मंगलवार, 24 मार्च 2015

रामानुज मिश्रा की कहानी - काली माई

काली माई

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रेशम सी मुलायम अगहनी धूप दीवार पर धीरे-धीरे उतरकर आंगन को छूने लगी है। पल भर के लिए कटोरे में ठहरी धूप की एक किरण सुमन की आँखों में चमक भर देती है। चकाचौंध से खींझ का एक टुकडा उसके मन में समा जाता है। टोकरी भर बर्तन मलने के बाद अभी-अभी तो बरामदे में बैठी है पीछे पर। बन्द हुई आँखों में भीतर का रातवाला गुस्सा जाग उठता है।

संध्या प्रस्थान के बाद ही वह जब घर की कोठरियों में दीया दिखाने लगी कोनों में चुपचाप बैठी खामोशी भी पीछे-पीछे चलने लगी। दालान तक पहुँचते-पहुँचते उसने देखा माँ ठीक दरवाजे की चौखट पर बैठी है, बगल में ही है कडे से भरी खंचिया। बाबू लौट आये है पगिया से। उनकी पगडी साफ-साफ दिख रही है उनचन पर। वापस घर लौटते हुए सुमन ने महसूस किया-माँ की आँखों में हमेशा की तरह कई सवाल हैं।

'का भयल'

'का होई उहे भयल, जवन न होखे के चाही'

नहकार गईलें का?'

'लेन-देन पर त नाहीं बिगड्‌ल, लेकिन......'

सुमन को आभास हो रहा है,सवाल-जवाब में गरमी आयेगी।

लड़िका क मतारी भीतर से साफ-साफ कहलस हमके लड़की गोर-अंगार चाही, करिया कलूटी नाहीं। पढाई-लिखाई लेके चाटव का?'

ओकर भतारों कुछ कहलस

'ऊ का कही। चुप्पी साध लेहलस। मेहरी के वश में ह ससुरा। '

उसकी माँ का गुस्सा वहाँ से लौटकर अब अपने पति जगरदेव पर भहरा पडा।

'हम जानत हई। तू कुछ नाहीं कय सकता। लड़की दिन पर दिन सयान हो गइल। अरे ऊ मुँहझौंसा क मुँह फूक देवे के चाहत रहल ह। घरे त शेर बनयला तू-बाहर बकरी बन जाला?

यह तय था कि बात केवल बात से खत्म नहीं होगी। दोनों ओर का क्रोध सारी रात अपनी चाल चलेगा। सांझ खत्म होते ही रात आगे बढने लगी थी, पर सुमन को नींद कहाँ? बीच में पल भर के लिए रुका महाभारत फिर लौट आया। 'तू खुदयं कुलच्छनी हई, करिया कलूटी लईका पैदा कइली। ' 'देखा हमसे कहावा जिन, अपने बुढ़वा के भुलाय गइला अलकतरा जइसन, लाड़ अलगे से। सारी जिनगी भचकते बीतल। '

अँधेरे में लहराते माँ के हाथ कौन देख सकता था। लालटेन कब की भभककर बुझ गई थी।

देख हमरे बाप-दादा पर मत जो। बात बिगड़ जाई। बताव हमरे खनदान में अइसन कलुटी रहल कोई?'

'नानी के आगे ननिअबुरे क बखान जिन करा। अपने फुलवा के भुलाय गइला। लतियाय के भगाय देहले रहलयं सब। '

जगरदेव का तमाचा ज्योंही माँ के गाल पर पड़ता, सुमन बीच में आकर उसे बचा ली। गुस्से में बढती बातें गाली-गलौज का रूप ले ली।

