पुस्तक समीक्षा/ 'स्पंदन' में है हर एक की भावनाओं का स्पंदन

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    स्पन्दन शब्द का अर्थ किसी वस्तु का शनैः शनैः हिलना, काँपना या शरीर के अंगों आदि का फड़कना होता है। क्रान्तद्रष्टा कवि अतीव भावुक कोमल ह...

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    स्पन्दन शब्द का अर्थ किसी वस्तु का शनैः शनैः हिलना, काँपना या शरीर के अंगों आदि का फड़कना होता है। क्रान्तद्रष्टा कवि अतीव भावुक कोमल हृदय का अनुपम प्राणी होता है। चराचर जगत में जब भी कोई अप्राकृतिक घटना घटित होती है तो उसका सहृदय भाव कम्पायमान होने लगता है। उसके भीतर एक असह्य ज्वारभाटा उठता है जो उसे अपने भावोद्गारों को व्यक्त करने के लिए बलात् विवश कर देता है। कवि अपने समाज में जब अवाँछनीय तत्त्वों को देखता है, अमानवीय कृत्यों से जब कहीं भीतर तक आहत होता है, सज्जन निरीह मूक होकर दुर्जनों से ग्रसित त्राहि-त्राहि करने लगते हैं, अनाचार-कदाचार जब चरम सीमा पर व्यक्त होने लगता है तभी कवि आन्तस् कराहने लगता है और तत्काल कवि-मन-मस्तिष्क से निःसृत शब्द वृष्टि भव-ताप-तापित जन समुदाय की अनेक विध-पीड़ाओं का शमन करती है।

कवि अपनी कविताओं के माध्यम से, वर्जनाओं की लक्ष्मण रेखा तथा सर्जनाओं की सौम्य सम्पदा सहृदय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। इन्हीं समस्त भावोर्मियों से स्पन्दित करने वाला कविवर डॉ. शंकर लाल वासिष्ठ का द्वितीय कविता संग्रह 'स्पन्दन' है। प्रस्तुत संग्रह की अधिकांश कविताएँ सम-सामयिक विभिन्न समस्याओें की ओर जन सामान्य का ध्यानाकृष्ट करती हैं तथा उनके समाधानार्थ पाठकों को प्रेरित भी करती हैं। संग्रह की प्रतिनिधि रचना में कवि अभाव ग्रसित समाज का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करते लिखता है :-

''निराशा-हताशा दिग् शून्यता , मृगतृष्णा धुन्धलाती किरण।
निर्वसन निराहार निराश्रय, फुटपाथों बसता यही समाज।।''


    राष्ट्र का निम्न अधिकाँश वर्ग आज भी निराशा-हताशामय जीवन यापन कर रहा है। उसकी दौड़ आज भी रोटी-कपड़ा और मकान तक सीमित है। फुटपाथों पर उनका जीवन व्यतीत हो रहा है। मात्र मृगमरीचिका ही उनका सम्बल है। डॉ. वासिष्ठ अपनी रचना के माध्यम से केवल जनाकँाक्षाओं की अभिव्यक्ति ही नहीं करते उसका सही समाधान भी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं :-

 

''श्रद्धा आस्था परम्परा व भक्ति, नहीं आडम्बर आज वसन ।
रख आचरण कसौटी लाओ, लकीर फकीर में परिवर्तन ।''


    कवि की भाषा मुहावरेदार है। लकीर का फकीर बने रहने से कदापि समस्याओं का समाधान नहीं हुआ करता। कथनी और करनी की एकरूपता कवि को अभिप्रेत है। पुरातनता की अहितकर परम्पराएँ कवि को त्यज्य हैं तथा अर्वाचीनता की लाभप्रद सरणियाँ सर्वथा ग्राह्य हैं। दिशा निर्देशन करना ही सफल कवि का ध्येय होता है।
    प्राकृतिक उपकरणों से भी समाज को शिक्षा देने का विशेष कवि कौशल होता है :-


''कालिख मिटा निर्मल अपना मन, आओ! करें हम वसन्त अभिनन्दन ।।''


    मानव-मन कालुष्य जब समाप्त होगा, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, बड़ा-छोटा, ईर्ष्याद्वेष भाव जब समाप्त होगा, स्वतः मानव मन विमल होगा और तभी सद्भावनाओं की सुखद सुरभी से तन-मन-विश्व का ऋतुराज वसन्त की तरह समग्र परिवेश को सही अर्थों में सुवासित करेगा ।
    अन्तहीन लिप्सा, रचना के माध्यम से अर्थ प्रधान वर्ग पर चपेटाघात किया है तथा 'तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा' का सदुपदेश प्रदान किया है।

