह तो कम्प्यूटर के, सब काम कर लेता था! उसे यह ज्ञान, परेश मामा से मिला था. शहर से परेश ही, उस ‘अजब गजब यंत्र’ को उठा लाये. उसके कस्बे में तो, वह ‘टेलीविज़न प्रजाति’ की मशीन दुर्लभ थी. जाने कैसे अमन को, उसके कंप्यूटर- कौशल का पता चला! अब सवाल था कि काइयां अमन का काम करना, ठीक रहेगा??? पर भूख के आगे, सारे तर्क हार गये. काम के उसे अच्छे दाम मिले- भरपेट सुस्वादु भोजन के साथ, अमन की मां के हाथ से बने, देसी घी के लड्डू भी. मन बाग़ बाग़ हो गया. रात के सवा नौ बजे, वह अपने रूम में पहुंचा. आँखें भारी हो रही थीं पर नींद पास तक न फटकी. सोचने लगा- ‘कैसी होगी अमन की मां, जो ममता से स्वाद भरे लड्डू बनाकर भेजती रहती है’

खुद अपनी मां को, उसने कभी नहीं देखा...उनकी तस्वीर तक न दिखाई किसी ने. अजब सा तिलस्म बुना है, वक्त ने- उनके वजूद के इर्द गिर्द. तिलस्म के उस जाल को, काटने की कोशिश में, हर बार...बस उलझ उलझ जाता है वो! आकाश सोच में था कि तभी अमन के रूम से, जोरों के ठहाके सुनाई पड़े. वह धीरे से उधर पहुंचा तो पाया कि दरवाजा बंद था. खिड़की से झाँका तो कंप्यूटर पर किसी अश्लील साईट के दृश्य दिखाई दिए. वह बड़बड़ाते हुए, उलटे पाँव वापस लौट आया. उसने सोचा था कि अमन का कंप्यूटर खाली रहने पर, कोई एजुकेशनल प्रोग्राम खोलकर देखेगा. लेकिन यहाँ माहौल, कुछ ऐसा खराब था...जैसे कि कुएं में भंग! उसने तय कर लिया कि दोबारा उधर का रुख नहीं करेगा.

अगले दिन, क्लास के लिए जाते हुए, विशाल ने उससे चुटकी ली, “क्यों जी...?! कमपूटर में रंगीन नजारे देखने ही थे तो कुण्डी खटकाते अऊर भीतर आ जाते...खिड़की से तांकझांक, काहे कर रहे थे” “वो नज़ारे तुमहीं को मुबारक हों...आइन्दा ऐसी बकवाद, हमसे न करना” आकाश के तेवर देख, विशाल भौंचक्का रह गया. संभलकर बोला, “अरे गुरूजी आप तो बुरा मान गये...आप देखो न देखो पर उस ‘बिगड़ैल डब्बे’- कमपूटर को साधना, आपहि जानते हैं” बात बदल दी गयी थी इसलिए आकाश गुस्सा भूलकर, आगे निकल लिया...विशाल जैसों से उलझना, उसे गवारा न था. पर सब कुछ, संकल्प के अनुसार कहाँ होता है! अमन से कोई वास्ता न रखने का संकल्प भी, जल्द ही टूट गया. स्कूल के एक प्रोजेक्ट के लिए, उसे अंतर्जाल में कुछ खोजना था. दूर तक, कोई साइबर कैफे भी नहीं था. झख मारकर, अमन के वहां जाना पड़ा.

ऐसा एक- दो बार और हुआ. परस्पर सम्पर्क बढ़ा. अमन की प्रदूषित सोच, उसके आस पास, कुंडली मारकर बैठ जाती. आकाश का मन भी चन्दन कहाँ था, जो उस विष से अछूता रहता! स्त्रियों को लेकर अमन का दुराग्रह, प्रबल था. उनकी बेहूदा तस्वीरें नेट पर ढूंढना और छींटाकशी करना- रोज का उसका शगल था. ऐसी संगत में, आकाश के भीतर, एक नारी- विरोधी मनोविज्ञान पनपने लगा. नानी वह स्त्री थी- जिसने पगली बेटी को, एक स्वस्थ पुरुष पर थोप दिया. अपने इस नाती को, बरसों भरम में रखा. यदि आज वह परिवारहीन है, एकाकी है तो उसका कारण भी एक स्त्री है...और वह स्त्री थी- उसकी अपनी मां! इसके चलते, उसको खुद से नफरत होती है...और कहीं न कहीं, उस पागल महुआ से भी!!

