सोमवार, 29 जून 2015

सामाजिक न्याय की कसौटी और गांधी दर्शन'

डॉ0 पारमिता

ज के जमाने में भी विश्व के विभिन्न प्रांतों में मानवाधिकारों की रक्षा के आंदोलन में हगांधीजी का जीवन और संघर्ष एक महान प्रेरणा है । अमेरिका में . ष्णांग समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ाई करने वाले मार्टिन लूथर किंग, दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला, अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा या बर्मा में इक्कीस साल तक बंदी रहने के बाद हाल ही में मुक्त हुईं आंग सान सू की- सभी ने गांधीजी को अपना आदर्श माना । फ़िर भी वर्तमान समय में गांधी की के विचार कितने प्रासंगिक हैं, ये प्रश्न समय-समय पर उठता रहा है। इस संदर्भ में आवश्यकता ये है कि हम गांधीजी के विचारों को एक बार पुनः समझने का प्रयास करें। खासतौर पर, सामाजिक न्याय के विषय में उनकी धारणाओं का पुनरावलोकन जरूरी है ताकि समाज की वर्तमान समस्याओं को सुलझाने में मदद मिले।

गांधीदर्शन अन्याय और शोषण की समप्ति शांतिपूर्ण व अंहिसात्मक उपाय द्वारा की करना चाहता है। भारत की आजादी इस बात का श्रेष्ठ उदाहरण है कि समाज या व्यवस्था को अहिंसात्मक आंदोलन से भी परिवर्तित किया जा सकता है। अहिंसा मानवीय स्वतंत्रता समानता तथा न्याय के प्रति गांधीजी की प्रतिबद्धता सावधानीपूर्वक व्यक्गित परीक्षण के बाद जीवन के सत्य से पैदा हुई थी। गांधीजी द्वारा निर्देशित अहिंसा का वही मार्ग आज के हिंसादीर्ण समाज लिए और भी अधिक उपयोगी प्रतीत होता है।

सामाजिक न्याय एवं उसकी मांग संबंधी अवधारणा आधुनिक युग की देन है। पीड़ित और पिछड़े वर्ग के लोगों को सामाजिक न्याय उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आधुनिक राष्ट्र के प्रमुख कार्यों में से एक माना जाता है। औद्योगिक क्रांति के समय से श्रमिकों के प्रति पूंजीपतियों के शोषण के विरोधस्वरूप इस अवधारणा का विकास हुआ। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था मे श्रमिकों की अवस्था में सुधार लाने के उद्देश्य से विश्व भर में जो आंदोलन छेड़ा गया, सामाजिक न्याय की अवधारणा उसी पर आधारित है। उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में उपनिवेशी शासन के खिलाफ़ विश्व के विभिन्न प्रांतों में आवाजें उठीं और नए-नए स्वाधीन राष्ट्रों की स्थापना हुई। तभी राष्ट्र-व्यवस्था के तहत सामाजिक न्याय की प्रक्रिया को संवैधानिक प्रावधानों में शामिल किया गया। स्वतंत्र भारत में भी विकास के प्रयास सबंधित सभी कार्यक्रम सामाजिक न्याय की धारणा से प्रेरित रहे हैं, ताकि सभी वर्ग, वर्ण, जाति एवं धर्म के लोग अपनी-अपनी मानवीय स्थितियों में सुधार ला सकें।

समाज में मौजूद प्रत्येक वर्ग के लोगों की अंतर्निहित संभावनाओं को अभिव्यक्ति मिले और उनकी आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति की जा सके- सामाजिक न्याय का उदेश्य यही है। किंतु समय के साथ तकनीकी विकास के कारण सांस्.तिक और सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव आते रहे हैं। मनुष्य की आवश्यकताएँ भी उसी के अनुरूप बदलती रही हैं। इसलिए न्यायपूर्ण समाज की स्थापना हेतु प्रत्येक पीढ़ी बदलाव की माँग करती रही है। जिसके परिणामस्वरूप कई बार मौजूदा व्यवस्था परिवर्तनकामी शक्तियों के खिलाफ़ खड़ी हो जाती हैं। अपने-अपने को सही मानने का यही मतभेद उनके बीच हिंसा को उकसाता है। ऐसी संघर्षपूर्ण स्थितियों को संभालकर शांति कायम रखना कोई आसान बात नहीं थी। सामाजिक न्याय के लिए लड़ाई अहिंसा से लड़ी जाए, इसलिए गांधीजी मनुष्य जीवन में नैतिक गुणों के विकास जरूरी समझते थे। उनका यह अटूट विश्वास था कि भारत के लोगों के लिए स्वतंत्र एवं उच्च जीवन निर्माण हेतु सामजिक एवं नैतिक गुण आवश्यक ही नहीं बल्कि अपरिहार्य हैं। नैतिकता के आधार पर की गई लड़ाई में जीत अवश्य होगी- बापू का जीवन इस विश्वास पर आधारित रहा है।