    सोलन नगर अधिष्ठात्री माँ शूलिनी का स्मरण कर कवि ने वर्षों से आयोजित मेले का बिम्ब चित्र कविता के माध्यम से खींचा है तथा पाठकों को समरसता व विश्वबन्धुत्व की अनूठी प्रेरणा भी प्रदान की है :-


''बजे शहनाई ढोल-नगारे, मनमोहन नागर नर्तन ।
सजते हैं पकवान पाण्डाल, बिना भेद के होता वितरण ।।''

 

    संसार में मानव स्वार्थों की पराकाष्ठा पार कर रहा है। कवि के दुःखी हृदय की चीत्कार श्रवणीय है :-


''गैरों की कोई परवाह नहीं, अपनों से धोखा खाता रहता हूँ।
स्वार्थों में डूबे अपने-पराये, शब्दों में रिश्ते ढूँढता रहता हूँ।।''

 

    'अराजकता' शीर्षक से नेताओें की क्रिया पद्धति का सही चित्रण प्रस्तुत हुआ है :-


''नेताओं का प्रचार-प्रसार, भविष्य में कुर्सियों पर अधिकार ।
सेंककर रोटियाँ अपनी-अपनी, कर नया कोई वक्तव्य जारी
कौतुहल से अखबार भर देते हैं।।''

 

    कवि वासिष्ठ ने आदमी को आदमी बनने का समुचित परामर्श दिया है, उसकी सामाजिक उपाधियाँ उन्हें कतई पसन्द नहीं, बस मानव-मानव बन जाए तो सभी समस्याओं का निदान स्वतः हो जाएगा :-


''आदमी से आदमी क्यों डरता है, स्वार्थहित क्यों लड़ मरता है,
देख पर सुख डाह से जलता है, वैसे सृष्टि में श्रेष्ठ कहलाता है।।''

 

    भारत गाँव बहुल देश है, गाँव में भारतीय परम्पराएँ सभ्यता-संस्कृति जीवित हैं, वहीं अश्वत्थ और वटवृक्षों का अतीत भी शिक्षा एवं आश्रय प्रद है, इसी के साथ गहन अध्ययन करने से कवि की यह रचना दिवंगत पूज्य पिता सर्व विद्याविशारद, समाज सेवी, ज्योतिषकर्मकाण्ड प्रवीण आचार्य चन्द्रमणि वासिष्ठ, जो वास्तव में क्षेत्र के वट वृक्ष तुल्य रहे हैं उन्हें समर्पित है, कविता के समस्त प्रतीक, बिम्ब उन्हीं के प्रति अगाध श्रद्धा एवं कृतज्ञता के द्योतक हैं :-


''परिश्रान्त पथिक शान्त छाँव, व्यथित मन सहलाता घाव।
पींग-हुल्लार सा पनपाता, निराश मन सदा जीने का चाव।''

 

    'अस्मिता' शीर्षक से कवि अभाव पीड़ित समाज और समृद्ध वर्ग की मानसिकता को उनकी विवशता और विकृति विद्रूपता को सरल सपाट शब्दों से अभिव्यक्त कर रहे हैं :-


''एक सहमा लज्जाया
मर्यादित बदन अपने
जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों से
अस्मिता ढाँपने की....... असफल
कोशिश कर रहा है.......... और
दूसरा........... उच्छृंखल, असंयमित
सक्षम होने पर भी.......... निर्लज्ज
बदन को निर्वसन कर........... स्व प्रदर्शन
को लालायित हो रहा है।''

 

    'परम्परा' कविता के माध्यम से प्रतिवर्ष रावण दहन पर कवि का व्यंग्य ध्यातव्य हैः-


''माना कटना मेरी नियति है
पर कटने पर किसी गरीब की छत बनता
बन टोकरी किसी पेट को सम्बल देता
सीढ़ी बनकर मानव को ऊँचा उठाता
और महाप्रयाण का अन्तिम साथी बनता ।''


    कवि मन में असह्य व्यथा है उसे दीवाली-होली जैसे महोत्सव मनाने के सही रहस्य को जनमानस तक पहुँचाने की सतत चिन्ता है। उसे होली के बाह्य रंगों के दिखावे पर घोर आपत्ति है। वह मानव मन में आत्मीयता का रंग भरना चाहता है :-


''हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-इसाई, छद्म से बने भाई-भाई
धरती जीतो चाहे अम्बर, प्रथम भरो निज मन की खाई ।
कान्ह! न सखियों की टोली, कहो! हम कैसे खेले होली ?''

