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भाषाविज्ञान

महावीर सरन जैन

परिभाषा (नामकरण) स्वरूप एवं व्याप्ति अथवा अध्ययन-क्षेत्र

परिभाषा एवं नामकरण

भाषाविज्ञान भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। इसमें भाषा के समान्य पक्षों पर तथा विशेष भाषा अथवा भाषाओं का भाषाविज्ञान की अध्ययन पद्धति अथवा प्रविधि के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन किया जाता है। भाषागत अध्ययन करने वाले विषयों के लिए अंग्रेजी में दो नाम अधिक प्रचलित रहे हैं –

(1) फिलालोजी (Philology)

(2) लिंग्विस्टिक्स (Linguistics)

(यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बीसवीं शताब्दी में ये दोनों पर्याय के रूप में प्रयुक्त नहीं होते। हमारा विवेच्य विषय ‘फिलालोजी’ न होकर ‘लिंग्विस्टिक्स’ है।)

हिन्दी में सन् 1960 से 1970 तक कुछ भाषावैज्ञानिकों ने फिलालोजी शब्द के लिए ‘भाषाविज्ञान’ तथा लिंग्विस्टिक्स के लिए ‘भाषाशास्त्र’ शब्दों का प्रयोग किया। सम्प्रति, ‘लिंग्विटिक्स’ को ‘भाषाविज्ञान’ तथा ‘फिलालोजी’ को ‘वाङ् मीमांसा’ से अभिहित किया जा रहा है। द्वितीय महायुद्ध के पूर्व यूरोप एवं अमेरिका में भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले विषय के लिए अनेक नाम प्रचलित थे। विशेष प्रचलित नामों में ‘कम्पेरेटिव ग्रामर’ ‘कम्पेरेटिव फिलालोजी’ अथवा ‘फिलालोजी’ शब्दों का प्रयोग अधिक होता था। सन् 1916 ई0 में डेवीज ने भाषाविज्ञान से मिलते-जुलते अर्थ में ग्लासालोजी (Gloss logy) शब्द का प्रयोग किया था। इसी प्रकार सन् 1841 में प्रिचर्ड ने इस विषय के लिए ग्लाटालोजी (Glottology) का प्रयोग किया। मैक्समूलर ने इस शब्द का भाषाविज्ञान से थोड़े भिन्न अर्थ में प्रयोग किया। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में टकर ने भाषा का अध्ययन करने वाले शास्त्र के अन्य सभी नामों की आलोचना की तथा ग्लाटालोजी शब्द को सबसे अधिक उपयुक्त बतलाया एवं संगत ठहराया। किन्तु न जाने क्यों यह नाम अधिक न चल सका तथा सबसे अधिक प्रचलित नाम ‘फिलालोजी’ ही रहा। फिलालोजी मूलतः ग्रीक भाषा का शब्द है। वहाँ इसका रूप ‘Philologos’ है। इसमें ‘फिलोस’ का अर्थ है ‘अनुराग’ एवं ‘लोगोस’ का अर्थ है – (1) बातचीत करना (2) शब्द (3) भाषा। ग्रीक से लैटिन में इसका रूप ‘फिलोलाजिया’ (Philologia) तथा फ्रांसीसी में फिलोलाजीय (Philologie) हुआ।

अंग्रेजी में ‘फिलालोजी’ शब्द का प्राचीनम प्रयोग सन् 1386 ई0 में मिलता है। उस समय यह शब्द भाषा के व्याकरणिक अध्ययन के अतिरिक्त साहित्यिक आलोचना तथा सम्बन्धित सामाजिक सांस्कृतिक ज्ञान के लिए प्रयुक्त होता था। बाद में यह शब्द ग्रीक एवं लैटिन आदि शास्त्रीय भाषाओं को समझने में सहायता देने वाले शास्त्र के अर्थ में व्यहृत होने लगा।

भाषा का अध्ययन करने वाले विज्ञान के पर्याय के रूप में इस शब्द का प्रयोग 18वीं सदी के दूसरे दशक में मिलता है। तब से आरम्भ होकर इस शब्द का प्रयोग 19वीं शताब्दी के अन्त तक होता रहा। आज भी इंग्लैंड में तथा भारत एवं अन्य देशों में फिलालोजी शब्द का परम्परागत प्रयोग होता है। कलकत्ता विश्वविद्यालय में आज भी इस विषय के विभाग का नाम ‘डिपार्टमेंट ऑफ कम्पेरेटिव फिलालोजी’ है। धीरे-धीरे इस नाम का प्रचलन कम होता जा रहा है और इसके स्थान पर लिंग्विस्टिक्स शब्द का प्रयोग बढ़ रहा है। भाषाविज्ञान की पुस्तकों में फिलालोजी शब्द का परिचय इस प्रकार दिया जाता है कि यह इंग्लैंड में लिंग्विस्टिक्स के पर्याय रूप में तथा अन्यत्र साहित्यिक विषयक अध्ययन के लिए प्रयुक्त होता है।

