गढ़ी-चुनौटी का ठर्रा

SHARE:

गढ़ी -चुनौटी का ठर्रा रामनरेश 'उज्ज्वल' अगर ताड़ मगह का बीयर है, तो गढ़ी चुनौटी का ठर्रा है। फसल में यह अनवरत बहता रहता है, लोग चुल्लू...

गढ़ी-चुनौटी का ठर्रा

रामनरेश 'उज्ज्वल'

अगर ताड़ मगह का बीयर है, तो गढ़ी चुनौटी का ठर्रा है। फसल में यह अनवरत बहता रहता है, लोग चुल्लू लगाये जी-भर पीते हैं। यह तरावट भी देता है और सुरूर भी। जो सुकून यहाँ है, अन्यत्र कहीं नहीं। स्वर्ग धरती पर उतरता है ताड़ के सहारे धीरे-धीरे। मौसम खुशनुमा हो जाता है अपने आप। चेहरे पर मुस्कान छा जाती है, हृदय प्रफुल्लित हो जाता है। मादकता फैल जाती है हवाओं में चारों तरफ। मेहमानों का आगमन शुरू हो जाता है।

clip_image002

ताड़ी से भरी लबनी सबको अपनी ओर आकर्षित करने लगती है। जो नशा नहीं करते, वे भी ताड़ी को ताड़ के फल का जूस मानकर पीते हैं। वास्तव में ताड़ी ताड़ के फल का अर्क (रस) ही है, जो बूँद-बूँद टपक कर लबनी में एकत्र होती है।

ताड़ को गढ़ी-चुनौटी का ठर्रा इसलिए कहा, क्योंकि लोग यहाँ ताड़ी को ठर्रे की तरह पीते हैं और मस्ती में झूमते रहते हैं। गढ़ी-चुनौटी लखनऊ में ताड़ी के लिए सबसे ज्यादा मशहूर गाँव है । इसे ताड़ी का गढ़ कहा जाता है। इस गाँव के चारों तरफ हजारों ताड़ के वृक्ष हैं, जो किसान के खेत की मेड़ पर सिर उठाये गर्व से खड़े हैं। गाँव के चारों ओर सीनरी जैसा दृश्य नजर आता है। इस गाँव के आस-पास का पूरा क्षेत्र ताड़ के वृक्षों से भरा हुआ है।

गढ़ी-चुनौटी गाँव चारबाग रेलवे-स्टेशन से लगभग बीस किलोमीटर दूर बंथरा क्षेत्र में स्थित है। बंथरा के महावीर मंदिर के सामने से दांई ओर तीन किलोमीटर दूर सड़क पर यह गाँव स्थित है।

महावीर मंदिर से चलते समय रास्ते में रामचौरा नाम का गाँव पड़ता है। कहते हैं, वनवास जाते समय भगवान श्रीराम ने यहाँ पर कुछ समय विश्राम किया था, तभी से इस गाँव का नाम 'रामचौरा' पड़ गया। इस गाँव से ही ताड़ के वृक्षों का सुन्दर नजारा नजर आने लगता है। ताड़ी के सीजन में इस सड़क पर ज्यादातर लोग ताड़ी के नशे में झूमते हुए मिलते हैं।

गढ़ी-चुनौटी एवं आस-पास हर गाँव के प्रत्येक घर में ताड़ी की लबनी अवश्य मिलेगी।

ताड़ी की फसल का समय आते-आते गाँव के लोगों की खेती-बारी के काम भी लगभग समाप्त हो जाते हैं। इस समय किसान फुर्सत में रहते हैं। गाँवों में इसे बैठा-बैठी का समय कहा जाता है। इस समय बाग-बगीचों, खेत-खलिहानों और ताड़ के वृक्षों के इर्द-गिर्द तड़ियल यानी ताड़ी पीने वाले लोगों का मजमा लखनऊ के हर उस गाँव में लगता है, जहाँ थोड़ी-बहुत ताड़ी होती है।

लखनऊ में ताड़ी के लिए गढ़ी-चुनौटी, पहाड़पुर, रामचौरा, औरावां, अन्दपुर, दादूपुर, बांदेपुर, पछेला, खुरूमपुर, ईंटगांव, बिजनौर, काकोरी, सदरौना एवं मलिहाबाद आदि क्षेत्र विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

