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निःशुल्क योजनाएं अर्थव्यवस्था पर भारी

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सूर्यकांत मिश्रा

० मध्यम वर्ग की कमर तोड़ने वाली योजना

शासकीय निःशुल्क योजनाएं भारत वर्ष के लगभग प्रत्येक राज्य में संचालित की जा रही है। इन योजनाओं के अंतर्गत गरीबों को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने के साथ एकलबत्ती विद्युत कनेक्शन, निःशुल्क शिक्षा, निःशुल्क शैक्षणिक सामग्री, मध्याह्न भोजन, निःशुल्क चिकित्सा, सायकिल, सिलाई मशीन, टेबलेट, लेपटॉप का निःशुल्क वितरण और न जाने कौन-कौन सी योजनाएं दी जा रही है। सवाल यह उठता है कि अपने कर्म पर विश्वास करने वाले मेहनती हिंन्दुस्तान को कर्मवीर से काम चोर बनाने की पहले सबसे पहले कहां से और क्यों शुरू की गयी? आज हिन्दुस्तान का कोई ऐसा प्रदेश नहीं, जो श्रम के लिये न भटक रहा हो। उद्योगों की संचालन, मशीनीकरण के बावजूद श्रमिकों पर ही निर्भर करता है। इस कटु सत्य को जानते हुए भी भारत वर्ष में काम न करने वालों की जमात तैयार करने जैसे फैसले भला क्यों लिये गये? इस पर मंथन करने कोई भी तैयार नहीं। करोड़ों-अरबों रूपयों का बजट में प्रावधान रखने वाली इन योजनाओं में हमारे आर्थिक ढांचे को कितना खोखला किया है, इसका अध्ययन अब जरूरी हो गया है। विश्व के बड़े और विकसित राष्ट्रों का कुल बजट जितने का होता है, उससे कहीं अधिक भारत वर्ष में निःशुल्क सुविधाओं के नाम पर लुटाये जा रहे है। इस प्रकार की योजनाएं कैसे विकास की प्रतीक है, इसे हमारे कर्णधार राजनीतिज्ञ ही बेहतर बता सकते है।

जैसा मैंने गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबंध में सुन रखा था कि वे अपने राज्य में लोगों को काम चोर बनाने वाली किसी योजना को लागू नहीं कर रहे है, तो मुझे ऐसा लगा था कि देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात मॉडल पूरे देश में लागू होगा, और लोगों को पेट भरने के लिये काम करना होगा। हालांकि अभी प्रधानमंत्री मोदी जी ने प्रधानमंत्री के रूप में एक वर्ष भी पूरा नहीं किया है। अतः किसी प्रकार का लांछन लगाना उचित नहीं होगा, किंतु जहां तक मैंने समझा है, अभी तक के कार्यकाल में ऐसा कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है, जो मुक्त की येाजनाओं को समेटने से संबंध रखता हो। पहली बार इतने बड़े बहुमत के साथ भाजपा ने केंद्र में सरकार बनाई और फिर राज्यों की चुनावों में भी लगातार कांग्रेस अथवा अन्य पार्टियों से सत्ता छीनते हुए अधिकांश राज्य में अपनी सरकारें बैठाने में कामयाब रही। इन सबके बात तो यही आशा की जा सकती है कि अब देश की आर्थिक स्थिति मजबूती की ओर अग्रसर होगी, किंतु न जाने कौन सी विवशता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री का कार्यभार संभाल रहे अरूण जेटली ने एक निराशाजनक बजट पेश किया। इतना ही नहीं इससे पूर्व रेल मंत्री प्रभु ने भी लोगों के सपनों को चकनाचूर कर दिया। देश के अनेक प्रदेशों में चल रही मुफ्त की योजनाओं ने किस कदर अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी तोड़ी है, उसे पूरा देश समझ रहा है। फिर भी उन्हें बंद करने की हिम्मत न जुटाना कहीं न कहीं वोट की राजनीति को ही पुष्ट करता दिख रहा है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह जो अपनी तीसरी पारी खेल रहे है, उन्होंने भी राज्य में 6 हजार 8 सौ 36 करोड़ के घाटे का बजट पेश किया। बावजूद इसके निःशुल्क योजनाओं पर ऊंगली नहीं उठाई गई। वैसे अर्थव्यवस्था में विकास के मद्देनजर घाटे का बजट ही एक अच्छी सरकार का प्रतीक माना जाता है, किंतु वास्तविकता के धरातल में घाटा कहीं होता नहीं है। केवल छद्म रूप में उसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है। गरीबों को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने हजारों करोड़ रूपये का प्रावधान बजट में रखा गया है, जिस धान की खरीदी 11-12 सौ रूपये क्विंटल में की जा रही है और प्रति क्विंटल 300 रूपये बोनस दिया जा रहा है, उसी धान से निकाले गये चावल को मात्र 1-2 रूपये प्रति किलो में बेचकर सरकार जो प्रतिकिलो घाटा उठा रही है, उसकी पूर्ति महंगाई के रूप में मध्यम वर्ग की कमर तोड़ रही है। गेंहू से लेकर दाल, चीनी, नमक और न जाने क्या-क्या इसी प्रकार के घाटे की स्थिति में गरीबों को दिया जा रहा है। सारी मुफ्त की योजनाओं को बंद कर सरकार काम उपलब्ध कराते हुए मजदूरी में वृद्धि कर सके तो देश की आर्थिक दशा सुधार पर आने के साथ ही लोगों को कर्म के प्रति अग्रसर करने में कारगर हो सकती है। ऐसा करने से निर्माण कार्यों में गति आ सकेगी और उद्योगों में लगे ताले भी वापस खोले जा सकेंगे। ऐसे करोड़ों-अरबों रूपये जो फालतू की योजनाओं में बर्बाद किये जा रहे है, उनसे विकास कार्यों के दरवाजे खोले जा सकते है।

