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मानव अधिकार का दार्शनिक आधार : पाश्चात्य संदर्भ

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डॉ0 सरोज कुमार वर्मा '' प्र त्येक व्यक्ति बिना जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक अथवा सामाजिक उत्पत्ति, जन्म अथवा किसी दूसरे प्...

डॉ0 सरोज कुमार वर्मा

''प्रत्येक व्यक्ति बिना जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक अथवा सामाजिक उत्पत्ति, जन्म अथवा किसी दूसरे प्रकार के भेदभाव के इस घोषणा में व्यक्त किये हुए सभी अधिकारों और स्वतंत्रताओं का पात्र है। इसके अलावा किसी स्थान अथवा देश के साथ जिसका, वह व्यक्ति नागरिक है, राजनीतिक परिस्थिति के आधार पर भेद नहीं किया जायेगा, चाहे वह स्वतंत्र हो, संरक्षित हो अथवा स्वशासनाधिकार से विहीन हो, अथवा अन्य प्रकार से अल्प-प्रभु हो।''

-मानव अधिकारों का सार्वभौम घोषणा पत्र, अनुच्छेद-2

मानव अधिकार मूलतः एक पाश्चात्य संकल्पना है, जिसकी जड़ें भारत में भी गहराती गयी हैं। पश्चिम वाले इसकी शुरूआत 1215 में प्रकाशित ब्रिटेन के घोषणा-पत्र (डंहदं ब्ंतजं) से मानते हैं, जो अपनी परिपूर्णता को 10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में पारित 'मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा-पत्र' के रूप में प्राप्त करती है। इस बीच के सात शताब्दियों के मार्ग पर कई ऐसे द्वार हैं जिन से होकर यह संकल्पना यहाँ तक पहुँच पायी। ये द्वार ब्रिटेन के 1679 का 'बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिनियम', 1689 का 'अधिकार-पत्र' (ठपसस व`ि त्पहीजे), 1776 की अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा तथा 1789 की फ्रांसीसी अधिकारों की घोषणा आदि हैं। इनके बाद बर्लिन, कांग्रेस, ब्रुसेल्स सम्मेलन तथा 1899 एवं 1907 के हेग सम्मेलनों में मानवाधिकार विषयक विमर्शों एवं 1929 में अंतर्राष्ट्रीय विधि संस्थान द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों की घोषणा ने इस संकल्पना को आगे बढ़ाया। फिर द्वितीय विश्वयुद्ध के आघातों ने भी इसमें गति प्रदान की जिसमें 1941 के अटलांटिक चार्टर तथा 1942 की संयुक्त राष्ट्रसंघ की घोषणा से और त्वरा आई। इतना कुछ होने के बाद ही मानवाधिकार की यात्रा अपने उत्स से अंजाम तक पहुंच पायी। 1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्रसंघ अपनी स्थापना के तीन वर्षों बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग द्वारा प्रस्तुत मसौदे के आधार पर इसकी सार्वभौम घोषणा कर पाया। यह घोषणा प्रस्तावना सहित 30 अनुच्छेदों की है, जिनमें प्रथम दो मनुष्य के जन्मजा समान होने के अधिकार के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति के साथ किसी भी कारण से भेदभाव नहीं किये जाने के अधिकार की स्वीकृति देता है तो 3सरा से 21वां अनुच्छेद उसके नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों को सुनिश्चित करता है। फिर 22वां से 27वां अनुच्छेद व्यक्ति के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को तय करता है तो अंतिम दो अनुच्छेद समस्त मानवाधिकारों के सार्वभौम उपयोग हेतु एक वृहद् संरचनात्मक ढांचे का प्रावधान करता है। इस प्रकार सात सौ वर्षों में मानवाधिकार की संकल्पना अपना एक सुनिश्चित रूप ले पायी, हालांकि उसमें संशोधन-परिमार्जन उसके बाद भी होता रहा है और आगे भी होता रहेगा।

