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कहानी - कार्यकर्ता

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मनीष कुमार सिंह

अप्रैल का आखिरी हफ्ता था। नहर के किनारे खड़े कचनार के पेड़ लाल फूलों से भर गए थे। रामस्‍वरुप जी को लग रहा था कि दूर कहीं आग लगी हुई है। सुबह का मौसम अभी भी सुहाना था। वे उत्‍साह से छड़ी लेकर टहलने निकल पड़े। स्‍कूल जाते बच्‍चों को देखकर प्रसन्‍न भाव से मुस्‍कराए। कुछ दूर रास्‍ते में किनारे लोगों ने घर का कूड़ा-करकट फेंककर पहाड़ लगा दिया था। वे यह देखकर विद्रूपता से मुंह बनाकर स्‍वगत भाषण वाली शैली में बोले, ''पढ़े-लिखे लोग हैं। पर यह क्‍या तमीज है।'' सड़क के बीच में पड़े पॉलिथीन के एक थैले को छड़ी से किनारे हटाते हुए वहाँ से आगे बढ़ गए। नहर के पास स्थित पेड़ों पर चढ़ती-उतरती गिलहरियाँ उन्‍हें आकर्षित कर रही थीं। चिडि़यों का कलरव भी भला लग रहा था। नहर के किनारे चलते हुए वे उस पार देखने लगे। आगे खेत और खाली जमीन थी। इधर रिहायशी इलाका था। ग्रामीण अंचल से अलग करती बीच में यह नहर गयी थी। इन द्दश्‍यों का खूब आनन्‍द लेते हुए रामस्‍वरुप जी ने यह सोचा कि साथ में बच्‍चे भी आए होते तो कितना अच्‍छा होता। पोती तो उन्‍हीं की तरह पेड़-पौधों में बड़ी रुचि रखती है। खूब बातें करती और तरह-तरह के सवाल करती। रमेश और बहू तो क्‍या आते। बच्‍चे अगर स्‍कूल न गए होते तो वे उन्‍हें जरुर लाते।

करीब घंटे भर बाद जब वे वापस लौटे तो घर के पास उनके पड़ोसी गिरधारी लाल अपने दरवाजे पर खड़े मिल गए। ''भई राम-राम। इंसान हो तो आप जैसा। बिल्‍कुल समय का पाबंद। किधर का चक्‍कर लगाकर लौट रहे हैं?'' व्‍यंग्‍य, वक्रोति इत्‍यादि के सम्मिश्रण से युक्‍त सवाल गिरधारी लाल ने उनकी तरफ उछाला।

वे सौजन्‍यतावश हँसे  ''अरे बस सुबह की सैर हो रही थी। नहर पर गया था।''

''तो साहब लोटा-तौलिया लेकर जाते। नहा-धोकर आना था।'' वे इस बात को भी चुपचाप पी गए। ''सुबह की ताजी हवा का मजा कुछ और है।'' बस इतना कहकर घर में घुसे।

धर्मपत्‍नी माला फेर रही थी। इस कार्य में पूर्णतया तल्‍लीन थी यह नहीं कहा जा सकता था क्‍योंकि ऐसा करते हुए उन्‍होंने दो बार कामवाली को टोका और बहू को कतिपय निर्देश देने का प्रयास किया। इस पर तीक्ष्‍ण द्दष्टि डालकर बिना कुछ कहे बहू दूसरे कक्ष में चली गयी। लेकिन रामस्‍वरुप जी को देखकर वे उपेक्षा से माला फेरने में लगी रहीं। इस व्‍यवहार से उन्‍हें चाय के लिए बोलने की हिम्‍मत नहीं हुई। वे घर में बिना किसी को लक्ष्‍य किए बोले, ''अरे जरा एक कप चाय पिलाना।'' अन्‍त में कामवाली को न जाने क्‍या सूझी कि वह अपने निर्धारित कार्य की परिधि का स्‍वेच्‍छापूर्वक अतिक्रमण कर रसोई में चाय बनाने चली गयी।