 

    लोकतन्त्र का संरक्षण अपात्र व्यक्तियों के हाथों में जाता देखकर
कवि मन अतीव खिन्न है। रक्षक ही भक्षक बन गये हैं। एक शब्द चित्र
अवलोकनीय हैः-


लोकतन्त्र का मन्दिर लूटें कैसे, आज ऐसी चाहत सभी ने पाली
सब दौड़े हैं सत्ता हथियाने ऐसे, दौड़े ज्यों बेशर्म श्वानों की टोली।


इस सम्पूर्ण कविता के द्वारा कवि ने सभी शीर्ष राजनेताओं का यथार्थ चित्र अंकित करने का सफल प्रयास किया है। किसी बड़े नेता के आगमन पर उद्घाटन करने हेतु या किसी सामाजिक कार्यक्रम में आने का समाचार सुनते ही हमारा तन्त्र उनके भय से कुम्भकरणीय निद्रा से एकाएक जागकर बिजली, पानी, सड़कें सुधारने लगते हैं। कवि ने 'मेरे आका' शीर्षक से यही कुछ कहने का सफल प्रयास किया हैः-


''चप्पा चप्पा सजने संवरने लग जाता है
सुनकर आहट
महोत्सव में बदल जाता है ........... शहर
वर्षों से रण्डेपा काटने वाली
सड़कें व मेरे शहर की गलियाँ
शृंगार कर लगती है दुल्हन
सदा सुहागन ........... इसलिए मेरे आका
तुम्हारा अभिनन्दन।
मेरे शहर आओ,
पर बारम्बार आओ ।''


    ग्रामीण परिवेश में जन्मे, पले, पढ़े कवि को गाँव से स्वाभाविक स्नेह है। उसे गाँव का विछोह कतई पसन्द नहीं हैः-


बीहड़ इन्सानों के जंगल, ढूँढे नहीं मिलती कहीं छाँव
सशंकित मानव-मानव से, नित पीड़ा मन गहराता घाव
कितना अकेला पड़ गया हूँ, जब से छोड़ा अपना गाँव ।।

 

    पहाड़ी प्रदेश का नयनाभिराम बिम्ब चित्र भी आकृष्ट करने वाला है :-


झूलते प्रफुल्लित दारु-वृन्द, महकती डालियाँ पात-पात
सरसराती आनन्ददायक समीर, कलरव करते चहकते खग-वृन्द
बहते कलकल मुक्ता जलकण, रम्भाते पशुधन, उत्सुक जन जीवन ।।

 

    डॉ. वासिष्ठ का भाषायी आकर्षण सम्मोहित करता है कवि भाषायी मोह में न पड़कर तत्सम, तद्भव, देशी, विदेशी तथा आंचलिक शब्दों का प्रसंगवश अनायास प्रयोग करने में रंच भी संकोच नहीं करते, उनका लक्ष्य तो सहज, सरलरूपेण अपना संदेश समाज तक पहुँचाना है और इसमें कवि सफल हुआ है।


    गागर में सागर, बिन्दु में सिन्धु समेटने का कवि का अपना कौशल होता है और इस विद्या में डॉ. शंकर वासिष्ठ सफल चितेरे हैं। उन्हें क्षणिकाएँ लेखन में भी महती रूचि है। एक क्षणिका का उल्लेख करने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ:-


दस्यु सुन्दरी का
संसद में जीतकर आना
कोई त्रासदी नहीं, बल्कि प्रतीक है ......
कि आज के कर्णधार
दस्यु सुन्दरी से भी बदतर हो गये हैं।


    निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि डॉ. वासिष्ठ पाठकों को व्यर्थ के शब्द व्यामोह या उलझाने वाली क्लिष्ट उत्प्रेक्षाओं में न डालकर सांसारिक घटित-घटनाओं तथा उनसे हो रही, सामाजिक क्षति, फैल रही विद्रूपताएँ, पतन और दुर्दशा का सरल-सपाट चित्रण अभिधाशक्ति के माध्यम से प्रस्तुत करना मात्र कवि लक्ष्य रहा है। साहित्य का मुख्य उद्देश्य भी सहित की भावना स्थापित कर जगन्माँगल्य करना है। जन सामान्य की समस्याओं को शब्द एवं अर्थ चित्र देना तथा उनका समुचित निदान निर्देश करना सच्चे कवि का दायित्व भी होता है। इस दिशा में डॉ. शंकर वासिष्ठ सर्वथा सफल कवि हैं। मैं द्वितीय कविता संग्रह 'स्पन्दन' के सफल प्रकाशनार्थ विद्वान् कवि को हार्दिक साधुवाद प्रदान करता हूँ।

 

(डॉ॰ प्रेमलाल गौतम 'शिक्षार्थी ')
प्राचार्य (से.नि.)
सरस्वती सदन रबौण,
पत्रालय सपरून-173211,
जनपद सोलन (हि.प्र.)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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रचनाकार: पुस्तक समीक्षा/ 'स्पंदन' में है हर एक की भावनाओं का स्पंदन
पुस्तक समीक्षा/ 'स्पंदन' में है हर एक की भावनाओं का स्पंदन
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