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पर्यावरण पथ के पथिक 5 - रोमोलस विटेकर

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पर्यावरण पथ के पथिक

पंद्रह पर्यावरणविदों की असली जीवन कहानियां

संपादनः ममता पंडया, मीना रघुनाथन

हिंदी अनुवादः अरविन्द गुप्ता

 

रोमोलस विटेकर

रोमोलस विटेकर का जन्म न्यूयार्क शहर में हुआ। सरीसृपों से उन्हें शुरू से ही गहरा प्यार था। जब वो पहली बार भारत आये तो उनकी उम्र केवल आठ साल की थी। उनकी स्कूली पढ़ायी यहीं पर हुयी। 1960 के दशक के शुरुआत में वो कुछ वर्षों के लिये अमरीका गये। परंतु 1967 में वो वापिस आये। तब से भारत ही उनका घर है और सर्पविज्ञान उनका पेशा। तबसे वो दक्षिण भारत और अंडमन द्वीप में संरक्षण अभियान में जोरों से लगे हैं। उन्होंने तमिलनाड की इरुला जनजाति के साथ बहुत करीबी से काम किया है। 1970 में उन्होंने भारत के पहले सर्पोद्यान की स्थापना की और 1975 में, महाबलिपुरम में मगरमच्छों के संरक्षण के लिये मद्रास क्रोकोडाइल बैंक की स्थापना की। उन्होंने सरीसृपों पर कई पुस्तकें लिखी हैं और अब वो अपना अधिकांश समय वन्यजीवन पर फिल्में बनाते हैं। उनकी बच्चों की फिल्म द बाॅय एंड द क्रोकोडाइल को बहुत से पुरुस्कार मिले। 1998 में नेशनल ज्योगरेफिक टेलीविजन के लिये बनायी उनकी फिल्म किंग कोबरा , अमरीका में प्रतिष्ठित ऐमी पुरुस्कार से सम्मानित हुयी

 

सांपों का दीवाना

पांच साल की उम्र में मैं भाग्यशाली था कि उत्तरी न्यूयार्क राज्य के खेतों और जंगलों में घूम सका। यहीं मेरा जन्म हुआ था। पिता से अलग होने के बाद मेरी मां ने अकेले ही मेरा लालन-पालन किया। हम लोग 300 साल पुराने एक बड़े घर में रहते थे। उस पुराने घर की देखभाल करने में बहुत समय लगता होगा शायद इसलिये मेरे मां खुश थीं कि मैं और मेरी बहन अपना ज्यादातर समय घर के बाहर ही बिताते थे। न्यूयार्क के हूसिक नाम के पहाड़ी इलाके में, कई महीने बर्फ जमी रहती थी। परंतु जब वसंत आती तो वहां बहुत से जीव और प्राणी आते और वे पकड़े भी जाते! एक बार स्थानीय बड़े लड़कों के साथ खेल के अभियान में जब हमने एक पत्थर को उल्टा किया तो उसके नीचे एक छोटे सांप को पाया। मुझे तो वो सांप बड़ा आकर्षक लगा परंतु मेरे दोस्तों ने उस गार्टर सांप को पत्थरों से मारा। मैं उस बुरी तरह कुचले हुये सांप को एक डिब्बे में रखकर घर ले गया।