लेकिन सात सौ वर्ष पूर्व ब्रिटेन के जिस घोषणा-पत्र से मानव अधिकार की संकल्पना क्रियात्मक अभिव्यक्ति का रूप ले पाती है, ऐतिहासिक दृष्टि से पाश्चात्य जगत में उसकी पृष्ठभूमि उस अभिव्यक्ति से लगभग सोलह-सत्रह सौ वर्ष पूर्व से 'मनुष्य सभी वस्तुओं का मापदंड है' की घोषणा के साथ बनने लगी थी। यह घोषणा सोफिस्ट दार्शनिक प्रोटागोरस की थी। प्रोटागोरस सेफिस्ट दर्शन का संस्थापक था और उसका काल ई.पू. 490 से लेकर ई.पू. 420 तक का है। यह काल दार्शनिक दृष्टिकोण से उलझन भरा था। पूर्व के दार्शनिकों में एकमत नहीं था। मूल तत्त्व, जगत की उत्पत्ति, आदि विषयों को लेकर विवाद थे। कहीं कुछ निश्चित निर्धारण नहीं हो पा रहा था। इसलिए उस काल के लोग इन विवादों में पड़ने के बजाय उस ज्ञान की ओर उन्मुख हुए जिससे दैनिक जीवन के व्यावहारिक उद्देश्यों की पूर्ति होती है। इस क्रम में उन्हें यह ज्ञात हुआ कि निरपेक्ष नाम की कोई भी चीज सत्य नहीं है। सत्य वही है जिससे हमारा व्यावहारिक जीवन संभव हो पाता है। इसी पृष्ठभूमि में प्रोटागोरस ने मनुष्य के मापदंड होने की घोषणा की। उसने कहा कि मनुष्य सभी वस्तुओं का मापदंड है, इसलिए जो उसके सापेक्ष है उसका अस्तित्व है और जो नहीं है उसका अस्तित्व नहीं है। उसका यही कथन 'मनुष्य सभी वस्तुओं का मापदंड है' के सिद्धांत के रूप में प्रचलित हुआ। यदि सूक्ष्मता से देखा जाये तो मानवाधिकार की अवधारणा की शुरूआत यहीं से होती है। यह ठीक है कि बाद के दार्शनिकों में प्रोटागोरस के 'मनुष्य' शब्द को लेकर मतभिन्नता रही। प्लेटो और अरस्तु ने उसे व्यक्तिवाचक माना तो गोम्पर्ज ने समूहवाचक और शीलर ने इन दोनों रूपों को समाहित करते हुए प्रोटागोरस के इस सिद्धांत की मानवतावादी व्याख्या की। लेकिन इतना तय है कि प्रोटागोरस के इस कथन से मनुष्य चिंतन के केन्द्र में आ कर महिमामंडित हुआ। अतः मानवाधिकार की अवधारणा का आरंभ यहीं से माना जाना चाहिए। यही से विकसित होकर यह आधुनिक युग तक आती है, जहाँ लॉक और रूसो जैसे दार्शनिक इसके लिए ठोस दार्शनिक आधार निर्मित करते हैं।

इस आधार के निर्मित होने में जिस सिद्धांत ने अहम भूमिका निभाई वह अधिकार का प्राकृतिक सिद्धांत है। इस सिद्धांत के मुताबिक मनुष्य को कुछ अधिकार मनुष्य होने भर के नाते प्राप्त हैं, क्योंकि वे उन्हें जन्म के साथ लेकर पैदा होने के कारण प्रकृति-प्रदत हैं। अतः किसी भी परिस्थिति में, किसी के द्वारा, उन अधिकारों का हरण नहीं किया जा सकता। इसीलिए प्रो0 ए.डी. आशीर्वादम कहते हैं कि -''वे उसी प्रकार मनुष्य की प्रकृति के भाग हैं, जिस प्रकार उनकी खाल का रंग ।''1 इस सिद्धांत का सबसे प्रबल समर्थक 17वीं सदी का अंग्रेज दार्शनिक जॉन लॉक है। लॉक ज्ञान-मीमांसा के दृष्टिकोण से अनुभववादी दार्शनिक था। अनुभववाद पाश्चात्य दर्शन का वह ज्ञानमीमांसीय सिद्धांत है जो यह मानता है कि मनुष्य को किसी भी प्रकार का ज्ञान अनुभव के द्वारा होता है। अतः अनुभव ही ज्ञान-प्राप्ति का प्रामाणिक साधन है। लॉक ने ऐसा बुद्धिवाद के विरोध में कहा था। बुद्धिवाद बुद्धि को ज्ञान-प्राप्ति का प्रामाणिक साधन मानता है। दरअसल पाश्चात्य दर्शन के विकास-क्रम में धर्म-केन्द्रित मध्ययुगीन दर्शन के प्रतिरोध में जिस आधुनिक दर्शन का विकास होता है वह दो भागों में बंटा हुआ है । एक बुद्धिवाद और दूसरा अनुभववाद। बुद्धिवाद का प्रणेता फ्रांस का दार्शनिक रेने डेकार्ट है और अनुभववाद का प्रणेता इंग्लैण्ड का दार्शनिक जॉन लॉक। डेकार्ट ने अपने बुद्धिवाद की स्थापना में यह कहा कि मनुष्य में कुछ प्रत्यय जन्मजात होते हैं, जिनके आधार बुद्धि ज्ञान प्राप्त करती है। लॉक ने इस स्थापना का खंडन करते हुए कहा कि कोई प्रत्यय जन्मजात नहीं होता, इसलिए मनुष्य को सारा ज्ञान अनुभव से प्राप्त होता है।

लॉक अपनी इसी ज्ञानमीमांसीय स्थापना को राजनैतिक चिंतन के क्षेत्र में इस्तेमाल करते हुए राजा के दैवी अधिकार, जिसके मुताबिक राजा को राज्य करने का अधिकार जन्म से ही प्राप्त होता है, को खारिज करते हुए यह प्रतिपादित करता है कि चूंकि प्राकृतिक दृष्टिकोण से सभी मनुष्य समान होते हैं, इसलिए जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति का अधिकार उसे अपने-आप मनुष्य होने भर के नाते प्राप्त हो जाते हैं। डॉ. ए. एम.घोष लॉक के इस सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं- ''लौक ने राजाओं के दैवी अधिकार के सिद्धांत (कि राज्य करने का अधिकार ईश्वर से प्राप्त होता है) का खंडन किया है; उनकी मान्यता यह है कि शासन का अधिकार तो शासितों की स्वैच्छिक स्वीकृति से जन्मता है।...... प्राकृतिक नियम की मान्यता में सबसे बड़ी बात यह है कि मनुष्य दैवी नगर के नागरिक हैं, जहाँ अपरिवर्त्य नियमों का परिचालन होता है (जहाँ परिचालित होनेवाले नियम अपरिवर्त्य होते हैं)। इन नियमों की खोज मानवीय विवेक द्वारा होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रकृति की दृष्टि में सभी मनुष्य परस्पर समान हैं। और चूंकि प्रकृति ने सब मनुष्यों को समान बनाया है, इसलिए राजनैतिक राज्य का अस्तित्व उन सभी लोगों की सहमति अथवा अनुबंध द्वारा संभव हो सकता है जिसमें वे सभी मनुष्य अपने कतिपय उद्देश्यों की पूर्ति हेतु भागीदार होते हैं। कतिपय मनुष्यों ने दूसरे के शासन में रहना स्वीकार कर लिया था। सामाजिक अनुबंध (ैवबपंस बवदजतंबज) का सिद्धांत, इस प्रकार, प्राकृत नियम के सिद्धांत के साथ घनिष्ट रूप से संबद्ध था।''2

