गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

14 अप्रैल जन्मदिवस पर विशेष आलेख - संघर्ष की प्रतिमूर्ति : बाबा साहेब आम्बेडकर

14 अप्रैल जन्मदिवस पर विशेष

संघर्ष की प्रतिमूर्ति बाबा साहेब आम्बेडकर

-अनामिका

डॉ. भीमराव आम्बेडकर की प्रतिष्ठा भारतीय समाज में देश के कानून निर्माता के रूप में है. भारत रत्न से अलंकृत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का अथक योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता. वे हम सब के लिये प्रेरणास्रोत के रूप में युगों-युग तक उपस्थित रहेंगे. उनके विचार, उनकी जीवनशैली और उनके काम करने का तरीका हमेशा हमें उत्साहित करता रहेगा. बाबा साहेब धनी नहीं थे और न ही किसी उच्चकुलीन वर्ग में जन्म लिया था. वे अपने जन्म के साथ ही चुनौतियों को साथ लेकर इस दुनिया में आये थे लेकिन इस कुछ कर गुरजने की जीजिविषा ने उन्हें दुनिया में वह मुकाम दिया कि भारत वर्ष का उनका आजन्म ऋणी हो गया.  बाबा साहेब आज भले ही हमारे बीच में उपस्थित नहीं हैं लेकिन उन्होंने एक सफल जीवन जीने का जो मंत्र दिया, एक रास्ता बनाया, उस पर चलकर हम एक नये भारत के लिये रास्ता बना सकते हैं. यह रास्ता ऐसा होगा जहां न तो कोई जात-पात होगा और न ही अमीरी-गरीबी की खाई होगी. समतामूलक समाज का जो स्वप्न बाबा साहेब ने देखा था और उस स्वप्न को पूरा करने के लिये उन्होंने जिस भारतीय संविधान की रचना की थी, वह रास्ता हमें अपनी मंजिल की तरफ ले जायेगा. 

14 अप्रेल 1891 का वह शुभ दिन जब देश की यह भूमि कृतार्थ हो गयी क्योंकि इस दिन एक ऐसे बालक ने जन्म लिया था, जिसने अपने कार्यों से इतिहास लिख दिया. यह वह समय था छुआ-छूत का मसला शीर्ष पर था और ऐसे में बाबा साहेब जैसे लोगों को आगे बढऩा बेहद कठिन था लेकिन कभी ‘कभी हार नहीं मानूगां’ के संकल्प के साथ उन्होंने सारे कंटक भरे रास्ते को सुगम बना लिया. कहते हैं, जहाँ चाह है वहाँ राह है। प्रगतिशील विचारक एवं पूर्णरूप से मानवतावादी बङौदा के महाराज सयाजी गायकवाङ़ ने भीमराव जी को उच्च शिक्षा हेतु तीन साल तक छात्रवृत्ति प्रदान की, किन्तु उनकी शर्त थी की अमेरिका से वापस आने पर दस वर्ष तक बङौदा राज्य की सेवा करनी होगी। भीमराव ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से पहले एम. ए. तथा बाद में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की। ‘भारत का राष्ट्रीय लाभ’  विषय पर उनके इस शोध के कारण उनकी बहुत प्रशंसा हुई। उनकी छात्रवृत्ति एक वर्ष के लिये और बढ़ा दी गई। चार वर्ष पूर्ण होने पर जब भारत वापस आये तो बङौदा में उन्हे उच्च पद दिया गया किन्तु कुछ सामाजिक विडंबना की वजह से एवं आवासीय समस्या के कारण उन्हें नौकरी छोङक़र बम्बई जाना पङ़ा। 

