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ई-बुक : प्राची, जुलाई 2015 - रीतिकालीन साहित्य के संदर्भ में आचार्य विश्वनाथ प्रसाद की आलोचना दृष्टि

 

रीतिकालीन साहित्य के संदर्भ में आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र की आलोचना-दृष्टि

श्वेता पपरेजा

 

हिन्दी आलोचना के इतिहास या विकास को दर्शाने वाली पुसतकों में आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के आलोचक रूप के लिए मुख्य रूप से शुक्लानुवर्ती आलोचक या शुक्ल परंपरा के आलोचक शब्द को प्रयोग किया जाता है. विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी पुस्तक ‘हिन्दी आलोचना’ में ‘शुक्लानुवर्ती आलोचक’ शीर्षक अध्याय में आचार्य शुक्ल की आलोचना की दो विशिष्ट बातों का उल्लेख करते हैं.

1. शुक्ल जी साहित्य की समीक्षा सहृदयतापूर्वक करते हैं और कोई पंक्ति उन्हें क्यों अच्छी लग रही है, यह बताते समय उस परिस्थिति की व्याख्या करते हैं, जो पंक्ति के द्वारा संकेतित होती है.

2. वे परिस्थिति और भाव का संबंध जोड़कर उनकी व्याख्या करते हैं और अपनी व्याख्या के संदर्भ में काव्यशास्त्रीय विवेचना करते हैं. (हिन्दी आलोचना, विश्वनाथ त्रिपाठी, पृ.104)

इसके आगे त्रिपाठी जी लिखते हैं- ‘‘यहां उन आलोचकों की चर्चा की जा रही है, जिनकी आलोचनात्मक कृतियों में आचार्य शुक्ल की ये विशेषताएं परिलक्षित होती हैं. ऐसे आलोचकों में पं कृष्णशंकर शुक्ल और पं विश्वनाथ प्रसाद मिश्र प्रमुख हैं.’’ (हिन्दी आलोचना, विश्वनाथ त्रिपाठी, पृ 104) आचार्य शुक्ल बड़े आलोचक हैं. उनकी आलोचना दृष्टि से उनके समकालीन और परवर्ती आलोचक प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते. अब प्रश्न यह उठता है कि शुक्लानुवर्ती आलोचकों में केवल पं. कृष्णशंकर शुक्ल और मिश्र जी जैसे आलोचकों को ही क्यों शामिल किया जाये? इसका तर्क देते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी लिखते हैं-‘‘शुक्लानुवर्ती आलोचक पं रामचन्द्र शुक्ल की परंपरा का विकास नहीं करते, इनकी समीक्षा उन्हीं के आलोचक व्यक्तित्व में हो जाती है. इन्हें शुक्लानुवर्ती इसी बात को ध्यान में रखकर कहा गया है.’’ (हिन्दी आलेाचना, विश्वनाथ त्रिपाठी, पृ. 105)

सन् 1936 में हिन्दी से एम. ए. करने के क्रम में मिश्र जी ने बिहारी पर अपना शोध-प्रबंध प्रस्तुत किया था. यही

शोध-प्रबंध ‘बिहारी की वाग्विभूति’ नाम से पुस्तक के रूप में सामने आया. रीतिकालीन कविता पर केन्द्रित मिश्र जी की यह पहली पुस्तक है. मिश्र जी ऐसे अकेले लेखक हैं, जिन्होंने ‘रीतिकाल’ के अनेक कवियों पर पहली बार विस्तारपूर्वक विचार किया. अपनी पुस्तक ‘वाङ्मय विमर्श’ में मिश्र जी ने रीतिकाल के एक ऐतिहासिक पक्ष पर गंभीरता से विचार किया है. इनकी पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य का अतीत-भाग 2: श्रृंगारकाल’ रीतिकाल को समझने के लिए अनिवार्य पाठ्यपुस्तक का दर्जा प्राप्त कर चुकी है. यह पुस्तक 1960 ई. में प्रकाशित हुई थी. इसे रीतिकाल पर मिश्र जी की प्रतिनिधि पुस्तक कहा जा सकता है. मिश्र जी की यह रचना रीतिकाल के विवेचन-विश्लेषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. इस ग्रंथ में रीतिकाल के संबंध में कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार किया गया है. अब हम इन्हीं बिन्दुओं के आधार पर मिश्र जी के रीतिकालीन साहित्य

संबंधी विचारों पर चर्चा करेंगे.

