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धर्म का मर्म समझें

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डॉ. दीपक आचार्य

 

हम सभी लोग अपने आपको धार्मिक कहलाना पसंद जरूर करते हैं, मगर अपनी आत्मा से ही कभी कभार पूछ लिया करें कि हम कितने धार्मिक हैं तो हमारी कलई अपने आप खुल जाएगी।

धर्म-कर्म के नाम पर हम जो कुछ करते हैं उसका अधिकांश हिस्सा भगवान को रिझाने या दिखाने के लिए कभी नहीं होता बल्कि लोक दिखाऊ संस्कृति का ही हिस्सा माना जा सकता है।

हम जो कुछ साधना और धर्म-ध्यान, भजन-पूजन आदि करते हैं वह सब कुछ देवी या देवता के लिए करते हैं मगर प्रायःतर देखा यह गया है कि हम लोगों को देख कर अपने हाथ-होंठ और जीभ चलाते हैं।

कोई हमें नहीं देख रहा हो तब हत कुछ भी नहीं करते या कि दूसरे-तीसरे विचारों में खोये रहते हैं अथवा अन्य कामों में मन लगाए रहते हैं।

धर्म को हमने उपासना पद्धति ही मान लिया है जबकि धर्म का संबंध जीवनचर्या के व्यापक अनुशासन और वैश्विक सोच की उदारता से भरा है।

धर्म हमें वसुधैव कुटुम्बकम्, मातृवत परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत, आत्मवत सर्वभूतेषु के सिद्धान्त को सिखाता है और वह भी केवल जिह्वा तक नहीं बल्कि हृदय के अन्तस्तल तक अपनी भावनाओं का ज्वार उमड़ाता है।

वेदव्यास ने केवल एक वाक्य में इसे स्पष्ट किया है - परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़िनम्। अर्थात परोपकार करना ही पुण्य है और दूसरों को किसी भी भांति सताना और दुःखी करना पाप है।

सच में देखा जाए तो धर्म समष्टि और व्यष्टि तक सभी के लिए धारण करने योग्य मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा का प्रतीक है।

कहा भी गया है कि जो धर्म को धारण करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।

कोई कितना ही साधन, भजन-पूजन, अनुष्ठान आदि कर ले, यज्ञ-यागादि, धार्मिक समारोहों आदि से लेकर मन्दिरों और मूर्तियों की प्रतिष्ठा में लाखों-करोड़ो रुपयों का दान कर दे, इसका कोई मूल्य नहीं है, यदि यह पैसा पवित्र नहीं है।

दुर्भाग्य से आजकल धर्म के नाम पर जो कुछ हो रहा है उसमें अधिकांश पैसा दूषित आ रहा है।

और बाबाओं ने भी धर्म के नाम पर गंदे और प्रदूषित पैसे को शुद्ध करने का ऎसा भ्रम बना रखा है कि धर्म और कालेधन, पापधन, दूषित धन सब कुछ एक दूसरे का पर्याय हो गया है।

हम सभी लोगों को भ्रम है कि कितनी ही काली कमायी कर लें, रिश्वतखोर बने रहें, भ्रष्टाचार से धन जमा करते रहें, उसका थोड़ा सा अंश धार्मिक कार्यक्रमों, मन्दिरों और पूजा-पाठ या बाबाओं के चरणों में समर्पित कर देने से उनके पाप  धुल जाएंगे और अनाचार, अनीति से धनार्जन का पाप समाप्त हो जाएगा।

यही वजह है कि देश में हर तरफ धर्म के नाम पर गतिविधियों की हमेशा धूम मची रहती है, हर दिन कोई न कोई आयोजन होता रहता है, इसके बावजूद न शांति स्थापित हो पा रही है, न संतोष।  प्राकृतिक, दैवीय और मानवीय आपदाओं का ग्राफ निरन्तर बढ़ता ही चला जा रहा है।

कहीं भूकंप आ रहे हैं, भूस्खलन हो रहा है, कही बाढ़ सूखा और दूसरी सारी समस्याएं बढ़ती ही चली जा रही हैं।

इन सभी का मूल कारण यही है कि धर्म के नाम पर जो कुछ हो रहा है उसमें शुचिता समाप्त हो रही है, प्रदूषित और पाप की कमायी लग रही है। जो कर रहे हैं वे भी, और जो करवा रहे हैं उनका भी धर्म से कोई वास्ता नहीं है बल्कि इन लोगों ने धर्म के नाम पर धंधा ही चला रखा है।

यही कारण है कि भगवान भी इन लोगों की उपेक्षा कर रहा है और हम सभी मूर्खों को भी उपेक्षित कर रखा है जिन्हें धर्म के मूल मर्म से कोई सरोकार नहीं है।

धर्म सदाचार, मानवीय मूल्यों, आदर्शाें और विश्व मंगल के लिए जीने का दूसरा नाम है।

असली धर्म वही है जिसे देख, सुन और अनुभव कर हर किसी को प्रसन्नता का अनुभव हो, चाहे वह मनुष्य और, दूसरे कोई से प्राणी या जड़-चेतन जगत ही क्यों न हो।

धर्म वह है जिसमें एक गरीब से गरीब इंसान को भी वह सब कुछ करने का अधिकार हो जो राजा या किसी समृद्ध व्यक्ति को हो।

धर्म वह छत है जिसके नीचे कोई भेदभाव नहीं है बल्कि पूरी सृष्टि का भरण-पोषण और रक्षण करता है।

जहाँ अद्वैत नहीं है, भेद दृष्टि है, दूरियां हैं, एक-दूसरे को मार-काट मचा कर अपनी ओर कर लेने का दुस्साहस भरा काम हो, संख्या बल अभिवृद्धि का ध्येय हो, वह धर्म नहीं है, इसे आसुरी कर्म से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता।

हम सभी को चाहिए कि धर्म के मूल मर्म को आत्मसात करें और मानवीय मूल्यों से भरे-पूरे उन विचारों और कर्मों को अपनाएं जहाँ हर कोई एक-दूसरे से प्रसन्नता का अनुभव करे, मनुष्य-मनुष्य और जगत के हर प्राणी के बीच प्रेम, सात्ति्वकता और पारस्परिक विकास की भावनाओं से भरा माहौल हो।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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