लॉक अपने राजनैतिक चिंतन में प्रेम, दया, विवेक और नीति संपन्न मानव स्वभाव की चर्चा करते हुए एक ऐसी प्राकृतिक अवस्था का वर्णन करता है जिसमें मनुष्य शांति, सहयोग, सद्भाव और सुरक्षा के साथ रहता था। लॉक के अनुसार यह प्राकृतिक अवस्था उस प्राकृतिक नियम से संचालित होती थी जो विवेकयुक्त मनुष्य को, सभी मनुष्यों के समान और स्वतंत्र होने के कारण किसी भी मनुष्य को किसी दूसरे मनुष्य के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाने की सीख देता था। डॉ. एस. सी. सिंहल के शब्दों में - ''लॉक ने प्राकृतिक नियम की नैतिक व्यवस्था प्रस्तुत करते हुए कहा है कि- प्राकृतिक अवस्था को शामिल करने के लिए प्राकृतिक नियम होता है जो प्रत्येक को बाध्य करता है और प्रज्ञा अर्थात् विवेक जो कि उस कानून का ही दूसरा नाम है, संपूर्ण मानव समाज को, जो उसका प्रायः पालन करता है, यह सिखाता है कि सब लोग समान तथा स्वतंत्र हैं, इसलिए किसी को भी दूसरे के जीवन, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता एवं संपत्ति को क्षति नहीं पहुंचानी चाहिए।''3 लॉक का यह कथन मानवाधिकार का प्रस्थान-विन्दु है।

यद्यपि लॉक ने इस प्राकृतिक अवस्था की कठिनाईयों, जो कि- प्राकृतिक नियम की अस्पष्टता, इन नियमों की निष्पक्ष व्याख्याकार की कमी तथा इन नियमों को लागू करने वाले शक्तिशाली सत्ता का अभाव- थे, के कारण इन्हें दूर करने के लिए मनुष्यों के आपसी समझौते के आधार पर समाज और राज्य के निर्माण का विचार दिया, लेकिन इन दोनों संस्थाओं में से किन्हीं के पास उतने असीम अधिकार नहीं दिये गये कि वह किसी भी व्यक्ति के जीवन, संपत्ति और स्वतंत्रता को नष्ट कर दे। उनके अधिकार सीमित रहे और उनका दायित्व व्यक्ति के जीवन, संपत्ति और स्वतंत्रता की सुरक्षा करना ही रहा। लॉक के अनुसार समाज और राज्य के निर्माण के लिए मनुष्यों के बीच दो समझौते हुए। एक समझौता मनुष्यों द्वारा आपस में हुआ जिससे समाज का निर्माण हुआ। इस समझौते द्वारा व्यक्ति के जीवन, संपत्ति और स्वतंत्रता की सुरक्षा का अधिकार समाज को देते हुए यह प्रावधान किया गया कि जो व्यक्ति भी इन अधिकारों का उल्लंघन करेगा, समाज उन्हें दंडित करेगा। और दूसरा समझौता, इस पहले समझौता द्वारा बने समाज द्वारा किसी व्यक्ति को शासक चयनित कर, उस शासक के साथ किया गया जिसमें उसे कुछ अधिकार सौंपे गये। इससे राज्य की उत्पत्ति हुई। परन्तु राज्य को दिये गये अधिकार के साथ-साथ यह प्रावधान भी किया गया कि यदि राज्य समझौते की शर्तों को निष्ठा के साथ लागू नहीं करता हो, अथवा प्राकृतिक तथा सामाजिक जीवन में बाधा पहुंचाने वाले कानून बनाता हो या फिर जनता के प्रति उपेक्षा, अन्याय तथा अपमानजनक व्यवहार करे तो समाज को यह अधिकार होगा कि वह उस शासक को हटा कर दूसरे शासक को नियुक्त करे। इस प्रकार समाज और राज्य दोनों के अधिकार सीमित रहे और किन्हीं के पास व्यक्ति के जीवन, संपत्ति और स्वतंत्रता के अधिकार को, जो उसे मानव होने के नाते प्राप्त हैं, नष्ट करने का अधिकार नहीं दिया गया। लॉक का यही व्यक्ति, समाज और राज्य विषयक विचार मानव अधिकार का ठोस दार्शनिक आधार बना।

