रविवार, 22 मार्च 2015

स्मृति लेख - प्रोफेसर सूरज भान सिंह

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प्रोफेसर सूरज भान सिंह : हिन्दी वाक्यात्मक व्याकरण के शोधक

 

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

आज दुखद समाचार मिला कि अब सूरज भान सिंह भी परलोकगमन कर गए। विगत दो वर्षों में पहले डॉ. कैलाश चन्द्र भाटिया ने मुझे छोड़ा और उसके बाद डॉ. रमेश चन्द्र महरोत्रा ने विदा ली। ये दोनों मेरे मित्र थे। डॉ. सूरज भान सिंह मेरे स्नेह के पात्र थे जो बाद में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में सन् 1992 से लेकर सन् 1995 तक की अवधि में मेरे सहयोगी तथा संस्थान की योजनाओं को पूरा करने में मेरे भरोसे के विश्वासपात्र रहे।

डॉ. सूरज भान सिंह से मेरी पहली मुलाकात सन् 1972 ईस्वी में मसूरी में हुई। भारत सरकार ने यह निर्णय लिया कि भारतीय प्रशासकों को हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए। इस निर्णय के लिए यह आवश्यक था कि भारतीय प्रशासकों को अपनी मातृभाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा के साथ साथ हिन्दी का प्रशिक्षण प्रदान किया जाए। राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं के प्रोफेसर डॉ. कैलाश चन्द्र भाटिया ने मुझसे हिन्दीतर प्रोबेशनर्स को हिन्दी प्रशिक्षण देने के सम्बंध में विचार विमर्श किया। मैंने भाषा-प्रयोगशाला के माध्यम से हिन्दीतर प्रोबेशनर्स को हिन्दी प्रशिक्षण देने का सुझाव दिया। राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी ने अपने यहाँ भाषा-प्रयोगशाला स्थापित करवाने के सम्बंध में कारगर कदम उठाए तथा भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम वी. वी. गिरी ने 06 दिसम्बर, 1972 को इसका संदर्शन किया। राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी ने प्रयोगशाला के माध्यम से हिन्दीतर प्रोबेशनर्स को हिन्दी प्रशिक्षण देने के लिए मई-जून, 1972 में "सामग्री निर्माण की कार्यशाला" आयोजित की। इसमें भाग लेने के लिए मेरे सहित देश के चार पाँच भाषाविदों को बुलाया गया। इसमें केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की ओर से डॉ. सूरज भान सिंह आए। इस कार्यशाला में हम सबने साथ साथ सामग्री निर्माण करने का कार्य किया। इसमें मैंने हिन्दी की आधारभूत उपवाक्य संरचनाओं पर अपना आलेख पढ़ा। इसका प्रकाशन राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी की शोध पत्रिका में हुआ।

 

(हिन्दी की उपवाक्य संरचना % Journal of LBS National Academy of Administration, Vol. XIX, pp. 87 - 92 (1974)।

इसी कार्यशाला में डॉ. सूरज भान सिंह ने पी-एच. डी. उपाधि के लिए हिन्दी वाक्यों की संरचना पर कार्य करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। इस विषय पर हमारे बीच कई बार संवाद हुए। मैंने उनको अपने मित्र डॉ. भोलानाथ तिवारी के निर्देशन में दिल्ली विश्वविद्यालय से पी-एच. डी. उपाधि के लिए काम करने का सुझाव दिया। सूरज भान सिंह ने सन् 1973 से ही तदनुसार काम करना शुरु कर दिया। दिनांक 28 अगस्त, 1976 को सूरज भान सिंह ने "हिन्दी वाक्य साँचों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन" शीर्षक शोध-प्रबंध पूर्णकर दिल्ली विश्वविद्यालय में जमा कर दिया। सूरज भान सिंह के शोध-प्रबंध के मेरे अलावा डॉ. कैलाश चन्द्र भाटिया और डॉ. विद्या निवास मिश्र परीश्रक थे। मैंने दिनांक 25 जनवरी, 1977 को अपना प्रतिवेदन विश्वविद्यालय को भेजा। मैंने यह संस्तुति की कि श्री सूरज भान सिंह को प्रस्तुत शोध-प्रबंध पर दिल्ली विश्वविद्यालय की पी-एच. डी. की उपाधि प्रदान की जाए। मैंने अपने प्रतिवेदन में स्पष्ट लिखा कि प्रस्तुत शोध-प्रबंध न केवल श्रमसाध्य है अपितु गवेषणा और मीमांसा के गहन विस्तारों से भी सम्पन्न है। बहुत कम शोध-प्रबंधों पर मैंने इस प्रकार की संस्तुति की है। इस शोध-प्रबंध के मूल्यांकन से मेरे मन में सूरज भान सिंह के अध्यवसाय के प्रमाण की अमिट छाप अंकित हो गई।

