नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

दीपक आचार्य का आलेख - कमजोरी का लक्षण है शिकायत करना

कमजोरी का लक्षण है

शिकायत करना

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

सांसारिकों और शिकायतों के बीच सनातन रिश्ता रहा है। कोई भी संसारी इंसान किसी की भी शिकायत न करे अथवा उसे किसी से कोई शिकायत न हो, यह संभव नहीं है।

शिकायत करना आदमी का परंपरागत स्वभाव रहा है और उसे वह हमेशा अपनाए रखता है। कुछेक लोग हो सकते हैं जो किसी से कोई शिकायत नहीं करते हैं। वे लोग या तो ईश्वर पर अनन्य श्रद्धा रखने वाले होते हैं अथवा नैष्ठिक कर्मयोगी, जिन्हें अपने काम से मतलब है औरों से कुछ नहीं। कोई मदद करे या साथ दे तब भी ठीक, और न दे तब भी ठीक।

इन लोगों को इससे कोई फरक नहीं पड़ता कि कौन उनका साथ दे रहा है, कौन आदर-सम्मान या प्रोत्साहन दे रहा है अथवा कौन प्रशंसा-निन्दा कर रहा है।

आम तौर पर हममें से हरेक इंसान को किसी न किसी से शिकायत होती ही है। घर-परिवार या रिश्तेदारों से लेकर सहकर्मियों या पड़ोसियों तक से हमेें अक्सर शिकायत रहती ही है ।

कुछ लोगों का कोई सा दिन ऎसा नहीं जाता होगा जिस दिन किसी न किसी के बारे में शिकायत बयाँ नहीं की हो। अधिकांश लोग शिकायतों भरी आबोहवा में ही रमण करते हैं और उसी से उन्हें आनंद प्राप्त होता है।

कुछ लोगों को अपने आप से शिकायत होती है और वे दूसरों के सामने अपना रोना हमेशा रोते रहते हैं जबकि अधिकतर को दूसरों से शिकायतें होती हैं कि अमुक इंसान काम नहीं करता, ईमानदार नहीं है, कामचोर है, नालायकी करता है, भ्रष्ट और बेईमान है, बदतमीज है, संवेदनहीन है आदि-आदि।

यही सब कुछ हमारे आस-पास जिन्दगी भर चलता रहता है। शिकायतों के बारे में आमतौर पर यही धारणा होती है कि हर कोई इंसान दूसरे में गलतियाँ तलाशता है और सुधार लाना चाहता है लेकिन कोई भी अपनी तरफ देखना नहीं चाहता, अपनी गलतियों का अहसास नहीं करता।

खूब सारे लोग गलतियां बताने पर भी स्वीकार करने को तैयार नहीं होते और ढीठ व निर्लज्ज ही बने रहते हैं। कई सारे लोगों ने शिकायतों का घंधा अपना लिया है जिसके सहारे इनकी पूरी जिन्दगी निकल जाती है।

शिकायतें करने वालों का अनुभव है कि शिकायतों से कुछ नहीं होता। शिकायतें करने वाले लोग अपनी ऊर्जा, समय, श्रम और पैसा नष्ट करते हैं। कई बार लोग अधिकार सम्पन्न होने के बावजूद दूसरों की शिकायतें करते हैं।

बहुत से लोग ऎसे हैं जो शक्ति सम्पन्न होते हैं और राजधर्म का निर्वाह करना जिनके जिम्मे होता है लेकिन ऎसे लोग भी कभी दया, प्रलोभन और मोह के चक्कर में आकर किसी को कुछ कह पाने से परहेज रखते हैं और अपनी दयालु या कृपालु छवि को बनाए रखने के लिए कामचोरों, निकम्मों, नालायकों और विघ्नसंतोषियों पर अंकुश लगाने की बजाय इनकी शिकायतें करके भडास निकालते रहते हैं। 

सनातन सत्य और शाश्वत तथ्य यह है कि दूसरों की शिकायत करने वाला हर इंसान कमजोर होता है। अपनी मर्यादाओं में रहकर शक्तियों का प्रभावी उपयोग करने की कला जो लोग सीख जाते हैं वे कभी भी दूसरों की शिकायत नहीं करते।

ऎसे लोग निर्णायक भूमिका में होते हैं और अपनी शक्तियों का पूरा-पूरा परिचय देते हुए माहौल को अपने अनुकूल कर लिया करते हैं, चाहे कैसी भी विषम परिस्थितियां क्यों न हों, कितने ही शातिर कामचोरों से पाला क्यों न पड़े।

जहाँ तक संभव हो अपने अधिकारों, शक्तियों और प्रभावों के इस्तेमाल से कभी कोई परहेज न रखे, अपात्रों और अनुशासनहीनों को हतोत्साहित करना, उन्हें दण्डित करना और सबक सिखाना समाज हित में है और जो लोग पुरुषार्थहीन बने रहते हैं उन्हें दण्ड देना ही आज का असली राष्ट्रवाद है।

इस देश को कमजोर किसी और ने नहीं किया, कामचोरों और बेईमानों के ही कारण देश में भ्रष्टाचार और कर्महीनता का माहौल देखा जाता है। शिकायतें करने का स्वभाव छोड़ें और कुपात्रों के उन्मूलन में अपनी शक्ति लगाएं, यही स्वच्छता अभियान का संदेश है।

अपनी छवि बनाना अपने हाथ है।  नालायकों को ठिकाने लगाने के लिए अधिकारों का भरपूर उपयोग इस प्रकार करें कि निकम्मे और खुदगर्ज लोग खुद हैरान-परेशान होकर हमारी शिकायतें करने को विवश हो जाएं। इसी में हमारी सफलता है।

यही आज का राजधर्म, मानव धर्म और विश्व धर्म है।  देश को कामचोरों से मुक्ति दिलाए बिना राष्ट्र को परमवैभव पर पहुंचाने की कल्पना दिवा स्वप्न ही है।

---000---

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.