इधर अपने घर के दालान में आराम कुर्सी पर विराजमान गिरधारी लाल गर्म चाय के साथ मठरी जैसी कोई चीज ग्रहण कर रहे थे। अपनी बहू को लक्ष्‍य करके कहा, ''देखो यह जमींदार के बच्‍चे खाया करते थे। आटे की बनी देशी चीज हैं। आज कहाँ किसी को नसीब होगी।''

शाम को क्षेत्र के इकलौते पार्क में कतिपय बुजुर्ग घास पर पसरे वार्तालाप में लीन थे। ''आज के बच्‍चे बड़ों का लिहाज करना नहीं जानते।'' रामस्‍वरुप जी ने सामान्‍य तरीके से मन की बात सार्वजनिक की। इस पर गिरधारी लाल ठठाकर हँसने लगे। ''अजी बाबूजी सब अपने हाथ में होता है।'' हाथ में से उनका क्‍या तात्‍पर्य है यह स्‍पष्‍ट करते हुए बोले, ''इंसान जिन्‍दगी में मात तब खाता है जब वह औरों को अपने ऊपर सवारी करने देता है। अगर हम सही वक्‍त पर सही चाल चले तो क्‍या मजाल कि कोई पठ्ठा हमें जिन्‍दगी में मात दे पाए।'' इस आत्‍मविश्‍वास से प्रभावित होकर लोग उनकी तरफ प्रशंसा मिश्रित उत्‍सुकता से देखने लगे। ''आप लोग यकीन नहीं करेंगे। आज भी घर का कोई मेम्‍बर मेरे सामने जबान खोलने की हिम्‍मत नहीं करता है। बेटा-बेटी या बहू की क्‍या मजाल की मेरी बात काट दे।'' इस आवेश मिश्रित गर्व से कहे गए वाक्‍य को किसी ने नहीं काटा। बल्कि तह तक जाकर सफाई जानने की कोशिश भी नहीं की। वक्‍तव्‍य देते हुए वे पल भर रुके। लेकिन इस विराम का लाभ उठाकर सामने वाले कुछ बोल न पड़े इसलिए हथेली उठाकर कुछ भी कहना निषिद्ध कर रखा था। रुकने का उद्देश्‍य यह देखना था कि श्रोता उनके मन्‍तव्‍य के अनुकूल आशय ग्रहण कर रहे हैं या नहीं।

अपने तेजामय व्‍यक्तित्‍व से सभी को विदग्‍ध करके वे तनिक दया भाव से रामस्‍वरुप जी की ओर मुखातिब होकर बोले, ''ये भाईसाहब सीधे-सादे आदमी हैं। आज के जमाने में ऐसे लोगों को हर कोई ठगता है। क्‍या घरवाले, क्‍या बाहर वाले...।'' रामस्‍वरुप जी कोई प्रतिक्रिया प्रकट करते इससे पूर्व उन्‍होंने परिहासपूर्वक हँसकर मामले का एकतरफा पटाक्षेप किया।

जानकार लोगों को मालूम था कि गिरधारी लाल ने हाल में अपनी बेटी की शादी एक इंजीनियर वर से करायी थी। छोटे लड़के को उच्‍च शिक्षा के लिए पुणे भेजा एवं बड़ा बेटा डाँक्‍टर था। वह इसी शहर में प्रैक्टिस करता था। पत्‍नी एवं दो संतान के साथ माता-पिता के संग रहता था। यह बात कुछ समय के लिए जरुर फैली थी कि अपनी सुपुत्री का विवाह छलपूर्वक कराया। किसी रिश्‍तेदार की बेटी के लिए वर देखने निकले थे। घरबार पसंद आ गया तो अपनी बेटी का फोटो दिखाकर बात चला दी। रिश्‍तेदार संपन्‍नता में जरा कमतर था इसलिए ज्‍यादा दान-दहेज देकर अपनी लड़की उस इंजीनियर से ब्‍याह दी। इस घटना पर स्‍वत:स्‍फूर्त स्‍पष्‍टीकरण देते हुए गिरधारी लाल कहते कि भई अगर लड़के वालों को रिश्‍ता पसंद नहीं आया तो क्‍या किया जाए। जहाँ मामला पटेगा वही शादी होगी।