लॉक के पहले थॉमस हॉब्स ने भी, जो कि इंग्लैण्ड का ही 17वीं सदी का ही दार्शनिक था, मानव स्वभाव और प्राकृतिक अवस्था की विवेचना करते हुए प्राकृतिक नियम, प्राकृतिक अधिकार और सामाजिक समझौते द्वारा राज्य की उत्पत्ति के सिद्धांत प्रतिपादित किये थे। अपने इस प्रतिपादन में हॉब्स ने यह बताया था कि मानव स्वभाव से स्वार्थी, ईर्ष्यालु और निरंतर लड़ते-झगड़ते रहने वाला असामाजिक प्राणी है। वह हमेशा ज्यादा से ज्यादा ताकत प्राप्त करने के प्रयास में लगा रहता है ताकि संघर्ष में वह दूसरे पर विजय प्राप्त कर सके। हॉब्स के अनुसार प्रतिस्पर्धा, भय और वैभव के चलते मनुष्य सदैव संघर्ष करता रहता है। इसलिए प्राकृतिक अवस्था लगातार युद्ध की अवस्था थी और उसमें हर मनुष्य दूसरे मनुष्य का दुश्मन था। ऐसी स्थिति में किसी भी मनुष्य का यही प्राकृतिक अधिकार था कि वह अपने जीवन की सुरक्षा के लिए कुछ भी करे, दूसरे को लूटे, मारे या फिर उसकी हत्या ही कर दे। इस प्रकार हॉब्स के मुताबिक मनुष्य को अपने जीवन-रक्षा के लिए हिंसा और हत्या करने का भी अधिकार है। परन्तु चूंकि यह अधिकार सभी मनुष्यों के पास है, जिसका उपयोग करने से जीवन असुरक्षित हो जाता है इसलिए प्राकृतिक नियम यह है कि मनुष्य ऐसा कोई कार्य न करे जिससे जीवन असुरक्षित हो जाये। डॉ. एस.सी.सिंहल हॉब्स को उद्धृत करते हुए इस संबंध में लिखते हैं- ''हॉब्स ने प्राकृतिक नियम की परिभाषा देते हुए कहा है कि- यह वह नियम है जो विवेक द्वारा खोजा गया है, जिसके द्वारा मनुष्य के लिए वे कार्य निषिद्ध हैं जो उनके जीवन के लिए विनाशप्रद हैं या जिनसे जीवन की रक्षा के साधनों का हरण होता है और जिनके द्वारा उसके लिए उन कार्यों का न करना निषिद्ध है जिनसे जीवन की रक्षा होती है।''4 परन्तु इस नियम को हॉब्स कानून की संज्ञा नहीं देता। हॉब्स के अनुसार कानून संप्रभु का आदेश होता है और संप्रभु राज्य का शासक होता है।

राज्य की उत्पत्ति के संबंध में हॉब्स का कहना है कि चूंकि प्राकृतिक अवस्था बेहद अराजक थी, हमेशा लूट-मार मची रहती थी, इसलिए यह अवस्था मनुष्य के लिए सुखकर नहीं थी। वह इसमें रहते हुए लगातार दुख भोग रहा था। अतः इस दुख से उबरने के लिए उसने आपस में एक समझौता किया, जिससे राज्य की उत्पत्ति हुई। इस समझौते में प्रत्येक मनुष्य द्वारा शांतिपूर्वक और सुरक्षित रहने के लिए किसी एक मनुष्य अथवा जनसभा को अपने ऊपर शासन करने का अधिकार दिया गया। परन्तु जिस जनसभा अथवा मनुष्य को यह अधिकार दिया गया वह इस समझौते से नहीं बंधा। इसलिए वह निरंकुश सत्ता संप्रभु बना और इस समझौते से बंधे हुए सारे मनुष्य उसकी प्रजा बने। हॉब्स ने इस संप्रभु को लेवियाथन (स्मअपंजींद) कहा। परन्तु संप्रभु को निरंकुश मानने के बावजूद हॉब्स ने प्रजा के पास यह अधिकार सुरक्षित रहने दिया कि यदि संप्रभु किसी मनुष्य को स्वयं की हत्या करने अथवा दूसरे द्वारा हमला किये जाने पर उसका विरोध न करने का आदेश दे, तो वह मनुष्य संप्रभु के आदेश का उल्लंघन कर सकता है। इसके अलावा यदि संप्रभु व्यक्ति के भोजन, इलाज, हवा, पानी आदि पर प्रतिबंध लगाये, अथवा किसी दूसरे व्यक्ति को मारने की आज्ञा दे तो वह व्यक्ति संप्रभु की आज्ञा नहीं मानने के लिए स्वतंत्र है। फिर जान जाने के डर से युद्ध से भाग आने तथा अपने दोषों को इन्कार करने के मामले में भी कोई व्यक्ति संप्रभु की आज्ञा का उल्लंघन कर सकता है।

इस प्रकार हॉब्स ने मनुष्य के बुरे स्वभाव, बदतर प्राकृतिक अवस्था और निरंकुश संप्रभु का समर्थक होने के बावजूद मनुष्य के जीवन के अधिकार को सर्वोपरि माना। इसीलिए उसके इस विचार को मानवाधिकार के आधार के रूप में स्वीकृत किया गया। यद्यपि तुलनात्मक ढंग से हॉब्स का विचार लॉक की अपेक्षा मनुष्य के पास मनुष्य होने के नाते कम अधिकार होने का हिमायती है, फिर भी चूंकि वह जीवन के अधिकार को प्राकृतिक मानते हुए उसके सर्वोपरि होने की घोषणा करता है और किसी भी हाल में उसे संप्रभु को सौंपने की इजाजत नहीं देता, इसलिए उसके विचार को मानवाधिकार को मजबूत करनेवाले सिद्धांत की श्रेणी में रखा गया ।

