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समाजिक विकास के साहित्यिक संदर्भ : एक वैचारिकी'

कुसुम खेमानी

दि हम बहुत ही घिसे-पिटे से जुमले 'साहित्य समाज का दर्पण है' को दरकिनार कर भी दें, तो भी इस संदर्भ से तो मुक्त नहीं ही हो सकते हैं कि मैं जो आज माइक के सामने खड़ी हूँ या कि आप सब विद्वज्जनों का जो समाज यहाँ उपस्थित हुआ है- वह केवल और केवल साहित्य के बहुआयामी दृष्टिकोण के कारण ही सम्भव हुआ है।

यदि 'मेरा रंग दे बसन्ती चोला' गाते हुए क्रांतिकारी फाँसी पर न झूल गए होते या कि 'वन्देमातरम् का नारा लगाते हुए असंख्य नौजवान तिरंगा फहराने आगे न बढ़ते या कि गांधी केवल 'हिंद स्वराज' ही नहीं; अनेकानेक रूपों में साहित्य का सही प्रयोग करते हुए अहिंसा की लड़ाई लड़कर हमें स्वतंत्र न कराते तो हमारी क्या बिसात थी। कि आज हम यहाँ यों एकत्रित होकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत अपने विचार रख पाते।

जरा ध्यान दें कि मार्टिन लूथर किंग का 'हम होंगे कामयाब' आधुनिक विश्व में चेतना जगाने का मूल-मंत्र बन गया है। जिन्होंने इसे सुर दिया है- ने अपने कलकत्ता प्रवास में हमें बताया कि इस गीत को मिटा देने के लिए किस-किस तरह से उन पर हमले किए गए। यहाँ तक कि एक बार तो उनके पंडाल में आग भी लगा दी गई और वे अपना गिटार वहीं छोड़ कर भाग गये। यह बात इतर है कि, फिर गिटार की बड़ी भारी कीमत हो गई।

महादेवी वर्मा के सम्पादन में चाँद का 'फाँसी' अंक जब्त किया गया। बोरिस पास्तरनाक, सोल्झेनितस्न और विश्व के अनेकानेक लेखकों को जेलों में यातनाएं दी गई। क्योंकि उनका साहित्य मनुष्य के विकास की बात कर रहा था। जनमानस को जागृत कर रहा था। चीन का नृशंसतम नरसंहार 'थ्यानमान चौक' पर पढ़े-लिखे विद्यार्थियों के खिलाफ इसलिए घटाया गया क्योंकि साहित्य में ही वह 'असीम' शक्ति है जो मनुष्य के मानस में पैठकर उसका विवेक जागृत कर उसे सही-गलत का, अच्छे-बुरे का, और उसके कर्त्तव्य और अधिकारों का ज्ञान करवाती है।

शायद आप सबने यह वाकया सुन रखा होगा कि इंग्लैंड के एक इतिहासकार दीर्घ समय से इतिहास लिख रहे थे कि एक दिन अपने सामने घटी घटना का ब्यौरा जब उन्होंने अन्य लोगों से सुना तो उन्हें अपने शोध की निरर्थकता का अहसास हुआ। क्योंकि हर व्यक्ति उनको अपनी आंखों देखी की भिन्न कहानी सुना रहा था। अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति उस घटना का अपना अलग ही इतिहास रच रहा था, बता रहा था और उन्होंने अपने कई युगों के परिश्रम को यह कह कर जला डाला कि यदि किसी काल विशेष के बारे में जानना है, तो उस समय का साहित्य पढ़ना चाहिए, क्योंकि साहित्य आम आदमी की कथा कहता है और इतिहास राजा-महाराजाओं का प्रशस्ति वाचन करता है।

वैसे तो साहित्य अपने विशेष युग समाज और परिवेश से उत्पन्न होता है, लेकिन उसमें युग-बोध के अतिरिक्त युगान्तर बोध भी रहता है। वह अतीत के शाश्वत जीवन-मूल्यों को वर्त्तमान की गंगा-युमना में प्रक्षालित करता है। जिसके अन्तस् में भविष्य रूपी सरस्वती भी अन्त सलिला के रूप में विद्यमान रहती है। सच्चा साहित्य व्यक्ति को समष्टि से एकाकार करने वाली एक निरंतर गतिमान् धारा है। साहित्यकार को 'कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभू' इसीलिए माना गया है; क्योंकि वह सब कालखंडों का संकलन करता है।

