एक पहल अपनों के लिए

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प्रतिभा अंश

अभी कुछ ही हफ्ते पहले की बात है, एक सोशल नेटवर्किंग साईट पर एक बच्ची के द्वारा लिखा गया पत्र बहुत वायरल हुआ जो पत्र उस बच्ची ने अपने मृत्यु के पहले लिखा था।

उस बच्ची के साथ बलात्कार हुआ था। और न्याय न मिलने के कारण वो काफी परेशान थी, पता नहीं कितने बार वह अपने माता-पिता के साथ अदालत के चक्कर कर चुकी थी, वह थक चुकी थी सबके सवालों के जवाब देते -देते , हद तो तब हुई जब समाज भी अपने कटु शब्दों से प्रताडित करने लगी अब उस बच्ची की सहनशक्ति जवाब देने लगी थी, आखिरकार उसे, लगा कि उसके जीते जी उसे कभी न्याय नहीं मिलेगी। अतः उसने जज साहब के नाम एक पत्र लिखकर मौत को गले लगा लिया और इस तरह उस बच्ची की कहानी खत्म ही गई , उसके मरने के बाद उसके पत्र को बहुत से लाईक मिले , बहुत सारे कमेंट मिले , मैंने भी जब उसके पत्र को पढी, तो काफी द्रवित हो उठी थी, बहुत से लोगों ने बहुत अच्छे-अच्छे कमेंट किये थे, मैंने भी, एक कमेंट किया था। उस पत्र पर कुछ दिन बीते कुछ हफ्ता बिता पर न जाने क्यों वह पत्र मेरे मन-मस्तिष्क में ऐसी छाप छोड़ गयी कि मैं चाह कर भी उसे भुला नहीं पा रही थी। मैंने एक प्रश्न खुद से किया कि क्या उस पत्र पर एक कमेंट भर करने से मेरा कर्तव्य पूरा हो गया। जवाब मिला, मैं कर ही क्या सकती हूँ।

कितने सारे लोगों ने उस पर कमेंट किया कि ऐसा न हो इसके लिए हमारे सरकार को क्या- क्या कदम उठाना चाहिए, ऐसी कई घटनाएं रोज होती , कुछ दिन तक तो माहौल गर्म होता , पर जैसे ही घटना के कुछ दिन बीत जाते ही सब शान्त हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि मानो कुछ हुआ ही न हो , उस बच्ची के पत्र पर मैंने बहुत सोच - विचार किया आखिरकार निष्कर्ष ये निकाला की हम एक घटना के लिए या तो सरकार को दोषी मानते हैं। या अपने समाज पर अँगुली उठाते हैं। मैंने फिर एक प्रश्न खुद से किया, दोष सरकार का है या समाज का है? समाज कैसे बनता है। जवाब आप सबको पता है। समाज का निर्माण हम सभी से होता है , और जब हम दोष समाज को देते हैं , तो आप बताएँ कि दोषी कौन है? समाज में होनी वाली इन घटनाओं को अगर कोई कम कर सकता है। तो वे आप और हम हैं। न कि सरकार के द्वारा तय किये गये कानून। कोई भी अपराधी जन्म से नहीं होता बल्कि अपराधी उसे हम , आप और हमारी समाज बना देती है।

आज कल के बच्चों में नैतिकता की कमी है। बच्चे रिश्तों की गंभीरता को नहीं समझते। अगर कुछ समझते हैं तो भौतिकतावाद को। इसमें किसकी गलती है। मेरा मानना हैं कि पूर्णतः गलती माँ - बाप की है। वे असफल रहे हैं। अपने बच्चों को नैतिकता का पाठ पढाने में , मुझे याद है। जब हम छोटे थे कैसे दादी और नानी के किस्से , कहानियाँ सुनते थे और बाद में एक सवाल भी किया जाता था। कि हमें इस कहानी से क्या सीख मिली। सभी जानते है कि बाल मन कितना कोमल होता है। उसे जैसे चाहो वैसा ही बनता है। आज के दौर में न तो दादी- नानी है न ही उनके किस्से कहानियाँ , न माँ-बाप के पास इतना समय है, कि अपने बच्चों को सही गलत का पाठ पढाये , आज कल के पिता अपना पूरा समय पैसा कमाने में गुजार देते है। और माँ अपने बच्चों को यही सिखाती है। कि कैसे दूसरों को पछाड़ के हमें आगे निकलना है। हम-अभिभावक को तो समझ ही नहीं पाते हमारे बच्चों के मन में क्या चल रहा ै। पिता तो हर चीज को पैसे तौलते है। और माँ को सिर्फ रिजल्ट से मतलब है। बच्चे कि क्या इच्छा है। उसकी क्या जिज्ञाषाएँ है, उनसे हम अनभिज्ञ होते है। ऐसे में बच्चे जाये तो जाये कहाँ ? मेरे ख्याल से माता-पिता के डर के कारण बच्चे की अतृप्त जिज्ञाषाएँ से ही एक बालक अपराध के तरफ अपना कदम बढाने लगता है। जब हमें पता चलता है कि हमारा बच्चा गलत संगति में है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

अतः आप सभी से मेरा नम्र निवेदन की हम किसी घटना के घटित होने का इंतजार नहीं करना चाहिये बल्कि अपने बच्चों के बचपन से ही नैतिकता व रिश्तों ही गरिमा बनाये रखने की घुट्टी पिलना शुरू कर देना चाहिए। दूसरों को गिरा के आगे बढ़ने से अच्छा है कि हम उसके साथ-साथ चले। बच्चों को सिखाएँ की हमारे आस -पास के लोग हमारे अपने ही है,े अगर हम उसकी मदद नहीं कर सकते तो कम से कम उसे नुकसान तो नहीं पहुँचाएँ। किसी भी घटना के लिए समाज दोषी नहीं होता , असल दोष तो हमारी सोच का है। मैंने उस बच्ची , जो इस दुनिया में जीने से बेहतर मरना समझा , उसके लिए बेशक कुछ न कर सकी पर आज मैं आप सभी से आग्रह करती हूँ। कि आप सब मेरी मदद करे। एक नई समाज की संरचना करने में एक ऐसा समाज जहाँ फिर कोई रविना अपनी जान न दे। जिस समाज मैं हमारी बच्चियाँ सुरक्षित रहे। यह तभी संभव होगा जब हर एक अभिभावक अपने-अपने कर्तव्यों का पालन न्याय-पूर्वक करेगा और तब शायद किसी को भी न्यायालयों का दरवाजा खट-खटाना नहीं पडेगा , आओ हम सब मिलकर एक नई पहल करें, अपनों के लिये 

 

प्रतिभा अंश

साकेत नगर भोपाल मध्यप्रदेश

pratibha_shr@yahoo.com

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