फिर लॉक के बाद 18वीं सदी का फ्रांसीसी दार्शनिक जीन जैक्विस रूसो के विचारों में भी मानवाधिकार को संबल प्रदान करने वाले तत्त्व हैं। रूसो ने भी अपने विचारों में मानव स्वभाव तथा प्राकृतिक अवस्था की चर्चा करते हुए समाज और राज्य की उत्पत्ति विषयक सिद्धांत प्रस्तुत किये है। इस क्रम में उसने मनुष्य को निर्दोष, निष्पाप और पशु के समान माना है। उसके अनुसार मनुष्य स्वभावतः अच्छा होता है और उसमें संपत्ति संग्रह की कोई इच्छा नहीं होती। वह स्वभाव से स्वतंत्र और नैतिकता के विचारों से रहित होता है। उसमे विवेक नहीं होता। लेकिन समानता की भावना होती है। मनुष्य को ऐसा मानने के कारण ही रूसो ने प्राकृतिक अवस्था को भी वैसी अवस्था माना है जिसमें मनुष्य पूरी तरह स्वतंत्र और समान था। इसलिए इस अवस्था में वह भय और चिंता से मुक्त होकर सरल और निश्चिन्त जीवन जीता था। तब वह आत्मनिर्भर होने के कारण अपना मालिक था और दूसरे को न्यूनतम नुकसान पहुंचाते हुए अपना हित करने में लगा रहता था। परन्तु यह प्राकृतिक अवस्था, जो रूसो के मुताबिक स्वर्ग-तुल्य था, समाप्त हो गयी । सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य की जरूरतों ने पांव फैलाने शुरू कर दिये। फलतः उसमें धन प्राप्त करने की इच्छा भी पैदा हुई और तेरे-मेरे का भाव भी उत्पन्न हुआ। फिर उसे हथियार बनाने, शिकार करने, आग जलाने, खेती करने और कपड़ा पहनने का ज्ञान भी हो गया। इससे मनुष्यों में अहंकार के साथ-साथ भेद-भाव की भावना ने भी जन्म ले लिया। इसके चलते मनुष्य हिंसक और आक्रामक हो गया । इसकी परिणति अराजकता में हुई। शांत और सुखद प्राकृतिक अवस्था अशांत और अराजक हो गई।

इसी अराजकता को दूर करने के लिए मनुष्यों ने आपसी समझौते के द्वारा समाज तथा राज्य का निर्माण किया । डॉ. एस. सी. सिंहल के शब्दों में - ''रूसो का विचार है कि अराजक दशा को समाप्त करने के लिए प्राकृतिक मनुष्यों ने एक समझौता किया और यह निश्चय किया कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता, अधिकार और शक्ति समाज को सौंप दे क्योंकि समाज व्यक्तियों का समूह है और समाज का निर्माण व्यक्तियों की सहमति से हुआ है। अतः मनुष्य अपनी जिस स्वतंत्रता, अधिकार और शक्ति को अपने से अलग करके समाज को सौंपता है, उसे वह समाज का सदस्य (अंग) होने के नाते पुनः प्राप्त कर लेता है। वह एक हाथ से अपनी स्वतंत्रता समाज को प्रदान करता है और दूसरे हाथ से समाज का अंग होने के नाते उसे वापस ले लेता है। इस समझौते का परिणाम यह हुआ कि समूह के प्रत्येक सदस्य का जीवन और उसकी स्वतंत्रता सुरक्षित हो गयी और वह समष्टि रूप में समाज की सामान्य इच्छा पर स्थापित हो गयी। चूंकि व्यक्तियों ने सामूहिक रूप से समाज का निर्माण किया इसलिए प्रत्येक व्यक्ति उस सामूहिक शक्ति का बराबर साझेदार हुआ। ... इस तरह रूसो के अनुसार मनुष्य अराजक प्राकृतिक अवस्था को समाप्त करने के लिए जो समझौते करते हैं वे दो पक्षों के बीच होती है। एक पक्ष उनके व्यक्तिगत जीवन का और दूसरा पक्ष उनके सामूहिक जीवन का है। अतः वे व्यक्तिगत रूप से जो गंवाते हैं उसे समझौते के फलस्वरूप सामूहिक रूप से पुनः प्राप्त कर लेते हैं।.... रूसो आगे बताता है कि - जो कुछ समझौते से मनुष्य खोता है वह है प्राकृतिक स्वतंत्रता और किसी भी वस्तु को पाने का असीमित अधिकार । जो कुछ वह पाता है वह है सामाजिक स्वतंत्रता और अपनी वस्तुओं पर स्वामित्व ।''5

