बुधवार, 25 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - सेवा वही जो निष्काम बाकी सब है धंधा

सेवा वही जो निष्काम

बाकी सब है धंधा

- डॉ.  दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

आजकल सेवा के नाम पर सभी तरफ बहुत कुछ हो रहा है, काम भी खूब हो रहा है और उससे सौ गुना इसका प्रचार-प्रसार भी।

लगता है कि जैसे सर्वत्र सेवा का समन्दर ही लहराने लगा हो। सेवा अपने भिन्न-भिन्न रूपों में कहीं गोपनीयता के साथ और कहीं प्रकट तौर पर हो रही है।

वैयक्तिक स्तर पर भी हो रही है और संस्थागत स्वरूप में भी इसका चलन बढ़ता जा रहा है।

यह सेवा ही है जिसके नाम पर जाने कितने सारे चेहरों और स्थलों के अनायास दर्शनों का परम सौभाग्य हम सभी हो प्राप्त हो रहा है।

इन सेवा प्रकल्पों के बहाने अपने क्षेत्र के सेवाव्रतियों की सुन्दर छवियों और  उनके सेवा कर्मों से भी रूबरू होने के अवसर प्राप्त हो रहे हैं।

हाशिये पर हैं तो बेचारे सिर्फ वे ही जो स्वान्तः सुखाय और आत्म आनंद के लिए काम कर रहे हैं, जिनका जिक्र न कहीं होता है, न कोई करता है। क्योंकि इन लोगों से किसी भी प्रकार की उम्मीद करना भी व्यर्थ है।

ये अपने सेवा कर्म में इतने व्यस्त रहते हैं कि इन लोगों को बाहरी क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं की कोई सूझ या सुध तक नहीं है।

सेवा का क्षेत्र आजकल अनन्त संभावनाओं और अपार प्राप्तियों से भरा हुआ है।

यह सेवा शब्द अब अपने आप इतना विराट हो चुका है कि दूसरे सारे कर्म इसके आगे वामन अवतार में आ गए हैं। 

खूब सारे लोग हैं जो सेवा कर रहे हैं, सेवा गतिविधियों में रमे हुए हैं और सेवा को ही जीवन का माध्यम बनाए हुए हैं। 

सेवा के मामले में दो तरफा सोच वाले इंसान हैं।

सेवा के बहाने कई दूसरे प्रत्यक्ष या परोक्ष कार्य संपादित करने के हुनर में माहिर लोग सेवा में दक्ष हो चुके हैं। कई इलाके तो ऎसे हैं जहां सेवाव्रतियों का अपना अलग ही संसार पसरा हुआ है।

ये लोग कोई सा सेवा कार्य हो, उसमें जबर्दस्त घुसपैठ कर लेते हैं और फिर अपने सेवाकर्मों को मनचाहा आकार देते रहते हैं।

सेवा का सीधा सा अर्थ उस प्रकार की गतिविधि से है जिससे दूसरों को उनकी आवश्यकता की मदद प्राप्त हो जाती है, सुकून मिलता है, दुःख-दर्द भूल जाते हैं और पीड़ाओं से मुक्ति का सुकून प्राप्त करते हैं।

इसमें असली सेवा वही है जो खुद के पैसों,  संसाधनों, शरीर और सामथ्र्य से की जाए।

पराए और चंदे से जमा किए गए पैसों से की जाने वाली सेवा द्वितीयक मानी गई है।

सेवा करने वाला और सेवा प्राप्त करने वाला पात्र होना चाहिए।

काफी सारे लोग सेवा कर रहे हैं, सेवा के नाम पर गोरखधंधे भी चला रहे हैं, पब्लिसिटी भी प्राप्त कर रहे हैं लेकिन इनमें से कुछ को छोड़कर अधिकांश लोग ऎसे होते हैं जिनके लिए सेवा अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की सीढ़ी होता है और इसका सेवा के माध्यम से बनने या बनाए जाने वाले संबंधों को अपने लाभ के लिए किस प्रकार भुनाया जा सकता है, इसका उन्हें अच्छा ज्ञान और अनुभव होता है।

ऎसे लोग सेवा क्षेत्रों में खूब तादाद में देखने को मिल जाते हैं।

सेवा का आत्मतोष और आनंद तभी पाया जा सकता है जबकि सेवा हर दृष्टि से अपेक्षा मुक्त हो और निष्काम भावना से की गई हो। 

सेवा के बदले कुछ भी प्राप्ति की इच्छा नहीं होनी चाहिए वरना वह सेवा न होकर व्यापार है और ऎसा व्यापार किस काम का जिसमें सेवा क्षेत्र को हथियार या मार्ग के रूप में इस्तेमाल किया जाए।

जिस सेवा से किसी सेवाकर्ता का कोई सा व्यवसायिक हित सध रहा हो, पब्लिसिटी का मोह हो या फिर लोकप्रियता की चाह हो, उस सेवा को सीधे तौर पर धंधा ही कहा जा सकता है।

ऎसे सेवा-कारोबारियों को न पुण्य प्राप्त होता है न आत्म आनंद या संतुष्टि।

सेवा आत्मतोष और भीतरी आनंद प्राप्ति का बहुत बड़ा जरिया और दरिया दोनों है बशर्तें कि वह निष्काम भाव से की गई हो तथा सेवा के पीछे किसी से कोई अपेक्षा न हो। न व्यक्ति से, और न ही समाज से। तभी यह सेवा पुण्य में भी परिवर्तित होती है।

आज सेवा के क्षेत्र में हर तरफ खूब काम हो रहा है, बहुत सारे लोग सेवा के काम में जुटे हुए हैं, बावजूद इसके समाज में जरूरतमन्दों की संख्या में कोई कमी नहीं आ पा रही है।

सेवा देने वाले और सेवा पाने वालों में कोई संतुष्ट या तृप्त नहीं दिख रहा है।

इसका मूल कारण यही है कि हमारी सेवा में निष्काम भाव का अभाव है।

हम जो कुछ करते हैं वह या तो दिखावे के लिए करते हैं अथवा अपनी पब्लिसिटी और शौहरत पाने के लिए।

हमारी सेवा में व्यवसायिक मानसिकता हावी होती जा रही है और इसी वजह से सेवा का अपेक्षित सौन्दर्य नहीं दिख पा रहा है।

समाज को सेवा की जरूरत है लेकिन उस सेवा की नहीं जिसका लक्ष्य धंधेबाजी या सेवा क्षेत्रों से पैसा कमाना  हो बल्कि उस सेवा की जरूरत है जो सर्वथा अपेक्षामुक्त हो।

जो निष्काम भाव से होती है वही सेवा है, बाकी सब धंधा ही है, और धंधा करने वाले लोगों को सेवा का आनंद न जीते जी प्राप्त हो सकता है, न मरने के बाद।

ये लोग एक व्यापारी की तरह आते हैं और निन्यानवें के फेर में जिन्दगी गँवा कर संसार से नौ दो ग्यारह हो जाते हैं।

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