मानसून के आने तक किसान के पास खेती-बारी का कोई विशेष कार्य नहीं रहता, अतः वे ताड़ के कार्य में व्यस्त हो जाते हैं। इस समय ताड़ के वृक्ष घौद से लड़ने लगते हैं। बलिहा और घौदहा दोनों तरह के ताड़ के पेड़ों पर लबनी टँग जाती है और कारीगर रोज सुबह-शाम ताड़ उतारने का काम शुरू कर देते हैं। जानकार लोग कहते हैं कि मौसम में जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वैसे-वैसे ताड़ी की मात्रा के साथ-साथ मादकता भी बढ़ती जाती है।

clip_image004

गढ़ी-चुनौटी में ताड़ी बनाने का काम अप्रैल माह से शुरू हो जाता है। 25 अप्रैल को यहाँ बिहार से ताड़ी बनाने (उतारने) वाले कारीगर आ जाते हैं। इन कारीगरों को ठेकेदार द्वारा बुलाया जाता है। ठेकेदार यहाँ के किसानों से ताड़ के वृक्ष सीजन भर के लिए खरीद लेते हैं और बदले में उन्हें एक वृक्ष का सौ-डेढ़ सौ रूपये मूल्य देते हैं। किसान कहते हैं कि ताड़ के वृक्षों से कोई विशेष आर्थिक लाभ तो नहीं होता, किन्तु सीजन भर शुद्ध ताड़ी रोज पीने के लिए मिल जाती है। फिर इन ताड़ के वृक्षों से खेत की शोभा बनी रहती है। पेड़ ऊँचे होते हैं, इनकी छाया भी खेत पर नहीं पड़ती। अतः फसल पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। हर तरह की खेती-बारी आसानी से हो जाती है और सीजन में दो-चार पैसे भी ठेकेदार से मिल जाते हैं। हम तो यही मानते हैं कि भागे भूत की लंगोटी भली।

clip_image006

ठेकेदार का काम देखने वाले चन्दू के अनुसार एक पेड़ के वृक्ष से एक दिन में दो सौ से एक हजार रूपये तक की ताड़ी उतरती है। एक कारीगर एक दिन में लगभग 60 लीटर ताड़ी उतारता है।

ठेकेदार कहते हैं कि ताड़ी के लिए आबकारी विभाग से लाइसेन्स बनवाना पड़ता है, जिसमें काफी खर्च लगता है। इसके अलावा कारीगर और मुंशी को भी पारिश्रमिक देना पड़ता है।

शुरूआत के चार-पाँच दिन तक ताड़ के वृक्ष से कच्ची ताड़ी उतरती है, इस ताड़ी को लोग पीते नहीं हैं, किन्तु जानकारों के अनुसार इस ताड़ी का प्रयोग लोग पेट साफ करने के लिए करते हैं । चार-पाँच दिन बाद जब पक्की ताड़ी उतरती है, तो इसका सेवन सभी लोग करते हैं। ताड़ी के सीजन में गाँव में चहल-पहल बढ़ जाती है। दूर-दराज से लोग ताड़ी की लालच में यहाँ चले आते हैं। ठेकेदार भी यहाँ की ताड़ी बिक्री के लिए वाहन द्वारा सूदूर क्षेत्रों में भेजते हैं, जिससे वाहनों का आवागमन बढ़ जाता है। सड़क किनारे लबनी रखकर ताड़ी बेचने वालों का मजमा भी खूब लगा रहता है। ज्यादातर राहगीर लबनी देखकर रूक जाते हैं और ताड़ी पीकर ही आगे बढ़ते हैं।