सामाजिक विकास में साहित्य कितना महत्त्वपूर्ण है यह मात्र इस एक उदाहरण से स्पष्ट हो सकता है कि आज कोई भी युद्धप्रिय तथा विज्ञान के चरमबिंदु तक पहुँचा हुआ देश भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उसके पास साहित्य नहीं है। या उसे साहित्यकार की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि साहित्य मनुष्य के विकास का एक ऐसा अभिन्न साथी रहा है जिसका अभाव बर्बरता या असभ्यता का पर्याय माना जाता है। यही कारण है कि बावजूद साहित्य को अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप ढालने के सभी वैध-अवैध प्रयास करते हुए भी प्रत्येक देश अपने यहाँ उसकी उच्च स्थिति को स्वीकार करते दिखते हैं।

साहित्य का सृजनकर्त्ता साहित्यकार क्रांतदृष्टा एवं स्रष्टा दोनों की भूमिका निबाहता है। वह अपने विवेक-चक्षुओं से तात्कालिक समस्याओं को जांच-परख कर उनकी विवेचना करता हुआ जो समाधान प्रस्तुत करता है; वही भविष्य के रचनात्मक एवं सकारात्मक कार्यों की नींव रखते हैं। ऐसा करते हुए उसे कभी समाज से कभी राजनीति से कभी निहित स्वार्थों से जूझना भी पड़ता है, और उनके लिए दंड भी झेलना पड़ता है। लेकिन चूंकि साहित्य में वह शक्ति है कि वह मानव-मन के गुहयतम अंत कोनों में अपनी लेखनी की तरलता से प्रवेश पर सके, इसलिए इन बाधाओं को दरकिनार करते हुए वह निरन्तर मनुष्य और समाज का विकास करता रहता है। आज हम भौतिक विज्ञान की चरम उपलब्धियों से लैस हैं। पर विज्ञान का यह ताप मानव मन की कोमल भावनाओं को सुखा रहा है। क्योंकि विज्ञान ने आज उपलब्धियों के साथ-साथ ध्वंसात्मक प्रवृत्ति के ज्वालामुखी पर भी मनुष्य को बैठा दिया है, जिसका भविष्य भयंकर हो सकता है।

इसके विपरीत आज भी साहित्य, जीवन के मंगलविधान के लिए मनुष्य में जिस तरल संवेदन की आवश्यकता होती है, उसकी रक्षा कर रहा है अन्यथा बिना स्नेह-ममता-बंधुता औ मानव-गरिमा के मानवजाति का भविष्य केवल 'मरण पर्व' है। गजानन माधव मुक्तिबोध का यह कथन कि 'साहित्य समाज के आगे-आगे चलनेवाली और जलनेवाली मशाल है' अत्यंत मार्मिक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि साहित्य और समाज अनुषंगी हैं एवं दोनों ही एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। वे कैसे सही इतिहास की संरचना करते हैं; इसका बहुत ही रोचक उदाहरण वाल्मीकि की 'रामायण' एवं 'वेदव्यास' के 'महाभारत' हैं।

रामायण काल में आदर्श जीवन-मूल्य व्याप्त थे और एक भाई दूसरे के सिर पर राजमुकुट पहना रहा था। महाभारत काल में यांत्रिक सभ्यता के विकास के सर्वोत्कृष्ट और जीवन-मूल्यों के ह्रास का निकृष्टतम वर्णन है। रामायण काल में एक भाईभ्दूसरे भाई के सिर पर राजमुकुट पहना रहा था; जबकि महाभारत काल में एक भाई दूसरे भाई के सिर से राजमुकुट उतार कर स्वयं के सिर पर पहनने के लिए इतना लालयित हो गया था कि वह कुरूक्षेत्र- सरीखे नरसंहार का आयोजन कर बैठा।

हिंदी साहित्य के आदिकाल में चंदबरदाई का युद्धक्षेत्र में उपस्थित होकर पृथ्वीराज को अधर्मी को पराजित करने हेतु उकसाना, मनुष्य के विकास में साहित्य की प्रत्यक्ष महत्ता को स्थापित करता है। भक्तिकाल में जब तत्कालीन राजनीति, लोगों में धर्म के नाम मतभेद और फूट पैदा कर रही थी। तब तुलसी, कबीर, रहीम, जायसी, सूर आदि कवि अपने साहित्य के माध्यम से लोगों में एकता का जागरण पैदा कर रहे थे। सिद्धों, भक्तों, नाथकवियों, या संतों के धर्म के जो भी माध्यम रहे हों, उनका काव्य लोक-जीवन और लोक-मूल्यों की अन्विति का काव्य था।