रामस्‍वरुप का पोता रोता हुआ बैट लेकर घर आया। करीब सात-आठ साल के बच्‍चे के घुटने से रक्‍तस्राव हो रहा था। गिरने से त्‍वचा छिल गयी थी। ''क्‍या हुआ बेटे?'' घरवाले हड़बड़ा गए। कहीं बच्‍चों की आपस में मारपीट न हो गयी हो। बच्‍चे ने रोते हुए बताया कि क्रिकेट खेलते समय वह गिर गया जिससे चोट लगी। फौरन घाव को धोकर ऐन्‍टीसेप्टिक लगाया गया। चिन्तित निगाहों से ताकते रामस्‍वरुप जी ने घरवालों को कहा कि घाव को खुला न छोड़े और पट्टी बाँध दे। इस पर कोई जवाब न देकर बहू अन्‍दर गयी और रेडीमेड बैंडेज लगा दिया। पुराने तरीके से फीते बाँधना उसे गवारा न था। बच्‍चे के माँ-बाप ने घर के बाहर इतने छोटे बच्‍चे को निकलने की छूट देने के लिए एक-दूसरे को दोषी ठहराया। बच्‍चे की दादी ने कुछ कहा। फिर बीच में पड़ना ठीक न समझकर रसोई में घुस गयीं।

क्षेत्र में किसी पार्क का अस्तित्‍व न होने पर लोग क्षोभ प्रकट कर रहे थे। नितांत व्‍यवहारिक बुद्धि के धनी गिरधारी लाल यह मानते थे कि किसी बात को मुद्दा बनाकर झंझट करना उचित नहीं है। वे कुर्सी पर बैठकर अपने स्‍वभाव के विपरीत चिन्‍तन करने लगे। पर वे किसी को सोचते नहीं दिखाई पड़ते थे। हालाँकि इसका यह अभिप्राय कतई नहीं था कि वे सोचते ही नहीं थे। वस्‍तुत: वे बेहद सोचे-समझे तरीके से चलने में विश्‍वास करते थे। ''देखो भई,'' वे अपने पुत्र से मुखातिब थे, ''अगर इस इलाके में एक अच्‍छा पार्क बन जाए तो कितना बढि़या होगा। बच्‍चे-बूढ़े सभी को फायदा है।''

अपने कैरियर को निरंतर उच्‍चतम शिखर तक ले जाने में प्रयासरत पुत्र ने ऊपरी तौर पर उनके कथन को सुना। ''बाबूजी इन सबके के लिए किसके पास टाइम है?'' वह एक उदासीन टिप्‍पणी के साथ वाकया खत्‍म करना चाहता था। लेकिन वे अपने रचनात्‍मक विचार को यूं काल-कवलित नहीं होने देना चाहते थे। इसलिए अपनी दुर्दमनीय इच्‍छा को सार्वजनिक करने का निश्‍चय कर चुके थे। ''लोग ठेले की तरह होते हैं। जितना धकिआया जाएगा उतनी ही दूर जाएगें। उनके अपने पैर नहीं होते हैं।'' वे अपने आत्‍मविश्‍वास को प्रकट करने के लिए जनता की मानसिकता को पहले स्‍पष्‍ट करना चाहते थे।