गढ़ी-चुनौटी में ताड़ वृक्ष का पहला बीज कब उगा, इसका अनुमान यहाँ के बुजुर्ग भी नहीं लगा पाते हैं, किन्तु ताड़ वृक्ष यहाँ कैसे पनपा इसकी एक किंबदन्ती सभी सुनाते हैं- कहते हैं, हमारे पूर्वज खेती बारी का काम निपटाकर बहुत समय पहले बिहार में 'गया' गए थे। उस समय ताड़ी का सीजन था। गर्मी बहुत थी। उन्होंने गर्मी को दूर करने के लिए लिमका की तरह ताड़ी छक कर पी। ताड़ी उन्हें बहुत पसन्द आई। वे वहीं रूक गए और फसल भर खूब ताड़ी पी। ताड़ी का स्वाद और उसके गुण उन्हें बहुत पसन्द आये। वे उसे अपने घर लाने के विषय में विचार करने लगे। ताड़ के वृक्ष को उखाड़ कर तो लाया जा नहीं सकता था, इसलिए वे ताड़ के फल के पकने का इंतजार करने लगे। समय आने पर जब ताड़ के फल पक-पक कर गिरने लगे, तब हमारे पूर्वज अधिक मात्रा में ताड़ के फल एकत्र करके यहाँ ले आए और उन फलों को अपने खेतों के चारों तरफ गाड़ दिए। फिर काफी समय बाद उन फलों से अंकुर फूटे और धीरे-धीरे ताड़ के हरे-भरे वृक्ष तैयार होकर आस-पास के क्षेत्रों में भी फैल गए।

clip_image008

ताड़ के वृक्ष 25-30 वषरें में तैयार होते हैं। ये खजूर के व़ृक्ष की तरह एक शाखा के बीस-तीस फुट के लम्बे वृक्ष होते हैं। ताड़ के वृक्षों की लम्बाई हर वर्ष बढ़ती जाती है।

ताड़ के विषय में गढ़ी-चुनौटी निवासी सम्पत पाल कहते हैं कि ताड़ी ताड़ के फल का रस है, पहले इसमें नशा नहीं होता था, नशा इसमें कैसे आया? इस विषय में वे एक कहानी सुनाते हैं- सतयुग में सुग्रीव और बालि के राज्य पम्पापुर में एक सर्प के ऊपर सात ताड़ के वृक्ष उगे थे। इन सात पेड़ों को एक बाण से एक साथ काटने वाला ही बालि को मार सकता था। बालि को मारने के पहले इन्हीं सात ताड़ के वृक्षों को एक बाण से काटने के लिए सुग्रीव राम को अपने साथ ले गए थे। किन्तु सर्प कुण्डली मारकर बैठा था, इसलिए ताड़ के वृक्ष गोलाई में थे। ऐसी स्थिति में सातों वृक्षों को एक तीर से काट पाना नामुमकिन था। अतः लक्ष्मण ने जाकर सर्प को अँगूठे से दबाया, जिसके कारण सर्प कुलबुलाकर सीधा हो गया। उसके सीधे होते ही राम ने सातों पेड़ों को एक बाण से काट दिया। कहते हैं ताड़ के वृक्षों पर उसी सर्प के विष का असर है, जो आज तक कायम है। सम्पत पाल के अनुसार पम्पापुर से ही ताड़ के वृक्ष दुनिया के अन्य राज्यों तक पहुँचे हैं।

ताड़ के वृक्षों का प्रयोग ग्रामवासी भिन्न-भिन्न कार्यों के लिए करते हैं। ताड़ के वृक्ष की लकड़ी से चारपाई की पाटी-पावे बनाते हैं। कोठरी में धन्नी के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी लकड़ी शीशम और सागौन से भी ज्यादा मजबूत होती है।

ताड़ से ताड़ी उतारने का कार्य कुशल कारीगरों द्वारा किया जाता है। ताड़ी उतारने को ही गाँव वाले ताड़ी बनाना कहते हैं। कारीगर ताड़ वृक्ष पर चढ़ने के लिए रस्सी के मजबूत फंदे का इस्तेमाल करते हैं। कारीगर वृक्ष पर चढ़ते समय फंदगी को पैर में फंसा लेता है। इससे उसके पैर फँस जाते हैं। कारीगर की कमर में एक पतली मजबूत रस्सी बँधी रहती है। इसी से वह अपने शरीर को ताड़ के वृक्ष में लपेटे रहता है।

