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मानव अधिकारों के संरक्षण व संवर्धन में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका

राकेश रेणु

हाल ही में जारी दो सर्वे-रिपोर्टों की ओर आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ। इनसे आप में से ज्यादातर लोग अवगत होंगे। पहली रिपोर्ट इसी साल अगस्त के आखिर में जारी नेशनल रीडरशिप सर्वे की है जिसमें कहा गया है कि देश के 10 सबसे अधिक प्रसारित समाचारपत्रों में एक भी अंग्रेजी अखबार नहीं है। इन 10 अखबारों में पांच पत्र हिंदी के हैं और बाकी पांच अन्य भारतीय भाषाओं के। दूसरी रिपोर्ट बीबीसी नयूज द्वारा जारी एक सर्वे की है। एनओपी वर्ल्ड कल्चर स्कोर इंडेक्स नामक इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतवासी दुनिया के पढ़ाकू या किताबी कीड़े हैं और औसतन प्रत्येक भारतीय हफ्ते में पौने ग्यारह घंटे पढ़ने में लगाता है। अब इन दोनों रिपोर्टों को एक जगह रखकर कोई निष्कर्ष निकालने की कोशिश करें तो क्या तस्वीर बनती है ? पहली तो एक कि लाख शोर-गुल के बावजूद भारतीय लोग अब भी टीवी पर ज्यादा समय नहीं बिताते हैं और छपे हुए पाठ को अधिक विश्वसनीय मानते हैं। दूसरी, और ज्यादा महत्वपूर्ण बात जो सामने आती है, वह यह कि इन पढ़ाकू लोगों में ज्यादातर वे हैं जो भारतीय भाषाओं के पाठक हैं और महानगरों में नहीं छोटे शहरों-कस्बों-गांवों में रहने वाले हैं।

इस तस्वीर के मद्देनजर हिंदी और भारतीय भाषाओं पर भारी जिम्मेदारी आ पड़ती है कि वे वस्तुनिष्ठता बनाए रखें, किसी खास समूह, वाद या विचारधारा का पल्लू पकड़ने की बजाय निरपेक्ष दृष्टि साधे रखें, बाजार और उपभोक्ता संस्कृति का साथ निभाने की मजबूरी के बीच सकारात्मक और समाज को जोड़ने वाली घटनाओं, समाचारों को प्रमुखता दें और नित घट रही मानवाधिकार हनन की घटनाओं की कवरेज़ के क्रम में पाठकों को उनके अधिकारों के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं से अवगत कराते चलें।

हम जानते हैं कि मानव अधिकारों के दायरे में जीवन के प्रायः सभी क्षेत्र आते हैं। हमारी सामाजिक, राजनीतिक, नागरिक और आर्थिक व्यवस्था के मानवीय लक्ष्य मानवाधिकार ही निर्धारित करते हैं; और उन्हें ही निर्धारित करना चाहिए। इस तरह, प्रत्येक सार्वजनिक या सामाजिक घटना, शासन-व्यवस्था द्वारा लिया जाने वाला प्रत्येक निर्णय, नीति और कार्यक्रम मानवाधिकारों के दायरे में आते हैं। हिंदी की पत्र-पत्रिकाएं और पत्रकार मानव अधिकारों के इस क्षेत्र विस्तार से अच्छी तरह वाकिफ हैं जिसकी वजह से अधिकारों से जुड़े मुद्दों को व्यापक कवरेज़ भी मिल रहा है। यहां रोज़गार गारंटी कार्यक्रम और सूचना के अधिकार को मिले व्यापक कवरेज़ का उल्लेख करना होगा। आज ये दोनों कानून का रूप ले चुके हैं, लेकिन उनका कितना अनुपालन हो रहा है और कितना उल्लंघन; यह समाचार और विश्लेषण का विषय हमेशा बना रहेगा। इसी तरह, महिला अधिकारों के हनन के तमाम मामलों को अखबारों ने प्रमुखता दी है। हाल ही में बने महिलाओं पर घरेलू हिंसा विरोधी कानून और उसके आलोक में दर्ज़ शिकायतों को भी समाचारपत्रों ने उठाया है। रोजगार गारंटी कार्यक्रम और सूचना के अधिकार को कानूनी हैसियत दिलाने के लिये जिन लोगों और संगठनों ने वर्षों मेहनत की, हिंदी और भाषायी पत्र-पत्रिकाएं उन्हें भी लगातार कवरेज़ और ताकत प्रदान करते रहे।