रूसो इसी समझौते के आधार पर राज्य की भी विवेचना करता है और कहता है कि समझौते से उत्पन्न सामूहिक एकता ही राज्य या संप्रभु है। उसके मुताबिक इस समझौते से जिस सामान्य इच्छा की उत्पत्ति होती है वही संप्रभु है। परन्तु यह संप्रभु सरकार नहीं है। रूसो राज्य और सरकार में अंतर करते हुए बताता है कि इस सर्वोच्च सामान्य इच्छा को व्यक्त करनेवाला सारा नागरिक समाज राज्य है और इस इच्छा के क्रियान्वयन के लिए समूह द्वारा जिस व्यक्ति का चयन किया जाता है वह सरकार का निर्माण करता है । लेकिन इतना कुछ कहने के बावजूद रूसो मनुष्य की स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानता है। उसके मुताबिक स्वतंत्रता मनुष्य का परम आंतरिक तत्त्व है। इसलिए यह मनुष्यता का अनिवार्य गुण है और उसे नष्ट कर देने पर मनुष्यता भी नष्ट हो जायेगी। इस मान्यता के कारण रूसो कानून को भी, जो कि उसके अनुसार संपूर्ण जनता से जुड़े मामलों से जुड़े होने के कारण संपूर्ण जनता के लिए प्रस्ताव है, मनुष्य की स्वतंत्रता को नष्ट करने की अनुमति नहीं देता। इस प्रकार रूसो के समझौता से निर्मित समाज और राज्य में भी मनुष्य, समझौता के पूर्व जितना स्वतंत्र था, समझौतों के बाद भी उतना ही स्वतंत्र रहता है। रूसो का यही प्रतिपादन मानवाधिकार की मजबूत आधारशिला के रूप में निर्मित हुआ।

इस प्रकार हॉब्स, लॉक और रूसो मानवाधिकार विषयक अधिकार के प्राकृतिक सिद्धांत के प्रमुख प्रवक्ता हैं। इनके अलावा मिल्टन, वाल्टेयर, दीदरो, स्पेन्सर तथा माण्टेस्क्यू आदि ने भी इस सिद्धांत का समर्थन किया है, जैसा कि डॉ. जी. पी. नेमा और डॉ. के.के. शर्मा लिखते भी हैं- ''अंग्रेजी दार्शनिक जॉन लॉक, जिसे आधुनिक काल का महत्वपूर्ण प्राकृतिक विधि विचारक कहा जाता है कि भूमिका को इस सिद्धांत के मूल में उल्लेखनीय कहा जा सकता है। अन्य दार्शनिकों में वाल्टेयर, जीन जैम्स रूसो एवं मॉण्टेस्क्यू का योगदान भी सराहनीय है। जॉन लॉक (जो 1688 की वैभवशाली क्रांति से संबद्ध थे) ने अपने विचारों के आधार पर यह सिद्ध कर दिया कि कुछ ऐसे अधिकार हैं जो मानव को मानव होने के नाते ही उपलब्ध होते हैं। जीवन जीने का अधिकार, संपत्ति का अधिकार और स्वतंत्रता का अधिकार- कुछ ऐसे अधिकार हैं जो स्वतः प्राप्त होते हैं। जैसे ही सामाजिक समझौते के तहत मानव ने सिविल समाज में प्रवेश किया तो उस दौरान राज्य के पक्ष में मानव ने उन अधिकारों के पुनः प्रवर्तन (त्मअपअंस) को स्वीकार किया। प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत के संदर्भ में एलेन पैजेल्स के विचारों को उद्धृत करना बेहतर होगा, ''व्यक्ति के पास अधिकार है; समाज पर या समाज के विरूद्ध दावा है कि समाज इन अधिकारों को अवश्य मान्यता प्रदान करे, जिस पर वह कार्य के लिए बाध्य है, मानव के अंतरस्थ हैं।'' इस परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव को मानव होने के नाते ही कुछ मानव अधिकार प्राप्त होते हैं और राज्य के लिए इन्हें लागू करना अपरिहार्य हो जाता है। राज्य इन अधिकारों को सुनिश्चित नहीं कर पाता है तो भी इस समझौते के अंतर्गत उसे अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करनी चाहिए। इस आशय से भी एक जिम्मेदार और लोकप्रिय राज्य-शक्ति का उदय होता है। इस प्रकारा प्राकृतिक आधार पर मानवाधिकारों का प्रारंभ हो जाता है।''6

