रविवार, 26 जुलाई 2015

हिमालय की गोद में: रोमांचक यात्रा संस्मरण

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--मनोज 'आजिज़'

श्री शीतल प्रसाद दूबे जमशेदपुर के एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। ये पेशे से प्रबन्धक, हृदय से भावुक और मन से योग तथा संस्कृति के प्रति समर्पित हैं। हिंदी-भोजपुरी के वरिष्ठ साहित्यकार व पूर्व आचार्य डॉ बच्चन पाठक 'सलिल' ने इनके विषय में कहा है कि दूबे जी योग और हिमालय यात्रा के अदभूत समन्वयक हैं। ये योग सुधा पत्रिका के सम्पादक भी हैं। हिमालय की गोद में उनका यात्रा-वृत्त संग्रह अभी-अभी प्रकाशित हुआ है। इसमें लेखक ने हिमालय के दुर्गम स्थानों की अपनी यात्राओं का रोमांचक वर्णन प्रकाशित किया है। लेखक रोमांच और वीरता के साथ अध्यात्म भावना से भी जुड़ा हुआ है। वे हिमालय के प्रति अपनी भावना का उद्गार करते हुए कहते हैं--"भारत में पुरातन काल से ही हिमालय पृथ्वी पुत्रों का आकर्षण रहा है। गुफाओं में आज भी साधना करते साधक परम तत्व की खोज में लगे हैं। यहाँ अनेक ऐतिहासिक गुफ़ाएँ भी हैं जो हमारे मनीषियों की कर्म-स्थलियाँ हैं।" प्रस्तुत पुस्तक में कुल चौदह संस्मरण हैं जिनमे से कुछ विशेष उल्लेख्य हैं--अमरनाथ, बौद्ध आस्था का केन्द्र लद्दाख, नंदन कानन, भागीरथी का जन्म स्थान, हर की दून, मणि महेश आदि। ये अधिकांश स्थान दुर्गम हैं। लेखक ने बराबर बताया है कि उस स्थान पर किस तारीख को पहुँचे थे, उनके सहयात्री कौन-कौन थे और वह स्थान समुद्रतल से कितनी ऊंचाई पर था। 

शीतल जी ने केवल वर्णनात्मक शैली ही नहीं अपनाई है बल्कि बीच-बीच में प्रकृति के सौन्दर्य का वर्णन किया है और उस स्थान की स्थानीय विशेषताओं तथा वहां के लोगों की जीवनशैली आदि पर भी प्रकाश डाला है जो एक साहित्यिक उपादेय है। 

लेखक ने कई स्थानों पर चिंतन प्रकट की है कि भारतीयों में अभी भी यायावरी की भावना का अभाव है। कई स्थान पर इनको केवल विदेशी पर्यटक ही मिले। कुछ महिलायें ऐसी भी मिली जो भारत की कोई भाषा नहीं जानती थी और अकेले या दो मिलकर हिमालय के दर्शन, भ्रमण करने और विहड़ स्थानों में रात गुजारने चली आई थीं। इनके कई रोचक संस्मरण भी लेखक ने दिए हैं। एक ऐसा ही संस्मरण दो ऑस्ट्रेलियाई बहनों का है। वे लद्दाख के एक ढाबा में खाना खाने बैठी थी। खाना में केवल दाल-भात और एक सब्ज़ी थी। न तो उन्होंने खाना देने वाले की भाषा समझीं और न वह लड़का उनकी भाषा समझता था। वे दाल को सूप समझकर पहले पी गयी। फिर भात फाँकने लॉगिन। लेखक ने वहां जाकर अंग्रेजी में उनको समझाया और होटलवाले से कहकर पुनः दाल मंगवाई।  

इस प्रकार के कई संस्मरण इस पुस्तक में प्राप्त होंगे। लेखक कहीं-कहीं चलती शैली भी अपना लेते हैं। जैसे 'बौद्ध आस्था का केंद्र लद्दाख' में उन्होंने विभिन्न स्थानों के नाम तो दिया है किन्तु बौद्ध आस्था के बहुत कम प्रसंग हैं। एक-आध मठों के विषय में और किसी बौद्ध सन्यासी का संक्षिप्त साक्षात्कार यदि इसमें रहता तो ज्यादा अच्छा लगता। प्रारम्भ से अंत तक वर्णन रोमांच से भरा हुआ है। पहाड़ों में काफी दूर चले गए हैं और तभी लगता है कि आकाश में बादल छाने लगे। तब जबरदस्ती वापस लौटना पड़ता है। कहीं-कहीं लेखक हिमालय प्रेम में मुग्ध हो जाता है। लेखक कहते हैं--"ऐसी मनोवृत्ति से आवेष्टित मेरा मन हिमालय-दर्शन को मचल उठता है। हिमालय के उतुंग श्रृंग, वक-पंख-धवल हिमाच्छादित पर्वत श्रेणियाँ, पाताल की परिभाषा बताती खोहें, आसमान को छूने को लालायित चिड़-देवदार के सघन वन, अनेक रंगों के परिधान धरे देवताओं के दिव्य उद्यान, निःसंकोच तुमुल ध्वनि से स्वछंदता का उद्घोष करती नदियाँ, रंग-बिरंगी बहुरुपियों के वेश में अभिनय करते लता-गुल्म, किसके मन-मयूर को नचाये बिना छोड़ सकते हैं।"

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह एक पठनीय यात्रा-संस्मरण है जिसमें सौन्दर्य की अपेक्षा साहस का पुट अधिक है। विस्तार से की गई व्याख्याओं के बीच-बीच जगहों और दृश्यों के चित्र पूरे वर्णन को जीवंत कर देते हैं। हिन्दी के यात्रा साहित्य में इस पुस्तक का निश्चित रूप से अपना महत्व रहेगा। 

(समीक्षक बहु-भाषीय कवि, ग़ज़लकार हैं एवं 'द चैलेंज' नामक अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेजी शोध-पत्रिका के संपादक हैं। इनके आठ कविताओं और ग़ज़लों की किताब प्रकशित हो चुकी हैं। पेशे से अंग्रेजी भाषा-साहित्य के प्राध्यापक हैं )

पुस्तक का नाम--हिमालय की गोद में (यात्रा-वृत्तान्त)

लेखक-- शीतल प्रसाद दूबे

प्रकाशक--गंगोत्री, जमशेदपुर

मूल्य--एक सौ बीस रुपये

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