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नया सवेरा

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लघु कहानी

संदीप तोमर
अलका सिंह मायके में जितनी सबकी प्रिय थी उतनी ही प्रिय ससुराल में भी थी.. ससुर योगेन्द्र प्रताप उन्हें बेटी सा सम्मान और दुलार देते थे...परिवार के कुछ लोगो को कई बार आश्चर्य भी होता की ठाकुर साहब बहु को बेटी सा प्यार क्यों देते हैं.. पति फ़ौज में कमान्डेंट ऑफिसर थे.. छुट्टियाँ कम ही मिलती.. अलका को कभी पति के साथ जाना होता कभी ससुराल को देखना होता.. वो सारी जिम्मेदारियां बखूबी निभा रही थी...


जब कभी वो पति के पास जाती तो ससुराल वाले परेशान हो जाते..कौन सा सामान कहाँ रखा है ..किसे कब क्या चाहिए.. किसे खाने में क्या पसंद है ,,, वगैरह वगैरह .... उसके ना होने पर सब अफरा-तफरी का सा माहौल हो जाता...
लद्दाख पोस्टिंग के बाद अलका सिंह ने निर्णय लिया कि बेटे का दाखिला केन्द्रीय विद्यालय में करा दिया जाये.. और तीन साल पतिदेव के साथ रहा जाये.. पति विश्वजीत का भी ऐसा ही मानना था... देवेश का दाखिला करा कर अलका ने चैन की साँस ली...
अभी दो महीने भी बमुश्किल हुए थे कि ससुराल से खबर आई कि ससुर की तबियत बहुत ख़राब है... अलका सिंह को वापिस सुसराल आना पड़ा... ससुर की हालत देखी तो वो उन्हें कार में लेकर दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल ले आई.. लोगो को आश्चर्य भी था कि ठाकुर साहब की बहु कार चलाकर ससुर को दिल्ली तक कैसे ले जाएगी..


ठाकुर परिवार का मान सम्मान पूरे इलाके में था.. पत्ता भी हिलता तो इस परिवार की मर्जी से... योगेन्द्र प्रताप का पूरे इलाके में नाम था.. कितने ही कारिंदे घर और खेत में होते.. आम के बगीचे.. और आम का व्यापार.. सैकड़ों एकड़ जमीन..इलाके के राजा थे योगेन्द्र प्रताप....
तीन बेटे और दो बेटियां.. सब की शादी संपन्न परिवारों में हुई थी..बेटियां विदेश में थी.. एक बेटा डाक्टर एक इंजीनियर ... डाक्टर बेटा अमेरिका चला गया..इंजिनियर बेटा बुकारो... और मझला बेटा सी. ओ.. खुशहाल परिवार...
अलका सिंह अपने परिवार में सबसे छोटी थी.. उन्होंने अपनी पसंद से शादी की थी.. शुरू में सबने ऐतराज़ किया लेकिन अलका के सौन्दर्य और शिक्षा देखकर कीस को ऐतराज़ न रहा.. हंसी खुशी विवाह हुआ.. और फिर अलका का सबके दिलों पर राज़ हो गया..
योगेन्द्र प्रताप को अस्पताल में भर्ती कर लिया गया..साँस रुकने लगी तो उन्हें icu में ले जाया गया ....लेकिन हालात बिगडती चली गयी.. दो हफ्ते के इलाज के बाद डाक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.. पूरा परिवार इकठ्ठा हो चूका था..
श्मसान ले जाने के वक़्त परिवार के वकील ने कहा --" ठाकुर साहब अपनी वसीयत लिखकर गएँ है.. वो चाहते थे कि उनके अंतिम संस्कार से पहले उनकी वसीयत पढ़ी जाये.."


किसी ने कहा कि अभी तो अंतिम संस्कार करना ही उचित है वसीयत तो बाद में भी देखी
जा सकती है..अलका सिंह ने कहा--"बाबूजी की इच्छा का हमें सम्मान करना चाहिए. यदि वो चाहते थे कि अंतिम संस्कार से पहले उनकी वसीयत पढ़ी जाये तो जरुर कोई वजह रही होगी ..बाबूजी बिना वजह कुछ भी नहीं करते थे....."
वकील साहब ने वसीयत से संपत्ति का बटवारा बताकर आगे बोला-- "मेरी चिता को अग्नि मेरी बहु अलका देगी.."
सुनकर सबको काटो तो खून नहीं... ठाकुर साहब ऐसा कैसे कर सकते हैं.. हमारे कुछ रीति-रिवाज हैं.. ठाकुरों में औरते शमसान तक नहीं जाती..और यहाँ बहु अग्नि देगी... अनर्थ हो जायेगा.. रीति रिवाज भी कुछ हैं कि नहीं...
सबमें काना फूसी होने लगी... परिवार के लोग भी स्तब्ध ... क्या करें.. तभी अलका सिंह ने कहा-" बाबु जी की आज्ञा का उलंघन उनके रहते किसी ने किया जो अब होगा?"


सब मौन ... कोई उत्तर नहीं.. कोई शोर-शराबा नहीं. . 
अलका ने आगे कहा-"बाबूजी पुराणी साड़ी गली प्रथाओं में विश्वास नहीं करते थे.. उनकी प्रगतिशील विचारों में आस्था थी.. वो तो कभी अपनी आसामियों का भी शोषण नहीं करते थे.. वो एक स्वस्थ समाज चाहते थे.. हमें उनकी इच्छा का सम्मान करना चाहिए..."
अलका के तर्क के आगे सब नतमस्तक हुए.. चिता को श्मसान घाट ले जाया गया..
सारी औपचारिकता पूरी करने के बाद अलका ने दाह संस्कार एक लिए प्रज्वलित अग्नि को हाथ में लिया ..चिता का भ्रमण करके मुखाग्नि दे दी.. चिता धू धू करके जल उठी... अलका देख रही थी.. चिता के साथ जलते पुराने विचार कि महिलाएं श्मसान भूमि नहीं जाती.... एक नया सवेरा समाज में पसरते हुए वो साफ़ देख रही थी...

 

संदीप तोमर

डी२/१ 

जीवन पार्क 

उत्तम नगर 

नयी दिल्ली -११००५९

8377875009 

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