परन्तु अधिकार का विधिजन्य सिद्धांत इस प्राकृतिक अधिकार को स्वीकार नहीं करता, यद्यपि कि यह भी मानवाधिकार को पुष्पित-पल्लवित करने में पर्याप्त खाद-पानी देता है। इस विधिजन्य सिद्धांत का प्रवर्तक 18वीं सदी का ब्रिटिश दार्शनिक जेरेमी बेंथम है। बेंथम नीतिमीमांसीय दृष्टिकोण से सुखवादी दार्शनिक था। सुखवाद पाश्चात्य नीतिशास्त्र का वह सिद्धांत है जो यह मानता है कि सुख ही मनुष्य के क्रिया-कलापों का मूल प्रेरक तत्व है, क्योंकि मनुष्य स्वभाव से ही सुख प्राप्त करना चाहता है और दुख से बचना चाहता है। इसलिए उसे वही करना चाहिए जिससे सुख प्राप्त होता है। इस प्रकार इस सिद्धांत के मुताबिक सुख ही हमारा अंतिम लक्ष्य है। लेकिन ऐसा मानने वाले सुखवादियों में भी एक वर्ग सिर्फ अपने सुख की बात करता है जबकि दूसरा वर्ग दूसरे के सुख की भी चिंता लेता है। इस दूसरे वर्ग के सुखवादियों को उपयोगितावादी कहा जाता है। बेंथम इसी उपयोगितावाद का समर्थक था। उसने अपने इस उपयोगितावाद को 'अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख' के सिद्धांत के रूप में प्रतिपादित किया, क्योंकि उसके अनुसार सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य सिर्फ अपने सुख से ही नहीं बल्कि दूसरे के सुख से भी सुखी होता है। परन्तु चूंकि वह सबको सुखी नहीं कर सकता, इसलिए उसे अधिकतम लोगों को अधिकतम सुखी करने का प्रयास करना चाहिए। बेंथम ने अपने इसी उपयोगितावादी नीतिमीमांसीय सिद्धांत को राजनीति के क्षेत्र में लागू करते हुए यह कहा कि राज्य का काम भी अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख पहुंचाना ही है। प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी के शब्दों में - ''उपयोगितावाद मूलतः एक आचार विषयक सिद्धांत है। राजनीतिक क्षेत्र मे ंइस सिद्धांत का अभिप्राय यह है कि राज्य को केवल वही कार्य करना चाहिए जिससे अधिकतम लोगों को अधिकतम लाभ पहुंचे। राज्य, कानून और शासन सभी के मूल में बेंथम उपयोगितावाद को ही निहित मानता है। इन सभी की उपादेयता इनके सुखदायी कार्यों के लिए ही है।''7

बेंथम राज्य को व्यक्तियों द्वारा गठित वह समूह मानता है जिसका काम व्यक्तियोें के लिए उपयोगिता यानी सुख को बनाये रखना तथा बढ़ाना है। इसीलिए वह यह भी कहता है कि व्यक्ति को राज्य की सत्ता को स्वीकारना और उसके आदेशों को मानना चाहिए, क्योंकि राज्य में रह कर ही वह दुखों से बच कर सुखों का उपभोग कर सकता है। बेंथम सामाजिक समझौते द्वारा राज्य के निर्माण विषयक विचार को खारिज करते हुए यह कहता है कि राज्य का निर्माण किसी समझौते के कारण नहीं बल्कि उपयोगिता के लिए हुआ है। बेंथम के ऐसा कहने के पीछे उसका किसी भी 'प्राकृतिक अवस्था' को इंकार करने का तर्क भी है। उसके मुताबिक कोई ऐसी प्राकृतिक अवस्था नहीं है जहाँ मनुष्य किसी अधिकार के साथ पैदा होता है। अधिकारों का निर्माण तो राज्य और कानून के द्वारा होता है। अतः राज्य की उत्पत्ति के पहले किसी प्रकार के अधिकार की कोई संभावना ही नहीं बनती। इसीलिए मनुष्यों ने राज्य का निर्माण किया ताकि वह उसे दुखों से बचाकर सुख दे सके। यही कारण है कि बेंथम राज्य के द्वारा बनाये गये कानून के बारे में कहता है कि उसकी सार्थकता इसी में है कि वह उपयोगिता की कसौटी पर खरा उतरे। और यह तब हो सकता है जब कानून सामाजिक उपयोग और सुख में वृद्धि करनेवाले अधिकारों को मान्यता दे। बेंथम राज्य के कानूनों द्वारा मान्यता प्राप्त अधिकार को सुखी जीवन का नियम मानता है। परन्तु इतना कुछ मानने के बावजूद बेंथम राज्य की शक्तियों को असीम नहीं मानता । इसलिए वह नागरिक को यह अधिकार देता है कि यदि राज्य उपयोगिता के मापदंड पर खरा नहीं उतरे और वह ऐसा और इतना कानून बनाये कि उससे अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख बाधित हो और बहुसंख्यक नागरिकों के दुख में वृद्धि हो तो वह राज्य की आज्ञा का उल्लंघन करते हुए कानून को मानने से इंकार कर सकता है। बेंथम द्वारा दिया गया यह अधिकार मानवाधिकार के विकास की पृष्ठभूमि बनता है। ऐसा करने से मानवाधिकार विधि और कानून के दायरे में आ जाता है।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि मानवाधिकार का ठोस दार्शनिक आधार है। इसी आधार पर पिछले चार सौ वर्षों में मानवाधिकार की संकल्पना विकसित होती रही है। इस विकास के फलस्वरूप इसकी शाखायें इतनी लंबी और घनी हो सकी हैं कि लोग इसकी छांव में सुस्ताने लगे हैं। पिछली सदी का अमेरिकी दार्शनिक जॉन बोर्डले रॉल्स भी इसी आधार पर अपनी न्याय की अवधारणा प्रतिपादित कर पाया है, जिसके चलते उसे मानवाधिकार का विशिष्ट पैरोकार माना जाता है। रॉल्स ने हॉब्स, लॉक और रूसो के सामाजिक समझौते के सिद्धांत तथा काण्ट के नैतिक सिद्धांत के सूत्र लेकर व्यक्ति की स्वतंत्रता को परम मानते हुए सभी के साथ समान व्यवहार तथा समान वितरण संबंधी अपने न्याय का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उसका यह सिद्धांत सामाजिक न्याय की अवधारणा के रूप में स्थापित हुआ। प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी का इस संबंध में कहना है- ''रॉल्स सामाजिक न्याय का प्रबल पक्षधर है। वह इसी को न्याय का प्रमुख अवलंब मानता है। उसका आशय सामाजिक जीवन में न्याय के माध्यम से समान एवं समन्वित प्रगति की व्यवस्था करना है। अवसर एवं सुविधाओं के न्यायोचित वितरण से इसकी प्राप्ति होती है। उसने न्याय के मूलतः दो सिद्धांतों को स्वीकृति प्रदान थी है : 1. न्याय के प्रथम सिद्धांत के अंतर्गत सभी को समान रूप से अवसर की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसमें उन सभी स्वतंत्रताओं को सम्मिलित कर सकते हैं जो उदार लोकतंत्रीय प्रणाली के अंतर्गत् पाये जाते हैं। 2. सामाजिक एवं आर्थिक असमानता को इस रूप में व्यवस्थित किया जाना चाहिए जिससे समाज में हीनतम स्थिति वाले लोगों को अधिकतम हित हो सके।''8 रॉल्स के ये सिद्धांत मानवाधिकारों को उर्वरता प्रदान करते हैं। इस बात की पुष्टि न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन ने इस कथन से भी होती है कि - ''अमरीकी दार्शनिक जॉन राल्स लिखते है कि सामाजिक न्याय इस धारणा पर आधारित है कि किसी समाज को तभी समतावादी माना जा सकता है जब वह समानता और एकजुटता के सिद्धांत पर आधारित हो और वहां मानवाधिकारों का सम्मान तथा प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान की रक्षा की जाती हो।''9