 

इस कार्यशाला में मेरे मन में सूरज भान सिंह के प्रति स्नेह और आत्मीय भावों के बीज अंकुरित हुए। न जाने क्यों मुझे यह विश्वास हो गया कि यह व्यक्ति भरोसे के लायक है। इसके बाद सूरज भान सिंह की नियुक्ति केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में हो गई। सन् 1976 ईस्वी में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में प्रोफेसर के तीन पद विज्ञापित हुए। संस्थान के तत्कालीन निदेशक डॉ. गोपाल शर्मा ने सन् 1976 ईस्वी में ही मुझको सम्मिलित रूप से एक संगोष्ठी आयोजित करने के लिए आगरा आमंत्रित किया। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा एवं जबलपुर विश्वविद्यालय, जबलपुर के संयुक्त तत्वावधान में जबलपुर में पं0 कामता प्रसाद गुरु जन्मशती के संदर्भ में ‘ अखिल भारतीय हिन्दी व्याकरण’ शीर्षक संगोष्ठी का जो संयोजन मैंने किया उसकी सराहना हुई। संगोष्ठी के एक सत्र में, मैंने " हिन्दी में रूप ग्रामिक विश्लेषण की समस्याएँ" शीर्षक आधार आलेख का वाचन किया। कदाचित इससे प्रभावित होकर डॉ. गोपाल शर्मा ने जबलपुर से प्रस्थान करते समय मुझको संस्थान में प्रोफेसर के पदों के लिए निकले विज्ञापन के बारे संकेत किया। उस समय तक मैं जबलपुर के स्नातकोत्तर हिन्दी एवं भाषानिज्ञान विभाग में रीडर एवं अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहा था। मैंने संस्थान में प्रोफेसर पद पर नियुक्ति की सम्भावनाओं के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजने के लिए सूरज भान सिंह को पत्र लिखा। सूरज भान सिंह ने मुझको जो उत्तर भेजा उसे मैं पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं जिस तटस्थ भाव के उत्तर की कामना कर रहा था, उसको सूरज भान सिंह ने अप्रमत्त भाव से पूर्ण किया

 

(पत्र संख्या – एक)

डॉ. सूरज भान सिंह D – 127 Kamla Nagar

Agra

दिनांक 16-07-1976

प्रिय बंधु डा. जैन,

आपका पत्र मुझे कुछ दिन हुए मिला स्थिति कुछ अधिक स्पष्ट हो जाए मैं इसके इंतजार में था। कौन-कौन लोग युद्ध-स्थल में उतर रहे हैं इसका हल्का-सा अंदाज जरूर लग गया है यद्यपि पुष्टि नहीं हुई। आपको शायद पता होगा कि डा. श्रीवास्तव दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो गये हैं। संम्भवतः 30 जुलाई तक चले जाएँगे। तीन पद रिक्त समझिए।

डा. बी.जी. मिश्र के chance सबसे अधिक हैं। शेष पद के लिए संघर्ष डा. अमर बहादुर सिंह, डा. एम. जी. चतुर्वेदी, डा. रस्तोगी, डा. जगन्नाथन, तथा आपके बीच में होगा। यह कहना मुश्किल है कौन विजयी होता है। आप अवश्य apply कीजिए। शायद आपने अग्रवाल साहब से form मंगवाएं हैं। आपका भी पलड़ा एक दृष्टि से भारी है, परन्तु निर्णय तो बोर्ड को ही लेना है।