जिंदगानी का खेला!... जिसने उसको- उसकी जड़ों से अलग कर दिया...वह किसी का नहीं और कोई उसका नहीं. कहने को एक बाप है; वह भी, मतलबी संसार का हिस्सा!! अवसाद बढ़ता गया और विकृत मानसिकता वाले, अमन और विशाल से प्रगाढ़ता भी. ‘मसालेदार’ फ़िल्में देखना, नेट पर एडल्ट जोक्स पढ़ना; प्रतिबंधित डेटिंग साइट्स का लुत्फ़ उठाना, अक्सर ही होता. मन भटकने लगा...किशोरावस्था के हारमोन उफान मारने लगे. और एक दिन...उन सबने मिलकर, एक कुत्सित योजना बना ली! ‘एडवेंचर’ के लिए, कमसिन बाला चाहिए थी. शहर की बदनाम गलियों में, कितनी ही मिल सकती थीं; पर खुल्लमखुल्ला वहां जाने की, हिम्मत न थी.

विशाल की जान- पहचान, ‘वनिता- भवन’ के रसोंइए जगन से थी. ‘वनिता भवन’- अनाथ, बेसहारा लड़कियों की शरण- स्थली. ‘शिकार’ को बहला- फुसलाकर, वहां से ला सकते थे. जगन विशाल के गाँव से ही था; इसी से पता था- कि वह बला का लालची है. अब तो...उसकी मुट्ठी गर्म करनी थी बस्स! घर से किसी बहाने, पैसा भी आ सकता था; बाकी का जुगाड़ तो...’भाई लोग’ कर ही लेते!! ‘पहली फुर्सत’ में ही ‘काम’ की शुरुआत होनी थी. यानी छुट्टी के दिन. योजना के प्रथम चरण के तहत, वे लोग, जगन के क्वार्टर में गये; जो ‘वनिता भवन’ परिसर में ही था. बहेलिये का जाल कैसे और किस पर बिछाया जाए- यह भी सुनिश्चित करना था.

संयोग से उस दिन रक्षा- बंधन था...फोन पर माओं की हिदायतें- “बेटा राखी बाँधने का शुभ मुहूर्त, सबेरे नौ बजे से है. हाँ टीका लगाना मत भूलना...टीके के साथ अक्षत भी...”...लड़के कलाइयों में, बहन का रक्षा-सूत्र बांधे हुए. कैसी विडम्बना! वे जिस किसी के लिए, व्यूह रच रहे थे– उसमें भी कोई मां, कोई बहन छुपी हो सकती थी!! जगन के कमरे में, एक छुटकी, गदबदी सी लड़की, रंगबिरंगे धागे लेकर आई. उसकी गोद में एक नन्हा शिशु था जो उससे संभल नहीं रहा था और आधा नीचे को लटका था. आते ही चहककर बोल उठी, “जगन काका! आपकी कोई बहन नहीं...सो हमहीं आपके लिए राखी ले आये.

उसने पहले शिशु को जमीन पर लिटाया; फिर बड़ी ममता से, जगन सर पर रूमाल रखा, माथे पे टीका लगाया. चीनी का एक बताशा, उसके मुंह में डाला. इसी बीच बच्चा सप्तम सुर में, लगा रोने –चिल्लाने और जोर- जोर से, हाथ पैर पटकने. “आती हूँ बबुआ... राखी तुझे भी बांधनी है...जरा ठहर तो! उसने शिशु को, फिर से टांग लिया. जगन उसे नोट पकड़ाने लगा तो बोली, “नहीं काका नोट नहीं. बाद में चॉकलेट दिला देना...चॉकलेट तो हमरे बबुआ को भी बहुतै पसंद है” कहकर वह चुलबुली सी हंसी हंसी और जाने लगी. जाते जाते आकाश की सूनी कलाई देखी तो झट उस पर भी धागा बाँध दिया.

