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जैसा भाव वैसा भगवान

jaisa bhaav vaisa bhagwaan article by b c joshi

 

डॉ. बी.सी. जोशी

नीचता, असत्य एवं ओछेपन से मनुष्य ने किसे ठगा है। छलकपट और असत्य का व्यवहार कर मंदिर बनाये जा रहे हैं। क्या भाव के भूखे भगवान को आपका यह ढोंग अच्छा लगता होगा? आपके हृदय में छलकपट का भाव है। क्या भगवान आपके हृदय के भावों को पढ़ नहीं सकते हैं? मंदिर बन जाने के बाद भगवान के भजन हो रहे हैं। इन भजनों में पाखण्ड, ढोंग, मिथ्या प्रचार और मिथ्या व्यवहार व दूसरों को परेशान करने की भावना स्पष्ट दिखायी देती है। लगभग सभी मंदिर ध्वनि प्रदूषण का केन्द्र बन गये हैं। भगवान के प्रति इस बनावटी प्रेम का प्रदर्शन कर आप किसे ठग रहे हैं? अपने आप को या फिर अंतर्यामी प्रभु को? दिन भर भगवान के आगे ढोलक बजता रहे, यह पुजारियों का अर्थ स्वार्थ हो सकता है। लेकिन इससे मंदिर के आसपास रहने वाले लोगों को कितनी परेशानी हो रही है इसका आभास मंदिर में आने वाले भक्तों और पुजारी को क्यों नहीं होता? इस सम्बन्ध में यदि चर्चा की जाय तो भक्तगण एवं पुजारी, व्यर्थ तर्क-कुतर्क द्वारा अपने पक्ष को प्रबल बनाये रखने का प्रयास करते हैं, संशय की स्थिति उत्पन्न करते हैं। भगवान से प्रतिकूल रह कर, दूसरों को भगवान के प्रति अनुकूल आचरण करने की शिक्षा व सुझाव देते हैं। क्या भगवान को यही बातें प्रिय हैं?

भगवान का सिर्फ सत्य से प्रेम है, इसीलिये भगवान को सत्यस्वरुप भी कहते हैं। असत्य आचरण द्वारा मंदिर निर्माण, चारों ओर असत्य का अंधकार, असामाजिक तत्वों द्वारा भजन कीर्तन के नाम पर शोर-शराबा, चारों ओर असत्य का अंधकार फैला रहा है। लेकिन मंदिर का उजाला कृत्रिम है। चारों ओर असत्य का अंधकार कटु सत्य है। क्या ऐसे मंदिर में भगवान के दर्शन होंगे? सच्चा भक्त ढोंग नहीं करता, असामाजिक तत्वों की भजन मंडली के साथ बैठ कर शोर नहीं मचाता, असत्य आचरण नहीं करता, दिखावे की भक्ति नहीं करता। सच्चे भक्त के मन में भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा व लगन होती है। 'सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म', परमात्मा का स्वरुप सत्य है, ज्ञानमय और अनन्त है। इस बात को जानने वाला संवेदनशील भक्त भगवान के दर्शन कर सीधे अपने घर को चला जाता है। भक्त ज्ञानवान होता है, भगवान से प्रेम करता है, भगवान के रहस्य को जानता है। भक्त का किसी विषय में ममत्व नहीं होता। भक्त निर्भय होता है, निरभिमान, निर्गर्व होता है, क्रोध नहीं करता, द्वेष नहीं करता, विनय, विनम्रता और प्रेम की मूर्ति होता है, किसी वस्तु की कामना नहीं करता। 'आचारः परमो धर्मः' - जीवन में सत्कर्म और श्रेष्ठ आचरण ही मनुष्य का परम धर्म है। श्रेष्ठ कर्म जीवन को ऊर्ध्वगामी और असत्कर्म अधोगामी बना देते हैं। इस तथ्य और सत्य से परिचित भक्त हमेशा ऊर्ध्वगामी जीवन जीने के लिए प्रयत्नशील रहता है। कवीन्द्र रवीन्द्र के शब्दों में -

‘My beloved is ever in my heart

That is why I See him everywhere.