बाबू तमक कर बंसखट से कई बार उठे, पर माँ चौखट से तिल भर नहीं हिली। एक-दो बार तो बाप के तने हुए तमाचे बड़बड़ाती माँ के मुँह तक पहुँच गये- सुमन ने उसे ढाँपकर बचा लिया था। समूची रात लडाई में गुजरी। न चूल्हा जला, न अन्न का दाना किसी के मुँह में गया। अँधेरा जब ढीला होकर भोर के पास पहुँचा, मियाँ-बीवी की लड़ाई में पराजित जगरदेव लोटा लेकर बाहर गया तो चिरौरी कर सुमन ने माँ को चौखट से हटाया। हाँ, तब जाती हुई रात सुमन के लिए नींद का एक नन्हा टुकडा जरूर फेंक गयी।

धूप तुलसी चौरे को रंगते हुए सिर पर खड़ी होने लगी है। उसका मन सोच-विचार की कटीली झाडी में उलझता ही जा रहा है। बेबसी बार-बार उसे ही क्यों चिढ़ाती है। लडकी है वह माँ-बाप के कन्धों पर मानों वजनी बोझ हो चली है। यह बोझ आज का तो नहीं पैदाइशी है। माँ ने बताया था- जब वह पैदा हुई, दादी ने चूल्हे में खौलता अदहन का पानी उड़ेल दिया था। अनगिनत गालियों से प्रसूता का सत्कार हुआ था।

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बचपन के दिन खेलते-कूदते कम, गालियाँ सुनते ज्यादा बीते। जैसे-जैसे वह बडी होती गई, उसके रंग की करिअई और गाडी होती गयी। स्कूलवाले मैदान में खेलते वक्त उसके लिए अक्सर करझौंसी शब्द हवा में उछलते रहते। वह भी कलूटी के बदले कई-कई गालियाँ साथी बच्चों की ओर झोंक देती-तोरे माई क. तोरे बाऊ क.। जब लतखोर बच्चे इतने से भी नहीं मानते तो नकबहनी भुक्खड़, चोट्टा कहकर उनका मुँह बन्द करा देती। अब तो अपनी त्वचा के रंग से देर तक दुख नहीं

पहुंचता। जल्दी ही सब कुछ भूल गोट्टी, लंगड़गुदिया खेलने लग जाती। घर में देर से सोकर उठने के बाद माँ भी तो कलूटी शब्द ही उसके लिए प्रयोग करती। बाऊ भी क्रोध में आकर घूरते, कुछ बोलते नहीं- तब वह सन्न रह जाती। अनजाना सा भय मन में पैठ जाता।

धीरे-धीरे उसने अपने आपको मनाना सीख लिया। अपने नाम का पर्याय मान लिया कलूटी को। लेकिन जब कोई बाहरी आदमी उसे इस नाम से पुकारता, उसके भीतर कुंडली मारकर बैठा करइत भीतर ही भीतर रेंगने लगता। पर गुस्सा बाहर आते-आते मिट्टी का परशुराम बन जाता। धीरे- धीरे जुटनेवाले अन्तर्साहस में सरेआम सेंध लग जाती।

हालांकि सुमन के पिता ने उस पर एक कृपा जरूर की। पढाई का अटूट सिलसिला जारी रखा। प्राइमरी स्कूल से होते हुए वह महाविद्यालय तक पहुँच गयी। अपने अध्ययन के पारिवारिक कारणों की उधेड़बुन में वह कम पड़ती-शायद ऊँची पढाई से उसकी शादी में मदद मिले। पर पड़ोसियों को उसका यहाँ तक पहुँचना कभी अच्छा नहीं लगा। बगलवाली सुमन बुआ ने तो प्राइमरी पास होते ही उसे सयानी घोषित कर दिया। वह घोषणा करती कि कउने घर जाई, के बियाह करी?' माँ उनकी बात पर ध्यान कम देती लेकिन इन्टरमीडिएट में पहुँचते ही एक दिन उसे अनजाने से दर्द ने विचलित कर दिया तो माँ ने उसकी ओर घूरकर देखा था। शायद उसकी आँखों में आगत की चिन्तायें थीं। उस दिन से वह विशेष बन गई थी।

