क्या हम सचमुच स्वतंत्रता की छांव तले सांस ले रहे हैं?

SHARE:

राकेश भ्रमर संपादकीय - प्राची, जुलाई 2015 मेरी तरह इस देशवासियों के मन में भी यह सवाल अक्सर आता होगा कि क्या वह सचमुच स्वतंत्रता की छांव...

राकेश भ्रमर

संपादकीय - प्राची, जुलाई 2015

मेरी तरह इस देशवासियों के मन में भी यह सवाल अक्सर आता होगा कि क्या वह सचमुच स्वतंत्रता की छांव तले सांस ले रहे हैं और इस देश के सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्राप्त है. समानता में बहुत सारी चीजें आती हैं, जैसे बोलने का अधिकार, काम करने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, धर्म और आस्था का अधिकार आदि-आदि...

मुझे तो नहीं लगता, इस देश के नागरिक स्वतंत्र हैं या उन्हें समानता के अधिकार प्राप्त हैं. आपको लगता हो तो बता दें. अब देखिए न, मजदूर पूरी मेहनत के बाद भी अपने मालिक से मजदूरी नहीं मांग सकता. मांगता है, तो बदले में गालियां पाता है या आधी-अधूरी मजदूरी देकर उसे टरका दिया जाता है. मजदूर अगर इसके बाद भी आवाज बुलंद करता है, तो मालिक के गुर्गे उसे मार-पीट कर भगा देते हैं या उसे किसी फर्जी मामले में फंसाकर हवालात की हवा खाने के लिए भेज देते हैं.

समाज में बहुत सारी असमानताएं हैं. हर व्यक्ति जाति और धर्म के खेमें में बंटा हुआ है, गरीबी और अमीरी के खानों में अपने-अपने हिस्से की रोटी या हलवा-पूरी खा रहा है. कुछ लोग भीग मांगते हैं, तो कुछ उन्हें श्रद्धापूर्वक भीख देते हैं और कुछ उन्हें दुत्कार कर भगा देते हैं. जो लोग भिखारियों को रोजगार देकर स्थायित्व दे सकते हैं, वह भीख देकर महानता का अनुभव करते हैं, परन्तु रोजगार देकर किसी विपन्न को संपन्न बनाने का जोखिम नहीं उठाते.

अभी हाल में ही मुंबई में जहरीली शराब पीने से सौ से अधिक व्यक्ति मर गये. विपक्ष के नेता उनके लिए मुआवजे की मांग कर रहे हैं. जहरीली शराब पीकर मरनेवाले परिवारों को सरकार लाखों रुपये का मुआवजा देती है, परन्तु जो लोग शराब पीकर धीरे-धीरे मरते हैं और अपने परिवार की सारी संपत्ति शराब के नशे में फूंककर अपने परिवार को विपन्न कर देते हैं और परिवार के सदस्यों को दर-दर की ठोकर खाने के लिए क्या हम आजाद हैं

मजबूर कर देते हैं, उनकी तरफ सरकार या कोई सामाजिक संस्था ध्यान नहीं देती. इसी प्रकार सड़क हादसों या ट्रेन हादसों में मरनेवाले यात्रियों के परिजनों को सरकार लाखों रुपये का मुआवजा बांटती है, लेकिन जो इक्का-दुक्का लोग प्रतिदिन सड़क हादसों में मरते हैं, उनका मुआवजा देने की बात कौन कहे, उनके जीवन बीमा की राशि जीवन बीमावाले ही हड़प कर जाते हैं.

आत्महत्या करनेवाले किसानों की तरफ तो सरकार ध्यान ही नहीं देती, न उनका कर्ज माफ करती है. जबकि किसान देश के नागरिकों को दो जून की रोटी मुहैया कराने के लिए सर्दी, गर्मी और बरसात में रात-दिन खटता है, दूसरों के लिए खुद भूखा रहता है और उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता. महाजन और व्यापारी उसकी मेहनत पर अच्छी कमाई करके अमीर बन जाते हैं, परन्तु वह सदा गरीब-का-गरीब ही रहता है.