He is in the pupils of my eyes

That is why I See him everywhere

मेरा प्राण पियारा सदा मेरे हृदय में बसता है, मेरी आँखों की प्यारी-प्यारी पुतलियों में छिपा रहता है। इसलिये उसे मैं घट-घट में देखता हूँ।

भक्त मंदिर में ढेर सारे पुष्प लेकर जाते हैं, मालाएँ लेकर जाते हैं। समृद्ध भक्त गुलाब के फूलों की वजनी माला चढ़ाते हैं। इन्हें भगवान को चढ़ाते समय ये धनवान, भाग्यवान भक्त यही विचार करते होंगे कि इससे भगवान बहुत प्रसन्न होंगे। भगवान आपकी वस्तु नहीं देखता, वजनी माला नहीं देखता, आपकी भारी भरकम भेंट व गुप्तदान को नहीं देखता। वह तो सिर्फ यह देखता है कि आपके हृदय में प्रभु के प्रति कितनी लगन है। भगवान कहते हैं, 'निर्मल मन जन सो मोहि पावा। भगवान मात्र एक पुष्प से प्रसन्न हो जाते हैं, तुलसी पत्र से प्रसन्न हो जाते हैं, चढ़ाने वाले का मन सुमन होना चाहिये। सुमन यानी अच्छा मन, निर्मल मन, शुद्ध अन्तःकरण। पुष्प को भी सुमन कहते हैं। अच्छे मन से सुमन चढ़ाया है तो निश्चित जानिये, भगवान प्रसन्न हो गये हैं। फूल बिक रहे हैं, मालाएँ बिक रही हैं, प्रसाद बिक रहा है। इसका सुखद पहलू यही है कि भगवान की कृपा से लोगों को अच्छा रोजगार मिल रहा है।

भगवान को प्रसन्न करने के लिये निम्नलिखित आठ पुष्पों की आवश्यकता होती है। इन्हें चढ़ाने पर ही भगवान प्रसन्न होते हैं।

पहला पुष्प - अहिंसा-बुराई का समर्थन मत करो, किसी का बुरा मत चाहो, बुरा मत करो। दूसरा पुष्प - इन्द्रिय निग्रह - इन्द्रियों को मनमाने विषयों में मत जाने दो । तीसरा पुष्प - प्राणीमात्र पर दया - दूसरे के दुःख को अपना दुःख समझो।

चौथा पुष्प - शांति - किसी भी अवस्था में मन क्षुब्ध न हो। पांचवा पुष्प - शम - मन को वश में रखो।

छठा पुष्प - तप - स्वधर्म पालनार्थ कष्ट सहन करो।

सातवां पुष्प - ध्यान - इष्टदेव को चित्त में बैठा कर ध्यान करो।

आठवाँ पुष्प - जीवन में सत्य आचरण करो। प्रभु को प्रसन्न करने के लिये यही सर्वश्रेष्ठ पुष्प है।

श्रावण मास से कार्तिक मास तक महिलाएँ रोज मंदिर में भगवान् की 108 परिक्रमा करती हैं। क्या यह परिक्रमा मन में शुद्धभाव लेकर की जाती है या यह मात्र एक ढोंग है, दिखावा है, भगवान के प्रति मिथ्या आचरण है? सभी महिलाएं मिथ्या आचरण करती होंगी, ऐसा मैं नहीं कहूँगा। लेकिन नित्य प्रति जो कुछ मैं खुलेआम अपनी आँखों से देखता हूँ, कानों से सुनता हूँ, उसे आधार बना कर इस बात को कहने में जरा भी संकोच नहीं करुँगा कि यह मात्र एक ढोंग है, लोक दिखावा है। परिक्रमा करती महिलाएँ-कल हमने क्या किया, हम कहाँ गये, कैसे मौज-मस्ती की, मेरे देवर ने क्या कहा, मेरी ननद का व्यवहार कैसा है, सास क्या कहती है, श्वसुर क्या करता है, मेरे पति क्या कहते हैं, उनका स्वभाव कैसा है, बच्चे दिन भर क्या करते हैं, घर में किस बात को लेकर महाभारत छिड़ जाती है। मेरी कमर में दर्द रहता है। ऐसा कॉपर-टी लगाने के बाद हुआ है। दर्द है, देखो फिर भी मैं रोज 108 परिक्रमा कर रही हूँ। मेरे शरीर में भी बहुत कमजोरी है। जब से मैंने बच्चेदानी का ऑपरेशन कराया है, बहुत परेशान हूँ। तेरी कितनी परिक्रमा हो गई। मेरी 97 हो गई है। हाय राम! मेरी तो अभी 55 ही हुई हैं। तकलीफ है तो क्या हुआ, 108 तो पूरी करनी ही पड़ेगी।