बीए. अन्तिम साल तक पहुँचते-पहुँचते मीरा, कबीर, जायसी, निराला, महादेवी उसके मित्र बन गये। मन की अतल गहराइयों में वे अपने-अपने तरीके से बैठ चुके थे। बिहारी ने उसके भीतर छिपी युवती को जागृत कर दिया। प्रेम के शारीरिक पक्ष की अनिवार्यता अब स्वयं सिद्ध होने लगी। प्रलय के बाद एकान्त में विचरण करते निराश मनु के जीवन में आशा का संचार करनेवाली श्रद्धा उसकी विश्वस्त सहेली बन गई।

खाना बनाने, परोसने तथा खुद खाने के बाद जब वह बिस्तर पर पहुँची तो लगा कि उसका मन एकदम खाली है। धीरे-धीरे ऊबन परेशान करने लगी। काल्पनिक पगडंडी पर विचार यायावर बन दिशाओं में तैरने लगे। खिड़की से आती ठंडी हवा के झोंके ने भटकते मन को वापस लौटा दिया। अब नींद चुपचाप शायद उसके पास आ जायेगी।

नींद आई किन्तु अकेली नहीं, सपने भी साथ आये। दूर-दूर तक फैला सन्नाटा। चाँदी की बिछी हुई बर्फ और ऊँची-ऊँची बर्फ सनी चोटियाँ। उन्नत शिखर में मृदंग की थाप धीरे-धीरे तेज हो रही है। चोटियों को चूमते बादलों की चादर को परे सरका वंशी के स्वर धीरे-धीरे नीचे उतर रहे हैं। वंशी और मृदंग के स्वरों का मनोहारी संयोग। प्रकट होते हैं कैलाशवासी महादेव शक्ल हवाओं के संग। वंशी के स्वर रुकते हैं, मृदंग की थाप थम जाती है। सुमन सिर नीचे किये वरदान की इच्छुक हथेलियों को गौरीपति के सामने फैला देती है। तभी बादल नीले आकाश से नीचे उतरते हँ, बिजली चमकती है। नीचे झुककर मेघ शंकर के कानों में कुछ कह रहे है. एक संगीतमय शंखनाद प्रतिध्वनित होता है।

बालिके तुम्हें अभी और तपस्या करनी है। '

नींद ने साथ छोड़ दिया. वह बड़बड़ा रही थी। बगल में सोई मां की निद्रा सुचेत हो गई। 'चुप रह, बड़बड़ा मत। करवट बदल ले, चित्त मत सो' उसने कहा।

रातवाला पूरा अंधेरा न जाने कहाँ विलीन हो गया। सूरज की एक पतली किरण चौखट छूने लगी। रात के सपने से भयभीत सुमन की निद्रा अभी टूटी नहीं। उसे अच्छी तरह से पता है- गिन बटोरती माँ रोज-रोज की तरह उसके लिए कई आधी-अधूरी व्यंग्य भरी गालियाँ कोठरी में भेज देगी. 'महारानी उठ. ए सहुरे तोके कुच दीहैं सब। ' आंगन की सटर-पटर ने उसे जगा ही दिया। उसे पता है बहुत काम करने हैं घर में। चूल्हा चौके से लेकर बर्तन माँजना है. हैंडपम्प से गगरी भर पानी लाना है फिर बाबू के लिए खराई भी बनानी है। खेती में भी बहुत सपराना है. तीसी बिननी है, सरसों काढ़ना है। कथरी को मोड़कर सिरहाने रख. बिना हाथ मुंह धोये बर्तन साफ करने पहुँच गयी। भातवाली बटलोही में चावल लग गया है. उसे करोने के लिए दायाँ हाथ जैसे ही वह भीतर डालती है, महसूस हुआ किसी ने उसके हाथ को पकड लिया है। मन यहाँ से भागकर पहुँच गया रातवाले सपने के पास- बालिके तुम्हें अभी और तपस्या करनी है। '