डा. अग्रवाल परसों इम्फाल गए हैं। बल्कि जबरदस्ती भेजे गए हैं।

आशा है आप सकुशल होंगे। Thesis submit करने का notice विश्वविद्यालय में जमा कराने के संबंध में ही मैं आज दिल्ली आया हूँ। यहीं से पत्र भी लिख रहा हूँ। Thesis का टाइप पूरा हो चुका है तथा इन दिनों मिलान कर रहा हूँ।

आपका

सूरजभान सिंह

 

मेरी नियुक्ति जनवरी, 1984 में, भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद् की ओर से प्रतिनियुक्ति पर रोमानिया में विज़िटिंग प्रोफेसर के पद पर हो गई। मुझ पर रोमानिया जल्दी से जल्दी जाकर ज्वाइन करने का दबाब था। बच्चों की पढ़ाई जबलपुर में चल रही थी। मैंने अकेले रोमानिया जाकर भारतीय राजदूतावास में फरवरी, 1984 में कार्यभार ग्रहण कर लिया। मैं जिस दिन रोमानिया पहुँचा, मेरे ठहरने का प्रबंध भारतीय राजदूतावास ने बुकारेस्त शहर के एक होटल में किया तथा डिनर पर राजदूतावास के प्रथम सचिव श्री बालानन्द ने मुझे आमंत्रित किया। उनसे मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे आने से पहले डॉ. सूरज भान सिंह यहाँ काम कर रहे थे। मैंने बालानन्द जी को अवगत कराया कि मेरा सूरज भान सिंह से परिचय रहा है मगर सन् 1977 के बाद से उनसे कोई पत्राचार नहीं हुआ। मैंने बुकारेस्त से डॉ. सूरज भान सिंह को पत्र लिखा तथा उनको सूचित किया कि फिलहाल मैं अकेला ही आया हूँ तथा परिवार के अन्य सदस्य मई अथवा जून, 1984 में आयेंगे। मैंने निम्न जानकारियाँ देने का आग्रह किया।

 

(1)मुझे भारत से क्या क्या सामान मँगाना चाहिए

(2) यहाँ के विश्वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण के कार्य को किस दिशा में आगे बढ़ाना चाहिए।

डॉ. सूरज भान सिंह ने मेरी प्रत्याशा के अनुरूप जो उत्तर दिया, वह प्रस्तुत है।

 

(पत्र संख्या – दो)

डॉ. सूरज भान सिंह D- 14, कमलानगर

आगरा - 282005

दिनांक 18.03.1984

प्रिय डा. जैन,

आपका पत्र मिला धन्यवाद। रोमानिया में नियुक्ति के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।

मैं आशा कर रहा था आप मुझे भारत से पत्र लिखेंगे या जाने से पहले मिलेंगे- यह आपके लिए बहुत उपयोगी होता। मुझे आश्चर्य है कि आपको यह पता नहीं था कि मैं चार साल रोमानिया रह चुका हूँ- ICCR से पता कर लिया होता, या शायद पद्मचंद जी ने भी आपको पहले बताया हो। खैर, धीरे-धीरे आपकी समस्याएँ सुलझती जाएंगी। रोमानिया के संबंध में विस्तृत सूचना जो मैंने दो लेखों में लिखी है अभी हाल ही मैंने श्री बालानंद जी को भेजी हैं। आप इन्हें उनसे लेकर अवश्य पढ़ लें। एक लेख ICCR के गगनांचल’ (अद्यतन जनवरी अंक) में छपी है जिसकी प्रति अनिवार्यतः दूतावास में वहाँ पहुँची होगी (रोमानिया में हिन्दी शीर्षक)। दूसरा शोध लेख यूरोप में हिन्दी’ ‘गवेषणा(विश्व हिन्दी सम्मेलन अंक) में प्रकाशित है, जिसका off print मैं आपको संलग्न भेज रहा हूँ। वैसे ये दोनों लेख मैं अलग से श्री बालानंद जी को भेज चुका हूँ।