शासकीय महाविद्यालयों और अभियांत्रिकीय महाविद्यालयों में निःशुल्क बांटे जाने वाले टेबलेट तथा लेपटॉप पर भी हमारे प्रदेश की डा. रमन सिंह सरकार ने अरबों रूपये विगत वर्षों तथा इसी नई पारी में खर्च किये है। टेबलेट देने का औचित्य तो समझ से परे है ही। इंजीनियरिंग के छात्रों को उपयोगी लेपटॉप निःशुल्क देना बे सिर पैर की योजना से कम नहीं है। कारण यह कि जो विद्यार्थी इंजीनियरिंग कालेज का लाखों रूपयों का शुल्क बिना दर्द से अदा कर सकता है, वह कुछ हजार रूपये में मिलने वाले लेपटॉप को क्यों नहीं खरीद सकता? दूसरी बात यह भी की सरकार द्वारा जब लेपटॉप और टेबलेट का वितरण मार्च-अप्रैल माह में किया जाता है, तब तक पूरा शैक्षणिक सत्र समाप्त हो चुका होता है। योजना अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों के लिये होती है, अतः उसका उपयोग शून्य की स्थिति में आकर रूक जाता है। अब छत्तीसगढ़ सरकार ने वॉट्सएप और फेसबुक के बढ़ते चरण को देखते हुए युवा मन को जितने का नया षड्यंत्रकारी विचार मन में लाया है। सभी शासकीय महाविद्यालय में वाईफाई सुविधा निःशुल्क देकर क्या सरकार अपने वोट बैंक के साथ साइबर क्राईम को भी प्रश्रय नहीं दे रही है? विज्ञान के आविष्कार और नई तकनीकी जहां विज्ञान को आगे ले जा रही है, वहीं कानून के लिये हमेशा अड़चनें भी पैदा करती रही है। विश्व की सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था वाले देश अमेरिका की अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष साइबर अपराधों की वजह से सौ बिलियन डॉलर की क्षति उठानी पड़ रही है।

हमारे प्रदेश की सरकारें यदि निःशुल्क दी जा रही है सेवाओं को किसी उचित योजना में तब्दील कर बंद कर दे तो देश एवं प्रदेश की अर्थव्यवस्था पटरी पर दौड़ने लगेगी। साथ ही इन योजनाओं के कारण प्रतिदिन बढ़ रही महंगाई भी नियंत्रण में आ सकेगी। सवाल यह उठता है गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों को दी जा रही सुविधा बंद करके सत्ता के सुख का त्याग कौन करे? हम आज की इन निःशुल्क योजनाओं को स्वतंत्रता के बाद 10 वर्षों के लिये लागू की गयी आरक्षण नीति के रूप में देख सकते है, जिसका दंश देश अब तक भुगत रहा है

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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sahi likha hai par yojnaon ki sameeksha tak nahi ki jaati hai

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