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कहानी: ‘ग्रीन-रूम का रहस्य’

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मनोज कुमार शेट्टी

भोपाल में एक सेमिनार को बहुत ही प्रभावशाली एंकर समीर संबोधित कर रहा था। आलम यूँ था कि जब भी कोई गेस्ट स्पीच देने आते तो दर्शक बोर हो जाते, पर जैसे ही समीर माइक पर आता लोग खुश हो जाते। उसका आकर्षक व्यक्तित्व, पहनावा, बात करने का तरीका, शब्दों का चुनाव, बीच-बीच में शायरी और आवाज़-सभी सुनने वालों का मन मोह लेती थी। सेमिनार की दर्शक-दीर्घा में पहली पंक्ति में बड़े ही ख़ास लोग बैठे थे-उसका सबसे अज़ीज़ दोस्त गिरीश उज्जैन से आया था। उसकी प्यारी पत्नी आयशा क्रीम रंग की साडी में बैठी थी। उनका पांच साल का बेटा राहुल भी पापा को स्टेज पर देखकर बड़ा खुश था। इस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि क्षेत्र की पूर्व गवर्नर श्रीमती प्रभा जी, कार्यक्रम के मुख्य अध्यक्ष श्री बलराम भूषण के साथ विराजमान थी। उनके साथ ही डीएसपी मिथिलेश, इंस्पेक्टर कुंदन और बलराम जी के खास दोस्त बिल्डर बृजमोहन भी उपस्थित थे।

दो-तीन बार यूँ ही चला-गेस्ट के भाषण पर दर्शक बोर हुए तो समीर के उदबोधन से खुश हुए। तीसरे गेस्ट के स्टेज से जाने के बाद समीर स्टेज पर नहीं आया। सब परदे की ओर देखते रहे, थोड़ी और देर हुई तो सभी एक-दुसरे को ताकने लगे। इतने में चौथा गेस्ट स्टेज पर बिना एंकर के संबोधन के अपनी रचना पढने लगा। अचानक किसी की चीख ने सबका ध्यान खीच लिया-

“खून! खून ! खून !”

दर्शकों में अजीब-सा शोर और अफरा-तफरी मच गई। लोग उठकर जाने की कोशिश करने लगे।

“कोई यहाँ से कही नहीं जाएगा।” जानेमाने प्राइवेट जासूस डेविड ग्रे की सख्त आवाज़ ने सभी का ध्यान खीच लिया। उनके साथ ही मौजूद पुलिस की टुकड़ी भी हरकत में आ गई। मुख्य दरवाजों को बंद कर, हॉल को घेरने के साथ ही सभी लोगों को रोक लिया गया।

समीर का खून हो चुका था। उसका गला किसी धारदार चीज़ से रेंता गया था। उसकी लाश स्टेज के पीछे ग्रीन-रूम में सोफे पे मिली थी। चिल्लाने की आवाज़ स्टेज के पीछे सफाई कर रही बाई की थी। डेविड ने एक पुलिस वाले के साथ लाश का निरीक्षण करते हुए पाया कि लाश पर कोई झूमाझपटी के निशान नहीं थे। इसका मतलब किसी ने समीर के कुछ कर पाने से पहले ही पीछे से उसका गला काट दिया था। खून के धब्बों पर पैरों के निशान दिखाई दिए जो २-२ फीट की दूरी से ग्रीन्र-रूम से हाल के सामने वाले बाथरूम की ओर जा रहे थे। निशानों की दूरी से डेविड ने निष्कर्ष निकाला कि कातिल की लम्बाई औसत से ज्यादा थी। बाथरूम खुलने पर वहां खून में सराबोर एक धारदार तार और जले हुए कपडे और जूते मिले।

“कातिल ने कपडे बदले और दर्शकों में बैठ गया! यानि ये क़त्ल पूर्व निर्धारित था।” डेविड ने सोचा ।

आयशा और राहुल का रो-रोकर बुरा हाल था। गिरीश उनको सँभालने की कोशिश कर रहा था। पूर्व गवर्नर प्रभा और अन्य वीआइपी लोग सभी उन्हें घेरकर खड़े थे। डेविड उनके करीब आया और मुस्कुराने लगा। उसके अजीब व्यव्हार से सभी हैरान हो गए। वो बारी-बारी से सभी खास मेहमानों से मुखातिब हुआ।

“सर सुना है आज सुबह आपकी समीर से तीखी नोंक-झोंक हुई थी?” बलराम भूषण से डेविड ने पूछा.

“नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं।”

“ज़रा ठीक से याद कीजिये।”

“मुझे सब याद रहता है।”

“मुझे पीछे काम करने वाली बाई ने बताया है।”

“ओह हाँ हाँ सही है, पर इससे आप क्या कहना चाहते हैं? वो मेरा एम्प्लोयी था। उसके ज्यादा पैसे मांगने पर हमारी बहस हुई थी, बस।”

“घबराएँ नहीं, मैं आपको कातिल नहीं ठहरा रहा हूँ। बल्कि मैं जान चुका हूँ कि कातिल कौन हैं हाहाहा।” डेविड की हँसी ने सभी को परेशान कर दिया। “कातिल भी शातिर है और उसने क़त्ल भी सोच-समझकर किया है। बाकी सभी लोगों को जाने दो। कातिल इन ख़ास मेहमानों में से ही एक है। बस अब ये जानना बाकी है कि उसने ऐसा क्यूँ किया?” डेविड के कहने पर पुलिस वालों ने सभी दर्शकों को जाने दिया। समीर की लाश को पोस्टमॉर्टेम के लिए भिजवाया जाने लगा।

“डीएसपी मिथिलेश साहब मुझे बताएं कि जब आपने स्टेज के पीछे से किसी की आवाज़ सुनी तब आप कहाँ थे?”

“मैं... यही वीआईपी सोफे पर बैठा था I mean मैं प्रतियोगियों के व्याखान सुन रहा था।”

“कमाल करते हैं डीएसपी साहब, आप मेरे सामने उस वक़्त बाथरूम से आये थे। भूल गए?” डेविड ने मुस्कुराते हुए कहा।

“हाँ याद आया मैं बाथरूम से आया था। तो?”

डेविड डीएसपी को नज़रअंदाज़ करते हुए तपाक से इस्पेक्टर कुंदन के पास पहुँच गया।

“समीर का खून हुआ तब आप कहाँ थे इंस्पेक्टर कुंदन?” डेविड ने मुस्कुराते हुए कुंदन को ऊपर से नीचे तक घूरा।

“मैं भी यहीं बैठा था। आप मुझे इस तरह क्यूँ घूर रहे हैं?” इंस्पेक्टर ने भारी आवाज़ में कहा।

“हूँ लगता है आपने सवाल सुना नहीं, कोई बात नहीं। आप लड़की थोड़े ही हैं, नहीं घूरेंगे जी आपको। ”

“देखिये आप मुझसे बदतमीजी से बात कर रहे हैं!”

“जनाब मेरी बदतमीजी आप सहन न कर सकेंगे। सवाल था कि आप समीर के खून के वक़्त कहाँ थे। आपका जवाब आया यहीं सोफे पर बैठे थे इसका मतलब आपको पता था कि समीर का खून कब हुआ है?”

“सबको पता चल गया था जब चीखने की आवाज़ आई तो मुझे क्यूँ नहीं पता चलेगा।”

तभी डीएसपी साहब ने बीच में बोला, “तुम भी तो मेरे पीछे ही बाथरूम से बाहर आये थे न कुंदन?”

“मैं इनसे वही निकलवाना चाह रहा था, थैंक्यू मिथिलेश साहब।” डेविड ने आँखों से इशारा किया।

“हाँ मैं भी बाथरूम गया था। बाथरूम जाना कोई गुनाह हो गया क्या?” कुंदन ने बिना किसी देरी के कहा। कहते हुए उसके माथे पर पसीने की बूंदे टिमटिमाने लगीं। डेविड ने रुमाल देते हुए कहा, “अपने माथे से पसीना पोछो और ये बताओ कि तुम्हारा थैला कहाँ है जिसमें तुम एक्स्ट्रा वर्दी लाये थे।”

“वर्दी? कौन सी वर्दी?” कुंदन ने माथा पोछते हुए कहा 

डेविड स्टेज से एक थैला ले कर आया, “ये थैला जो तुम बाथरूम में फ्लश करके आये थे। इसी में तुम अपनी दूसरी वर्दी-जूते लाये थे जिससे तुम्हारे कपड़ों पर किसी को शक न हो। पर अफ़सोस ये कमबख्त थैला फ्लश न हो पाया और तुम पकडे गए।” डेविड की स्माइल सभी को इस केस के सुलझने का भरोसा दिला रही थी। एक इंस्पेक्टर ने एंकर की जान आखिर क्यूँ ली? सभी के दिमाग में बस एक सवाल था।. 

“बस मिस्टर डेविड! आपने आखिरकार मुझे गुनेहगार साबित कर दिया। हाँ मैं मानता हूँ मैंने खून किया है। सुनियोजित ढंग से किया है और इसकी वजह है-आयशा। जिससे मैं प्यार करता था, करता हूँ और ताउम्र करता रहूँगा।”

सभी की नज़रें रोती-बिलखती आयशा की ओर चली गई।

“हम कॉलेज में साथ थे। एक-दूसरे से प्यार करते थे। पर घरवालों ने ज़बरदस्ती इसकी शादी समीर से करा दी। मैं कुछ न कर सका। आज 6 साल बाद मैंने कुछ करने का निर्णय लिया और वो भी इतना गलत। मैं शर्मिंदा हूँ।” कहकर कुंदन के आंसू निकल आये।

सभी हैरत में थे। आयशा ने चिल्लाते हुए कुंदन को चांटा मारा और रोने लगी। “तुम कभी मुझे पाने के काबिल थे ही नहीं। वहशी, दरिन्दे हो तुम...” डेविड और गिरीश ने उसे कुंदन से दूर किया और सान्तवना दी।

वहां मौजूद सभी ने डेविड को केस सॉल्व करने की बधाई दी।

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