नामकरण

हिन्दी साहित्य में विक्रमी संवत 1700-1900 तक के काल को शुक्ल जी ने ‘रीतिकाल’ कहा गया है. वैसे आचार्य शुक्ल से पहले जार्ज ग्रियर्सन अपनी पुस्तक ‘द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान’ में ‘रीतिकाव्य’ शब्द को प्रयोग कर चुके थे. संस्कृत काव्यशास्त्र में तो बहुत पहले ‘रीति संप्रदाय’ नाम प्रसिद्ध हो चुका था, जिसमें ‘रीतिरात्मा काव्यस्य’ की बात कही गयी थी, परंतु हिन्दी के रीतिकालीन आचार्यों और कवियों ने ‘रीति’ शब्द का व्यवहार परंपरा के रूप में ही किया था. रीति का अर्थ है ‘विशिष्ट पद रचना’. रीतिकालीन कवियों के लिए रीति का अर्थ ‘काव्य रचना पद्धति’ ही है. ‘रीतिकाल’ नामकरण करते हुए आचार्य शुक्ल के मन में लक्षण-उदाहरण की परिपाटी में रचित काव्य ही था. हिंदी कविता के लिए लक्षण और उदाहरण की परिपाटी में काव्य-रचना प्रस्तुत करना बिल्कुल नई बात थी. भक्तिकालीन कविता से इस नई प्रवृत्ति को अलगाने के लिए ही आचार्य शुक्ल ने रीतिकाल नाम दिया.आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र इस कालखंड को ‘श्रृंगारकाल’ नाम देने के पक्ष में हैं. उनकी मान्यता है कि इस काल के कवियों की रुचि विशेष रूप से श्रृंगार काव्य लिखने की ही थी. अतः रीति नाम देने से इस मुख्य प्रवृत्ति की महत्ता ज्ञात नहीं होती, इसलिए इसे श्रृंगारकाल ही कहा जाना चाहिए. आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास में मिश्र जी से पहले इस बात का जिक्र कर दिया था कि ‘‘वास्तव में श्रृंगार और वीर इन्हीं दो रसों की कविता इस काल में हुई. प्रधानता श्रृंगार की ही रही. इससे इस काल को रस के विचार से कोई श्रृंगारकाल कहे तो कह सकता है’’ (हिन्दी साहित्य का इतिहास, आ. रामचंद्र शुक्ल, पृ. 171) मिश्र जी ने स्वयं यह कहकर स्थिति स्पष्ट कर दी है कि श्रृंगारकाल की सीमा के भीतर श्रृंगार के अतिरिक्त वीर रस और भक्ति रस की रचना बराबर होती रही. पर वीर रस की रचना थोड़ी है और जिन्होंने वीर रस की रचना की वे श्रृंगार की रचना से विरत नहीं थे. उस युग की भक्ति की रचनाओं में भी मिश्र जी श्रृंगार का आधिक्य मानते हैं. उनका विचार है कि उस युग में श्रृंगार ही श्रृंगार दिखाई देता है. इसीलिए उसे रीतिकाल मानने वाले विद्वान भी रस दृष्टि से ‘श्रृंगारकाल’ कहना उचित समझते हैं.

मिश्र जी के अनुसार कृति, विषय और पद्धति को दृष्टि में रखते हुए विभाजन तथा नामकरण होता है. आदिकाल की अधिकतर रचनाओं का नाम रासो है इसलिए कुछ लोग उसे ‘रासो काल’ कहना ही ठीक समझते हैं. कभी-कभी कोई विशिष्ट पद्धति भी नामकरण का आधार बनती है जैसे हिन्दी का आधुनिक काल गद्यकाल कहलाता है. मिश्र जी मानते हैं कि यदि रीतिकाल के समस्त ग्रन्थों की छानबीन की जाये तो किसी न किसी रूप या परिमाण में श्रृंगार अवश्य मिल जाता है. अन्य रसों को वर्णन करने वाले भी श्रृंगार का वर्णन अवश्य करते थे. वे कहते हैं कि रीति के अधिकांश ग्रंथ तो श्रृंगार-प्रधान हैं ही और ग्रंथ भी श्रृंगार-संवलित हैं. मिश्र जी ने ‘रीतिकाल’ तथा ‘अलंकृतकाल’ में अव्याप्ति दोष मानते हुए ‘श्रृंगारकाल’ नाम को युक्ति-मुक्त माना.

काल-सीमा तथा विभाजन

मिश्र जी आलोच्य काल का आरंभ संवत 1600 के आस पास मानते हैं. वे संवत 1600 से 1700 तक श्रृंगार का प्रस्तावना काल अथवा उपक्रम काल मानते हैं तथा 1900 से 1975 तक अवसानकाल अथवा उपसंहार काल. वे काल सीमा के प्रश्न को निश्चित सन् अथवा संवत से मानने के पक्ष में नहीं हैं. वे मानते हैं कि कोई भी प्रवृत्ति एकाएक आरंभ या समाप्त नहीं होती. उसका प्रारम्भ या समापन धीरे-धीरे होते हैं. आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र श्रृंगारकाल का विभाजन इस प्रकार करते हैं. उन्होंने श्रृंगारकाल को दो भागों में विभाजित किया- रीतिबद्ध काव्यधारा तथा रीतिमुक्त या स्वच्छंद

काव्यधारा. रीतिमुक्त काव्यधारा का पुनः दो भागों में वर्गीकरण किया. एक को लक्षणबद्ध काव्य नाम दिया तथा दूसरे को लक्ष्यमात्र कहा. रीतिमुक्त काव्य को रहस्योन्मुख काव्य तथा शुद्ध प्रेमकाव्य में विभाजित किया.