गांधीजी मानवप्रेमी होने के साथ-साथ गहरे रूप में आध्यात्मिक और धार्मिक थे। वे परम्पराओं में विश्वास करते थे, लेकिन उनके विचार अभिनव और क्रांतिकारी थे। उनका मानना था कि धार्मिक भावना से संचालित व्यक्ति कभी किसी प्रकार का अन्याय सहन नहीं करता। जहाँ भी मानवता पर कोई अन्याय हो, नैतिकता और धर्म का तकाजा यही है कि तुरंत उसको मिटाने का प्रयास किया जाए। सामाजिक भेदभाव और संकीर्णता मिटाने की निरंतर कोशिश, अस्पृश्यता और जाति-पांति के बैर को जड़ से मिटाने के लिए सामाजिक आंदोलन और भारतीय समाज को एक साथ जोड़ने की चेष्टा, गांधी दर्शन की धुरी है। अहिंसा एवं सत्याग्रह उनकी नैतिकता की अवधारणा के दो मुख्य पहलू रहे हैं और असहयोग, सामाजिक न्याय की लड़ाई का प्रमुख हथियार। तोलस्तॉय एक चिट्ठी में गांधीजी को लिखते हैं,'…. The psaive resistance is a question of great importance not only for India but for the whole humanity'. हालांकि आजादी की लड़ाई में कई बार असहयोग आंदोलन में हिंसा उतर आने के कारण गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन रद्द किया गया, पर यह आंदोलन भारतवासियों को एकजुट करने में सफ़ल रहा था।

गांधीजी का समग्र जीवन गरीबों और पीड़ितों को सामाजिक न्याय दिलाने के संघर्ष में बीता। दक्षिण अफ्रीका में जो लड़ाई अश्वेत नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रारंभ हुई, वह भारतवर्ष के स्वाधीनता संग्राम की पृष्ठभूमि थी। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधीजी को दो तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। एक था विदेशी शासकों के शिकंजे से देश को आजाद करना, और दूसरी तरफ़ भारतीय समाज में पनपने वाली अंदरूनी बुराइयों को हटाना। भारत को अगर अंग्रेज़ी हुकूमत का सामना करना था तो यह जरूरी था कि मौजूदा भेदभावपूर्ण समाज को बदलकर आपसी संबंधों को सुधारा जाए। सदियों से चली आ रही अन्याय की प्रथाओं को बदलना या मिटाना कोई आसान काम नहीं था। त्याग और बलिदान के लिए लोगों को अनुप्राणित करने की गांधीजी की अद्भुत क्षमता और पिछड़े वर्गों के प्रति उनके प्रेम ने इस कठिन काम को आगे बढ़ाया। आजादी की उनकी लड़ाई अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध थी। साथ ही साथ, एक समतामूलक समाज की स्थापना के लिए भी।

इस उद्देश्य से समाज के उत्थान के लिए गांधीजी ने कुछ रचनात्मक कार्यक्रम शुरू किए सांप्रदायिक एकता अस्पश्यता निवारण मद्यनिषेध खादी प्रचार ग्रोमोद्योग सफाई की शिक्षा बुनियादी तालीम हिंदी प्रचार अन्य भारतीय भाषाओं का विकास स्त्रियों की उन्नति स्वास्थ्य शिक्षा प्रौढ़ शिक्षा इसी प्रकार देशहित के लिए आर्थिक समानता कृषक संगठन श्रमिक संगठन विद्यार्थी संगठन और स्वतंत्रता तथा स्वराज के लिए निरंतर संघर्ष। स्वाधीनता के उपरांत स्वतंत्र भारत में, सभी को सम्मान के साथ जीने के अधिकार मिलें- यह गांधीजी का स्वप्न था। इस तरह से देखा जए तो गांधीजी का दर्शन और सामाजिक न्याय, इन दोनों में कोई अंतर नजर नहीं आता।

दुःखद बात यह है कि आज भी इस देश के अनेक प्रांतों में धर्म और जात-पाँत के नाम पर भेदभाव किया जाता है। आज भी एक ही धर्म के होने के वावजूद विभिन्न जाति व समुदायों के लोग गाँवों में अलग-अलग हिस्से में बसते है, अलग-अलग मंदिरों में जाते है। यहाँ तक कि स्कूलों में सारे बच्चे एक-साथ बैठकर मिड-डे मील का खाना तक नहीं खाते। जाति-भेद की यह समस्या केवल हिंदुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि मुस्लिम और सिख धर्मों में भी कायम है। अगर अलग-अलग जातियों के लड़के और लड़की एक-दूसरे से शादी कर लें तो उनकी जान खतरे में पड़ जाती है। संविधान में देश के सभी वर्ग के लोगों की समानता निश्चित की गई है, लेकिन आम आदमी अपना सामाजिक जीवन में जाति-विभेद कभी नहीं भूले।

देश में लागू आरक्षण और सकारात्मक विभेद की नीतियों से लाभ जरूर हुआ है । पर आजादी के इतने साल बाद इसी वजह से आज भी सरकारी तौर पर व्यक्ति की पहचान जाति के आधार पर ही होती है। अभी भी इस द्वैत को मिटाने का काम बाकी है। जब तक हम इन बुराइयों से आजाद नहीं होंगे, तब तक सही मायनों में एक स्वतंत्र और आधुनिक भारत का निर्माण संभव नहीं होगा।