कमर में बँधे रस्से पर वह तिरछा लटका रहता है और जेर्क से पेड़ पर ऊपर चढ़ता है। कमर में जो बेल्ट की तरह बारीक रस्सी बँधी होती है, उसके पीछे एक या दो लोहे के हुक होते हैं। हुक को अन्कुसी कहा जाता है। इस हुक में ताड़ के पेड़ पर से ताड़ी उतारने के लिए लबनी लटका कर ही कारीगर ताड़ी के पेड़ पर चढ़ता है और हँसुली (फल काटने का औजार, यहाँ इसे हंसिया या चाकू कहते हैं) से फल को छेकर (हल्का काटकर) उसके नीचे लबनी लटकाता है, जिसमें फल का रस चूता है, इस रस को ताड़ी कहते हैं। बलिहा ताड़ में कारीगर बाली को हल्का सा काटकर लबनी में घुसेड़ कर टाँग देता है। इसमें कटी हुई बाली से रस टपकता है, इसे बलिहा ताड़ी कहते हैं। यह ताड़ी अत्यन्त उत्तम होती है। वृक्ष पर टँगी लबनी में एकत्र ताड़ी को कारीगर अपनी लबनी में भरकर नीचे सरक-सरक कर जैसे चढ़ता है, वैसे ही उतर आता है।

ताड़ दो प्रकार के होते हैं- नर ताड़ एवं मादा ताड़। नर वृक्ष में रोयेंदार फूल होते हैं, इसे बलूरी, बल्तार, फुल्तार, फुल्दों या बलिहा कहते हैं। मादा वृक्ष में फल लगते हैं, इसलिए इसे फलतार या फल्ला कहते हैं।

ताड़ के नये और अपरिपक्व पौधे को खँगरा कहा जाता है। बसन्त ऋतु में ताड़ी देने वाले पेड़ को जेठुआ कहते हैं। घौदहा पेड़ साल में बारहों मास ताड़ी देता है। धौर ताड़ बरसात में ताड़ी देता है।

ताड़ी की फसल पर बाग-बगीचे पिकनिक स्पॉट या पार्कों में तब्दील हो जाते हैं। लोगों का हुजूम हर तरफ उमड़ता नजर आता है। क्या गरीब, क्या अमीर, क्या उच्चवर्ग, क्या निम्नवर्ग, सब एक रंग में रंग जाते हैं। इस समय सब मस्ती में चूर आपसी भेद-भावों और कलह को भूल जाते हैं। ताड़ के वृक्षों के नीचे जमावड़ा लगाकर लोग आपस में विचार-विमर्श करते हैं। मनोरंजन के भी दौर चलते हैं। राजनीति की बातें होती हैं। किस्से कहानियाँ सुने सुनाए जाते हैं। छोटी-छोटी बातों की लम्बी-लम्बी व्याख्याएँ की जाती हैं। देवी देवताओं की ऐसी-ऐसी बातें निकल कर आती हैं, जो वास्तव में अद्भुत और सच्ची होती हैं, पुराने जमाने की नए जमाने से तुलना की जाती है।

ताड़ के सीजन में किसानों के घर पर नाते-रिश्तेदार की भीड़ लगी रहती है। दूर के रिश्तेदार भी नजदीक का रिश्ता ढूँढ कर कई दिनों तक रूकते हैं। यहाँ की औरतें बहुत मेहनती होती हैं। वे खाना बनाते-बनाते परेशान तो जरूर होती हैं, पर उनके माथे पर परेशानी की एक भी लकीर नजर नहीं आती। किसान के घरों में खाने की अक्सर कमी हो जाती है, क्योंकि कोई न कोई रिश्तेदार बढ़ता रहता है। खाना कम पड़ने पर बिना खीझे यहाँ की औरतें झट खाना दोबारा बनाती हैं, सब्जी-तरकारी न होने पर चटनी रोटी से भी काम चलाती हैं। रिश्तेदार भी मस्त रहते हैं। उन्हें खाना मिले न मिले, बस ताड़ी मिल जाए, खाना तो अपने घर पर रोज ही खाते हैं। यहाँ के लोग फसल भर ताड़ी से ही मेहमानों का स्वागत करते हैं और मेहमान इसी स्वागत से निहाल हो जाते हैं। जिन किसानों के पास अपने पेड़ नहीं होते, वे नाते-रिश्तेदारों के लिए एक-दो वृक्ष खरीद कर कारीगर से ताड़ी बनवाते (उतरवाते) हैं।

ताड़ी में सुक्रोस (ैन्ब्त्व्ैम्) होता है, जो शरीर के लिए फायदेमंद होता है। ग्रामवासी इसे ग्लूकोज कहते हैं। इसमें 'फरमनटेशन' भी होता है, इसी की वजह से नशा चढ़ता है। लीवर (यकृत) के मरीजों के लिए सुबह की ताड़ी अत्यन्त लाभकारी होती है।

