बुधवार, 13 मई 2015

शिक्षा-शिक्षण हेतु नितांत अनिवार्य पाठ- ‘बच्चे असफल कैसे होते हैं?’

image

राकेश बाजिया

                          'हाउ चिल्ड्रन फेल' शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों को लेकर एक अंतराष्ट्रीय बहस की शुरुआत करवाती है , जिसके लिए सबसे ठोस आधार जॉन हॉल्ट बच्चो को खास तरह की श्रेणी में विभक्त कर रखते हैं। विद्यार्थियों के लिए उत्पादक और विचारक जैसे सार्थक शब्दों का प्रयोग कोई उनकी क्षमता को ठीक से जानने के बाद ही कर सकता है। जो की बच्चों से सीधा जुड़ता है ,जिज्ञासा का फलक कितना विस्तृत है यह किसी से छिपा नहीं है। फिर बच्चों में इस प्रकृति को सिर्फ ढूंढना नहीं अपितु विकसित करना और भी जटिल मगर संभव कार्य है, जिस पर हॉल्ट खरे उतरते हैं। जैसा कि  'चुप रहना एक बेहद सुरक्षित नीति है ' व्यवहारिक तौर पर बच्चे इस नीति का प्रयोग एक नीति के तहत ही करते हैं। जिसकी पहचान पुस्तक भली -भांति कराती है। साथ ही होल्ट कक्षा-कक्ष के उस विशेष माहौल को इंगित करते हैं कि 'कक्षा कक्ष में एक विशेष तरीके का भय होता है , जो बच्चों को समझ आने पर भी प्रश्न करने से रोकता है। पर शायद इसकी पहचान करना भी उतना ही आवश्यक है कि ऐसा क्यों होता है ? 

शब्द की कठोरता पहचान कर बच्चे द्वारा नए शब्दों का निर्माण कर लेना सीधे शिक्षकों के उस खाके पर प्रहार करता है , जिसमें वे बच्चों कि सीखने की सीमा निर्धारित मानते हैं। जैसा की माना जाता है अटकलें भिड़ानें और तुक्के लगानें की कला बच्चे खुद अख्तियार करते हैं, पर ध्यान देने वाली बात है की इसके लिए परिस्थिति उन्हें तैयार करती है। आगे हॉल्ट इस तथ्य से रूबरू करवाते हैं कि शिक्षक में स्वीकार भाव की कमी के चलते वैचारिक छात्रों की प्रतिभा दोषमंडित होकर सिर्फ दबी रह जाती है।

बच्चों के आपसी व्यवहार पर जिस तरह का जोर हॉल्ट देते हैं वह निहायत जरूरी है। पर यह भी समझना जरूरी है की क्या वास्तव में बच्चों का आपसी व्यवहार अनुशासन के पैमानों में आता है ? यदि बच्चों के आपसी व्यवहार की समझ भी शिक्षक रखें तो यह कहाँ तक संभव है ? शायद इसका व्यवहारिक ठोस रूप हम स्कूल में बच्चों द्वारा की गयी एक दूसरे की शिकायतों में देख सकते हैं। ऐसी स्थिति में बरबस एक शिक्षक याद आ जाते है , जो शिकायत लेकर जाने वाले बच्चे से कहा करते थे "दोनों आ जाओ " या इसका कोई और सार्थक निदान भी हो सकता है।

जबकि ' बच्चों में अनंत ऊर्जा होती है ' फिर क्यू नियम का निर्माण एक बात है और बच्चों द्वारा उसका पालन करवाना दूसरी यहाँ हॉल्ट यह कहकर कि ' क्यू के पहले का शोर ही उसके कारगर होने का राज़ भी है ' संतुष्ट होते नज़र आते हैं पर व्यवहारिक तौर पर इसे समझने से पता चलता है , की जो नियम बच्चों की और से लागु होता है उसमें वे उतनी ही श्रद्धा और पालन में तत्परता दिखाते हैं।

लेखक पुस्तक में बुद्धिहीनता की परिभाषा जिस तरह मनोवैज्ञानिकों के माध्यम से देते हैं , वह प्रभाव छोड़ती है। यहाँ मनोवैज्ञानिक उनकी परिभाषा की गारंटी देते हैं , पर क्या वाकई मेधा की मात्रा कम होना बुद्धिहीनता है ? जैसा की बच्चों की बौद्धिक क्षमता का विकास करने का जिम्मा शिक्षा का है , और वह ये दावा भी करती है। यही तय करती है कि उसे सभ्य कहे जाने वाले समाज को कैसा नागरिक देना है। तो जाहिर है अबोध बच्चे अपने मार्गदर्शक जो की शिक्षक होता है, की बातों को, उसके व्यवहार को, अपने जीवन में शत-प्रतिशत सत्य के साथ उद्घाटित करने का प्रयास करेंगे , ऐसे में शिक्षा कर्मियों की जिमेदारी और भी गहरी हो जाती है , जिससे बचा नहीं जा सकता। कुल मिलाकर छात्रों के लिए खराब शब्द के प्रयोग ( जो की तर्कसंगत नहीं लगता )  को यदि छोड़ दें तो अवलोकन पर आधारित यह पुस्तक शिक्षा-शिक्षण के क्षेत्र में अपने प्रामाणिक अनुभवों के जरिये नए मान गढ़ती है

 

राकेश बाजिया

पुस्तक : बच्चे असफल कैसे होते हैं ?

लेखक : जॉन होल्ट

अनुवाद: पूर्वा याज्ञिक कुशवाह

प्रकाशन: एकलव्य

मूल्य : 100.00 रू.

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------