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विशेष फलदायी है इस बार की रथयात्रा

18 जुलाई रथयात्रा पर विशेष...

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डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

० भगवान के गढ़े जाएंगे नये शरीर

जगन्नाथ रथयात्रा पर्व का इस वर्ष विशेष महत्व है। कारण यह है कि यह अधिक मास वाला वर्ष है और अधिक मास के रूप में आषाढ़ का होना भगवान जगन्नाथ रथयात्रा पर्व के लिए नये कलेवर का समय होता है। रथयात्रा से ठीक दो माह पूर्व भगवान जगन्नाथ सहित भाई बलभद्र एवं बहन सुभद्रा की नई मूर्तियां बनाई जाती है। भगवान की नये शरीर के साथ स्थापना और दस दिनों की पूजा आराधना भक्तों के जीवन में भी नया संचार करने वाली होती है। आषाढ़ का पुरूषोत्तम मास के रूप में आना बारह अथवा उन्नीस वर्षों पश्चात ही हो पाता है। इस लिहाज से भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का ऐसा सुंदर संयोग अब 2027 या फिर 2034 में ही आ पाएगा। इससे पूर्व भगवान का नौ वर्ष कलेवर पर्व 1996 में उत्साहपूर्वक मनाया गया था। भगवान के रूप को गढ़ने के लिए कौन से वृक्ष की लकड़ियां उपयोग में लाई जाएगी, यह भी पहले से सुनिश्चित होता है। जानकारों की माने तो भगवान जगन्नाथ सहित भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियां नीम की लकड़ियों से बनाई जाती है। इसमें भी भगवान जगन्नाथ का रूप अधिक सांवला होने से उनके लिए वैसे ही नीम की लकड़ी की खोज की जाती है जो अधिक काला रंग लिए हो।

मूर्ति के लिए नीम वृक्ष का चयन आसान नहीं

भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की नई मूर्तियों को गढ़ना इतना आसान काम नहीं है। कारण यह है कि मूर्तियों का निर्माण जिस नीम के वृक्ष की लकड़ी से किया जाना है वह साधारण नीम वृक्ष नहीं होता है। इसके कठिन नियम किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। जानकार बताते है कि जिस नीम वृक्ष की मूर्तियां बनाई जानी हो, उसकी विशेष पहचान की जाती है। कहा जाता है कि उस वृक्ष में चार शाखाएं होना जरूरी है। इन्हीं शाखाओं को भगवान श्री नारायण की चार भुजाओं को प्रतीक माना जाता है। यह भी आवश्यक है कि उक्त वृक्ष के समीप जलाशय, श्मशान और चीटियों की बांबी भी होना चाहिए। वृक्ष की जड़ में सांप का बिल भी जरूरी माना जाता है। इसके साथ ही वृक्ष की कोई भी शाखा टूटी या कटी हुई नहीं होना चाहिए। इन सबके अलावा ऐसा नीम का वृक्ष किसी तिराहे के पास हो या फिर वह तीन पहाड़ों से घिरा हुआ हो। यह भी देखा जाता है कि उस वृक्ष पर कभी किसी प्रकार की लता न चढ़ी हो और आस-पास बेल का वृक्ष भी होना चाहिए। जिस नीम की वृक्ष को इस प्रकार मूर्ति बनाने के लिए चयनित किया जाता है, उसका अंतिम रूप से शिव मंदिर के पास होना भी अनिवार्य शर्त मानी जाती है। ऐसा वृक्ष प्राप्त हो जाने के बाद शुभ मुर्हूत में लकड़ियों को मंत्रोच्चार के बीच काटा जाता है। काटी गई लकड़ियों को एक रथ में रखकर उन्हें दैतापति जगन्नाथ मंदिर ले जाया जाता है, जहां उन्हें तराशकर तीनों पवित्र मूर्तियों का निर्माण किया जाता है।