(Joshua Whatmough : Language – A Modern Synthesis, p.233, New York, 1957)

भाषाविज्ञान के लिए अंग्रेजी में प्रयुक्त लिंग्विस्टिक्स शब्द का मूल आधार लैटिन शब्द लिंगुवा (lingua) है जिसका अर्थ जिह्वा होता है। इसके लिए फ्रांसीसी में लेंग्विस्टिक (Linguistique), जर्मनी में स्प्राख विशेन शैफ्ट (Sprachwissenschaft) तथा रूसी में यजिकाज्नानिये (yazikoznanie) शब्दों का प्रयोग होता है।

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों तक यूरोप एवं अमेरिका में ‘फिलालोजी’ एवं ‘लिंग्विस्टिक्स’ शब्दों का प्रयोग समान अर्थों में होता था। तदनन्तर ‘फिलालोजी तथा लिंग्विस्टिक्स शब्द पर्याय न रहकर भिन्न अर्थ के द्योतक हो गये। प्रसिद्ध भाषा शास्त्री स्त्रुतवाँ (Sturevant) ने दोनों शब्दों की व्याख्या की है तथा दोनों की भिन्नताओं का प्रतिपादन किया है। ब्लूमफील्ड ने भी शब्दों को भिन्न अर्थों में प्रयुक्त करने पर बल दिया है।

(Bloomfield : Language, p. 502, (19350))

हिन्दी में पहले ‘भाषाविज्ञान’ तथा ‘भाषाशास्त्र’ शब्दों का समान अर्थ में प्रयोग होता था। डॉ. उदय नारायण तिवारी ने अपनी पुस्तक ‘भाषा शास्त्र की रूपरेखा’ में ‘फिलालोजी’ के लिए ‘भाषाविज्ञान’ तथा लिंग्विस्टिक्स’ के लिए ‘भाषाशास्त्र’ का प्रयोग किया था किन्तु ‘फिलालोजी‘ के लिए ‘भाषाविज्ञान’ रूढ़ न हो सका। ‘भाषाविज्ञान’ का प्रयोग ‘लिग्वस्टिक्स’ के अर्थ में ही होता है।वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा निर्मित मानविकी शब्दावली (भाषा विज्ञान) में ‘लिंग्विस्टिक्स’ के लिए ‘भाषा-विज्ञान’ एवं ‘फिलालोजी’ के लिए ‘वाङ् मीमांसा’ शब्द का प्रयोग हुआ है। यद्यपि लिंग्विस्टिक्स के लिए ‘भाषाविज्ञान’ के अतिरिक्त ‘भाषाशास्त्र’, भाषतत्त्व’, ‘भाषाविचार’, ‘भाषालोचन’ ‘भाषामीमांसा’ ‘भाषिकी’ आदि विविध शब्दों का प्रयोग होता है, तथापि सर्वाधिक प्रचलित नाम ‘भाषाविज्ञान’ ही है। इसे भारत सरकार द्वारा मान्यता भी प्राप्त है। अतः लिंग्विस्टिक्स के लिए ‘भाषाविज्ञान’ शब्द का प्रयोग करना ही अधिक उपयुक्त है। फिलालोजी को देवनागरी लिपि में लिखकर भी व्यक्त किया जा सकता है अथवा इसके लिए ‘वाङ् मीमासा’ शब्द का भी प्रयोग हो सकता है। नीचे ‘भाषाविज्ञान’ एवं ‘वाङ् मीमांसा’ के अन्तर का प्रतिपादन किया जा रहा है।

1. ‘वाङ् मीमांसा’ शब्द का प्रयोग लिखित भाषा एवं साहित्य तथा शिलालेखों की भाषा के संदर्भ में किया जाता है। स्त्रुतवाँ ने इनका प्रयोग पाठालोचन के संदर्भ में करते हुए लिखा कि मैं ‘वाङ् मीमांसा’ शब्द का प्रयोग लिखित प्रमाणों के अध्ययन के लिए करता हूँ। ‘वाङ् मीमांसा’ सबसे पहले शुद्ध पाठ की स्थापना की ओर ध्यान देता है।

2. ‘वाङ् मीमांसा’ शब्द से भिन्न ‘भाषाविज्ञान’ शब्द का प्रयोग मूलतः उच्चारित भाषाओं एवं बोलियों के विश्लेषण के लिए किया जाता है।