महाविद्यालय पहुँचने का रास्ता आज छोटा पड़ गया। घर का श्रापित नैराश्य तो पहले ही मोड़ पर छूट गया, लेकिन पड़ोसियों के जहर से सने कटाक्ष अगले मोड पर ही उससे अलग हो पाये। रास्ते की बेहूदी बेनाम निगाहें रोज की हिस्सा थी। उसे देख मजनुओं का मुँह बिचकाना आज स्वत: पीछे छूट गया। उसे अब न इन पर गुस्सा आता है. न ही तरस। सड़क का तीसरा मोड़ पार करते ही उसके महाविद्यालय का गेट दिखाई देने लगा। अपने सहपाठी विद्यार्थियों को ठेलते, धकियाते वह सीख्यिाँ चढ़ने लगी। आखिरी सीढ़ी पर पहुँचते-पहुँचते फिर रात का सपना रास्ता छेंककर खड़ा हो गया। थिरकते पाँव थम गये-कैसी तपस्या और कब तक? गालों पर झुक आयी लट को झटका देकर ऊपर पहुंच गयी। खचाखच भरा क्लास-आज कुछ लेट है क्या?

गंभीर किस्म के लडके, लड़कियां आगे की सीटों पर आसीन है, ताक-झांकवाले मध्य में बाईं ओर। सरिता के बगल में बैठते ही उसने पीछे मुड़कर देखा, प्रतीक्षा थी। उसने लक्ष्य किया कि वह तो नेत्र-संधान के बीचो-बीच पड गयी है। उसने देखा ' एक लड़का मुँह बिचका रहा है जैसे किसी ने कड़वी ककरी उसके मुँह में डाल दी हो। सर जी का अब तक पता नहीं। घड़ी के हिसाब से क्लास पन्द्रह मिनट लेट है। उसे ऑफिस में जाना चाहिए। यहाँ पर और बैठी रही तो गाँववाली चाची के नुकीले व्यंग्य बाण उसे बेधने लगेंगे- 'ई करझौंसी से कवन बियाह करी?' नहीं, वह हिन्दी सर को देखेगी।

ऑफिस की सीढ़ियाँ चढते-चढते उसे ध्यान आया कि वह अकेली है, प्रभा को भी साथ ले आना चाहिए था। खिड़की से उसने देख लिया- हिन्दीवाले सर और इतिहास की मैडम किसी रोचक वार्ता में मगन हैं। उसके वहाँ खड़े होते ही दोनों के चेहरे का रंग बदल गया था। खींझ उभर आयी थी हिन्दीसर की मुख मुद्रा में। वापस लौटते उसने कहा, 'सर जी, पूरा क्लास 15 - 20 मिनट से आपका इन्तजार कर रहा है। ' चलो मैं आ रहा हूँ न। उनके स्वर में आकस्मिक क्रोध प्रवेश कर चुका था। सुमन भारी मन से सीढियाँ उतरने लगी। अन्तिम सीढ़ी तक पहुँचते ही सर की तल्ख आवाज कानों में पडी- 'दाई, इ कलुई कैसे आ गई ऑफिस में, रोकी क्यों नहीं? बार-बार करिअई झलकाने चली आती है। ' उसके पाँवों में बिजली का करंट सा लग गया। सारा शरीर क्रोधाग्नि में धधकने लगा। क्लासरूम की बजाय फिर ऑफिस में उलटे पाँव धमक पड़ी।

हां सर, मैं कलुटी हूँ, कलुई भी। आप बता सकते हैं इसमें मेरा क्या दोष है? रोस से भरा उसका सारा शरीर काँप रहा था। आखिर जिस सष्टा ने गोरे लोगों को बनाया, उसी ने तो मुझे भी बनाया है। यदि नहीं बनाया तो आप क्यों कहते हैं, सारी सृष्टि का सर्जक एक ही ईश्वर है?'