''सबसे पहले इसके लिए हमें फण्‍ड का इंतजाम करना होगा।'' वे अपने समवय व्‍यक्तियों से कह रहे थे। लेकिन घर-घर जाकर चंदा कौन इकठ्ठा करेगा? एक शंका उठी। ''हम और आप और कौन...?'' वे हँस रहे थे। लोगों द्धारा उन्‍हें नेतृत्‍व करने का अनुरोध किए जाने पर वे चंद पल ऑखें बंद करके विचार करने के बाद उदारतापूर्वक राजी हो गए। उपसंहार के तौर पर उन्‍होंने कहा कि मुहल्‍ले के मामूली हैसियत वाले खुशी-खुशी दे देंगे लेकिन सेठों की थैली से दमड़ी निकालना मुश्किल है। यह बात ने जाने किसे लक्ष्‍य करके कही गयी थी।

''गिरधारीलाल जी आप भी हम सबमें सेठ हैं।'' एक हँसमुख मिजाज के बुजुर्ग ने ठिठोली की। वे किंचित गंभीर होकर टिप्‍पणी करने वाले की ओर बिना देखे प्रत्‍युत्‍तर देने लगे, ''जो भी मुझसे होगा उससे पीछे नहीं हटूंगा।'' ऐसा कहते वक्‍त उनकी मुख-मुद्रा व शरीर-भाषा से एक महान व्‍यक्तित्‍व की आभा प्रस्‍फुटित हो रही थी। सबसे पीछे रामस्‍वरुप जी दुबके से खड़े थे। अपने सबसे नजदीक खड़े सज्‍जन से कहा, ''क्‍या-क्‍या सुलझाइगा। यहाँ दिन-दहाड़े बदमाश किसी को चाकू मार देते हैं और दुनिया देखती रहती है।'' कहते हुए उन्‍होंने अपने पेट पर हाथ धर लिया। कोई देखता तो इस बात पर बरबस मुस्‍करा उठता।

गिरधारी लाल का नेतृत्‍व कौशल काम आया। चंद दिनों के अन्‍दर इतनी धनराशि इकठ्ठा हो गयी कि पार्क की धूल-धूसरितपथरीली भूमि के कायाकल्‍प हेतु खुइाई, जमीन को समतल करना एवं चारदीवारी खींचने जैसे मंसूबे बाँधे जा सकते थे। इस सम्‍बन्‍ध में नगर-निगम के अधिकारियों से मिलकर नागरिकों के इस स्‍तुत्‍य प्रयास की मंजूरी तथा यथासंभव सहायता का वायदा भी मिल गया। दुनिया में हर प्रकार के लोग होते हैं। कुछ काम में मदद करते हैं। कुछ बस देखते रहते हैं। कुछेक तत्‍व जलते हैं। संभवत: ऐसे लोगों ने ही यह बात उड़ायी कि गिरधारी लाल के काम में पारदर्शिता नहीं है। कितना पैसा जमा हुआ और इसमें से नगर-निगम के अधिकारियों को कितना खिलाया और बचे हुए का कितना अंश पार्क के लिए वास्‍तव में व्‍यय किया जा रहा है इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। ‍

ऐसी चर्चा अपने संज्ञान में आने पर वे स्मित मुस्‍कान के साथ बोले, ''लोग भगवान पर भी उँगली उठाते हैं। मैं तो बस एक अदना इंसान हूं।'' लोग उनकी स्थितप्रज्ञ अवस्‍था को देखते और हिसाब की बात गोल हो जाती। रामस्‍वरुप जी भी एक निष्‍ठावान परंतु भीरु अनुयायी की भाँति कार्यरत थे। नगर-निगम के लोगों से मिलने तथा काम का निरीक्षण वगैरह में उपस्थित रहते।

महीनों व्‍यतीत होने के पश्‍चात् भी पार्क की चारदीवारी बनाने के अलावा कोई उल्‍लेखनीय कार्य नहीं हुआ। मूल योजना में पार्क जगह-जगह फूलों की क्‍यारी लगाना, सुबह-शाम घूमने के लिए पत्‍थरों से रास्‍ता बनाना, पेड़ लगाना व मुख्‍य गेट के पास किसी महापुरुष की प्रतिमा स्‍थापित करके उसी के नाम पर पार्क का नामकरण करना इत्‍यादि। दरअसल इनमें से अधिकांश कार्य या तो अधूरे थे या आधे-अधूरे तरीके से हुए थे। पार्क में घास उगाने के लिए ठेके पर कुछ महिलाओं को रखा गया जो बाहर से घास लाकर भरी धूप में सर पर पगड़ीनुमा कुछ लपेट कर उन्‍हें रोपती। एक माली भी था जो पाइप से जमीन की सिंचाई करता।‍