रीतिबद्ध काव्य

लक्षण युक्त काव्य रीतिबद्ध काव्य कहलाता है. रीतिबद्ध काव्यधारा की मुख्य प्रवृत्ति है- लक्षण ग्रन्थों का प्रणयन, जिनमें विविध काव्यांगों का विवेचन किया गया है. मिश्र जी रीतिकाव्य में रीति विवेचन की दो पद्धतियां मानते हैं. पहली में काव्य के एक या दो अंगों का संक्षेप में दोहे आदि में विवेचन होता है और दूसरी में उदाहरण दिये जाते हैं, जिसके लिए कवित्त, सवैया छंद का प्रयोग होता है. मिश्र जी का मानना है कि हिन्दी के मध्यकालीन लक्षण ग्रंथ शास्त्र चिंतन के लिए नहीं बने. हिन्दी में कवि स्वयं अपने उदाहरण देते थे. इस प्रकार लक्षण ग्रंथ लक्ष्य बनाने के लिए सहारे का काम करते थे. मिश्र जी के अनुसार हिन्दी में नायिका-भेद के क्षेत्र में भी कोई उद्भावना नहीं हुई. हां, भिखारीदास को अवश्य वे कुछ नया कहने वाला मानते हैं.

रीतिबद्ध काव्य के विषय में मिश्र जी का कथन है कि ‘‘रीतिबद्ध काव्य हिन्दी को श्रृंगार की उक्तियों का जैसा भारी भंडार सौंप गया है उसमें कूड़ा-करकट या केवल अशिष्ट या अश्लील वर्णन ही नहीं हैं उसमें श्रृंगार की प्रभूत परिमाण में इतनी अच्छी-अच्छी उक्तियां भी संचित हैं जितनी संस्कृत क्या किसी भी साहित्य में उपलब्ध नहीं हो सकती. इसे इसकी कड़ी से कड़ी आलोचना करने वाले महानुभावों ने भी स्वीकार किया है.’’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ.6) रीतिकाव्य की प्रवृत्ति दरबारी थी. दरबारी कवियों ने आश्रयदाताओं की प्रशंसा में कई अतिशयोक्तिपूर्ण बातें भी लिखीं, जिससे रीति साहित्य चमत्कार और अतिशयोक्ति आदि के दलदल में धंस गया. आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के अनुसार रीतिशास्त्र का सम्यक प्रवर्तन केशवदास द्वारा हुआ. वे केशवदास का महत्व बताते हुए कहते हैं. ‘‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें हृदयहीन क्या लिख दिया, वे बेचारे रसिकों, सहृदयों, कवियों सबकी मंडली से खारिज किए जाने लगे... प्रकृति के प्रति उनके हृदय में वह राग नहीं था जो होना कवि के लिए अपेक्षित है. पर यह तो हिन्दी के सभी कवियों के लिए है. केवल केशव ही प्रकृति से उदासीन नहीं, सारा मध्यकालीन काव्य उदासीन है.’’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ 71) रीतिबद्ध काव्य करने वालों में मतिराम को मिश्र जी विलक्षण कवि मानते हैं. इसी के साथ उन्होंने देव, भिखारीदास, पद्माकर आदि के आचार्यत्व विवेचन आदि का भी वर्णन किया है.

रीतिसिद्ध काव्य

इस धारा के कवियों ने काव्यशास्त्र सिद्धान्त या लक्षण प्रस्तुत नहीं किए हैं, केवल कविताएं लिखीं हैं. ये कवितायें काव्यशास्त्र के लखणों को ध्यान में रखकर ही लिखी गईं हैं. रीतिसिद्ध कवियों के विषय में मिश्र जी का विचार हे कि ऐसे कवि लक्षण ग्रंथ लिखने वाले रीतिबद्ध कवियों की भांति रीति की शास्त्रकथित बातों का पूरापालन नहीं करते थे. कहीं तो ये चमत्कारातिशय के लिए उक्तियां बांधते थे और कहीं रसाभिव्यक्ति के लिए रीतिशास्त्रों की सामग्री का त्याग करके अपने अनुभव से प्राप्त सामग्री का समावेश करते थे. मिश्र जी ने रीतिसिद्ध कवियों के अंतर्गत उन कवियों का वर्णन किया है, जिन्होंने रीति की सारी परंपरा सिद्ध कर ली थी. इन कवियों ने लक्षण ग्रंथ प्रस्तुत न करके स्वतंत्र रूप से अपनी रचनाएं रची हैं. इनकी रचनाएं रीति की परिपाटी के अनुकूल ही हैं. मिश्र जी रीतिसिद्ध कवियों को मध्यमार्गी कवि कहते हैं क्योंकि ये कवि रीति से बंधे भी थे और उससे कुछ स्वच्छंद होकर भी चलते थे. मिश्र जी बिहारी को रीतिसिद्ध कवियों में मानते हैं क्योंकि उनके अनुसार बिहारी रीति से बंधकर भी स्वतंत्र हैं. मिश्र जी का कहना है कि यदि बिहारी को शुद्ध रीतिबद्ध कवियों के बीच बैठाया जाये तो वे अपनी विशेषता के कारण अलग से चमकते रहेंगे.

आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने रीतिसिद्ध काव्य का अलग से विभाजन नहीं किया बल्कि रीतिबद्ध काव्य की चर्चा करते हुए उन्होंने उपविभाजन किया और बिहारी को रीतिसिद्ध कवि के रूप में प्रस्तुत किया. इसी उपविभाजन का संकेत लेकर बाद में डा. भगीरथ मिश्र ने रीतिकाव्य को तीन धाराओं में बांटा. लेकिन अगर ध्यान से देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि मिश्र जी ही रीतिकाल को इन धाराओं मे विभाजित कर चुक थे भले ही उन्होंने रीतिसिद्ध को एक स्वतंत्र धारा न कहा हो. विश्वनाथ त्रिपाठी का भी यही मानना है और वे इस विभाजन का श्रेय मिश्र जी को देते हैं. रीतिसिद्ध कवियों में मिश्र जी ने बिहारी की सतसई का विस्तृत विवेचन किया है. इसके अतिरिक्त उन्होने मतिराम सतसई का भी उल्लेख किया है.

रीतिमुक्त काव्य

रीतिकाल के वे कवि जो किसी काव्यशास्त्रीय बंधन में नहीं बंधे अर्थात जो काव्ययशास्त्रीय नियमों से मुक्त हैं, रीतिमुक्त कवि कहलाए. इन कवियों ने अपनी स्वच्छंद वृत्ति के अनुसार काव्य रचना का रीतिमुक्त कवियों ने अधिकतर अपने प्रेम का वर्णन किया है. रीतिकाल की रीतिमुक्त काव्यधारा के विषय में उनका मत है कि ‘‘स्वच्छंद काव्य भाव भावित होता है, बुद्धिबोधित नहीं. इसलिए आंतरिकता उसका सर्वोपरि गुण है. (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ 276) इनमें रसखान, आलम, ठाकुर, घनानन्द, बोधा तथा द्विजदेव को वे प्रमुख मानते हैं. इन सबमें घनानन्द मिश्र जी को श्रेष्ठ प्रतीत होते हैं, क्योंकि उनकी संवेदना सर्वाधिक साहित्यिक है. मिश्र जी इन्हीं स्वच्छंद कवियों की प्रेम संवेदना को महत्वपूर्ण मानते हैं. वे इन्हें प्रेम की पीर के पक्षी कहते है. वे स्वच्छंद कवियों की अनुभूति को उनका मुख्य आधार मानते हैं, जबकि रीतिकाव्य के कर्ताओं का मूल आधारभूत तत्व भंगिमा है. मिश्र जी ने रसखान, आलम, ठाकुर, घनानन्द, बोधा तथा द्विजदेव के व्यक्तित्व तथा कृतियों का सम्यक प्रतिपादन किया है.

रीति इतर काव्य

रीतिकाल में लक्षण, लक्ष्य ग्रन्थों व श्रृंगार काव्य के अतिरिक्त अन्य प्रकार को काव्य भी रचा गया. भक्तिकाव्य, वीरकाव्य, नीतिकाव्य की रचना भी आलोच्य काल में पर्याप्त मात्रा में हुई है. मिश्र जी ने वीरकाव्य, नीतिकाव्य, नाट्यकाव्य, अनुवादकाव्य, हास्यकाव्य, प्रशस्तिकाव्य आदि की भी व्याख्या तथा आलोचना प्रस्तुत की है. वीरकाव्य को वे प्रशस्तिकाव्य मानते हैं. रीतिकालीन वीरकाव्य के अर्न्तगत उन्होंने जोधराज, भूषण, सूदन, लाल कवि आदि की चर्चा की है. नीतिकाव्य को वे काव्य के अंतर्गत मानने में संकोच करते हैं. वे नीति कथन को सूक्ति कहने के पक्ष में हैं. हिन्दी के नीतिकारों में वे रहीम और दीनदायल गिरी को साहित्यिक कोटि का नीतिकार, वृंद को मध्यमार्गी और गिरिधर को शुद्ध नीति के कर्ता मानते हैं. गद्य के विकास को भी वे शुभ लक्षण मानते हैं.