आकाश के मन में, ग्लानि की लहर दौड़ पड़ी. इस छोटी बच्ची में भी, इतनी इंसानियत है और वह! अपने साथियों के बहकावे में, कितनी नीच बात सोच रहा था!! जगन ने बताया, “इसकी बहन के साथ किसी ने जबरदस्ती की थी...वह सदमे से पागल हो गयी. उसका बच्चा भी ‘जबरदस्ती की औलाद’ है...बच्चे को छुटकी ही देखती है” ‘वनिता भवन’ के लॉन में, खेलती कूदती लड़कियों के बीच, वह अभागन बैठी हुई थी. स्याह आँखें...सूनी, पथराई दृष्टि, पेड़ों के झुरमुटों से लेकर- गगन के विस्तार तक भटकती. मन में शूल सा चुभा. इधर विशाल, अमन और जगन के बीच कोई दुरभि- संधि चल रही थी. एक गूंगी बहरी, मंदबुद्धि कन्या को ‘फांसने’ की तैयारी!!

आकाश का मन खट्टा हो गया. सबसे ज्यादा क्रोध उसे, जगन पर आया. एक तरफ बेसहारा बच्चियों का हिमायती बनता है...और दूसरी तरफ! हॉस्टल वापस जाकर, वह बिस्तर पर पड़ रहा. सर दर्द से फटा जा रहा था. तभी अलमारी के ऊपर, चूहा उछलकूद करने लगा. उसे सबक सिखाने के लिए, आकाश ने अलमारी को हिलाया ही था कि पिटारी धाड़ से नीचे गिरी और अपनेआप खुल गयी. उससे कुछ ऐसे दस्तावेज निकले, जिन्हें देख उसकी आँखें फटी रह गयीं!! यह तो उसकी मां के हाई स्कूल, इंटर के सर्टिफिकेट्स थे...साथ में प्राइवेट बी. ए. का फॉर्म भी. इसका मतलब...उसकी मां विक्षिप्त नहीं थी...झूठ कहते थे सब!!!

उनकी तस्वीरें भी कितनी सुंदर थीं- गरिमामयी, सौम्य...एक फोटो में संभवतः, उसे ही गोद में उठाये! मुख पर ममत्व के भाव...उन छायाचित्रों में दबा हुआ, एक कागज का पुर्जा. आकाश ने उसे उठाकर पढ़ा...और फिर! मानों आसमान गोल गोल घूम रहा था; धरती जड़ हो गयी थी; सारी कायनात सुन्न!! कागज के पुर्जे पर जड़े शब्द; ज्यों जलते हुए अंगार- “आकाश के बापू, इस जीवन में आप हमको नहीं समझ पायेंगे. आप तो बस, अपने भाई के कहे में है. आपको कितनी बार समझाने की कोसिस की, उनकी नजर हमपे ठीक नहीं; मगर हर बार पांसा उलटा पड़ा. वो आपको बहका ले गये. हमने चाहा था कि हमरे अकास की इक बहनिया हो. पर आपके भाई...उन्होंने सब नास कर दिया!! उस दिन हमसे ‘पकड़ापकड़ी’ के चक्कर में थे. हमरा पैर फिसला और...बिटिया पैदा होने के पहिले ही...!!

पनीली आँखों में धुंधलाते हुए अक्षर! महुआ नाम की वह औरत, बेटी चाहती थी पर सास उस पर गर्भ गिराने का दबाव डाल रही थी...एक क्रूर भ्रूण परीक्षण हुआ और बच्ची को गर्भ में ही मार देने की साजिश... उनके संयुक्त परिवार में, बेटियों की लम्बी फ़ौज थी...उन्हें बेटा ही चाहिए था. ’बैलान’(पगली) महुआ उनके विरोध में डटी रही- बेटी को, संसार में लाने कि मुहिम में...लेकिन! जेठ के आतंक से, वह जान दे बैठी थी!! अकेली दुकेली घर में रहते हुए, आबरू पर खतरा मंडराता था. आकाश सन्न था. वह गहरी सोच में जकड़ा, देख रहा था- वनिता भवन की छुटकी, अपने भांजे को गोद में टिकाये...उसकी अजन्मी बहन, दोनों हाथ फैलाकर उसे पुकारती हुई...छुटकी की पगलिया दीदी जोर जोर से चिल्लाती!! नहीं! वह उस विषैली परम्परा का, रक्तबीज नहीं बनेगा...वह आज ही वार्डेन से, अमन और विशाल के नापाक इरादे, कह डालेगा!!!