3. ‘वाङ् मीमांसा’ के अन्तर्गत भाषा के लिखित साहित्य में प्राप्त व्याकरणिक रूपों एवं शब्दावली का अध्ययन उनके प्राचीन रूपों के संदर्भ में किया जाता है तथा साहित्यकार के द्वारा प्रयुक्त विशिष्ट व्याकरणिक रूपों अथवा शब्दावली प्रयोग की विवेचना की जाती है। एकाधिक भाषाओं में प्राप्त शब्दावली एवं व्याकरणिक रूपों के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा उनकी सांस्कृतिक एवं भावात्मक प्रवृत्तियों के साम्य वैषम्य का निरूपण भी किया जाता है। इस अध्ययन का उद्देश्य साहित्य को समझाना अधिक रहा है।

4. भाषाविज्ञान में भाषा को केन्द्र मानकर उसकी विशिष्टता जानने के लिए अध्ययन किया जात है। इस प्रकार ‘वाङ् मीमांसा’ के लिए भाषा का अध्ययन साहित्य एवं संस्कृति के अर्थ का उद्घाटन करने के लिए साधन है जबकि भाषाविज्ञान में भाषा का अध्ययन अपने आप में साध्य है।

5. ‘वाङ् मीमांसा’ अध्ययन में सबसे अधिक महत्व ध्वनिविज्ञान (Phonetics) एवं अर्थ विज्ञान (Semantics) पर दिया जाता है। अर्थ का अध्ययन करते समय शब्दों की शैली, भाषा का साहित्यिक विवेचन एवं उनसे सम्बंधित सांस्कृतिक प्रवृत्तियों की विवेचना भी की जाती है। इस सम्बंध में ‘ब्लूमफील्ड’ ने लिखा है कि ‘वाङ् मीमांसाकार’ की रूचि बहुत व्यापक होती है। वह जिस भाषिक सामग्री का अध्ययन करता है उसकी सांस्कृतिक पृष्ठ-भूमि एवं उसके महत्त्व की जानकारी की दिशा में भी प्रवृत्त होता है। भाषाविज्ञान में सबसे अधिक महत्व भाषा की व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं के अध्ययन पर होता है। भाषावैज्ञानिक ध्वनि-विज्ञान एवं अर्थ-विज्ञान को उतना महत्व नहीं देता। उसके अध्ययन का प्रधान उद्देश्य किसी भाषा के ध्वनिमों अथवा स्वनिमों (Phonemes) का निर्धारण एवं रूपिमों (Morphemes) तथा वाक्यविन्यास (Syntactic) सम्बंधी अध्ययन प्रस्तुत करना है।

6. ‘वाङ् मीमांसा’ का क्षेत्र अधिक व्यापक एवं अनिश्चित है। उसकी सीमाओं में साहित्य, भाषा, शैली, कोश निर्माण, पाठालोचन के आधार पर ग्रन्थों का संशोधन एवं सम्पादन, लोकवार्ता का विश्लेषण आदि सभी आ जाते हैं। भाषाविज्ञान शब्द का प्रयोग भाषा की संचरनाओं एवं व्यवस्थाओं को भाषा विशेष के संदर्भ में विश्लेषित एवं विवेचित करने वाले अध्ययन विषय के अर्थ में अधिक होता है।

7. भाषा के विश्लेषण की पद्धति के अन्तर ने भी ‘वाङ् मीमांसा’ एवं भाषाविज्ञान के अन्तर को बढ़ा दिया है। ‘वाङ् मीमांसा’ से आज भी उस पद्धति का बोध होता है जिसके आधार पर 19वीं शताब्दी में यूरोप में कार्य सम्पन्न हुए थे किन्तु भाषाविज्ञान से उस प्रकार की विश्लेषणात्मक पद्धति का बोध होता है जिसे हॉकिट, हैरिस, याकोब्सन एवं चॉम्स्की आदि भाषावैज्ञानिकों ने अपनाया है।

8. भाषाविज्ञान में किसी भाषा जनसमुदाय के प्रत्येक क्षेत्र एंव वर्ग के भाषा-भाषियों के भाषिक रूपों को समान महत्व दिया जाता है। ‘वाङ् मीमांसा’ में किसी साहित्यकार की भाषा के अध्ययन पर अधिक बल दिया जाता है। जर्मनी में तो ‘वाङ् मीमांसा’ से साहित्यिक अध्ययन का ही अर्थ ग्रहण किया जाता है।

एककालिक अथवा संकालिक तथा कालक्रमिक भाषाविज्ञान की वैज्ञानिकता

20वीं शताब्दी के पूर्व भाषावैज्ञानिक एककालिक अथवा संकालिक भाषाविज्ञान का कोई महत्त्व नहीं समझते थे। वे यह मानते थे कि भाषा के विकास का अध्ययन करने वाली पद्धति के अतिरिक्त अन्य कोई पद्धति वैज्ञानिक नहीं होती। फर्डिनेंड डी. सस्यूर ने इस विचार को चुनौती दी तथा एककालिक अथवा संकालिक भाषाविज्ञान की वैज्ञानिकता पर बल दिया। सस्यूर ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी भाषा का अध्ययन दोनों प्रकार से सम्भव है –