मिश्र जी श्रृंगारकाल में हास्यरस की रचनाओं की कमी मानते हैं. इसका कारण वे इस काल की दरबारी रचना को मानते हैं क्योंकि हास-विनोद का कार्य दरबारों के भांड कर दिया करते थे. रीतिकाल के कवि हास्यरस को हल्का रस मानकर उसकी रचना के फेर में नहीं पड़े और रीतिबद्ध रचना लिखते रहे. मिश्र जी ने मध्यकाल में अनुवादकाव्य पर भी चर्चा की है. उन रचनाओं को वे अनुवाद नहीं मानते, जो आधारभूत ग्रन्थों से अनुरचित हुए हैं. यदि कोई ग्रंथ अनुवाद के प्रयोजन से लिखा जाये तो ही वह अनुवाद कहलाएगा.

भाषा

भाषा के संबंध में भी मिश्र जी की दृष्टि बहुत स्पष्ट है. ब्रज का ज्ञान प्राप्त करने के लिए कोई कवि ब्रज में ही पैदा हो या वहीं जाकर बसे, ऐसा आवश्यक नहीं. उस भाषा में जो ग्रंथ प्रस्तुत हो चुके हैं उनके अनुशीलन से भी वह ब्रजभाषा का ज्ञान प्राप्त कर सकता है. उनका विचार है कि शुद्ध ब्रजभाषा का प्रयोग करने वाले बहुत थोड़े कवि मिलते हैं. घनानन्द को वे ‘ब्रजभाषा प्रवीण’ कवि मानते हैं.

आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के रीतिकालीन काव्य संबंधी विचारों का मूल्यांकन

मिश्र जी के रीतिकालीन काव्य संबंधी विचारों को जानने के पश्चात अब हम उसका मूल्यांकन करने का प्रयास करेंगे.

मिश्र जी भाव या रस को साहित्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं और लिखते हैं-‘‘भारतीय दृष्टि से साहित्य या काव्य का प्रतिपाद्य भाव या रस ही होता है. इसी में उसमें कर्त्ताओं के मानसपक्ष को प्रसार दूर तक दिखाई पड़ता है अर्थात उसकी व्याप्ति प्रक्रिया अधिक होती है.’’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ.35)

मिश्र जी का रस निरूपण अथवा रस विषयक चिंतन सूक्ष्म तथा प्रौद है. उनका मानना है कि हिन्दी के मध्यकाल में रस मीमांसा की ओर प्रवृति की दृष्टि से ‘अलंकार काल’ पर भी श्रृंगार की प्रवृत्ति इससे अधिक व्यापक थी.’’ (हिन्दी साहित्य को अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ 15)

वे वर्ण्य विषय को किसी काल के नामकरण का श्रेष्ठ आधार मानते हैं. काव्य रचना पद्धति को बाह्यार्थ मानते हुए मिश्र जी ‘रीति’ की जगह आभ्यांतरार्थ अर्थात श्रृंगार को ज्यादा महत्व देते हुए श्रृंगारकाल कहने की वकालत करते हैं.

जिस प्रकार श्रृंगारकाल नामकरण पुष्ट करने के लिए मिश्र जी ने रीतिमुक्त कवियों की उपेक्षा की बात सामने रखी उसी प्रकार आलोचकों ने ‘श्रृंगारकाल’ नामकरण की सीमा बतलाते हुए यह कहा कि रीतिकाल के बदले श्रृंगारकाल नाम स्वीकार कर लेने पर भूषण और लाल जैसे वीर रस के कवियों को फुटकल खाते में डालना पड़ेगा. इस तर्क का जवाब देते हुए वे लिखते हैं ‘‘रीति की सीमा में जितनी कृतियां समाविष्ट हैं वे अधिकतर ‘श्रृंगार की सीमा में हैं. थोड़ी सी वीर रस या शुद्ध भक्ति की रचनाएं श्रृंगार की सीमा में आबद्ध नहीं होती’’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ 36) श्रृंगारकाल नामकरण को उचित ठहराते हुए मिश्र जी एक और तर्क देते हैं ‘‘रीतिकाल की सीमा बढाने से ‘रीति’ के नाम पर उन रचनाओं को भी समेटना पड़ा है जो रीतिशास्त्र को उदाहरण प्रस्तुत करने के उद्देश्य से नहीं निर्मित हुई थी. दूसरे शब्दों में इन कवियों का साध्य श्रृंगार था, रीति से ये कभी-कभी साधन का काम अवश्य लेते थे. यदि श्रृंगाारकाल नाम रखा जाता तो यह तर्क देने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती और वे तथा उनके अतिश्रिक्त फुटकल खाते में फेंके हुए और भी बहुत से कवि उसकी सीमा में आप-से-आप आ जाते.’’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र,, पृ 37-38)