मुझे अभी तक याद है कि मेरी छोटी बहन ने उसे देखकर घृणा से कहा, "इस बेचारे को तुम कैसे मार सकते हो?" मैं जल्द ही सांप पकड़ने लगा और उन्हें जिंदा घर वापिस लाने लगा। अपनी तेज शिकारी समझ के कारण मैंने पैदल चलना शुरू करते ही, कीड़े और मकड़ियां पकड़ना शुरू कर दिया था (मेरी मां मुझे बताती हैं)। इसलिये अब सांपों को पकड़ने से जिंदगी में थोड़ी और रंगत आ गयी। अगर मेरी मां कुछ मित्रों को चाय पर बुलातीं तो वे या तो मेरे शौक में बहुत रुचि दिखाते या फिर सांपों से भरे मेरे कमरे से बहुत दूर ही रहते। जिंदगी के उस चरण में मुझे यह पता नहीं था कि सरीसृपों का यह शौक एक दिन मेरा पेशा बन जायेगा। मुझे डायनौसौर में बेहद गहरी रुचि थी और मुझे पता था कि जीवाश्म-विज्ञानी ‘हड्डियों के लिये खुदायी करते हैं’। मुझे लगता था कि बड़े होकर मैं वही बनूंगा। परंतु जब मैं सात वर्ष का था तब मां मेरे सौतेले पिता राम के साथ भारत आ गयीं। यहां पर आकर मेरे लिये सांपों, छिपकलियों, कछुओं और मगरमच्छों की एक नयी दुनिया खुल गयी। बंबई के जुहू तट के सपेरे मेरे पहले शिक्षक थे। परंतु मैं जल्द ही उनके जादू और बकवास की परिधि से आगे निकल गया। मैं क्रार्फोड मार्केट में पालतू जानवर देखता। यहां सुंदर कछुये, छोटे अजगर कभी-कभी एक छोटे मगरमच्छ को भी देखा जा सकता था। बाद में मैं बांबे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी में जाने लगा और धीरे-धीरे मैं एक प्रकृति वैज्ञानिक बनने की ओर बढ़ने लगा। मेरे स्कूल के दिन कोडाईकैनाल में बीते, जो तमिलनाड में 7000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। बोर्डिंग स्कूल में मेरा पालतू अजगर मेरे पलंग के नीचे ही रहता था। परंतु गिरगिट और कभी-कभी पकड़ में आये विषैले पिट-वाइपर सांपों को जीवविज्ञान की प्रयोगशाला में ही रखना पड़ता था। मेरा नसीब अच्छा था।

मैं कभी कुछ समय के लिये शहर में भी रहा परंतु ज्यादातर समय मैं जंगल के पास ही रहा और कोई बहाना बनाकर स्कूल से दूर जंगलों में घूमता रहा।

यह सौभाग्य ही है कि तेरह वर्ष की उम्र तक मेरी भेंट किसी विषैले सांप से नहीं हुयी। एक बार मैंने बेवकूफी में अति विषैले फुरसा यानि रसिल्स वाइपर नाम के सांप को बटरफ्लाई नेट के जाल की मदद से से झील में से निकाला और फिर उसे अपने खाने के डिब्बे में रखा। परंतु सांप पकड़ने के इन शुरुआत सालों में मैं जिंदा रहा और मुझे इस दौरान बहुत अच्छा अनुभव मिला। अगला बड़ा चरण तब आया जब मैं कालेज की पढ़ायी के लिये अमरीका गया। मैंने पढ़ायी में कुछ खास अच्छा नहीं किया परंतु मुझे मियामी सर्पोद्यान में नौकरी मिल गयी। उस समय यह दुनिया में सांप के विष उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र था। इस जगह को लोग ‘सर्प’ के नाम से बुलाते। इसका मालिक बिल हास्ट था जो हरेक के साथ सख्ती से पेश आता था परंतु वा 15 फीट लंबे किंग कोबरा सांपों को आसानी से पकड़ लेता था। दस साल बाद मैं भी दक्षिण भारत और अंदामन द्वीप में, अपने हाथों से नाग यानि किंग कोबरा पकड़ रहा था। इसी बीच वियतनाम युद्ध के लिये मुझे अमरीकी सेना में भर्ती होना पड़ा। मैंने युद्ध के ज्यादातर सालों में टेक्सस और ऐरीजोना में रैटिल स्नेक (यह सांप पूंछ से झुनझुने की आवाज करता है) पकड़ते हुये बिताये। युद्ध के साल इतने बुरे नहीं बीते! यहां मुझे बहुत गंभीर रूप से एक सांप ने काटा। एक बार टेक्सस/ऐरीजोना की सरहद पर मैं थोड़ा लापरवाह हो गया और तभी एक प्रेरी रैटलर प्रजाति के सांप ने मेरे दायें हाथ की तर्जनी उंगली पर वार किया। वो दर्द असहनीय था। जैसे किसी ने हड्डी में गर्म कील ढोक दी हो। मैं दो हफ्ते तक अस्पताल में रहा। मेरी उंगली बच गयी परंतु वो अभी भी एक तरह से अपंग है - वो मुझे हमेशा याद दिलाती है कि मुझे अगली बार सावधानी बरतनी चाहिये।

