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पुस्तक समीक्षा/ 'स्पंदन' में है हर एक की भावनाओं का स्पंदन

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    स्पन्दन शब्द का अर्थ किसी वस्तु का शनैः शनैः हिलना, काँपना या शरीर के अंगों आदि का फड़कना होता है। क्रान्तद्रष्टा कवि अतीव भावुक कोमल हृदय का अनुपम प्राणी होता है। चराचर जगत में जब भी कोई अप्राकृतिक घटना घटित होती है तो उसका सहृदय भाव कम्पायमान होने लगता है। उसके भीतर एक असह्य ज्वारभाटा उठता है जो उसे अपने भावोद्गारों को व्यक्त करने के लिए बलात् विवश कर देता है। कवि अपने समाज में जब अवाँछनीय तत्त्वों को देखता है, अमानवीय कृत्यों से जब कहीं भीतर तक आहत होता है, सज्जन निरीह मूक होकर दुर्जनों से ग्रसित त्राहि-त्राहि करने लगते हैं, अनाचार-कदाचार जब चरम सीमा पर व्यक्त होने लगता है तभी कवि आन्तस् कराहने लगता है और तत्काल कवि-मन-मस्तिष्क से निःसृत शब्द वृष्टि भव-ताप-तापित जन समुदाय की अनेक विध-पीड़ाओं का शमन करती है।

कवि अपनी कविताओं के माध्यम से, वर्जनाओं की लक्ष्मण रेखा तथा सर्जनाओं की सौम्य सम्पदा सहृदय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। इन्हीं समस्त भावोर्मियों से स्पन्दित करने वाला कविवर डॉ. शंकर लाल वासिष्ठ का द्वितीय कविता संग्रह 'स्पन्दन' है। प्रस्तुत संग्रह की अधिकांश कविताएँ सम-सामयिक विभिन्न समस्याओें की ओर जन सामान्य का ध्यानाकृष्ट करती हैं तथा उनके समाधानार्थ पाठकों को प्रेरित भी करती हैं। संग्रह की प्रतिनिधि रचना में कवि अभाव ग्रसित समाज का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करते लिखता है :-

''निराशा-हताशा दिग् शून्यता , मृगतृष्णा धुन्धलाती किरण।
निर्वसन निराहार निराश्रय, फुटपाथों बसता यही समाज।।''


    राष्ट्र का निम्न अधिकाँश वर्ग आज भी निराशा-हताशामय जीवन यापन कर रहा है। उसकी दौड़ आज भी रोटी-कपड़ा और मकान तक सीमित है। फुटपाथों पर उनका जीवन व्यतीत हो रहा है। मात्र मृगमरीचिका ही उनका सम्बल है। डॉ. वासिष्ठ अपनी रचना के माध्यम से केवल जनाकँाक्षाओं की अभिव्यक्ति ही नहीं करते उसका सही समाधान भी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं :-

 

''श्रद्धा आस्था परम्परा व भक्ति, नहीं आडम्बर आज वसन ।
रख आचरण कसौटी लाओ, लकीर फकीर में परिवर्तन ।''


    कवि की भाषा मुहावरेदार है। लकीर का फकीर बने रहने से कदापि समस्याओं का समाधान नहीं हुआ करता। कथनी और करनी की एकरूपता कवि को अभिप्रेत है। पुरातनता की अहितकर परम्पराएँ कवि को त्यज्य हैं तथा अर्वाचीनता की लाभप्रद सरणियाँ सर्वथा ग्राह्य हैं। दिशा निर्देशन करना ही सफल कवि का ध्येय होता है।
    प्राकृतिक उपकरणों से भी समाज को शिक्षा देने का विशेष कवि कौशल होता है :-


''कालिख मिटा निर्मल अपना मन, आओ! करें हम वसन्त अभिनन्दन ।।''


    मानव-मन कालुष्य जब समाप्त होगा, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, बड़ा-छोटा, ईर्ष्याद्वेष भाव जब समाप्त होगा, स्वतः मानव मन विमल होगा और तभी सद्भावनाओं की सुखद सुरभी से तन-मन-विश्व का ऋतुराज वसन्त की तरह समग्र परिवेश को सही अर्थों में सुवासित करेगा ।
    अन्तहीन लिप्सा, रचना के माध्यम से अर्थ प्रधान वर्ग पर चपेटाघात किया है तथा 'तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा' का सदुपदेश प्रदान किया है।

    सोलन नगर अधिष्ठात्री माँ शूलिनी का स्मरण कर कवि ने वर्षों से आयोजित मेले का बिम्ब चित्र कविता के माध्यम से खींचा है तथा पाठकों को समरसता व विश्वबन्धुत्व की अनूठी प्रेरणा भी प्रदान की है :-