दरअसल, भारतीय परिप्रेक्ष्य में संचार माध्यमों को ताकत स्वाधीनता आंदोलन से मिलती है जहां न केवल उनकी जड़ें स्थित हैं, बल्कि जहां से उनका उद्गम भी हुआ। आजादी की लड़ाई के दिनों से ही पत्र-पत्रिकाओं का स्वयंसेवी संगठनों से भी गहरा नाता बना रहा, जो स्वाधीनता के बड़े और व्यापक आंदोलन के भीतर विभिन्न सामाजिक सुधारों, लड़ाइयों; मसलन सती प्रथा का उन्मूलन, जाति-भेद और छुआछूत उन्मूलन सहित विभिन्न मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे। पत्र-पत्रिकाएं इन छोटी-बड़ी लड़ाइयों का संदेशवाहक थीं और इनके संपादक-प्रकाशक स्वयं इनसे सक्रियता से जुड़े थे। इस पृष्ठभूमि से निकले हुए संचार माध्यम आज भी स्वयंसेवी संगठनों के साथ रचनात्मक सहकार बनाए हुए हैं और मानवाधिकारों के प्रसंग को परिप्रेक्ष्य और प्रसार दे रहे हैं।

लेकिन यह तस्वीर का एक पहलू है जो काफी सीधा-सरल है। तस्वीर का दूसरा पहलू किंचित जटिल है। उपभोक्तावाद का वर्चस्व समूचे विश्वग्राम में देखा जा सकता है। बीते डेढ़ दशक में इसने भारतीय समाज को भी अपने पाश में ले लिया है। फलतः संचार माध्यमों और कर्मियों पर व्यावसायिकता और कैरियरिज्म हावी हो चुका है। व्यावसायिकता और कैरियरिज्म के दबाव में प्रायः समाचार पत्र, और पत्रकार भी, मालिकानों के व्यावसायिक, राजनीतिक और वैचारिक हितसाधन का उपकरण बन जाते हैं। अनेक मर्तबा खबर सनसनीखेज बनाने के लिये उन्हें असंगत अथवा गलत रंग दे दिया जाता है अथवा अनुचित रूप से अधिक कवरेज दिया जाता है।

एक दूसरा उदाहरण दूं। सर्वोच्च न्यायालय ने डी.के.बसु मामले में यह व्यवस्था दी कि विचारधीन कैदियों को हथकड़ी पहनाना उनके मानवाधिकारों का हनन है। बावजूद इसके हम जानते है कि विचाराधीन कैदियों को खुलेआम हथकड़ी पहनाई जाती है। अज्ञानतावश, या अति उत्साह में या, खबर को सनसनी देने के लिये हम उनकी तस्वीरें भी छाप देते हैं। बेहतर तो यह है कि हम ऐसी तस्वीरें न छापें। यदि हम उन्हें छाप ही रहें तो कैप्शन अथवा खबर में न्यायालय की व्यवस्था का जिक्र करते हुए बताएं कि यह पुलिस अत्याचार और मानवाधिकार हनन की एक बानगी है।

पिछले एक-डेढ़ दशक में पत्र-पत्रिकाओं में एक चिंताजनक परिवर्तन यह आया है कि उनमें धार्मिक कवरेज बढ़ गई है। यह परिवर्तन भाषायी पत्र-पत्रिकाओं में अधिक हुआ है। कुछ मीडियाकर्मियों का तर्क है कि पाठक इसके बारे में पढ़ना चाहते है। लेकिन इस तर्क की सच्चाई से हम सब वाफिक हैं। अव्वल तो तीर्थस्थलों और विभिन्न धार्मिक उपक्रमों पर फीचर लेख समाचार नहीं है, दूसरे यह पत्र और पत्रकारिता की निरपेक्ष छवि के विपरीत है। धार्मिक बहुलता वाले भारतीय समाज में यदि कोई समाचार पत्र किसी एक धर्म के बारे में बार-बार छापे तो यह और भी खतरनाक है। हिंदी में इसका परिणाम यह हुआ कि वह हिंदुओं की भाषा मान ली गई है। उर्दू मुसलमानों की भाषा हो गई है। एक धर्मनिरपेक्ष समाज में धार्मिक कवरेज से सामजिक ताने-बाने के धर्म के आधार पर विभाजन के खतरे भी निहित हैं। इसलिये इनसे जितना अधिक बचा जाए, उतना बेहतर।