इसी तरह धर्म के नाम पर भी लोगों के साथ भेदभाव किया जाता है. किसी को उनका धर्म स्थल बनाने के लिए न केवल सरकार द्वारा जमीन दी जाती है, बल्कि आर्थिक सहयोग भी दिया जाता है और उन्हें उनके पवित्र तीर्थस्थल जाने के लिए सब्सिडी भी दी जाती है, परन्तु किसी अन्य को न केवल उनके धर्मस्थल को बनाने से मना कर दिया जाता है, बल्कि उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया जाता है.

कहते हैं कि पुलिस जनता के लिए होती है, परन्तु यहां भी सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्राप्त नहीं है. जिनके पास पैसा है, वह अपराध करके भी बच जाते हैं, और जिनके पास पुलिस की जेब गर्म करने के लिए धेला नहीं होता, वह बिना अपराध के भी जेल के अंदर पहुंच जाता है. पुलिस जनता का ध्यान रखे या न रखे, किसी अपराधी को गिरफ्तार करे या न करे, वह नेता की सुरक्षा में बहुत मुस्तैद रहती है.

इसी देश के एक प्रदेश के प्रभावशाली नेता की भैंसें चोरी हो गयीं तो एक हफ्ते के अंदर न केवल चोरी गयी भैंसें वापस आ गयीं, बल्कि एक साल बाद अपराधी भी पकड़ लिये गये. इससे हमारी पुलिस की मुस्तैदी का पता चलता है, परन्तु इसी देश में कितने ही लोगों की हत्या करके भागे अपराधी सालों साल तक पकड़ में नहीं आते, न उनके खिलाफ पुलिस कोई चालान पेश कर पाती है. वही दूसरी तरफ कुछ पैसे वाले लोग किसी से दुश्मनी निकालने के लिए पैसे के जोर पर अपने दुश्मन के खिलाफ न केवल मुकदमा कायम करवा देते हैं, बल्कि उसको कोर्ट से सजा भी दिलवा देते हैं.

कुछ गरीब व्यक्ति बिना अपराध के भी सजा पा जाते हैं और कुछ अमीर अपराधी अपराध करके भी कानून से बचे रहते हैं. ऐसे अपराधी राजनीति को ढाल बनाकर और महंगे वकील करके कानून को ठेंगा दिखाते रहते हैं.

इस देश में बोलने की आजादी के ऊपर तो सबसे ज्यादा प्रतिबंध है. पत्रकारों और लेखकों के ऊपर सरकार, नेता, उद्योगपति, व्यापारी और माफिया सभी खफा रहते हैं. इनके खिलाफ लिखने और बोलने वालों को पहले लालच से पटाने की कोशिश की जाती है और जब बात नहीं बनती तो उन्हें डराया- धमकाया जाता है. फिर भी बात नहीं बनती तो उन्हें गोली का शिकार बना दिया जाता है. अभी हाल में ही शाहजहांपुर के एक पत्रकार को एक खनिज माफिया, जो राज्य सरकार में मंत्री भी हैं, ने पुलिसवालों की मदद से जिन्दा ही जलाकर मार दिया. बहुत हो हल्ला होने पर एफ.आई.आर तो दर्ज हुई, परन्तु विवेचना के नाम पर कुछ नहीं हुआ. न तो पुलिसवालों के खिलाफ कुछ हुआ और न मंत्री का कुछ बिगड़ा. सरकार ने सभी को बचाने के लिए पूरा जोर लगा दिया और मीडिया के शोर-शराबे के बावजूद उसने केवल पुलिसवालों को निलंबित करके विवेचना की इतिश्री कर दी. परिवारवालों ने सीबीआई जांच की मांग की तो उनको तीस लाख का मुआवजा देकर चुप करा दिया गया. मंत्री जी साफ बच गये, परिवार वाले चुप हो गये.