भारत आने के बाद मैंने ‘सर्पों के देश में’ एक सर्पोद्यान स्थापित करने का निर्णय लिया और अपनी रुचि के जीवों - सरीसृपों का अध्ययन करने का निश्चय किया। उनके खूबसूरत रंग, उनके चलने की अदा मुझे हमेशा आकर्षित करती है और यह कभी-कभी बहुत खतरनाक भी होती है। मैं पक्षियों और स्तनपायी प्राणियों को लेकर कभी भी इतना उत्साहित नहीं हुआ जितना कि सरीसृपों से। सच तो यह है कि ऐरीजोना और फ्लोरिडा में मैं और मेरे साथ सांपों का शिकार करने वाले साथी चिड़ियों और स्तनपायी प्राणियों का मजाक उड़ाते थेः "बदबूदार और शोर मचाने वाले" हम कहते "ये सांपों के लिये अच्छा भोजन हैं!" और "किसी भी पैरों वाले प्राणी पर मैं यकीन नहीं कर सकता हूं"। हम सरीसृपों के बारे में लगातार जो गलत बातें सुनते थे यह उसकी ही प्रतिक्रिया थी। सच तो यह था कि हम सभी लोग किसी न किसी रूप में प्रकृति वैज्ञानिक थे और हमारी सभी प्राणियों और पौधों में रुचि थी। परंतु मुझे फिर भी अपना जीवनयापन तो करना ही था! पहले मैंने अखबारों और फिर पत्रिकाओं के लिये लेख लिखना शुरु किये जिनके लिये मैं अपने पुराने पेंटेक्स के-1000 कैमरे से ही फोटोग्राफ लेता था। मैं बांबे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी की पत्रिका में सरीसृपों के बारे में रोचक जानकारियां लिखने लगा।

इसी बीच मैं सर्पोद्यान शुरू करने के लिये कोई स्थान ढूंढने लगा और जल्द ही मुझे महसूस हुआ कि मद्रास ही इसके लिये सबसे उपयुक्त जगह होगी। इस लंबी कहानी को छोटा करते हुये मैं बस यही कहूंगा कि मैंने जंगल विभाग और मद्रास (जो अब चेन्नई है) सचिवालय में लोगों को काफी परेशान किया और अंत में उन्होंने शहर के मध्य - गिंडी राष्ट्रीय उद्यान के परिसर में मुझे भारत का पहला सर्पोद्यान शुरू करने की अनुमति दे दी। मद्रास सर्पोद्यान शुरू से ही बहुत सफल रहा और मेरे बहुत से अच्छे मित्रां, भाई और बहन ने इसको संभव बनाने में सहायता दी। मद्रास के पास रहने वाले इरुला जनजाति के लोग मेरे मित्र और पथप्रर्दशक बने। इन लोगों को विषैले सांपों - कोबरा, क्रेट, रसेल वाइपर और सा-स्केल्ड वाइपर को पकड़ने का पीढ़ियों और सदियों का अनुभव था। उनसे जो कुछ भी मैंने सीखा उसे मैं किसी भी कालेज में नहीं सीख सकता था। मैं लगातार सांपों को पकड़ने के लिये राजस्थान और पश्चिम बंगाल के दूर-दराज इलाकों की यात्रा कर रहा था जिससे कि सर्पोद्यान में हर साल आने वाले दस लाख लोग कुछ नयी प्रजातियों के सांप देख पायें।