एक खुशनुमा सुबह क्षेत्रवासियों ने देखा कि पार्क की चारदीवारी के चतुर्दिक गिरधारी लाल का मुस्‍कराता मुखड़ा वाला पोस्‍टर लगा है। नीचे मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था हमारे आदरणीय नेता श्री गिरधारी लाल का इस वाटिका की स्‍थापना व विकास में किए गए योगदान के लिए कोटी-कोटी धन्‍यवाद। कुछ लोगों के नाम नीचे दिए गए थे जो इस कार्य के लिए उन्‍हें धन्‍यवाद दे रहे थे। वे संभवत: क्षेत्र के सम्‍मानित लोग थे।

रामस्‍वरुप जी उसी दिन शाम में कुछ बच्‍चों और किशोरों के साथ पार्क में जगह-जगह बिखरे पत्‍थरों व ईटों को टोकरियों में इकठ्ठा करवा कर एक किनारे डाल रहे थे। थोड़े परिश्रम से ही उनके शरीर पर स्‍वेद की धाराऍ बह रही थीं। प्रमुख लोगों के साथ एक जुलूस की शक्‍ल में उधर से गुजरते और लोगों को हाथ जोड़तें गिरधारी लाल की नजर उन पर नहीं पड़ी।

जब रामस्‍वरुप जी बच्‍चों के साथ क्रिकेट या बैड़मिण्‍टन खेलने का प्रयास करते तो उधर से गुजरते समवयस्‍क लोग टिप्‍पणी करते। अच्‍छा साथ दे रहे हैं आप बच्‍चों का। अल्‍प श्रमसे ही क्‍लांत होकर वे विरत हो जाते। एकाध जागरुक नागरिक अभी भी गिरधारी लाल से पूछ बैठते कि पार्क की अव्‍यवस्‍था कब दूर होगी। इस पर वे बेहद उदारता से सामने वाले की बुद्धि पर तरस खाकर बोलते, ''हजूर यह सरकार हमारी आपकी किसी की नहीं है। जहाँ कोई सुनवाई न हो वहाँ सर टकराने से क्‍या फायदा।'' बोलते-बोलते उन्‍हें डकार आ गयी। शायद ज्‍यादा खा लिया था। वे एक जलसे में शामिल होने चले गए। एक बड़ी पाटी्र के स्‍थानीय नेता के यहाँ कोई आयोजन था। वे उसमें आमंत्रित थे। उन्‍हें मालूम था कि काम चाहे अपना हो या समाज का, सभी के सफल निष्‍पादन हेतु बुद्धिमान व अति चातुर बनना पड़ता है। दरअसल वे परस्‍पर जीविता में विश्‍वास करते थे। लड्डू यदा-कदा किसी श्रद्धालु के कर-कमलों से मिल सकता है परन्‍तु यदि नियमित रुप से मोदक का सेवन करना हो तो मंदिर में देवता के स्‍थान पर स्‍थापित होने का जुगाड़ करना पड़ेगा।