अभिव्यक्ति की आजादी न आम आदमी को है, न लेखक और पत्रकार को. कई बार सरकार भी अपनी मनमानी नहीं कर पाती और वह विपक्ष की आवाज के सामने अपनी आवाज को दबा देती है. घर परिवार में भी कभी पत्नी पति को नहीं बोलने देती तो कभी पति पत्नी को पीटकर उनकी आवाज को विलाप में बदल देता है. बेटा बड़ा होते ही बाप की आवाज को गले के अंदर डाल देता है और सास बहू तो एक दूसरे की आवाज को दबाने का कोई मौका नहीं चूकतीं. अब यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन कितना तेज है. बहू दहेज कम लाती है, तो सास के सामने आवाज नहीं निकाल पाती और अगर वह मनमाने से भी ज्यादा दहेज लेकर आती है, तो सास ही नहीं, पूरे घरवालों की आवाज ही नहीं, सिट्टी-पिट्टी गुम किये रहती है. कई बार इसके उलट स्थितियां होती हैं. अगर बहू थोड़ा सा भी तेज हुई तो वह बिना दहेज के ही ससुराल पक्ष के लोगों को दहेज के मुकदमें में फंसाने की धमकी देकर सबकी आवाज को दबा देती है.

इस प्रकार देखा जाए तो अभिव्यक्ति की आजादी पर इस देश में सबसे ज्यादा प्रतिबंध होते हैं. दूसरे प्रतिबंध कुछ कम, कुछ ज्यादा होते हैं. यह परिस्थिति और आर्थिक क्षमता पर निर्भर करता है, कि कौन स्वतंत्रता का लाभ उठाता है और किस पर कितने प्रतिबंध लगते हैं.

सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं का लाभ सदा ही उसको लागू करनेवाला अधिकारी, कर्मचारी और ठेकेदार उठाता है, चाहे वह सस्ता राशन हो, या मकान. गरीबों को मिलनेवाला मकान अमीरों के नाम पर बुक हो जाता है. अभी पता चला है कि दिल्ली के रोहिड़ी के एक स्कूल में गरीबों के कोटेवाली सीटों पर उद्योगपतियों और व्यापारियों के बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं. उनका प्रवेश फर्जी आय प्रमाणपत्रों के आधार पर हुआ है. सच तो यह है कि गरीब बेचारा अपनी गरीबी का प्रमाण पत्र ही नहीं बनवा पाता, परन्तु अमीर आदमी फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर गरीब भी बन जाता है, गरीबों की सीट पर अपने बच्चे को दाखिला दिलवाकर उन्हें उच्च शिक्षा भी दिलवा देता है. देश के ये गरीब लोग मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू जैसी कारों में चलते हुए कहते हैं कि रिक्शा में चल रहे हैं और अपने महलों को झोंपड़ीनुमां बताते हैं. ऐसा बताते हुए उनके चेहरों पर गरीबों की दीनता का भाव नहीं होता, बल्कि अरब देश के किसी शेख जैसा गर्व होता है.

सम्पत्ति का अधिकार भी सभी को समान रूप से प्राप्त नहीं है. कोई गरीब है तो कोई अमीर. जो जितनी मेहनत करता है, उतना ही कमाता है, जो जितनी कंजूसी करता, वह उतना ही अधिक बचाता है. लेकिन अमीरी-गरीबी का यहीं एक कारण नहीं है, इसके कई अन्य कारण हैं. जो शोषण कर सकता है, कर चोरी कर सकता है, कालाबाजारी में लिप्त होता है, वह बहुत ज्यादा धनवान बन जाता है. कुछ लोग आपराधिक कृत्यों से धनवान बन जाते हैं, कुछ लोग गरीबों की रोटी छीनकर अपना पेट भरते हैं. लेकिन इस देश में एक बात पूर्णतया सत्य प्रतीत होती है, ''जिसकी लाठी उसकी भैंस'' यानी जो पैसे और शरीर से बलवान होता है, वही भैंस का दूध पीता है, और मूंछों पर ताव देता है. और यह बात भी सच है कि सबके पास धन और बल बराबर नहीं होता, इसलिए सम्पत्ति भी सबके पास बराबर की मात्रा में नहीं हो सकती. सम्पत्ति पर अधिकार वही कर सकता है, जो उसे संभाल सकता है. और उसे संभालने की ताकत हमारे देश में घूसखोंरों, बेईमानों, अपराधियों, उद्योगपतियों, व्यापारियों और नेताओं के पास होती है

