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अनन्त आलोक की ताज़ा ग़ज़लें

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बह्र ए हजज में तीन ग़ज़लें
मुफाईलुन    मुफाईलुन    मुफाईलुन    मुफाईलुन
1222             /1222   /         1222/          1222
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ग़ज़ल 1     काफिया : आत , रदीफ़ : होठों पर
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अनन्त आलोक
ख़ुशी की बात होठों  पर  ग़मों की रात  होठों  पर ,
चले आओ कि होने  दो  सनम बरसात  होठों  पर |
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बड़ा  जालिम  जमाना  है फँसा  देगा  सवालों   में ,
मैं आने  दे नहीं  सकता  तुम्हारी बात  होठों   पर |
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नज़र की बात नैनों से फिसल कर दिल में आ धमकी ,
हुई  जो  बात  नैनों  से   बनी   सौगात   होठों   पर |
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जुबां  को  लफ्ज देते हैं  ग़ज़ल  को भी  नजाकत  दी ,
अदम या  जानवर हो  तुम तुम्हारी  जात  होठों  पर |
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तेरा आलोक  आशिक है  ग़ज़ल  से  इश्क  फरमाए ,
कलम की नोक पर या फिर मेरी औकात होठों पर |
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अनन्त आलोक
साहित्यलोक , बायरी , डाकघर  ददाहू , सिरमौर , हिमाचल प्रदेश 173022
Email: anantalok1@gmail.com

 

 

ग़ज़ल 2  कफिया : आना ,  रदीफ़ : है                                                                                                     
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अनन्त आलोक
ये रिश्ते और ये शादी सभी केवल बहाना ….है ,
मुहब्बत वो तराना है जो सबको गुनगुनाना है |
**
चला है कौन सा नम्बर तुम्हारी आइडी है क्या ,
मुझे इतना बता देना तुम्हारा क्या ठिकाना ..है |
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रहो तुम दूर ही बेशक मगर तुम नेट पे   रहना ,
इसी पर बात करनी है इसी पर रूठ जाना… है |
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चली आना उसी पल नेट पे जब याद आये तो  ,
न मम्मी को खबर होगी न डेडी को बताना …है |
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यहीं दिल का मिलन होता यहीं दिल टूट कर बिखरे ,
न कोई जान पाता है समय कितना सयाना.. है |
**
हुआ आलोक आशिक ये सभी से इश्क फरमाए ,
यही दौलत कमाई है गले सब को लगाना ….है

अनन्त आलोक
साहित्यलोक , बायरी , डाकघर  ददाहू , सिरमौर , हिमाचल प्रदेश 173022
Email: anantalok1@gmail.com

 

ग़ज़ल 3   काफिया : ई  रदीफ़ : हाला                                                                           
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अनन्त आलोक
दीदारे यार आया था पिला दी हुस्न की... ..हाला ,
दस्त से गिर गई हाला लबों पे तिर गई.... हाला |
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कटोरे नैन भर पी ली है मदिरा प्रेम की... जिसने ,
चढ़ेगी क्या उसे फिर इस जहाँ की कोई भी .हाला |
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समंदर में तू उतरी पर समंदर को मिले .....मोती ,
नहाकर आ गई लेकिन समंदर कर गई .....हाला |
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पिलाने और पीने का चला है दौर सदियों...... से ,
कभी मीकी कभी तुलसी कभी मीरा ने पी ..हाला |
**
हुई जो शाम प्यासों का लगा जमघट तेरे दर ...पर ,
हुई है रात काली फिर से तन्हा हो रही .....हाला |
**
शराबी हो गया है ये तेरा आलोक बिन .......पीये ,
न तुम ने दी कभी हाला न मैंने पी कभी ...हाला |
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अनन्त आलोक
साहित्यलोक , बायरी , डाकघर  ददाहू , सिरमौर , हिमाचल प्रदेश 173022
Email: anantalok1@gmail.com

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