पिछले दो साल से रोमानिया में केवल एक ही पाठ्यक्रम चल रहा है एच्छिक कोर्स। जब मैं वहाँ था तब चार वर्षीय नियमित स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम भी चलता था। 1981-82 से यह पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय में बंद हो गया था क्योंकि आर्थिक संकट के कारण रोमानियन सरकार ने कई पाठ्यक्रम कम कर दिए थे जिसमें हिन्दी पाठ्यक्रम भी एक था। इसके बावजूद ऐच्छिक हिन्दीनाम से सायंकालीन पाठ्यक्रम चलता रहा। यह एक-दो वर्षों का भाषा-पाठ्यक्रम है। यह पाठ्यक्रम वस्तुतः अक्टूबर में शुरू होता है। पिछले अक्टूबर में वहाँ कोई भारतीय प्रोफेसर नहीं था इसलिए इस वर्ष संभवतः यह शुरू न हुआ हो। अभी तक आपको वहाँ सभी स्थिति स्पष्ट हो चुकी होगी। श्रीमती अमिता बोस से भी आपको सूचना मिल चुकी होगी। मैं आपको इस पत्र में कुछ छात्राओं-छात्रों के फोन नम्बर दे रहा हूँ, आप उनसे मिलकर सब स्थिति जान जाएंगे और वे आपकी बहुत मदद करेंगे। श्री पावेल (486588), कुमारी इरीना (745651), कुमारी जुलिया (474654)। दूतावास में हमारी ही एक छात्रा श्रीमती इलियाना सेक्रेटरी है (MMTC) में)। आप श्री पावेल को संपर्क सूत्र बना लें वह आपकी बहुत मदद करेगा।

वस्तुतः आपका प्रयास अब यह होना चाहिए कि इस वर्ष सितंबर से शुरू होने वाले सत्र में हिन्दी का नियमित चार-वर्षीय पाठ्यक्रम पुनः शुरू हो। यही वास्तविक विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम है जिसे आप चाहे स्नातक स्तरीय कहें या स्नातकोत्तर स्तरीय। यहाँ की पद्धति भारत से भिन्न है। हर छात्र को दो विदेशी भाषाएँ अनिवार्यतः पढ़नी होती हैं एक मुख्य, दूसरी गौण। हिन्दी चार वर्षीय गौण भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है जो अनिवार्य नहीं और उसकी परीक्षा होती है। पूरा करने पर प्रमाण-पत्र में अतिरिक्त विषय के रूप में इस भाषा का उल्लेख होता है। इसमें विश्वविद्यालय के बाहर के छात्र भी पढ़ने आते हैं। वैसे यह बहुत लोकप्रिय है और 30 के करीब छात्र इसमें प्रवेश लेते हैं।

आप इस समय तथा शीघ्र रोमानियन भाषा सीख लें। मैंने विश्वविद्यालय से ही रोमानियन भाषा का कोर्स पास कर लिया था। आप भी कर लेंगे। यह आपके अध्यापन के लिए उपयोगी होगा। वहाँ के अध्यापन की अपनी समस्याएँ अलग हैं। नए प्रोफेसर के लिए, जो रोमानियन न जानता हो, कुछ समय कठिनाई हो सकती है। इसी उद्देश्य से मैंने दो पुस्तकें लिखी थीं ताकि कोई भी नया प्रोफसर इसके आधार पर अध्यापन कर सके। यह पूर्णतः स्वैच्छिक कार्य था जिसके लिए मैंने विश्वविद्यालय आदि से कोई धन या पारिश्रमिक नहीं लिया था।

वैसे, संयोग कहिए या भाग्य, ये पुस्तकें पेरिस विश्वविद्यालय को पसंद आईं और इनका फ्रांसीसी संस्करण फ्रांस सरकार और पेरिस विश्वविद्यालय छाप रहा है तथा ये सभी पाठ कैसेट में भी भरे जा चुके हैं। वहाँ के प्रोफेसर निकोल बलबीर इसके सह लेखक हैं जिन्होंने इनका फ्रांसीसी अनुवाद किया। मैं इसी सिलसिले में पेरिस जाकर 1982 में पांडुलिपि तैयार कर आया था। आजकल प्रेस में है। हिन्दी अंश के मुद्रण का कार्य दिल्ली में हो रहा है तथा प्रूफ देखे जा रहे हैं। पिछले दो-तीन वर्षों से ये ही पुस्तकें पेरिस विश्वविद्यालय में भी निर्धारित हैं।