इतने में ही मोबाइल की घंटी बजती है और शुरु होता है वार्तालाप। गप्पें मारती, जोर-जोर से बोलती, हँसती, ताली बजाती, भजन गाती, मोबाइल पर बातें करती, ये महिलाएँ क्या वास्तव में इस ओछेपन के साथ भगवान तक पहुँचने का प्रयास कर रही हैं? इस प्रश्न का उत्तर क्या हो सकता है, क्या होना चाहिये, क्या होगा, इस पर पाठक स्वयं विचार करें तो अच्छा रहेगा। एक दिन एक बुजुर्ग व्यक्ति ने इन महिलाओं को टोकते हुए कहा, 'परिक्रमा करते हुए जो कुछ भी आप कर रही हैं क्या यह उचित है?' जितनी देर तक ये मंदिर में रहे, महिलाएँ चुपचाप परिक्रमा करती रहीं। जैसे ही ये मंदिर से बाहर निकले, महिलाएँ एक स्वर में बोलीं, 'बुड्ढे का दिमाग खराब है।' और फिर शुरु हो गया अनर्गल वार्तालाप। इसे कहते हैं, भक्त का अहंकार। भगवान भक्त के दैन्य-नम्र स्वभाव को देख कर प्रसन्न होते हैं, अहंकार को देख कर नहीं। प्रतिदिन 108 परिक्रमा करते समय एक बुजुर्ग की नेक सलाह इन्हें अच्छी नहीं लगी।

यस्य नास्ति स्वस्य प्रज्ञा तस्य शास्त्रं करोति किं। लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करियष्यति।।

जिसके पास स्वयं की प्रज्ञा (बुद्धि) नहीं है उसके लिये शास्त्र का ठीक वैसे ही कोई उपयोग

नहीं है, जैसे आँखों के बिना दपर्ण निरुपयोगी है।

धर्म के क्षेत्र में भी अब पाखण्ड और प्रदर्शन ने अपनी जगह बना ली है, और धर्म में दर्शन का स्थान प्रदर्शन ने ले लिया है। हमारे धर्मशास्त्र कहते हैं, भगवान को पाने के लिये न भव्यता चाहिये, न दिखावा चाहिये, न दिव्यता। उन्हें भोग नहीं, भाव चाहिये। प्रेम और माधुर्य में डूबी भक्ति के दो पुष्प ही उन्हें रिझाने के लिये काफी हैं। संसार के सारे रिश्ते यहीं छूट जायेंगे, लेकिन परमात्मा से प्रीति का रिश्ता न कभी टूटेगा, न ही छूटेगा।

छलकपट करने वाले भक्त की हमेशा दुर्गति होती है। बिना भावना के सब व्यर्थ है। जैसा भाव वैसा ही फल। मैं रोज अपनी आँखों से परिक्रमा करती महिलाओं और युवतियों की हरकतें देखता हूँ और कानों से अभद्र वार्तालाप सुनता हूँ तो मुझे शर्म आती है, लेकिन महिलाओं को नहीं। अहंकार के वशीभूत होकर की जा रही भक्ति एवं प्रतिदिन 108 परिक्रमा करके ये सिर्फ अपने व्यवहार को दूषित कर रही हैं। विवेकेशून्य होकर परिवार निन्दा, परनिन्दा व अनर्गल वार्तालाप में संलग्न ये महिलाएँ  सत्यस्वरुप प्रभु को छल रही हैं। सत्य विचार, सत्य व्यवहार, सत्य वचन व पवित्र हृदय से भक्ति करने पर ही भगवान के दर्शन होते हैं, शायद ये इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं।