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परिचय -

नाम- विनीता शुक्ला

शिक्षा – बी. एस. सी., बी. एड. (कानपुर विश्वविद्यालय)

परास्नातक- फल संरक्षण एवं तकनीक (एफ. पी. सी. आई., लखनऊ)

अतिरिक्त योग्यता- कम्प्यूटर एप्लीकेशंस में ऑनर्स डिप्लोमा (एन. आई. आई. टी., लखनऊ)

कार्य अनुभव-

१- सेंट फ्रांसिस, अनपरा में कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य

२- आकाशवाणी कोच्चि के लिए अनुवाद कार्य

सम्प्रति- सदस्य, अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, लखनऊ

 

प्रकाशित रचनाएँ-

१- प्रथम कथा संग्रह’ अपने अपने मरुस्थल’( सन २००६) के लिए उ. प्र. हिंदी संस्थान के ‘पं. बद्री प्रसाद शिंगलू पुरस्कार’ से सम्मानित

२- ‘अभिव्यक्ति’ के कथा संकलनों ‘पत्तियों से छनती धूप’(सन २००४), ‘परिक्रमा’(सन २००७), ‘आरोह’(सन २००९) तथा प्रवाह(सन २०१०) में कहानियां प्रकाशित

३- लखनऊ से निकलने वाली पत्रिकाओं ‘नामान्तर’(अप्रैल २००५) एवं राष्ट्रधर्म (फरवरी २००७)में कहानियां प्रकाशित

४- झांसी से निकलने वाले दैनिक पत्र ‘राष्ट्रबोध’ के ‘०७-०१-०५’ तथा ‘०४-०४-०५’ के अंकों में रचनाएँ प्रकाशित

५- द्वितीय कथा संकलन ‘नागफनी’ का, मार्च २०१० में, लोकार्पण सम्पन्न

६- ‘वनिता’ के अप्रैल २०१० के अंक में कहानी प्रकाशित

७- ‘मेरी सहेली’ के एक्स्ट्रा इशू, २०१० में कहानी ‘पराभव’ प्रकाशित

८- कहानी ‘पराभव’ के लिए सांत्वना पुरस्कार

९- २६-१-‘१२ को हिंदी साहित्य सम्मेलन ‘तेजपुर’ में लोकार्पित पत्रिका ‘उषा ज्योति’ में कविता प्रकाशित

१०- ‘ओपन बुक्स ऑनलाइन’ में सितम्बर माह(२०१२) की, सर्वश्रेष्ठ रचना का पुरस्कार

११- ‘मेरी सहेली’ पत्रिका के अक्टूबर(२०१२) एवं जनवरी (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१२- ‘दैनिक जागरण’ में, नियमित (जागरण जंक्शन वाले) ब्लॉगों का प्रकाशन

१३- ‘गृहशोभा’ के जून प्रथम(२०१३) अंक में कहानी प्रकाशित

१४- ‘वनिता’ के जून(२०१३) और दिसम्बर (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१५- बोधि- प्रकाशन की ‘उत्पल’ पत्रिका के नवम्बर(२०१३) अंक में कविता प्रकाशित

१६- -जागरण सखी’ के मार्च(२०१४) के अंक में कहानी प्रकाशित

१८-तेजपुर की वार्षिक पत्रिका ‘उषा ज्योति’(२०१४) में हास्य रचना प्रकाशित

१९- ‘गृहशोभा’ के दिसम्बर ‘प्रथम’ अंक (२०१४)में कहानी प्रकाशित

२०- ‘वनिता’, ‘वुमेन ऑन द टॉप’ तथा ‘सुजाता’ पत्रिकाओं के जनवरी (२०१५) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

२१- ‘जागरण सखी’ के फरवरी अंक में कहानी प्रकाशित

पत्राचार का पता-

टाइप ५, फ्लैट नं. -९, एन. पी. ओ. एल. क्वार्टस, ‘सागर रेजिडेंशियल काम्प्लेक्स, पोस्ट- त्रिक्काकरा, कोच्चि, केरल- ६८२०२१

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: विनीता शुक्ला की कहानी - रक्तबीज
विनीता शुक्ला की कहानी - रक्तबीज
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