 

कई बिखरे सूत्र हैं जो अब आपको संभालने हैं। किसी हिन्दी प्रोफेसर के न जाने से रोमानिया के छात्र निराश थे। ये छात्र बहुत ही अच्छे, बहुत स्नेही और ईमानदार हैं। शेष बाद में लिखूँगा।

आप अपनी पत्नी के साथ पर्याप्त मात्रा में दाल मँगवा लें। आप शाकाहारी हैं अतः दाल, मैदा, बड़ी, पापड़, छोले, राजमा, चना आदि जितना चाहें मँगवा लें। वहाँ custom में अपने साथ किसी diplomate को ले जाएँ तो सुविध हो। वैसे इन सामानों के लिए भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय से प्रमाण-पत्र लेना चाहिए, क्योंकि सामान्यतः खाने की चीजें किसी देश में नहीं ले जाई जाती। कस्टम वालों ने एक बार मेरा 5 किलो दाल रख लिया था। certificate मांगते थे।

 

कपड़े अपने साथ कम ले जाएँ वहीं बनवा लें। आप कितने वर्ष के लिए गए हैं? यदि दो वर्ष हो तो आप Transfer of residence नियम के अंतर्गत कुछ सामान electronics आदि के खरीद लें। आपको जो भी समस्या हो लिख भेजें। जो भी सहायता मुझसे होगी मैं करूंगा।

मकान आपको कहाँ मिला वहाँ की प्रगति विस्तार से लिखें।

शुभकामनाओं के साथ

आपका सूरजभान सिंह

 

डॉ. सूरज भान सिंह के पत्र तथा उनके लेखों ने मेरी बहुत सहायता की। उनके पत्र के कारण मैंने वहाँ के विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर पर यह दबाब बनाया कि यदि उन्होंने अपने विश्वविद्यालय में हिन्दी का नियमित चार-वर्षीय पाठ्यक्रम अगले सत्र से आरम्भ नहीं किया तो फिर मैं भारत वापिस लौट जाऊँगा। मैंने उनको दो तथ्यों से अवगत कराया। (1) आपके विश्वविद्यालय के विदेशी भाषाओं के संकाय में लगभग 40 विदेशी भाषाओं के पढ़ाने की व्यवस्था है। इन भाषाओं में, जिन भाषाओं का चार वर्षों का पाठ्यक्रम चलाया जा रहा है उनमें से चीनी भाषा को छोड़कर हिन्दी बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक है। यदि हिन्दी का नियमित चार-वर्षीय पाठ्यक्रम नहीं चलाया जाता तो यह भारत की हिन्दी भाषा के प्रति अन्याय होगा। (2) मुझसे पहले भारत से हिन्दी के जो अध्यापक आए वे रीडर रैंक के थे। मैं भारत में विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद पर आसीन हूँ। यदि मुझे नियमित चार-वर्षीय पाठ्यक्रम के छात्रों को पढ़ाने का अवसर नहीं मिलेगा तो मुझको आपके यहाँ पढ़ाने में आनन्द नहीं आएगा। ऐसी स्थिति में मुझे विवश होकर भारत लौटने का निर्णय लेना पड़ेगा। हमारे राजदूतावास के राजदूत श्री हर देव भल्ला ने भी रोमानिया की सरकार को मेरे निर्णय से अवगत करा दिया कि यदि अगले सत्र से विश्वविद्यालय में हिन्दी का नियमित चार-वर्षीय पाठ्यक्रम आरम्भ नहीं किया गया तो हमारे प्रोफेसर यहाँ काम नहीं करेंगे। इसका मनोनुकूल परिणाम निकला। सूरज भान सिंह के पत्र के कारण ही श्रीमती जैन ने चार पाँच सालों के लिए लगने वाले खाद्य पदार्थों का परमिट बनवाकर उसे बुक करा दिया। इस काम में उनकी मदद ICCR के अधिकारियों ने की। मगर रास्ता बताने का श्रेय सूरज भान सिंह को जाता है। सामान की इस मात्रा के कारण हम भारत से आने वाले महमानों और रोमानिया में स्थित अनेक देशों के डिपलोमैट्स की आवभगत करने में समर्थ हो सके।