कुछ बातें पत्र-पत्रिकाओं के अंदरूनी जनतंत्र और मानवाधिकारों की स्थिति के बारे में। कहा जाता है कि पत्रकारिता में अच्छी संख्या में महिलाएं हैं। संवैधानिक रूप से लिंग आधारित भेदभाव नहीं है। लेकिन व्यवहार में, महिलाएं काम और वेतन दोनों के मामले में भेदभाव का शिकार होती हैं। इस स्थिति से निबटने के लिये हाल ही में हरियाणा के मानेसर में इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स के एक सम्मेलन में महिला पत्रकारों के लिये एक जेंडर काउंसिल गठित करने का निर्णय लिया गया। इस निर्णय में पत्रकार संगठनों की अहम भूमिकाा रही। लेकिन यह काउंसिल कितना और कैसे काम करता है, यह भी अभी देखा जाना है। पुरूषवादी दृष्टि केवल समाचार कवरेज़ तक ही सीमित नहीं है। विज्ञापनों और फीचर लेखों के साथ छपने वाले रंगीन छाया भी इस सोच का हिस्सा हैं।

दोस्तों, बात मैंने अखबारों के अंदरूनी जनतंत्र से शुरू की थी। महिला पत्रकारों से जुड़े मामले उसका महज एक पहलू है। दूसरा महत्पूर्ण पहलू दलितों से जुड़ा है। संचार माध्यमों के भीतर दलित पत्रकारों की संख्या के बारे में कोई प्रामाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। बावजूद इसके, यह भी सर्वमान्य है कि संचार माध्यमों सहित समस्त निजी क्षेत्र में सवर्ण जातियों और समाज के उच्च-मध्य तथा मध्यवर्ग का वर्चस्व है। इसका परिणाम क्या हो रहा हैं ? हम पाते हैं कि आरक्षण का विरोध कर रहे खाते-पीते घरों के मुट्ठीभर बच्चों की खबरें मुख्य समाचार बन जाता हैं, मानो देश के सभी छात्र-छात्राओं का मिजाज वही हो। दरअसल आरक्षण का मुद्दा रोजगार से, और रोजगार व्यक्ति की आर्थिक स्थिति और सामजिक हैसियत से जुड़ा है। इसलिये, दलित अधिकारों के पैरोकार भी तक अपने वर्ग के लिये सुरक्षित जमीन का बंटवारा होते देखते हैं, तो उन्हें वह स्वीकार नहीं कर पाते।

अंदरूनी जनतंत्र का अन्य पहलू पिछले सालों में खूब चलन में आई ठेकेदारी प्रथा से जुड़ता है। पिछली एनडीए सरकार ने श्रम सुधारों के नाम पर अन्य क्षेत्रों की तरह पत्रकारिता में भी ठेकेदारी प्रथा को व्यापक मान्यता दी। फलस्वरूप जो नये पत्रकार अब नौकरी करने आ रहे हैं उन्हें प्रायः एकमुश्त राशि दे दी जाती है। किसी किस्म का सेवा लाभ नहीं। कई बार यह एकमुश्त राशि उतनी भी नहीं होती जितने पर उनसे हस्ताक्षर कराया जाता है। एक समाचारपत्र समूह से पिछले दिनों एक साथ दर्जनभर पत्रकारों को निकाल दिया गया। और इनमें से एक भी पत्रकार नौसिखुआ नहीं थे, सभी स्थापित नाम थे। जानकारों की मानें तो इस समूह में नौकरी शुरू करने के साथ ही इस्तीफे पर हस्ताक्षर करा लिया जाता है। जैसे ही प्रबंधन ने यह समझा कि आप उनके लिये उपयोगी नहीं रहे, इस्तीफे में तारीख डाल आपको उसकी सूचना दे दी जाती है। लेकिन देखिये कि अखबारों के भीतर मानवाधिकार हनन के ये मामले कहां और कितना बाहर आ पाते हैं ? आपने जैसे ये मुद्दे उठाए, इस्तीफे पर तारीख डली। 'हायर एंड फायर' नीति के तहत ठेके पर आए पत्रकारों के लिये तो यह औपचारिकता भी वांछित नहीं। यह स्थिति कब तक जारी रहेगी ? इससे निजात पाने के लिये पत्रकार संगठनों के साथ राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को भी आगे आना होगा 

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(मानवाधिकार संचयिका, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से साभार)

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