पार्क की दीवारें इतनी कच्‍ची थी कि साथ लगे खाली प्‍लॉट में जब मकान बनना शुरु हुआ तो ठेकेदार ने भवन-निर्माण के निमित्‍त रखी ईटें दीवार से सटा कर क्‍या रखी कि एक पूरा हिस्‍सा ढ़ह गया। आसपास के पशुपालक अपनी ढ़ोरों को बीच से ले जाने लगे। लेकिन यह सिलसिला लम्‍बे समय तक नहीं चला। रामस्‍वरुप जी दो-तीन लोगों के साथ संबंधित अधिकारी से मिले। हफ्ते भर के अन्‍दर नयी दीवार खड़ी हो गयी। सुबह टहलने वालों को पुख्‍ता दीवार देखकर हैरानी हुई। एकाध लोग उनकी इस पहल पर उन्‍हें बधाई देने लगे। वे सहज भाव से बोले, ''अजी यह कुछ भी नहीं है। देखिए सड़कों की दशा...। मैं एक आर.टी.आई. ऐपलिकेशन डाल रहा हूं। इसमें पूछूंगा कि पिछली दफा सड़कों की मरम्‍मत कब हुई थी। इनको बनाने में किस किस्‍म का सामान इस्‍तेमाल हुआ है और कितने समय बाद इनकी दुबारा मरम्‍मत होगी।...इनके रखरखाव के लिए कौन जिम्‍मेवार है वगैरह।''

लोग उनके चारों ओर भीड़ की शक्‍ल में जुटने लगे। लेकिन वे फौरन वहाँ से यह कहकर निकल गए कि घर पर सब्‍जी लेकर पहँुचना है नहीं तो बहू भी बोलेगी और छोटे पोत की रिमोट कार नहीं ली तो वह घर में घुसने नहीं देगा।

किसी को यकीन नहीं हो पा रहा था कि यह महत्‍वाकांक्षाहीन वृद्ध कुछ कर पाएगा।

पार्क के किनारे खड़े कचनार के वृक्ष बडी संख्‍या में पुष्‍प विसर्जित कर रहे थे। नीचे की माटी बिल्‍कुल लाल हो गयी थी। धूप लगातार उष्‍ण होती जा रही थी। आखिर मई आ गया था। अमलतास की टहनियाँ पीले फूलों से लदकर कड़ी धूप में भी अद्भुत आभा उत्‍पन्‍न कर रही थीं। एक और अज्ञात वृक्ष सफेद कलियों जैसा कुछ धरती को अर्पित कर रहा था। उसके फूल कली की तरह दिखते थे। नीचे हरी घास पर गोलाकार श्‍वेत चादर सद्दश्‍य सजी जमीन बेहद आकर्षक लग रही थी।

''दोस्‍त सिद्धांत इंसान के लिए होते हैं। हम उनसे बँधे नहीं रहते।'' गिरधारी लाल न जाने क्‍यों एक दिन बेहद असंयत होकर लोगों से मुखातिब थे। प्रतिदिन प्रात: काल उठने के अपने दिनचर्यात्‍मक सिद्धांत का पालन करने वाले रामस्‍वरुप जी को भ्रमण करते देखकर आज वे उद्धिग्‍न थे। जो इंसान अपने घर में टी.वी. पर उछल-कूद वाले कार्यक्रम या सास-बहू के घिसे-पीटे फार्मूले पर आधारित धारावाहिक को न देखने के अभिरुचिगत सिद्धांत को किसी सदस्‍य से नहीं मनवा पाया था वह कोई सामाजिक कार्य कैसे सफलतापूर्वक कर पाएगा। पार्क की बढ़ती हरियाली देखकर गिरधारी लाल का ऐसा लगता कि वनस्‍पतियों ने भी मनुष्‍य की तरह अपना स्‍वभाव बदल लिया है। जो चीज वे शायद भाँप नहीं पाए वह थी कि जड़ वनस्‍पतियाँ भी मनुष्‍यों की भाँति प्‍यार व परवाह करना पसंद करती हैं।