 

सन् 1988 के बाद मैंने वापिस आकर जबलपुर के विश्वविद्यालय में अपना कार्यभार ग्रहण कर लिया। डॉ. सूरज भान सिंह ने इसके बाद वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के चेययरमेन के पद का कार्यभार ग्रहण कर लिया। उनकी यह नियुक्ति केन्द्रीय हिन्दी संस्थान से प्रतिनियुक्ति पर हुई। आयोग के कामों से वे मुझको आमंत्रित करते रहे। जुलाई, 1989 में उनके वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली द्वारा जबलपुर में मेरे विभाग में शब्दावली कार्यशाला का आयोजन हुआ जिसके विषय प्रवर्तन का दायित्व भी मुझे वहन करना पड़ा। डॉ. सूरज भान सिंह ने आत्मीय भाव से और अधिकार भाव से मुझे यह सूचित किया कि कार्यशाला की पूरी अवधि में वे मेरे घर पर ही रुकना पसंद करेंगे। हम लोगों ने प्रवास की अवधि में रोमानिया में छात्र-छात्राओं, विद्वानों और कलाकारों के हिन्दी के प्रति अनुराग की तथा रोमानियन संस्कृति पर भारत के प्रभाव की विशद चर्चाएँ कीं।

 

मैंने जुलाई, 1992 में जबलपुर से केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक के पद का कार्यभार ग्रहण करने के लिए प्रस्थान किया। मुझे मानव संसाधन विकास मंत्रालय, नई दिल्ली में ज्वाइनिंग रिपोर्ट देनी थी। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुँचने से लेकर आगरा के लिए प्रस्थान करने तक मेरी सारी व्यवस्थाएँ डॉ. सूरज भान सिंह ने वहन की। मुझे मंत्रालय में मानव संसाधन विकास मंत्री से लेकर किन किन अधिकारियों तथा अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों से मिलने के बाद आगरा जाने के लिए प्रस्थान करना चाहिए – इसका परामर्श भी डॉ. सिंह ने दिया।

 

सन् 1994 में, जब वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली में सूरज भान सिंह का कार्यकाल समाप्त हो गया तो मैं चाहता था कि वे आगरा आकर काम करें। मगर डॉ. सिंह ने अपनी पारिवारिक समस्याओं की जानकारी दी तथा संस्थान के दिल्ली केन्द्र के प्रभारी के रूप में कार्य करने की अपनी इच्छा व्यक्त की। उस समय डॉ. सुरेश कुमार दिल्ली केन्द्र के प्रभारी के रूप में कार्य कर रहे थे और डॉ. माणिक्यलाल गोविन्द चतुर्वेदी हैदराबाद केन्द्र से वापिस दिल्ली केन्द्र में आकर काम करना चाहते थे। दिल्ली केन्द्र के प्रभारी की सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका मंत्रालय और निदेशक के बीच सामंजस्य और तालमेल बैठाने की होती है। यह भूमिका बहुत कुछ दिल्ली में स्थित राज्य के रेजिडेंट कमिश्नर की तरह की होती है। मैंने डॉ. सुरेश कुमार से कहा कि मुझको आगरा में उनकी जरूरत है। अनुसंधान की गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है। डॉ. सुरेश कुमार को मेरा प्रस्ताव प्रीतिकर लगा। और इस प्रकार डॉ. सूरज भान सिंह को दिल्ली केन्द्र के प्रभारी बनाने का मार्ग प्रशस्त हो गया। उनको दिल्ली केन्द्र का प्रभारी बनाने से मुझको तथा संस्थान को फायदा हुआ।