यहां मैं कल्याण में प्रकाशित लघुकथा का जिक्र कर रहा हूँ-

एक महिला बहुत भक्ति करती थी, लेकिन स्वभाव से बहुत अभिमानी, अहंकारी थी। परिवारजन, सगे'सम्बन्धी, अड़ौसी-पड़ौसी उसके रुखे और अहंकारी व्यवहार से बहुत दुःखी थे। एक दिन इस महिला ने एक संत से पूछा, 'मैं इतनी भक्ति करती हूँ लेकिन ईश्वर ने मुझे सपने में भी दर्शन नहीं दिये।' महिला की बात सुन कर संत हँसे। उन्होंने महिला से कहा, 'आज मैं भगवान से पूछूँगा कि वे तुम्हें दर्शन क्यों नहीं देते?'

दूसरे दिन संत ने महिला को बताया कि भगवान तुम्हारे आचरण एवं अहंकारपूर्ण व्यवहार से बहुत दुःखी हैं, नाराज हैं। इसलिये उनका मन तुमसे मिलने को नहीं करता। महिला सब कुछ समझ गई। उसके व्यवहार में परिवर्तन हुआ। उसका व्यवहार पूर्णतः अहंकाररहित हो गया। इस परिवर्तन को देख कर उसे सभी ने भरपूर प्यार दिया, आदर दिया। व्यवहार परिवर्तन से प्राप्त शांति ही उसके जीवन में प्रभु की उपस्थिति बन गयी। मंदिर में रोज 108 परिक्रमा, परिक्रमा करते समय अभद्रता, शोर मचा कर दूसरों को परेशान करना, जो भक्त शुद्ध अन्तःकरण से चुपचाप मन ही मन प्रभु नाम-स्मरण कर रहा है उसकी पूजा में व्यवधान डालना, अड़ौस-पड़ौस में रहने वालों को हो-हल्ला कर परेशान करना, वास्तव में निन्दनीय व्यवहार है। क्या इस तरह की महिलाएँ राधा या सीता हो सकती हैं? इन्हें तो हम लंकिनी या त्रिजटा राक्षसी भी नहीं कह सकते हैं। इन्हें शूर्पणखा कहें तो कैसा रहेगा? ये वास्तव में शूर्पणखा भी नहीं हैं। अल्पज्ञता के कारण इनका बर्ताव, व्यवहार और आचरण शूर्पणखा जैसा हो गया है। बुद्धिहीन लोग करते हैं ऐसा व्यवहार।

ढोल गंवार सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी''-तुलसीदास जी ने अपने ग्रंथ रामचरितमानस में ऐसा क्यों लिखा होगा? क्या यहाँ ताड़ना का अर्थ 'शिक्षा के अधिकारी' उचित है? मंदिर में आने वाली एवं प्रतिदिन 108 परिक्रमा करने वाली महिलाओं के व्यवहार को देख कर तो यही लगता है कि यहाँ ताड़ना का अर्थ 'शिक्षा के अधिकारी' न होकर मारना, डाँटना या प्रताड़ित करना ही होना चाहिये। कल्याण में प्रकाशित लघुकथा के अनुसार - गणेश और कार्तिकेय अपनी माता के साथ खेल रहे हैं। सभी देवता उन्हें निहार रहे हैं। बच्चों का खेल देख कर सभी प्रसन्न हैं। तभी देवताओं ने अमृत से निर्मित एक मोदक माता पार्वती को दिया। गणेश ने कहा, 'माँ मुझे लड्डू दो।' कार्तिकेय भी लड्डू के लिये जिद करने लगा। माता ने बड़े-प्रेम से अपने बच्चों को समझाया कि इस मोदक के दो हिस्से नहीं होंगे। मेरी और तुम्हारे पिता की यही इच्छा है कि तुम दोनों में जिसका धर्म सबसे बढ़ कर सिद्ध होगा उसे यह पूरा मोदक मिलेगा।