यह साहित्य की ही क्षमता थी कि अगर रीतिकाल में धर्म के केन्द्र से मानवीय रागात्मकता और मूल्याश्रित जीवन को उजागर किया गया, तो उसकी परिण्तियाँ किसी पतनोन्मुख युग में न होकर आधुनिक युग के लिए प्रेरणादायी चेतना के रूप में हुई। भारतेन्दु युग का सामाजिक जागरण, रूढ़ियों से मुक्त होने की कामना और सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक पाखंडों पर प्रहार-मूल रूप से साहित्य के लोक-चरित्र और लोक-चेतना का ही अनवरत प्रवाह था।

राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष के युग में रचनाकारों की वाणी ने परम्परा के श्रेष्ठ उपादानों के माध्यम से लोगों की आत्महीनता को दूर करते हुए उनके अंदर एक ऐसा ओजस्वी राष्ट्रीय भाव जगाया, जो तत्कालीन समय की आवश्यक मांग थी। मैथिलीशरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'- जैसे राष्ट्रीय कवियों की वाणी जनता की ही वाणी थी।

छायावादी कवियों ने भी कविता और गद्य के माध्यम से भारतीय जन-मानस को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता का बोध कराया और उनके भीतर सोए उच्च भावों को जागृत किया। कामायनी, राम की शक्ति पूजा, चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्त, तुलसीदास, जागो फिर एकबार आदि ऐसी रचनाएं हैं, जो इतिहास के संदर्भों को, सामयिक संघर्ष को नई अर्थवत्ता भी देती हैं।

इतना ही नहीं, समकालीन समस्याएं, अंतर्बाधाएं और उत्पीड़न को भी इन रचनाकारों ने नई अर्थवत्ता दी और सदियों से मन में बैठी गुलामी से मुक्त होने का आह्वान किया। यह मनोवैज्ञानिक उपचार निश्चय ही महत्त्वपूर्ण था; क्योंकि बाहर की बेड़ियाँ तोड़ने से पहले जरूरी होता है भीतर की बेड़ियों को काटना। 'ध्रुवस्वामिनी' का पुरूष-उत्पीड़न से मुक्त होकर अपने विशिष्ट व्यक्तित्व को घोषित करना या 'चतुरी चमार' और 'पगली'-जैसे चरित्रों का अपने विशिष्ठ व्यक्तित्व और संघर्ष द्वारा नये अर्थ में उजागर होना या तत्कालीन अकाल, भुखमरी और ग्रामीणों की समस्याओं का गद्य व कथा के माध्यम से समाज के सम्मुख अवतरित होना। यह दिखाता है कि किस तरह हमारा साहित्य जीवन की उत्कट समस्याओं और मानवीय संबंधों को नए ढंग से परिभाषित कर रहा था।

प्रेमचंद युग के साहित्य ने ग्राम्य-जीवन और साधारण मनुष्य की यातनाओं के साथ उसकी उदात्तताओं का जो रूप प्रस्तुत किया, उसने साहित्य में परम्परागत रूप से चली रही नायक की अवधारणाओं को बदल दिया। उन्होंने अपनी संवेदनशील सशक्त लेखनी द्वारा प्रमाणित किया कि बड़े कुल या समृद्धि के बीच ही बड़े आदमी पैदा नहीं होते। बल्कि दरिद्रता व अभाव के बीच भी ऐसे इंसान पैदा होते हैं, जो नायक या महानायक बनने की क्षमता रखते हैं।

प्रेमचंद का 'गोदान', जयशंकर प्रसाद का 'कंकाल' और 'तितली'- जैसे प्रचण्ड आक्रामक और ग्राम्य-जीवन की नई रूप-रेखा प्रस्तुत करने वाले उपन्यास एवं निराला की 'भिखारी' और 'दान' -जैसी कविताओं को यदि हम देखें, तो हमें समाज के रचाव में साहित्य की भूमिका स्पष्ट नजर आएगी। आशय यह कि हिंदी साहित्य पर मार्क्सवाद के प्रभाव को मान्यता देते हुए भी हम यह स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि मानवीय की भावना के कारण हमारे रचनाकार स्वयं ही प्रगतिशील थे, किसी बाहरी प्रभाव के कारण नहीं।