मेरे दिल्ली प्रवास में वे मेरी सभी सुविधाओं का दत्तचित्त एवं मनोयोग के साथ ध्यान रखते थे। मैंने कभी उनको किसी की बुराई करते हुए नहीं सुना। वे काम से काम रखते थे। खुलकर बात करते थे। मेरा राग-द्वेष कम करने का मंत्र उनको बहुत अच्छा लगता था। संस्थान के हित में वे सार्थक सुझाव देते थे। दिल्ली प्रवास में अनेक बार मुझको उनके मायापुरी स्थित आवास पर भोजन करने और अकादमिक बाते करने का रस प्राप्त हुआ। उनके मन में किसी के प्रति मनोमालिन्य नहीं था। कम बोलते थे मगर जो बोलते थे वह दिल से बोलते थे। सहज भाव से बोलते थे। आत्मीय भाव से बोलते थे। विगत कई वर्षों से उनसे कोई संवाद नहीं हुआ।

दिल्ली से लखनऊ जाते समय हवाई जहाज में प्रोफेसर कुमार गोस्वामी से मुलाकात हुई। मैंने उनसे संस्थान के दिल्ली रहने वाले सहयोगियों (डॉ. सूरज भान सिंह, डॉ. सुरेश कुमार, डॉ. माणिक्यलाल गोविन्ददत्त चतुर्वेदी, डॉ. ठाकुरदास आदि) के बारे में जानकारी प्राप्त की। उनसे समाचार मिला कि डॉ. सूरज भान सिंह अब दिल्ली में नहीं रहते। देहरादून में रहते हैं। अस्वस्थ हैं। मैंने उनसे कहा था कि यदि सम्भव हो तो वे किसी से पता लगाकर डॉ. सूरज भान सिंह के देहरादून वाले मोबाइल नम्बर की सूचना मुझे भिजवादें। मेरी कामना थी कि मैं उनसे बात करूँ। उनके हालचाल की जानकारी प्राप्त करूँ। मगर मन की समस्त इच्छाएँ कहाँ पूर्ण होती हैं। अब उनके साथ जुड़ी हुई यादें स्मृति पटल पर एक एक करके आ रही हैं और जा रही हैं। आने और जाने का नाम ही तो सृष्टि चक्र है। यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। जानते हम सब हैं। मगर जब कोई आत्मीय इहलोक छोड़कर परलोक जाता है तो मन में उसके साथ जुड़ी सब स्मृतियाँ सजीव हो उठती हैं। उनकी सजीवता मन को व्यथित कर देती है। बुद्धि और तर्क मौन हो जाते हैं। मन के सागर में यादों की लहरों का आलोड़न विलोड़न ही गूँजता रहता है। यही संतोष है कि हिन्दी भाषा के भण्डार की श्रीवृद्धि करने वाली उनकी रचनाएँ अमर रहेंगी। मैं उनकी निम्न रचनाओं का विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूँगा।

 

(1) हिन्दी का वाक्यात्मक व्याकरण

(2) हिन्दी भाषा – संरचना और प्रयोग

(3) अंग्रेजी-हिन्दी अनुवाद व्याकरण।

स्नेहसिक्त स्मृतियों को नमन।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123 हरि एन्कलेव

बुलन्दशहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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  1. प्रो॰जी॰गोपीनाथन4:09 pm

    सूरज भान सिंहजी के निधन के समाचार पर फेज बुक पर टिप्पणी की थी,यात्राओं के कारण इस लेख को मैं आज ही पढ़ सका॰सूरज भान सिंह से दिल्ली,आगरा तथा भारत के आँय प्रदेशों में और वर्धा में हुयी गोष्ठियों में मुलाक़ात होती थी,मेरे द्वारा हिन्दी और विश्व भाषाओं के परस्पर अनुवाद की समस्याएँ किताब के लिए हिन्दी और रोमानियन पर आलेख लिखने की उनहों ने कृपा की थी॰अक्सर उन से हिन्दी में कोंप्यूटर अनुवाद पर बातचीत होती थी,उन का भाषिक अनुसंधान इस क्षेत्र में काफी बुनियादी है॰उन को नमन और श्रद्धांजलि

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रो॰जी॰गोपीनाथन4:11 pm

    हिन्दी के वाकयात्मक व्याकरण और कंप्यूटर अनुवाद पर सूरज भान सिंह का योगदान चिरस्मरणीय रहेगा॰श्रद्धांजलि॰

    उत्तर देंहटाएं

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