गोंचा पर्व से जीवित है छत्तीसगढ़ की रथयात्रा

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा पर्व के अवसर पर मां दंतेश्वरी का बस्तर क्षेत्र बड़ी धूमधाम से गोंचा पर्व का आयोजन करता आ रहा है। जून अथवा जुलाई माह में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की दूज तिथि पर रथयात्रा के दौरान जगदलपुर में गोंचा पर्व मनाया जाता है। आदिवासी बाहुल्य इस क्षेत्र में पर्व की तैयारी माह भर पूर्व शुरू कर दी जाती है। त्यौहार के उत्साह का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस त्यौहार के खुशी का इजहार करने पूरे बस्तर क्षेत्र में दूर दूर तक निवास करने वाले आदिवासी जगदलपुर पहुंचने लगते है। रथ यात्रा के दौरान अपने उत्साह का प्रदर्शन करने आदिवासी तुक्की और गोंचा का उपयोग करते है। तुक्की को बनाने के लिये उच्च कोटि के बांस का प्रयोग किया जाता है। इसी तरह गोंचा एक प्रकार का फल होता है। अंचल के आदिवासी तुक्की को बंदूक के रूप में और गोंचा को गोली की तरह उपयोग करते है। इस तरह से वे आपस में तुक्की पर गोंचा को रखकर एक दूसरे पर वार करते है। आदिवासियों की इस परंपरा को जगदलपुर सहित अन्य स्थानों में रहने वाले लोग एक खेल के उत्साह के रूप में देखते है।

बस्तर दे रहा महत्वपूर्ण रथयात्रा की जानकारी

भगवान जगन्नाथ पूरे विश्व के देव माने जाते है। संस्कृत में उन्हें जगत्+नाथ के रूप में संयोजित किया गया है। भगवान की दस अथवा पंद्रह दिवसीय यात्रा सामान्यतः श्रद्धालुओं को धार्मिक आयोजनों से जोड़ती है। वास्तव में रथ यात्रा में उपयोग किये जा रहे रथों से लेकर अन्य सामग्रियों की विस्तृत एवं संजोने योग्य जानकारी बस्तर क्षेत्र की रथयात्रा से प्राप्त होती है। जगदलपुर में निकाली जाने वाली रथ यात्रा के रथों को गरूड़ ध्वज और कपि ध्वज के नाम से जाना जाता है। इसी तरह रथ में फांदे गये घोड़ों को शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व के रूप में जाना जाता है। सभी घोड़ों का रंग श्वेत अथवा सफेद होता है, जो शांति का प्रतीक है। इसी तरह रथ के सारथी का नाम दारूक है। रथ को हर प्रकार से सुरक्षित रखने भगवान विष्णु के वाहन पक्षी राज गरूड़ को रक्षक की जवाबदारी सौंपी जाती है। रथ के सबसे ऊपरी हिस्से में लहरा रही ध्वजा अर्थात झंडा त्रैलोक्यवाहिनी के नाम से जाना जाता है। यह सर्व विदित है कि रथ के आगे किसी प्रकार के संचालन की व्यवस्था नहीं होती है। उसे चलाने अथवा खींचने के लिये एक बड़ी और मोटी रस्सी बांधी जाती है। जिसे शंखचुड़ का नाम दिया गया है। आम श्रद्धालुओं को सामान्यतः यही जानकारी है कि रथ में भगवान जगन्नाथ के साथ भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा ही विराजमान रहती है। रहस्य की बात यह है कि उसी रथ में बजरंग बली, श्री कृष्ण, नृसिंह, राम-लक्ष्मण, नारायण, चिंतामणी तथा राघव की मूर्तियां भी स्थापित की जाती है।

बिलासपुर-रायगढ़ में भी महीनों पूर्व से होती है तैयारी

छत्तीसगढ़ प्रदेश की न्यायाधीन बिलासपुर और जुड़वा गणेश के लिये प्रसिद्ध रायगढ़ में भी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा की तैयारी महीनों पूर्व शुरू कर दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि रथ दूज के दिन बरसात होने से किसानी कार्य अच्छा होता है। यही कारण है कि मंदिर समितियां भगवान के रथ को विशेष वाटर प्रूफ पेंट से सजाती है। रथ पर सवार भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की सुरक्षा लिये बड़ा ही आकर्षक और बरसात पानी को रोकने छत्र का निर्माण किया जाता है। गजामुंग का प्रसाद अंकुरित करने के लिये मंदिर समितियां दो दिन पूर्व चने और मूंग को पानी में भिगोने के बाद उसे कपड़े में बांधकर रख देते है। छत्तीसगढ़ प्रदेश के हर छोटे बड़े शहर में स्थापित भगवान जगन्नाथ की मंदिर इस बात का प्रमाण है कि पूरा प्रदेश भगवान जगन्नाथ के प्रति अपनी श्रद्धा रखता है। भगवान जगन्नाथ मंदिर उड़ीसा से लाया गया चावल (भात) का सुखा दान भी लोग शादी विवाह के भंडारे में अवश्य डालते है ताकि भोजन में किसी प्रकार की कमी न आये।

 

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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