गांधीजी मार्क्सवादी चिंतन से बेहद प्रभावित थे। वर्गहीन समाज की मार्क्सवादी धारणा उन्हें आकर्षित करती थी। राष्ट्रवादी चिंतकों के अनुसार साम्राज्यवादी शोषण के कारण अंग्रेज़ी शासन के दौरान भारत की आर्थिक स्थितियाँ दुर्दशापूर्ण हो गई। जिससे उबरने का एकमात्र उपाय था अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति । जबकि मार्क्सवादी चिंतन के अनुसार इस दुर्दशा के मूल में भी पूंजीवादी शोषण है, जिससे समाज में आर्थिक असमानता और अन्याय पनपते हैं और वर्ग-संघर्ष ही इससे निपटने का इकलौता रास्ता है। पूंजीवादी एवं मार्क्सवादी, दोनों अर्थव्यवस्थाएँ मशीन-निर्भर अति-उत्पादन पर टिकी हुई हैं । जबकि पूंजीवादी व्यवस्था अन्याय और हिंसापूर्ण शोषण के बल पर चलती है, मार्क्सवाद इससे उद्भूत परिस्थितियों से मुक्ति पाने के लिए हिंसक उपाय अपनाने की बात करता है। हिंसाअ के मामले में पूंजीवाद एवं मार्क्सवाद में शायद ही कोई अंतर है।

किंतु गांधीजी की विचार कुछ अलग था । उनका मानना था कि भारत की आर्थिक दुर्दशा का कारण था शहरी विकास के दौरान ग्राम-निर्भर अर्थव्यवस्था का विनाश। यह उनके लिए शहर द्वारा गाँवों का शोषण था। वे मानते थे कि भारत में ऐसी उत्पादन-व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को काम मिले एवं आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विकास हो। गांधीजी चाहते थे कि हर हाथ को काम मिले बेकारी नहीं। आदमी के पास ऐसे औजार होने चाहिए जिस पर सही अर्थों में उसका नियंत्रण हो। यंत्र यदि व्यक्ति के काम को छीनकर पंगु बनाता है तो वह गांधी को स्वीकार्य नहीं। चरखे का संदेश है नियंत्रण योग्य मशीनें और गांव शासन।

गांधीजी के लिए चरखा श्रम की मर्यादा का भी प्रतीक था। वे मशीनी-उत्पादन और औद्योगिकीकरण के विरोधी थे। इसके लिए प्रायः उनकी आलोचना भी की जाती है। गांधीजी ने 1909 में रचित अपनी पुस्तक हिंद स्वराज में आधुनिक सभ्यता को नकारा था। वस्तुतः आधुनिक सभ्यता के बारे में उनकी नकारात्मक भावना कभी नहीं बदली। लेकिन उस समय जबकि पिछड़े मुल्कों के अधिकतर देश शीघ्र औद्योगिक विकास के लिए प्रयासरत थे, गांधीजी द्वारा आधुनिक सभ्यता और आधुनिक तकनीकी विकास से विरोध को स्वाधीन भारत की विकास नीति का समर्थन नहीं मिला। भूमण्डलीकरण के इस दौर में विश्वभर में बेकारी की समस्या प्रकट होती दिख रही है। चारों ओर आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है। आज हर किसी का मानना है कि, प्रत्येक हाथ को कामश्सामाजिक न्याय की स्थापना के संदर्भ में प्राथमिक शर्त है।

वस्तुतः गांधीजी अनियंत्रित विकास के विरोधी थे। गांधी सिद्धांत अनुसार रहन सहन में सादगी और कमखर्ची की बात आज के जमाने में कोई मानने के लिए भले ही तैयार न हो लेकिन जब भी सभी मनुष्यों के लिए अच्छा रहन सहन नीतियों का एक आवश्यक लक्ष्य हो और साधन सीमित हो तो सादगी अनिवार्य लगती है। मानव अपनी प्रगति और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कृति का अत्याधिक शोषण दोहन और र्प्यावरण की तबाही में लगा है। यदि हम पिछले सौ वर्षों के विकास और विनाश का अध्ययन करें तो हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि सचमुच यंत्रों ने इस सभ्यता को विनाश के मुहाने पर ला खड़ा किया है। अगर आगामी समय में समाज के हरेक वर्ग को विकास का सुफल चाहिए तो सबके लिए अपनी आवश्यकताएँ सीमित करना बहुत जरूरी है। पृथ्वी के पास हमारी आवश्यकताओं के लिए ही पर्याप्त संपदा है न कि हमारे लोभ के लिए गांधीजी द्वारा कही यह बात पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति हमारा ध्यान आकर्षित करती है और हमें विकास के वैकल्पिक पथ के बारे में सोचने के लिए मजबूर करती है 

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(मानवाधिकार संचयिका, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से साभार)

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