माता पार्वती की इच्छा को ध्यान में रखकर कार्तिकेय मोर पर बैठे और तीर्थयात्रा पर निकल गये। क्योंकि वे यही मानते हैं कि तीर्थ यात्रा से मिलने वाला धर्म सर्वश्रेष्ठ है।

गणेशजी का सोच कार्तिकेय से सर्वथा भिन्न था। उनका मानना था कि माता-पिता की परिक्रमा और पूजा करने से तीर्थयात्रा से अधिक फल मिलता है। गणेशजी उठे, माता-पिता की परिक्रमा की, चरणों में प्रणाम कर उनके सामने बैठ गये। माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, सबसे बड़ी तीर्थयात्रा है, गणेशजी अपनी तीर्थ यात्रा पूर्ण कर चुके हैं। कार्तिकेय भी सभी तीर्थों की यात्रा पूर्ण कर लौट आये। उन्होंने अपने माता-पिता से पूरा मोदक माँगा तो उन्होंने बड़े प्रेम से समझाया कि सभी तीर्थों में स्नान करने से, सभी देवताओं की पूजा करने से, सभी यज्ञों से और सभी तरह के व्रतों से बढ़कर माता-पिता की पूजा होती है। पुत्र के लिये तो माता- पिता की भक्ति यानी सेवा ही एक मात्र धर्म है। माता-पिता की सेवा करने वाले को बैकुण्ठलोक प्राप्त होता है।

यहाँ गणेशजी का धर्म सबसे बढ़ कर सिद्ध हुआ है, अतः मोदक गणेशजी को ही मिलेगा। माता-पिता की इसी पूजा (सेवा) के कारण ही गणेशजी सभी देवताओं में अग्रपूज्य हो गये। कहते हैं, पंडित, पुजारी व संत-महात्मा के सानिध्य में रहने वाले नर-नारी व बच्चों के व्यवहार में आश्चर्यजनक परिवर्तन आ जाता है, बच्चों की बुद्धि का विकास होता है, भक्तों के आचरण में सुधार आ जाता है। यह तभी सम्भव हो सकता है जब मंदिर का ब्राह्मण पुजारी निम्नलिखित लक्षणों से परिपूर्ण हो -

(1) शम (संयम, अनासक्ति, शांति, विषयहीनता)

(2) दम (अक्रोध)

(3) तप

(4) शौच (शुद्धता)

(5) संतोष

(6) क्षमा

(7) सरलता

(8) ज्ञान

(9) दया

(10) भगवत्परायणता और

(11) सत्य।

लेकिन यदि पंडित, पुजारी व संत माया का लोभी हो, जिसका उद्देश्य सिर्फ अर्थ अर्जित करना हो, जो अर्थ लाभ को सामने रख कर सबके गलत आचरण को सहन करता हो या फिर भक्तों को गलत आचरण करने के लिये प्रेरित करता हो, उन्हें बाध्य करता हो, ऐसा पंडित, पुजारी या संत स्वयं दोषी है भक्त नहीं। मंदिर में जाने वाली प्रत्येक महिला का व्यवहार सीता माता और राधा जैसा हो, शूर्पणखा जैसा नहीं। प्रत्येक पुरुष का व्यवहार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जैसा हो रावण जैसा नहीं। जो पंडित, पुजारी दूसरों की बात को समझने की चेष्टा ही नहीं करे, जिसके व्यवहार में नम्रता ही नहीं हो, वह शिक्षक कैसे बन सकता है। क्या ऐसा शिक्षक अपने भक्त को शांति का पाठ पढ़ा सकता है, विज्ञ बना सकता है, श्रेष्ठ बना सकता है? ऐसा पुजारी अपने जीवन में सिर्फ अर्थलाभ अर्जित करने के लिये भगवान की सेवा-पूजा करता है। सभ्य समाज का निर्माण उसका उद्देश्य नहीं हो सकता है। पूजा-पाठ के लिये शांत वातावरण चाहिये। आजकल किसी भी मंदिर में शांति नहीं है। भक्त नियमितरुप से मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करे, मंदिर में शांति को बनाये रखने का प्रयास करे। मंदिर जाने से पहले या मंदिर जाने के बाद घर के शांत वातावरण में पूजा-पाठ करे, हरि-नाम स्मरण करे। पूजा का अर्थ है पुकारना। अपने घर के पूजा स्थल में बैठ कर निराकाररुप प्रभु को साकाररुप में पुकारने व देखने का प्रयत्न करे।