'सुनो भाई, सुनो। नाराज क्यों हो रही हो?' सर की आँखों में एक विकलांग प्रतिवाद झलकने लगा था।

'सर, मैं नाराज नहीं, अपनी बात कह रही हूँ। आपने ही तो इस बात को बार-बार हमें बताया था। ' अब उसका गुस्सा छत से टकराने लगा था।

'आप ही तो अक्सर जायसी के व्यक्तित्व का उदाहरण देते हैं-मोहि पे हँसेसि कि कोहरहिं। उस वक्त तो बादशाह के चुगलखोर दरबारी चुप रह गये थे, लेकिन आज आपको बोलना पड़ेगा। उस निर्माता परमेश्वर पर क्यों नहीं हँसते?'

इतिहासवाली वर्मा मैडम काठ की पुतली बनी कभी हिन्दी सर को, कभी सुमन को देखने लगी थीं।

'अरे सुनो, सुनो। मेरा मतलब ऐसा कुछ नहीं था। ' उनकी आवाज में एक नपुंसक कायरता आ चुकी थी।

'सर, आपको यह भी बतलाना पड़ेगा कि कृष्ण सांवले थे, काले थे तो घर-परिवार, समाज की लोकमर्यादा त्याग वंशी की तान पर वे क्यों दौड़ जाती थीं? राधा और तमाम गोपियों को कालिन्दी का श्याम तट ही क्यों भाता था?'

'सुनो, मैंने तुम्हें कुछ कहा तो नहीं। ' सुमन को न तो कुछ सुनाई पड़ रहा है, न ही कुछ दिखाई। हिन्दीवाले सर के माथे पर पसीनें की कई बूँदें झलमला रही थीं। ऑफिस की तेज बातें क्लास रूम तक पहुंच गयी थीं। लड़के-लड़कियों का खामोश जमाव धीरे-धीरे बाहर होने लगा।

'सर जी, आप लोग तो विद्वान हैं, सौन्दर्य शास्त्र की सटीक परिभाषा जानते हैं और उसे हमें बताते भी हैं। ' क्रोधावेग में उसकी हथेलियाँ बार-बार मेज पर पड़ रही थीं। कालिंग बेल लड़खडाकर फर्श पर गिर पड़ा था।

'क्या गोरा रंग ही सुन्दरता का मूलाधार है। अगर ऐसा है, तो अफ्रीका के सभी मूल निवासी बदसूरत हैं। उन्हें आप लोग अपनी दुनिया से बाहर क्यों नहीं निकाल देते? ताकत है किसी में। ' उसकी आवाज के सिवाय ऑफिस में कोई दूसरी और आवाज नहीं थी।

'सर, आप लोग अपने को गोरा समझते हैं. सुन्दर भी। पर आप क्यों भूल जाते हैं-यूरोपियनों की निगाह में सारा हिन्दुस्तान ब्लैक है, काला है। '

' अब तो चुप हो जाओ, बहुत हो गया। '

'क्यों? बताइये न सर जी। आप तो संवेदनशील साहित्यिक पुरुष हैं... अफसोस कि सुन्दरता को केवल चेहरे पर देखते हैं. भोगते हैं। बार-बार मन को धोखा देते हैं। चुप क्यों रहूँ? क्या गलती है मेरी?' 'मैडम, आप ही बताइये न लोग मन के आन्तरिक भाव-जगत की खुशबू से खिलवाड़ क्यों करते हें?'

एक विवश सन्नाटा कॉलेज को छू रहा है। अन्तहीन प्रश्नों के आवेग से मैडम वर्मा अवाक सी हो गयी थीं। हिन्दीवाले सर के स्वर में बहुरुपिया कायरता उभरने लगी।

'सुमन तुम तो कोई बात सुन ही नहीं रही हो। काली माई सवार हो गई हैं तुम पर। ' बिलकुल नहीं सर, मेरे ऊपर कोई सवार नहीं.... मैं काली स्वयं हूँ। मुझ पर कोई सवार हो ही नहीं सकता

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