ताड़ी सुबह-दोपहर, शाम तीनों समय उतरती है किन्तु अर्धरात्रि की ताड़ी ही सबसे ज्यादा स्वादिष्ट होती है। इस ताड़ी का यदि सूर्य निकलने से पूर्व ही सेवन किया जाए तो इसका स्वाद अलग रहेगा। दोपहर की ताड़ी अधिक नशीली और खट्टी होती है। लोग कहते हैं कि ताड़ी पीने से सेहत बनती है। यदि सुबह शाम ताड़ी सही मात्रा में पी जाये तो शरीर के लिए फायदेमंद होती है और अगर जरूरत से अधिक पी जाए तो शरीर को नुकसान पहुंचाती है।

यहाँ ताड़ के फल को बलगुद्दा कहते हैं। ये बलगुद्दे जब पक कर जमीन पर गिर जाते हैं तो बच्चे उसके ऊपर के छिलके को हटाकर उसके गूदे को मजे से खाते हैं। गूदा खाने के बाद नारियल बचता है। यह बहुत कड़ा होता है, यह बड़ी मुश्किल से कटता है। इसके भीतर का सफेद गूदा भी काफी कड़ा होता है, इसे लोग कम पसन्द करते हैं।

clip_image010

बलगुद्दे का गूदा खाकर बच्चे नारियल खेत में फेंक देते हैं। कुछ समय बाद उसमें अंकुर फूटता है। अंकुरित फल को बच्चे घर लाकर उसे काटते हैं, अब वही कड़ा और सफेद नारियल मीठे 'कोये' में तब्दील हो जाता है। यह 'कोया' मीठा एवं खोये की तरह स्वादिष्ट होता है।

यहाँ के लगभग सभी लोग बची खुची ताड़ी को सिरका बनाने के लिए रख देते हैं। लगभग एक माह में सिरका उठ जाता है। यह सिरका पेट के मरीजों के लिए रामबाण दवा है, किन्तु अधिक मात्रा में इसका सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह बहुत तेज होता है। इसे चटनी, दाल, सब्जी आदि में डालकर खाना चाहिए, इससे गैस की बीमारी एकदम ठीक हो जाती है और खाने का स्वाद भी बढ़ जाता है।

''''''''

जीवन-वृत्त

clip_image012

नाम : राम नरेश 'उज्ज्वल'

पिता का नाम : श्री राम नरायन

विधा : कहानी, कविता, व्यंग्य, लेख, समीक्षा आदि

अनुभव : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग पाँच सौ

रचनाओं का प्रकाशन

प्रकाशित पुस्तके : 1-'चोट्टा'(राज्य संसाधन केन्द्र,उ0प्र0

द्वारा पुरस्कृत)

2-'अपाहिज़'(भारत सरकार द्वारा राश्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत)

3-'घुँघरू बोला'(राज्य संसाधन केन्द्र,उ0प्र0 द्वारा पुरस्कृत)

4-'लम्बरदार'

5-'ठिगनू की मूँछ'

6- 'बिरजू की मुस्कान'

7-'बिश्वास के बंधन'

8- 'जनसंख्या एवं पर्यावरण'

सम्प्रति : 'पैदावार' मासिक में उप सम्पादक के पद पर कार्यरत

सम्पर्क : उज्ज्वल सदन, मुंशी खेड़ा, पो0- अमौसी हवाई अड्डा, लखनऊ-226009

मोबाइल : 09616586495

ई-मेल : ujjwal226009@gmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: गढ़ी-चुनौटी का ठर्रा
गढ़ी-चुनौटी का ठर्रा
http://lh3.googleusercontent.com/-D7doOhzhTqE/VbIfadEEttI/AAAAAAAAlTI/VKXTQoU01EA/clip_image002%25255B3%25255D.png?imgmax=800
http://lh3.googleusercontent.com/-D7doOhzhTqE/VbIfadEEttI/AAAAAAAAlTI/VKXTQoU01EA/s72-c/clip_image002%25255B3%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2015/07/blog-post_619.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2015/07/blog-post_619.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content