क्या है कलयुग? धन-सम्पत्ति के लिये परिवारजन आपस में लड़ेंगे, भाई का भाई से बैर होगा, पड़ौसी आपस में एक दूसरे से ईर्ष्या करेंगे। अधिकतम स्त्री, पुरुष मर्यादा का उल्लंघन करेंगे, मांस- मदिरा का सेवन बढ़ेगा। चारों ओर चोरी-चकारी एवं हिंसा का वातावरण होगा। मनुष्य बुद्धिविकार, अल्पबुद्धि, अल्पज्ञता एवं अल्प आयु का शिकार होगा। यही है कलयुग। इस घोर कलयुग में जहाँ तक सम्भव हो प्रत्येक व्यक्ति को राग-द्वेष से ऊपर उठ कर सभी के प्रति समता का भाव बनाये रखने का प्रयास करना चाहिये और निरन्तर हरि-स्मरण करते रहना चाहिये। यदि आपका मन सुखी है तो धीरे-धीरे मधुरता के साथ हरि-स्मरण करें, राम-नाम का संकीर्तन करें। भगवान को साकाररुप में देखें, उसे निहारते रहें, उसके साथ नृत्य करें, खेलते रहें तो आपका जीवन हमेशा सुखमय और आनन्दमय बना रहेगा। ध्यान रहे, आपके संकीर्तन और नृत्य से दूसरों को परेशानी नहीं होनी चाहिये।

जिनका मन दुःखी है उन्हें निरन्तर राम-नाम का जप करना चाहिये। मन ही मन राम-नाम का जप करते रहने से सभी दुःखों का अन्त हो जाता है। यदि आपका मन शांत है तो ध्यान मग्न होकर राम-नाम का स्मरण करते रहें। राम-नाम तारक मंत्र है। इस भवसागर को पार करने के लिये सद्गुणों की खान मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के नाम का जप करो, उनके सद्गुणों को जीवन में उतारने का प्रयास करो। ऐसा करने से इस कलयुग में प्रभु की माया के कारण हो रहे सुख-दुःख, पाप-पुण्य, बंध-मोक्ष को सहजता से स्वीकार करने की शक्ति स्वतः ही आ जाती है। जीवन में किसी का अहित मच सोचो। इस संसार में दुष्ट प्रकृति के लोग भी भगवान के हैं, अधिक लाड़-प्यार पाकर बिगड़े हुए हैं। शिवजी कहते हैं - उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध।।

रा.च.मा. ७/११२(ख)

'हे उमा! जो श्रीराम जी के चरणों के प्रेमी हैं और काम, अभिमान, क्रोध से रहित हैं, वे जगत को अपने प्रभु से भरा हुआ देखते है, फिर वे किससे बैर करें।' निःस्वार्थ भाव से सबकी भरपूर सेवा करने वाला अपने को सेवक और जगत को प्रभु का स्वरूप मानता है। भगवान कहते हैं -

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।। रा.च.मा.4/3

'हे हनुमान! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर (जड़-चेतन) जगत् मेरे स्वामी भगवान का रूप है।' सेवा और प्रेम से ही इस जगत में प्रभु के दर्शन हो सकते हैं, यह बात मनन करने योग्य है।

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