परन्तु अफसोस की बात है कि इतना सुदृढ़ दार्शनिक आधार और शताब्दियों के लंबे प्रयास के बावजूद मानवाधिकारों की सुरक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता अभी तक नहीं मिल पायी है। समूची दुनिया में व्यापक स्तर पर मानवाधिकारों का होनवाला हनन इसका सबूत है। डॉ. एस.सी. सिंहल इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं- ''यह एक विडंबना ही है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग का कार्यक्षेत्र आयु बढ़ने के साथ-साथ बढ़ने के स्थान पर संकुचित होता जा रहा है। वह अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में असफल रहा है। यह सत्य है कि आज समस्त विश्व में मानवाधिकारों का व्यापक स्तर पर हनन हो रहा है, इस संदर्भ में एमनेस्टी इण्टरनेशनल 1995 की रिपोर्ट उल्लेखनीय है । इसमें 150 देशों में मानवाधिकार की स्थिति की समीक्षा की गई थी। इसमें उग्रवादी संगठनों और सरकारी दमन तंत्र की विवेचना की गयी। इस रिपोर्ट में सभी दक्षिण एशियाई देशों सहित विश्व के 141 देशों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया। पामर और पार्किन्स के शब्दों में - विश्व के कुछ ही भागों में मानव अधिकार तथा आधारभूत स्वतंत्रताएं वास्तव में सुरक्षित हैं, अधिकांश क्षेत्रों में तो अभी इसका कोई अर्थ नहीं है।''10 वह इसलिए कि मानवाधिकारों के कार्यान्वयन के लिए कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। अतः इसकी समुचित सफलता के लिए इसकी घोषणा को सिर्फ शब्दों तक सीमित न रखकर कुछ यर्थाथवादी व्यावहारिक उपक्रम भी किया जाना जरूरी है। इसलिए दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों से बात समाप्त करना लाजिमी होगा कि -

''इस रास्ते के नाम लिखो एक शाम और ।

या इसमें रोशनी का करो इंतजाम और ।

आंधी में सिर्फ हम ही उखड़ कर नहीं गिरे,

हमसे जुड़ा हुआ था कोई एक नाम और।''

 

संन्दर्भ :

1. ऐ.डी. आशीर्वादम; 'पॉलिटिकल थ्योरी', पृ-150; दि अपर इंडिया पब्लिशिंग हाउस, लखनऊ; 1976

2. ए.एम. घोष, ''लॉक''; 'पाश्चात्य दर्शन का इतिहास (खण्ड-2)', पृ-168-169; राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर; 1984

3. डॉ. एस.सी. सिंहल; 'प्रतिनिधि राजनीतिक विचारक', पृ-183; लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, अनुपम प्लाजा-1, ब्लॉक नं.-50, संजय प्लेस, आगरा-282002; 2010

4. वही, पृ-167

5. वही, पृ-202-203

6. वही, पृ-2

7. प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी; 'समकालीन राजनीतिक चिंतन', पृ-5; राज पब्लिकेशन्स, 108, 4855/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, 2011

8. वही, पृ-585-586

9. न्यायमूर्ति के.जी. बालकृष्णन; ''सपना समतामूलक समाज का'', 'योजना', वर्ष-55, अंक-4, अप्रैल 2011, पृ-6; 538, योजना भवन, संसद मार्ग, नई दिल्ली-110001

10. डॉ. एस.सी. सिंहल; ''समकालीन राजनीतिक मुद्दे', पृ-103; लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, अनुपम प्लाजा, आगरा-2; 2005-06

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(मानवाधिकार संचयिका, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से साभार)

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रचनाकार: मानव अधिकार का दार्शनिक आधार : पाश्चात्य संदर्भ
मानव अधिकार का दार्शनिक आधार : पाश्चात्य संदर्भ
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