. जीवन जीने का अधिकार भी इस देश के नागरिकों के पास बराबर का नहीं है. कोई महलों में रहता है, कोई छोटे घर में रहता है, तो कोई झोंपड़ियों या झुग्गियों में. करोड़ों लेाग ऐसे हैं, जिनके सिर पर छत के नाम पर पेड़ की छाया भी नहीं है. ऐसे लोग, सड़़क के फुटपाथों ओर रेलवे प्लेटफामों पर जीवन गुजारने के लिए मजबूर हैं. इनकी तरफ न सरकार का, न समाज सेवी संस्थाओं का ध्यान जाता है.

शिक्षा के क्षेत्र में इतनी असमानता है, कि गरीब का बच्चा सरकारी स्कूल मे भी नहीं जा पाता और अच्छे स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए आरक्षित सीटों पर अमीर बच्चे पढ़ाई करते हैं. सरकार ने सरकारी और गैर-सरकारी स्कूलों को मान्यता प्रदान कर ऐसी विषम परिस्थितियां पैदा कर दी हैं कि इस देश के नागरिकों को समान शिक्षा का अधिकार कभी प्राप्त नहीं हो सकता.

हमारे देश के नेता- सांसद और विधायक- स्वतंत्र देश के राजा और जमींदार हैं. यह जनता के प्रतिनिधि होते हुए भी जनता से दूर रहते हैं और जनता की भलाई के लिए लागू की जानेवाली योजनाओं का पैसा हड़पकर अपने परिजनों और संबंधियों के नाम से बड़े-बड़े उद्योग चलाने लगते हैं. बड़ी-बड़ी मिलों के ये मालिक बन जाते हैं, स्कूल और कॉलेज चलाते हैं. ऐसा कोई उद्योग नहीं होता जो नेता नहीं चलाता. माफिया और बिल्डरों से इनकी सांठ-गांठ होती है और उनको संरक्षण देने के नाम पर करोड़ों रुपये इनके खातों में जाते हैं.

इस छोटे से लेख में बहुत सारी बातों का उल्लेख संभव नहीं है. हो सकता है, कुछ ऐसी बातें छूट गयी हों, जिन पर सार्थक बहस हो सकती है. परंतु अंत में मेरा यही कहना है, अंग्रेजों से आजाद होने के बाद भी हम आजाद भारत में सांस नहीं ले रहे हैं. जनतंत्र होते हुए भी जनता बुनियादी सुविधाओं और अधिकारों से दूर है और वह घुट-घुटकर जीने के लिए मजबूर है. बस उसे मताधिकार में समानता प्राप्त है, परन्तु इससे उसके घर में एक जून का चूल्हा भी नहीं जलता.

 

राकेश भ्रमर

संपादक -प्राची

मो. 09968020930

Email: rakeshbhramar@rediffmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: क्या हम सचमुच स्वतंत्रता की छांव तले सांस ले रहे हैं?
क्या हम सचमुच स्वतंत्रता की छांव तले सांस ले रहे हैं?
http://lh4.ggpht.com/-7VFdrcqi7fI/Ubhn5z_QoPI/AAAAAAAAU_0/s5hURc_q3RQ/image%25255B2%25255D.png?imgmax=200
http://lh4.ggpht.com/-7VFdrcqi7fI/Ubhn5z_QoPI/AAAAAAAAU_0/s5hURc_q3RQ/s72-c/image%25255B2%25255D.png?imgmax=200
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2015/07/blog-post_315.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2015/07/blog-post_315.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content