परंतु मेरी सबसे रोमांचक यात्रा रही जब मैं मई के महीने में कर्नाटक के अगुंबे नाम के इलाके में गया। वहां जंगल एकदम नम और गर्म था और किसी भी दिन बारिश पड़ने की उम्मीद थी। तभी मुझे एक सांप की काली, भुगंज पूंछ झाड़ियों में गायब होती दिखी। प्रतिक्रिया में मैं तत्काल कूदा और मैंने झट से ओंझल होती पूंछ को पकड़ लिया। जब मैंने सिर ऊपर उठाया तो मैंने एक बड़े सांप का फन फैलाये अपनी ओर घूरते देखा। उसे देखकर मेरा दिल उछल कर हलक में अटक गया - वो एक नाग यानि किंग कोबरा था! मैंने झट से उसकी पूंछ छोड़ दी और पैरों के बल कूदकर किसी डंडी को तलाशने लगा। मैं उस किंग कोबरा को पकड़ने में सफल रहा और उसकी 12 फीट लंबे शरीर को मैंने आसपास उपलब्ध सबसे बड़े थैले अपने स्लीपिंग बैग में मुश्किल से घुसाया। परंतु केवल सांपों को पकड़ना, उनका अध्ययन करना और उनके बारे में सिखाना मेरे लिये पर्याप्त नहीं था। लोगों की बढ़ती आबादी का सरीसृपों पर दबाव पड़ रहा था। भारत में विशेष रूप से मगरमच्छ काफी मुश्किल स्थिति में लगते थे। उनकी सहायता के लिये दो काम करना जरूरी थे - पहला, पूरे भारत में मगरमच्छों का सर्वेक्षण करके उन्हें कितना खतरा है इसे मालूम करना, और दूसरा, मगरमच्छों के लिये एक जीन-बैंक की स्थापना करना - एक ऐसा फार्म जहां डायनासौर युग के इन विशाल प्राणियों का संरक्षण किया जा सके।

1975 में, कई मित्रों की सहायता से मद्रास क्रोकोडायल बैंक की शुरुआत हुयी। शुरू में यहां पर सिर्फ एक दर्जन मगरमच्छ थे परंतु अब धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ कर 5,000 हो गयी है और उनमें दस भिन्न प्रजातियां हैं।

क्रौक-बैंक सिर्फ मगरमच्छों का उत्पादन केंद्र नहीं है परंतु यह देश के कई हिस्सों, जिनमें अंदमान द्वीप शामिल हैं में कई संरक्षण प्रकल्पों का आधार है। पिछले कई वर्षों में बहुत से अच्छे छात्रों ने अपने काम की शुरुआत क्रौक-बैंक के प्रकल्पों से शुरू की है। धीरे-धीरे विज्ञान को अधिक लोकप्रिय बनाने के साथ-साथ उन्होंने वार्षिक वैज्ञानिक पत्रिका हैमडरैयड (जो किंग कोबरा का ही एक और नाम है) को प्रकाशित करना शुरू किया है। लोगों को सरीसृप दिखाने और उनके बारे में बताने की मेरी आदत मुझे डाक्युमेंटरी फिल्में बनाने की ओर ले गयी।

पहले मैंने एक कम बजट वाली फिल्म ‘स्नेकबाईट’ बनायी जो सांप के काटने से बचने और उसके उपचार के बारे में थी। हाल के वर्षों में मेरी फिल्मों की नेशनल ज्योगराफिक टेलीवीजन ने सहायता की है। इससे मैं और मेरे साथी विस्तृत फिल्में बना पायें हैं जिसमें एक फिल्म दुनिया के सबसे बड़े जहरीले सांप किंग कोबरा के प्राकृतिक जीवन पर भी है। इसमें आप देख सकते हैं कि जिन प्राणियों को ज्यादातर लोग चिपचिपा और डरावना समझते हैं उनमें अगर एक बच्चे की गहरी रुचि हो तो वो उसका सबसे संतोषजनक पेशा बन सकता है। सरीसृपों में मेरी खुद की आत्म-केंद्रित रुचि दिन दूनी रात चौगनी के हिसाब से बढ़ी है और उसके ही परिणाम स्वरूप मद्रास सर्पोद्यान, मगरमच्छ बैंक और कुछ बढ़िया शैक्षणिक फिल्में तैयार हो सकी हैं। प्राणियों के अथाह प्रेम ने ही मेरी जिंदगी को बेहद सुंदर और जीने काबिल बनाया है।

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(अनुमति से साभार प्रकाशित)

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