बम्बई में सीडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए किन्तु कुछ संकीर्ण विचारधारा के कारण वहाँ भी परेशानियों का सामना करना पङ़ा। इन सबके बावजूद आत्मबल के धनी भीमराव आगे बढ़ते रहे। उनका दृढ़ विश्वास था कि मन के हारे, हार है, मन के जीते जीत। 1919 में वे पुन: लंदन चले गये। अपने अथक परिश्रम से एम.एस.सी., डी.एस.सी. तथा बैरिस्ट्री की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे। 1923 में बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत शुरु की अनेक कठनाईयों के बावजूद अपने कार्य में निरंतर आगे बढते रहे। एक मुकदमे में उन्होने अपने ठोस तर्कों से अभियुक्त को फांसी की सजा से मुक्त करा दिया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। इसके पश्चात बाबा साहेब की प्रसिद्धि में चार चाँद लग गया।

डॉ. आंबेडकर की लोकतंत्र में गहरी आस्था थी।  उनकी दृष्टि में राज्य एक मानव निर्मित संस्था है। इसका सबसे बङा कार्य ‘समाज की आंतरिक अव्यवस्था और बाह्य अतिक्रमण से रक्षा करना है।’ परन्तु वे राज्य को निरपेक्ष शक्ति नही मानते थे। उनके अनुसार- ‘किसी भी राज्य ने एक ऐसे अकेले समाज का रूप धारण नहीं किया जिसमें सब कुछ आ जाय या राज्य ही प्रत्येक विचार एवं क्रिया का स्रोत हो।’ अपने कठिन संर्घष और कठोर परिश्रम से उन्होंने प्रगति की ऊंचाइयों को स्पर्श किया था। अपने गुणों के कारण ही संविधान रचना में, संविधान सभा द्वारा गठित सभी समितियों में 29 अगस्त, 1947 को ‘प्रारूप-समिति’ जो कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण समिति थी, उसके अध्यक्ष पद के लिये बाबा साहेब को चुना गया।  संविधान सभा में सदस्यों द्वारा उठायी गयी आपत्तियों, शंकाओं एवं जिज्ञासाओं का निराकरण बङ़ी ही कुशलता से किया गया। उनके व्यक्तित्व और चिन्तन का संविधान के स्वरूप पर गहरा प्रभाव पङ़ा। उनके प्रभाव के कारण ही संविधान में समाज के पद-दलित वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उत्थान के लिये विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाओं और प्रावधानों का निरुपण किया ; परिणामस्वरूप भारतीय संविधान सामाजिक न्याय का एक महान दस्तावेज बन गया।

मधुमेह रोग से पीडि़त बाबा साहेब ने अपनी अंतिम पांडुलिपि ‘बुद्ध और उनके धम्म’ को पूरा करने के तीन दिन बाद 6 दिसंबर 1956 को अपना शरीर त्याग दिया.  बाबा साहब कहते थे कि -मैं  ऐसे  धर्म  को  मानता  हूँ  जो  स्वतंत्रता , समानता, और  भाईचारा  सिखाये.  अगर  धर्म  को  लोगो  के  भले  के  लिए  आवशयक  मान  लिया  जायेगा तो  और  किसी  मानक  का  मतलब  नहीं  होगा. उन्होंने जो कहा, उसका निर्वाह जीवन भर किया. आज भले ही बाबा हमारे बीच नहीं हैं लेकिन एक आदर्श समाज की रचना करने का जो पथ वे आलौकित कर गये हैं, वे भारत को नित विकास के पथ पर आगे बढ़ाते रहेंगे. डॉ. भीमराव आम्बेडकर का जन्म भारत की जिस धरा पर हुआ, वह आगे चलकर मध्यप्रदेश कहलाया. मध्यप्रदेश को देश का ह्दयप्रदेश भी कहा जा सकता है और उस ह्दयप्रदेश में बाबा साहेब जैसे महान व्यक्ति का जन्म हुआ तो ह्दयप्रदेश, मध्यप्रदेश स्वयं को गौरवांवित महसूस कर सकता है और करना भी चाहिये. बाबा साहेब का जन्मस्थल महू आज एक नगर नहीं बल्कि तीर्थनगरी है और हर वर्ष करोड़ों लोग आत्मबल प्राप्त करने के लिये इस तीर्थस्थल में आते हैं.

{टिप्पणीकार युवा पत्रकार हैं और भोपाल में रहती है }

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