1. एककालिक अथवा संकालिक (Synchronic) – एककालिकता संदर्भ में काल के किसी निश्चित बिन्दु पर भाषा का अध्ययन किया जाता है।

2. कालक्रमिक (Diachronic) – कालक्रमिकता संदर्भ में एकाधिक कालों में किसी भाषा में हुए विकास का अध्ययन किया जाता है। परम्परागत दृष्टि से यही ऐतिहासिक भाषाविज्ञान है।

उन्होंने यह मत प्रतिपादित किया कि एककालिक अथवा संकालिक भाषाविज्ञान की पद्धति अपनी विधियों एवं उद्देश्यों में उतनी ही वैज्ञानिक होती है जितनी अन्य कोई भी भाषावैज्ञानिक पद्धति हो सकती है। वस्तुतः संकालिक एवं वर्णनात्मक भाषविज्ञान न केवल वैज्ञानिक ही है, प्रत्युत अन्य समस्त प्रकार के अध्ययनों के लिए मूलाधार भी है। कालक्रमिक दृष्टि से (ऐतिहासिक भाषाविज्ञान में), हम किसी भाषा के विविध पूर्वकालीन रूपों के एककालिक अथवा संकालिक अध्ययनों का क्रमबद्ध अध्ययन प्रस्तुत करते हैं तथा तुलनात्मक अध्ययन में विवेच्य भाषाओं अथवा बोलियों के एककालिक अथवा संकालिक अध्ययनों की तुलना करते हैं। सस्यूर ने ऐतिहासिक भाषाविज्ञान को ‘विकासात्मक भाषाविज्ञान’ नाम से पुकारना अधिक उपयुक्त माना।

भाषाविज्ञान: महत्व एवं अध्ययन सीमा अथवा व्याप्ति

भाषा मानव जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण उपलब्धि है। ज्ञान विज्ञान की समस्त शाखाओं एवं प्रशाखाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा है। इस दृष्टि से ‘भाषा’ का सम्बन्ध प्रत्येक शास्त्र एवं विज्ञान से है। भाषाविज्ञान में ज्ञान के समस्त विषयों की अभिव्यक्ति के माध्यम ‘भाषा’ का अध्ययन किया जाता है और इस दृष्टि से भाषावैज्ञानिक अध्ययन का महत्त्व बहुत अधिक है। भाषाविज्ञान एवं ज्ञान की अन्य शाखाओं का अध्ययन करने वाले विषयों में यह अन्तर अवश्य है कि जहाँ दूसरे विषय भाषा के सम्बन्ध में एक माध्यम एवं साधन के रूप में विचार करते हैं वहाँ भाषावैज्ञानिक के लिए भाषा का अध्ययन एवं विवेचन ही साध्य है। यह बात अवश्य है कि भाषावैज्ञानिक भी भाषा का विवेचन ‘भाषा’ के माध्यम से ही करता है परन्तु उसका लक्ष्य ‘भाषा’ की संरचनाओं तथा अभिव्यक्ति-क्षमताओं का विवेचन एवं विश्लेषण करना होता है न कि भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त विचार का चिन्तन अथवा भाव-बोध के सौन्दर्य का उद्घाटन। भाषावैज्ञानिक भाषा की व्यवस्थाओं को ज्ञात करना है एवं उनमें प्राप्त अभिरचनाओं एवं संरचनाओं का विश्लेषण करता है तथा संसार भर की भाषाओं के स्वरूप के सम्बन्ध में विचार करने के पश्चात् उनका पारिवारिक एवं आकृतिमूलक वर्गीकरण करते हुए भाषा एवं भाषा अध्ययन की पद्धतियों के सम्बन्ध में सैद्धांतिक अध्ययन करता है।

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प्रो. महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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बहुत ही उपयोगी व ज्ञानवर्धक लेख ।

भाषा/ओं के व्यापक अध्यनार्थ इतनी सारी जानकारी हिन्दी में देने के लिए लेखक महोदय के प्रति आभार|आज हिन्दी दिवस है|जो हमारी भारतीय भाषाएँ हैं,उन्हें वैश्विकता के पटल पर प्रतिष्ठित कराने में भाषा विज्ञान किंवा वाङ॒ मीमांसा के अध्ययन काफी उपयोगी हो सकते हैं, ऐसी आशा की जानी चाहिए |

भाषा के व्यापक अध्ययन के प्रयोजनार्थ हिन्दी में उपलब्ध करायी गयी यह जानकारी महत्वपूर्ण है |

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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