''बजे शहनाई ढोल-नगारे, मनमोहन नागर नर्तन ।
सजते हैं पकवान पाण्डाल, बिना भेद के होता वितरण ।।''

 

    संसार में मानव स्वार्थों की पराकाष्ठा पार कर रहा है। कवि के दुःखी हृदय की चीत्कार श्रवणीय है :-


''गैरों की कोई परवाह नहीं, अपनों से धोखा खाता रहता हूँ।
स्वार्थों में डूबे अपने-पराये, शब्दों में रिश्ते ढूँढता रहता हूँ।।''

 

    'अराजकता' शीर्षक से नेताओें की क्रिया पद्धति का सही चित्रण प्रस्तुत हुआ है :-


''नेताओं का प्रचार-प्रसार, भविष्य में कुर्सियों पर अधिकार ।
सेंककर रोटियाँ अपनी-अपनी, कर नया कोई वक्तव्य जारी
कौतुहल से अखबार भर देते हैं।।''

 

    कवि वासिष्ठ ने आदमी को आदमी बनने का समुचित परामर्श दिया है, उसकी सामाजिक उपाधियाँ उन्हें कतई पसन्द नहीं, बस मानव-मानव बन जाए तो सभी समस्याओं का निदान स्वतः हो जाएगा :-


''आदमी से आदमी क्यों डरता है, स्वार्थहित क्यों लड़ मरता है,
देख पर सुख डाह से जलता है, वैसे सृष्टि में श्रेष्ठ कहलाता है।।''

 

    भारत गाँव बहुल देश है, गाँव में भारतीय परम्पराएँ सभ्यता-संस्कृति जीवित हैं, वहीं अश्वत्थ और वटवृक्षों का अतीत भी शिक्षा एवं आश्रय प्रद है, इसी के साथ गहन अध्ययन करने से कवि की यह रचना दिवंगत पूज्य पिता सर्व विद्याविशारद, समाज सेवी, ज्योतिषकर्मकाण्ड प्रवीण आचार्य चन्द्रमणि वासिष्ठ, जो वास्तव में क्षेत्र के वट वृक्ष तुल्य रहे हैं उन्हें समर्पित है, कविता के समस्त प्रतीक, बिम्ब उन्हीं के प्रति अगाध श्रद्धा एवं कृतज्ञता के द्योतक हैं :-


''परिश्रान्त पथिक शान्त छाँव, व्यथित मन सहलाता घाव।
पींग-हुल्लार सा पनपाता, निराश मन सदा जीने का चाव।''

 

    'अस्मिता' शीर्षक से कवि अभाव पीड़ित समाज और समृद्ध वर्ग की मानसिकता को उनकी विवशता और विकृति विद्रूपता को सरल सपाट शब्दों से अभिव्यक्त कर रहे हैं :-


''एक सहमा लज्जाया
मर्यादित बदन अपने
जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों से
अस्मिता ढाँपने की....... असफल
कोशिश कर रहा है.......... और
दूसरा........... उच्छृंखल, असंयमित
सक्षम होने पर भी.......... निर्लज्ज
बदन को निर्वसन कर........... स्व प्रदर्शन
को लालायित हो रहा है।''

 

    'परम्परा' कविता के माध्यम से प्रतिवर्ष रावण दहन पर कवि का व्यंग्य ध्यातव्य हैः-


''माना कटना मेरी नियति है
पर कटने पर किसी गरीब की छत बनता
बन टोकरी किसी पेट को सम्बल देता
सीढ़ी बनकर मानव को ऊँचा उठाता
और महाप्रयाण का अन्तिम साथी बनता ।''


    कवि मन में असह्य व्यथा है उसे दीवाली-होली जैसे महोत्सव मनाने के सही रहस्य को जनमानस तक पहुँचाने की सतत चिन्ता है। उसे होली के बाह्य रंगों के दिखावे पर घोर आपत्ति है। वह मानव मन में आत्मीयता का रंग भरना चाहता है :-


''हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-इसाई, छद्म से बने भाई-भाई
धरती जीतो चाहे अम्बर, प्रथम भरो निज मन की खाई ।
कान्ह! न सखियों की टोली, कहो! हम कैसे खेले होली ?''