यह सच है कि मिश्र जी श्रृंगारकाल नामकरण की वकालत करते हुए भी ‘रीति’ शब्द से मुक्त नहीं हो पाये हैं. इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘‘मिश्र जी ने इस काल के कवियों का विभाजन रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त श्रेणियों में किया है. इनमें रीतिबद्ध शब्द का प्रयोग तो शुक्ल जी के यहां मिल जाता है, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त का नहीं. इस विभाजन का आधार तो वही विशेषता है जो शुक्ल जी ने बताई थीं, नामकरण अवश्य मिश्र जी का है. नामकरण करके मिश्र जी ने शुक्ल जी के रीतिकाल नामकरण को पुष्ट कर दिया है. इस पर कदाचित उनका ध्यान नहीं गया. ‘रीति’ वह मानदंड हुआ जिसके

आधार पर इस काल के कवियों को श्रेणीबद्ध किया जा सकता है. यह बात मिश्र जी के विभाजन से पुष्ट हो जाती है, फिर ‘श्रृंगारकाल’ कहने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती.’’ (हिन्दी आलोचना, विश्वनाथ त्रिपाठी, पृ. 119)

इसमें कोई संदेह नहीं कि त्रिपाठी जी का यह तर्क बेहद मजबूत है लेकिन इस आधार पर यह कहना कि श्रृंगारकाल नाम की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती, ठीक नहीं है. इसमें केाई संदेह नहीं कि रीतिकाल शब्द सुनते ही मन में ‘श्रृंगार’ शब्द की प्रतिमा ही बनती है. स्पष्ट है कि रीतिकाल व्यावहारिक दृष्टि से श्रृंगारकाल का ही पर्याय लगता है. शायद यही कारण है कि मिश्र जी भी रीतिकाल नाम की लोकप्रियता को स्वीकार करते हैं लेकिन संवत 1700 से 1900 के बीच लिखी कविता की प्रवृत्ति को ज्यादा अच्छे से प्रदर्शित करने की शक्ति रखने के कारण ‘रीतिकाल’ के बदले ‘श्रृंगारकाल’ नाम स्वीकार करने का प्रस्ताव रखते हैं.

रीतिबद्ध काव्य पर विचार करते हुए मिश्र जी यह वाजिब सवाल उठाते हैं कि ‘‘रीतिबद्ध काव्य, कला के प्रदर्शनार्थ ही अधिकतर बना, यह तो सर्ववादिसम्मत है, किन्तु इस प्रदर्शन की तात्कालिक प्रेरणा, आवश्यकता या हेतु क्या था, इस पर किसी ने जमकर विचार करने को कष्ट नहीं उठाया. इस पर विचार करना इसलिए भी अपेक्षित है क्योंकि उसके परिणामस्वरूप जिन तथ्यों की उपलब्धि होगी वे रीतिबद्ध काव्य का स्वरूप तो स्पष्ट करेंगे ही साथ ही हिन्दी-साहित्य की परंपरा का स्वरूप भी निश्चित करने में सहायक होंगे.’’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ 54) इस प्रश्न पर विचार करते हुए मिश्र जी लिखते हैं-‘‘जनता में जेा रचनाएं होती थीं, उनमें श्रृंगार का अतिरेक तो है, पर प्रक्रिया प्रेम का अतिरेक नहीं. प्रकिया की चेष्टाओं, विदग्धता आदि का

आधिक्य फारसी-साहित्य के संपर्क के कारण हुआ है.’’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ 57)

रीतिकाल के कवि मूलतः भक्त न होकर कवि ही थे. जीविका के लिए उनके पास कोई निश्चित साधन नहीं था. दरबार से जुड़ने पर कवियों को शोहरत के साथ-साथ पैसा भी मिल जाता था. इसलिए एक तरह से दरबार से जुड़ना उनकी मजबूरी भी हो गयी थी. मिश्र जी का यह विचार बिल्कुल उचित प्रतीत होता है. मिश्र जी ने अतीत की आलोचना करने को फैशन बना लेने वाले आलोचकों को आईना दिखाते हुए कहा है कि सिर्फ चाटुकारिता के आधार पर रीतिकाल के कवियों को खारिज कर दिया जाएगा, तो आधुनिक काल के कवि-लेखक भी इससे बच नहीं पाएंगे. रीतिकाल के कवियों का मूल्यांकन करते हुए इस बात पर काफी बहस हुई है कि इस काल के कवि पहले कवि हैं या आचार्य और इन कवियों ने लक्षण-ग्रंथ लिखने की आवश्यकता क्यों महसूस की. मिश्र जी ऐसा मानते हैं कि यह सभी कहते हैं कि लक्षण ग्रंथ संस्कृत के साहित्याशास्त्र आधार पर बने. संस्कृत साहित्य के अनंतर प्राकृत-साहित्य का उत्कर्ष हुआ और तदनंतर अपभ्रंश-साहित्य का उत्थान हुआ. उन्हें भी साहित्याशास्त्र की अपेक्षा रही होगी. पर वहां साहित्याशास्त्र के ग्रंथ नहीं बने. वास्तव में प्राकृत या अपभ्रंश भाषा में लिखने वालों का काम संस्कृत भाषा में लिखे साहित्याशास्त्र के ग्रंथों ंसे चल जाता था.