समय की गति जैसे-जैसे तीव्र होती जाती है और विश्व का भूगोल सिमटने लगता है, वैसे-वैसे अनेक प्रकार की पारस्पारिक अंतः क्रियाएं होने लगती हैं। दुनिया का पास होना अब एक मुहावरा भर नहीं है। यह एक ऐसा ज्वलंत सत्य है जिससे इंकार करने का कोई औचित्य नहीं है। भारतीय जीवन, ज्ञान और साहित्य के अनेकानेक प्रभाव दूसरे देशों की रचनाओं पर पड़े हैं, पर साथ ही यह भी ठीक है कि स्वातंत्र्योत्तर काल में प्रभावों का प्रवाह पश्चिम की ओर से भी आया है। फिर भी एक बात हमें आश्वस्त करती है कि उन प्रवाहों में भारत बहा नहीं है। और इसका कारण उसकी भी परिपक्व मानसिकता और ठोस वैचारिक और मानवीय आधारभूमि है। जो गहराई से भारतीय मनुष्य में जमी है। उल्लेखनीय है कि इतने सारे वैचारिक संक्रमणों के बावजूद हमारा साहित्य अपनी जमीन और उसकी गंध से जुड़ा हुआ साहित्य है। किसी भी दौर में वह सरासर विदेशी नहीं हुआ, न ही अपने देश की मूल समस्याओं और परम्परा की उत्कृष्टता से विमुख हुआ है।

'अन्धायुग' हो या 'आत्मजयी' या 'मैयादास की माड़ी', 'झूठा सच' या 'अनामदास का पोथा' - सबके भीत आधुनिक चेतना के साथ परम्परा से उपलब्ध श्रेष्ठ तत्त्वों का समन्वय भी दिखाई देता है और एक ऐसा विखण्डन भी जो ऐतिहासिक प्रक्रिया का अनिवार्य अंग है।

हमारे वर्तमान साहित्य में भी जो बहुत से नये और ताजा रचनाकारों द्वारा समृद्ध किया जा रहा है; जन-भाषा का जन-चरित्र और लोक-संस्कार विद्यमान है। आज के रचनाकारों के कथ्य और भाषा-शैली पर लोक-भाषा और लोक-जीवन की गहरी छाप है, जो इस बात को साबित करती है कि आज के साहित्य का अपनी विरासत से गहरा रिश्ता है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि पिछले समय में भारत की राजनीति और राजनीतिक दलों में कई तरह की संकीर्णताओं ने प्रवेश किया। कई बार तो ऐसा लगा कि कही हम अपने कठमुल्लापन, जातीय और प्रांतीय भेदभाव, आतंकवाद और शोषण प्रक्रियाओं के चलते वापस मध्य काल में तो नहीं लौट गए हैं ? यद्यपि यह एक अंतर्राष्ट्रीय प्रवृति दिखाई पड़ रही है, पर हमारा आशंकित होना स्वाभाविक है; क्योंकि हमने अतीत में इसे सच होते हुए भी देखा है।

आज के युग में सुमन, मुक्तिबोध, नागार्जुन, सर्वेश्वर दयाल, धूमिल आदि साहित्यकारों के साथ ही अनेकानेक साहित्यकारों ने सत्ता के खिलाफ अपना हस्तक्षेप दर्ज करवाया है और यह धारा आज के सारे लेखन के परोक्ष में कहीं न कहीं विद्यमान है। सामाजिक जटिलताओं और विषमताओं का गहन चित्रण आज का साहित्यकार कर रहा है; उससे कहीं न कहीं समाज में जागरूकता पैदा हो रही है।

यह हमारा सौभाग्य है कि हमारी साहित्यिक विरासत में जो गहरा आध्यात्मिक स्पर्श है; जो एक निरपेक्ष उदात्तता है; निरर्थक परम्पराओं और पाखंडों पर जो करारी चोट है; और समस्याओं की कठिन राहों से गुजर कर आशा और आस्था की नई दिशा का संधान है; वह किसी भी दिग्भ्रम के युग में, परिवेश बदल जाने पर भी निश्चय ही एक प्रकाश-स्तम्भ का काम कर सकती है; क्योंकि समस्याओं की शक्ल भले बदल जाए, चरित्रों, कथाओं या विषयों के भीतर निहित कथ्य मनुष्य को विवेक संगत अर्थ और दृष्टि देने में समर्थ होता है

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(मानवाधिकार संचयिका, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से साभार)

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