सूर्य अपने समयानुसार प्रतिदिन उदित व अस्‍त होता रहा। गिरधारी लाल की विरुदावली गाने वाले पोस्‍टर बैनर यथावत थे। परंतु एक रोज क्षेत्रवासियों ने रामस्‍वरुप जी के यहाँ जाकर उनसे इलाके की समस्‍याओं को निपटाने के लिए बनी समिति का नेतृत्‍व सँभालने का अनुरोध किया। लाख ना-नुकुर के बावजूद वे उन्‍हें मनाने में कामयाब हो गए। युवकों ने इस कार्य में दौड़-धूप करने में आगे रहने का वचन दिया। अब रामस्‍वरुप जी अपने औसत व्‍यक्तित्‍व के बावजूद इस काम में रम गए। अगर उनके संकल्‍प को देखा जाए तो कोई भी यह नहीं कह सकता था कि ऐसा इंसान इस तरह का काम कर सकता है। वृद्धावस्‍था की अपनी आंगिक शिथिलता की वे अनुभवजन्‍य संपदा की विपुलता से क्षतिपूर्ति कर रहे थे। कुछ दिनों में इलाके में सड़क, बिजली, सीवर की व्‍यवस्‍था के लिए लोगबाग सम्‍बन्धित अधिकारियों से जवाब माँगने लगे। सभी रामस्‍वरूप जी के नाम का उल्‍लेख करके मिलते। उन्‍हें ज्ञात था कि यह कोई रातोरात सम्‍पन्‍न होने वाला कार्य नहीं है बल्कि आनुवांशिकी के क्रमिक विकास की भाँति शनै: शनै: होगा। परंतु एक बात स्‍पष्‍ट थी कि अब स्‍थानीय निवासी रोजमर्रा की सुविधाओं के बिना जल बिन मीन की तरह तड़पते नहीं थे वरन् स्‍वयं मत्‍स्‍यवतार लेकर अपना उद्धार करने की सामर्थ्‍य रखने की स्थिति में आ गए थे। आखिरकार अद्भुत घटनाऍ केवल पौराणिक काल में घटित नहीं होती हैं।

एक दिन जब गिरधारी लाल अपनी सद्व: क्रय किए हुए मोटरवाहन पर आरुढ़ होकर सपत्नीक समीप के मार्केट में गए तो नगर-निगम का एक अधिकारी दिखा। वह पास आकर बोला, '''अरे आप तो वही हैं ना...?''

''हाँ-हाँ।'' वे तनिक उपेक्षा प्रदर्शित करके आगे बढ़ने को उद्यत हुए। ''हाँ याद आया,'' अधिकारी ने बात आगे बढ़ायी। ''भई आपको कहीं देखा है। रामस्‍वरुप जी की कॉलोनी में रहते हैं।'' अधिकारी आगे बढ़ गया। वे जमीन में गड़ गए। पत्‍नी को आगे बढ़ने का निर्देश देने का भी भान नहीं रहा। वह खुद कुछ क्षणों पश्‍चात् बोली। ''क्‍या सोच रहे हैं? चलिए मार्केटिंग नहीं करनी है क्‍या?''

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(मनीष कुमार सिंह)

लेखक परिचय

मनीष कुमार सिंह।

जन्‍म 16 अगस्‍त,1968 को पटना के निकट खगौल (बिहार) में हुआ। प्राइमरी के बाद की शिक्षा इलाहाबाद में।

भारत सरकार,भारत सरकार, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय में प्रथम श्रेणी अधिकारी। पहली कहानी 1987 में ‘नैतिकता का पुजारी’ लिखी। विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं यथा-हंस,कथादेश,समकालीन भारतीय साहित्‍य,साक्षात्‍कार,पाखी,दैनिक भास्‍कर, नयी दुनिया, नवनीत, शुभ तारिका, अक्षरपर्व,लमही, कथाक्रम, परिकथा, शब्‍दयोग, ‍इत्‍यादि में कहानियाँ प्रकाशित। पाँच कहानी-संग्रह ‘आखिरकार’(2009),’धर्मसंकट’(2009), ‘अतीतजीवी’(2011),‘वामन अवतार’(2013) और ‘आत्‍मविश्‍वास’ (2014) प्रकाशित।

पता- एफ-2, 4/273, वैशाली, गाजियाबाद, उत्‍तर प्रदेश। पिन-201010

मोबाइल: 09868140022

ईमेल: manishkumarsingh513@gmail.com

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