 

    लोकतन्त्र का संरक्षण अपात्र व्यक्तियों के हाथों में जाता देखकर
कवि मन अतीव खिन्न है। रक्षक ही भक्षक बन गये हैं। एक शब्द चित्र
अवलोकनीय हैः-


लोकतन्त्र का मन्दिर लूटें कैसे, आज ऐसी चाहत सभी ने पाली
सब दौड़े हैं सत्ता हथियाने ऐसे, दौड़े ज्यों बेशर्म श्वानों की टोली।


इस सम्पूर्ण कविता के द्वारा कवि ने सभी शीर्ष राजनेताओं का यथार्थ चित्र अंकित करने का सफल प्रयास किया है। किसी बड़े नेता के आगमन पर उद्घाटन करने हेतु या किसी सामाजिक कार्यक्रम में आने का समाचार सुनते ही हमारा तन्त्र उनके भय से कुम्भकरणीय निद्रा से एकाएक जागकर बिजली, पानी, सड़कें सुधारने लगते हैं। कवि ने 'मेरे आका' शीर्षक से यही कुछ कहने का सफल प्रयास किया हैः-


''चप्पा चप्पा सजने संवरने लग जाता है
सुनकर आहट
महोत्सव में बदल जाता है ........... शहर
वर्षों से रण्डेपा काटने वाली
सड़कें व मेरे शहर की गलियाँ
शृंगार कर लगती है दुल्हन
सदा सुहागन ........... इसलिए मेरे आका
तुम्हारा अभिनन्दन।
मेरे शहर आओ,
पर बारम्बार आओ ।''


    ग्रामीण परिवेश में जन्मे, पले, पढ़े कवि को गाँव से स्वाभाविक स्नेह है। उसे गाँव का विछोह कतई पसन्द नहीं हैः-


बीहड़ इन्सानों के जंगल, ढूँढे नहीं मिलती कहीं छाँव
सशंकित मानव-मानव से, नित पीड़ा मन गहराता घाव
कितना अकेला पड़ गया हूँ, जब से छोड़ा अपना गाँव ।।

 

    पहाड़ी प्रदेश का नयनाभिराम बिम्ब चित्र भी आकृष्ट करने वाला है :-


झूलते प्रफुल्लित दारु-वृन्द, महकती डालियाँ पात-पात
सरसराती आनन्ददायक समीर, कलरव करते चहकते खग-वृन्द
बहते कलकल मुक्ता जलकण, रम्भाते पशुधन, उत्सुक जन जीवन ।।

 

    डॉ. वासिष्ठ का भाषायी आकर्षण सम्मोहित करता है कवि भाषायी मोह में न पड़कर तत्सम, तद्भव, देशी, विदेशी तथा आंचलिक शब्दों का प्रसंगवश अनायास प्रयोग करने में रंच भी संकोच नहीं करते, उनका लक्ष्य तो सहज, सरलरूपेण अपना संदेश समाज तक पहुँचाना है और इसमें कवि सफल हुआ है।


    गागर में सागर, बिन्दु में सिन्धु समेटने का कवि का अपना कौशल होता है और इस विद्या में डॉ. शंकर वासिष्ठ सफल चितेरे हैं। उन्हें क्षणिकाएँ लेखन में भी महती रूचि है। एक क्षणिका का उल्लेख करने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ:-


दस्यु सुन्दरी का
संसद में जीतकर आना
कोई त्रासदी नहीं, बल्कि प्रतीक है ......
कि आज के कर्णधार
दस्यु सुन्दरी से भी बदतर हो गये हैं।


    निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि डॉ. वासिष्ठ पाठकों को व्यर्थ के शब्द व्यामोह या उलझाने वाली क्लिष्ट उत्प्रेक्षाओं में न डालकर सांसारिक घटित-घटनाओं तथा उनसे हो रही, सामाजिक क्षति, फैल रही विद्रूपताएँ, पतन और दुर्दशा का सरल-सपाट चित्रण अभिधाशक्ति के माध्यम से प्रस्तुत करना मात्र कवि लक्ष्य रहा है। साहित्य का मुख्य उद्देश्य भी सहित की भावना स्थापित कर जगन्माँगल्य करना है। जन सामान्य की समस्याओं को शब्द एवं अर्थ चित्र देना तथा उनका समुचित निदान निर्देश करना सच्चे कवि का दायित्व भी होता है। इस दिशा में डॉ. शंकर वासिष्ठ सर्वथा सफल कवि हैं। मैं द्वितीय कविता संग्रह 'स्पन्दन' के सफल प्रकाशनार्थ विद्वान् कवि को हार्दिक साधुवाद प्रदान करता हूँ।

 

(डॉ॰ प्रेमलाल गौतम 'शिक्षार्थी ')
प्राचार्य (से.नि.)
सरस्वती सदन रबौण,
पत्रालय सपरून-173211,
जनपद सोलन (हि.प्र.)

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