मिश्र जी ने रीतिमुक्त कविता को रीतिकालीन कविता की प्रतिनिधि के रूप में सामने रखकर उसका सटीक मूल्यांकन किया है. शुक्ल जी ने रीतिमुक्त कवियों को फुटकल खाते में डाल दिया था. मिश्र जी ने इसके लिए शुक्ल जी की आलोचना की है. मिश्र जी ने सभी इतिहासकारों पर रीतिमुक्त काव्यधारा की अवहेलना का आरोप लगाते हुए लिखा है-‘‘हिन्दी साहित्य के मध्यकाल में सभी इतिहासकारों ने किसी न किसी रूप में भक्ति और रीति का नामोल्लेख तो किया है पर युग में प्रवाहित होने वाली एक साहित्यधारा को एकादम भूल ही गए हैं.’’

विश्वनाथ प्रसाद मिश्र का योगदान तथा उपलब्धियां

आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने जिस कठिन परिश्रम के साथ रीतिकाल के अनेक कवियों की रचनाओं का संकलन प्रस्तुत किया है, उससे गुजरे बिना रीतिकाल की कविताओं का मूल्यांकन संभव नहीं हो सकता. यह अपने आप में मिश्र जी की एक बड़ी उपलब्धि है. इसके अतिरिक्त आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा किया गया रीतिकाल का वर्गीकरण तथा कवियों की विविध आयामी व्याख्या आदि उनके योगदान के महत्वपूर्ण बिन्दु हैं.

मिश्र जी ने रीतिकालीन साहित्य के अंतर्गत रीतिमुक्त कविता को विशेष स्थान दिया है. रीतिमुक्त कविता को केंद्र में लाकर मिश्र जी ने बड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया है, इसे इनकी मौलिक-देन कहा जा सकता है.

यदि हम ‘‘हिन्दी साहित्य का अतीत भाग-2 श्रृंगारकाल’’ का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें तो इस बात का एहसास होगा कि जो लोग यह मानते हैं कि मिश्र जी ने रीतिकाल पर शुक्ल जी के लेखन का ही विश्लेषण मात्र किया है, वे यदि उनकी यह पुस्तक पढ़ें तो अपनी पूर्व मान्यता को बदलने पर विवश हो जाएंगे. पुस्तक के अध्ययन से यह विदित होता है कि अनेक स्थलों पर मिश्र जी ने शुक्ल जी के लेखन की सीमा बतलाई है और उन बिन्दुओं पर अपनी मौलिक दृष्टि को परिचय दिया हे. यही नहीं इस पुस्तक से रीतिकालीन चिंतन में एक नया मोड़ आया है. मिश्र जी ने आलोच्य काल के विभिन्न नामकरणों-अलंकृत काल, रीतिकाल, उत्तरमध्यकाल तथा कलाकाल आदि को नकारकर ‘श्रृंगारकाल’ नाम की स्थापना की. प्रस्तुत नामकरण काफी समीचीन तथा तर्कसंगत होते हुए भी लोकप्रिय तो रहा, परंतु उपयुक्त सिद्ध नहीं हो सका.

हिन्दी साहित्य के इतिहास की पुस्तको में रीतिकाल पर विचार करते हुए सर्वप्रथम उस बिन्दु पर विचार किया जाता है जो रीतिकालीन कविता को भक्तिकालीन कविता से अलग करता है. आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास में रीतिग्रंथों के निर्माण को रीतिकालीन कविता की पहचान से जोड़ा है. रीतिग्रंथों के निर्माण से रीतिकालीन कविता की पहचान तय करने का ही परिणाम है कि तुलसीदास के समकालीन होते हुए भी केशवदास को रीतिकाल का कवि मानाजाता है. जिन केशवदास को आचार्य शुक्ल ने ‘कविदयाविहीन’ और ‘कठिन काव्य का प्रेत’ कहकर खारिज कर दिया था, उन्हीं केशवदास के महत्व को स्वीकारते हुए मिश्र जी ने लिखा है, ‘‘मघ्यकाल में केशव और बिहारी का काव्यप्रवाह में जैसा मान था वैसा जायसी और कबीर का नहीं. कबीर का नाम तो प्रवाह में सुन भी जाता था, पर जायसी का कोई नामलेवा तक न था... केशव के काव्य की पढ़ाई पहले सर्वत्र हेाती थी. घीरे-धीरे वे हटाये गए. यह उन केशवदास की स्थिति है जिनकी कृतियों पर प्राचीन युग में सूरति मिश्र और सरदार कवि ने टीकाएं लिखीं थीं.’’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ 70) चूंकि रीतिकाल ही मिश्र जी का कार्य क्षेत्र था और उनकी आलोचना रीतिकालीन काव्य प्रतिमानों से बंधी हुई थी. इसीलिए कबीर, जायसी जैसे युगांतरकारी कवियों के महत्व को उन्होंने नकार दिया. यह एक प्रकार से पूर्वाग्रह है, जिसके कारण उन्होंने केशव के महत्व को प्रतिपादित करने के लिए कबीर और जायसी को उनसे कमतर माना.

हिन्दी साहित्य के इतिहास के अन्य कालों की तरह शुक्ल जी द्वारा किया गया रीतिकाल का समय-निर्धारण भी सर्वमान्य है. उल्लेखनीय है कि शुक्ल जी ने रीतिकाल का समय संवत 1700 से संवत 1900 माना है. मिश्र जी भी रीतिकाल का समय मोटे तौर पर संवत 1700 से संवत 1900 तक स्वीकारते हैं लेकिन इससे संबन्धित एक महत्वपूर्ण पक्ष की ओर ध्यान दिलाते हए लिखते हैं ‘‘विचार करने पर अवगत होता है कि साहित्य की श्रृंखला में इस काल की कड़ी भक्ति काल की कड़ी के गर्भ से घूमती हुई आगे बढ़ी है...’’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ 45-46) आचार्य शुक्ल की बातों से अपनी असहमति प्रकट करते हुए मिश्र जी लिखते हैं-‘‘ केशवदास की कविप्रिया को सामने रखकर यह कहना कि वह वामन, दंडी आदि अलंकारवादी आचायरें के अनुगमन पर निर्मित हुई है और हिन्दी के आदर्श ग्रंथ कुवलयानन्द या चंद्रलोक के भिन्न आदर्श पर खड़े हुए हैं, सोलह आने ठीक नहीं है. वामन या दंडी रीतिवादी या अलंकारवादी थी, पर जयदेव तो कट्टरवादी अलंकारवादी थे, उनसे भी बढ़कर.’’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ 46) इसके बाद शुक्ल जी के इस कथन कि हिन्दी रीतिग्रंथों की परंपरा चिंतामणि त्रिपाठी से चली, के जवाब में उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि, ‘‘रही अखंड परंपरा की बात इतिहास के पास पर्याप्त सामग्री का दारिद्रय है. पर संवत 1600 से लेकर संवत 1700 तक रीतिग्रन्थों की अखंड परंपरा रही है, इस संबंध में इतिहास मुखर है...’ (हिन्दी साहित्य का अतीत, आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पृ47)

अंत में मैं यही कहना चाहूंगी कि हिन्दी आलोचना में मिश्र जी ने जिस प्रतिबद्धता, लगन और समर्पण के साथ अनेक रीतिकालीन कवियों की ग्रंथावलियां संपादित करते हुए रीतिकालीन कविता के मूल्यांकन का विनम्र प्रयास किया है, वह अपने आप में अद्वितीय है. परंतु हिन्दी के आलोचकों ने मिश्र जी के इस समर्पण को उनकी सीमा में बदल दिया. आलोचकों ने यह कहना आरंभ कर दिया कि मिश्र जी रीतिकाल से बाहर निकलते ही असहाय हो जाते हैं. जिस व्यक्ति ने रीतिकाल की दरबारी कविता के मूल्यांकन में अपनी जिंदगी को अधिकांश समय बिता दिया, उस व्यक्ति की मानसिकता आधुनिक कैसे हो सकती है, आखिर रीतिकाल में ऐसा है ही क्या कि जिस पर हजारों पृष्ठ खर्च किए जाएं. जिस काल की कविता में महिलाओं को महज भोग-विलास की वस्तु समझा गया उस काल की कविता पर बात करके हम आधुनिक लोग अपना समय क्यों नष्ट करें. इस प्रकार की आलेाचना करने वाले आलोचक श्रृंगार और प्रेम के अंतर को नहीं समझ पाये. यदि समझ पाते तो वे देव, बिहारी और घनानन्द के बीच के अंतर को समझ पाते.

आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने रीतिकाव्य का मूल्यांकन रीतिकालीन काव्य मानदंडों के आधार पर किया. उन आधुनिक मानदंडों के आधार पर नहीं किया, जिसकी आवश्यकता थी. आधुनिकता के व्यापक मूल्य जैसे स्त्री की स्वतन्त्रता, प्रेम का अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, स्त्री-पुरुष समानता आदि के मूल्यों के आधार पर भी रीतिकालीन काव्य की आलोचना की जानी चाहिए थी. इसका अभाव हम सर्वत्र देखते हैं. मिश्र जी ने रीतिकाल पर इतनी विस्तृत और सकारात्मक आलोचना प्रस्तुत की है, जैसी किसी और ने नहीं की. बाद के आलोचकों और शोधार्थियों ने उनके इस काम को आगे विकसित करने का प्रयास नहीं किया. आज के समय में आवश्यकता इस बात की है, रीतिकालीन कविता के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त होकर आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र के लेखन का मूल्यांकन किया जाये.

 

संपर्कः 366,बी. फेस-1

पॉकेट-2, मयूर विहार,

नई दिल्ली-110091

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