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ई-बुक : प्राची, जुलाई 2015 - आलेख व साहित्यिक गतिविधियां

 

मतलबी मीडिया की बिगड़ती पीढ़ियां

राजेश कुमार शर्मा

विभिन्न समाचार चैनलों पर, अमुक खबर सुनकर अत्यंत निराशा हुई जिसमें, प्रदेश के सर्वप्रिय अध्यक्ष (सम्माननीय मुख्यमंत्री)श्री अरविंद केजरीवाल जी के एक पत्र, जिसमें उन्होंने मीडिया पर अंकुश लगाने की बात कही थी, के संबंध में, दिल्ली प्रदेश की ढाई करोड़ जनसंख्या में से 96 प्रतिशत लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली सिफारिश को ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने फटकार लगाई और कारण भी पूछा है. यदि जनसंख्या के बहुमत की मांग को, बिना कारण सुने सर्वोच्च न्याय व्यवस्था फटकार लगाएगी तो, आम आदमी के लिए फिर कौन सी राह बचेगी?

लोकतंत्र में मीडिया के महत्वपूर्ण माध्यम-समाचार चैनल और समाचार पत्र का कार्य समाज की विभिन्न गतिविधियों और घटनाओं को जनहित में, सीधे और साफ तरीके से, वृहत दृश्यपटल तक पहुंचाना होता है. इसीलिए संविधान उन्हें

अधिक अधिकार प्रदान करता है; परंतु आजकल ज्यादातर न्यूज चैनल और समाचार पत्र, निजी और कमाऊं उद्योग बन चुके हैं. इनकी प्रमुख कमियां, जो सामाजिक लाभ को कम करती हैं अथवा समाज की शक्ति और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती हैं, वे निम्नलिखित हैंः-

1. सूचनाओं में स्वतंत्रता और सहभागिता का अभाव रहता है. सूचनाएं अब सीधे और सरल रूप में समाज के समक्ष नहीं आ पातीं; बल्कि अब समाचार प्रदाता उसे अपने-अपने द्वष्टिकोणों से प्रस्तुत करते हैं. इसमें सामान्य नागरिक केवल मूक दर्शक बन कर रह जाते हैं; क्योंकि उनका द्वष्टिकोण समाचारों में औपचारिकता के लिए कभी-कभी ही शामिल किया जाता है.

2. सूचना प्रदाता समाचारोें को अपने-अपने विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करते हैं और इनके मन्तव्यों में परस्पर भिन्नता होती है. अतः संदेह होने लगता है कि समाचार मीडिया जन-भावना की अभिव्यक्ति करता है या अपनी भावना की. और यह अभिव्यक्ति किसी प्र्रकार के लालच से तो नहीं है.

3. मीडिया अपूर्ण और संकुचित खबर दिखा कर समाज को दिगभ्रमित करती है, जबकि नागरिकों के पास गलत खबर पर प्रतिक्रिया देने का कोई सरल मार्ग नहीं छोड़ा गया है.

4. समाज के हित के लिए बने मीडिया को अपने

अधिकारों का खूब पता होता है, परंतु समाज का प्रत्येक वर्ग-स्वयं मीडिया, मीडिया से अपने संबंधों और मीडिया के ऊपर समाज को दिए गए किसी प्रकार के अघिकार से परिचित नहीं होता है.

5. समाचार कार्यालय में साक्षात्कार हेतु आया कोई भी विषेश व्यक्ति एडिटर से क्या बात करता है, यह किसी को पता नहीं होता. फिर कोई न्याय, मीडिया की पारदर्षिता पर विश्वास करने को मजबूर क्यों कर सकता है?

6. समाचारों में सीधी खबरें कम होती हैं, वैचारिक टीका-टिप्पणियां अधिक होती हैं. यथा-दो व्यक्ति यदि साथ खड़े हों तो ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की छाया में यह कहा जा सकता है कि शायद वे प्यार करते हैं, शायद इनके शारीरिक संबंध है या शायद इनका ‘बच्चा’ भी है. अगर उन्होंने मुंह फेर लिया हो तो- यह कहना कि शायद इनका तलाक हो गया हो, सर्वदा ठीक माना जा रहा है. यदि किसी महिला ने किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई शिकायत की हो तो- किसी निर्णय या जांच से पहले ही व्यक्ति को व्यभिचारी या भ्रष्टाचारी कहना किसी की जीवन भर की मेहनत करके कमाई गई प्रतिष्ठा के साथ बलात्कार करना है.

7. एक नागरिक होते हुए मुझे ऐसा लगता है कि मीडिया अब नागरिकों की जुबान नहीं रह गया है, मीडिया की ताकत अब नागरिकों की ताकत नहीं रह गई है. इसलिए इस पर नैतिक अंकुश लगना सख्त जरूरी है.

8. चुनाव के समय मैंने स्वयं चुनाव आयोग से शिकायत की तथा सभी प्रमुख चैनलों से आग्रह किया था कि वे इस समाचार को चलाएं कि- सत्तारूढ़ पार्टी का प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या कोई भी केन्द्रीय मंत्री यदि किसी प्रदेश में जाकर कहेगा कि ‘‘यदि जनता ने अलग पार्टी को वोट दिया तो विकास नहीं हो सकेगा’’ तो यह सभी छोटे दलों के प्रति पक्षपात होगा. अतः इस पर चुनाव आयोग को प्रतिबंध लगाना चाहिए. तब मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मैं प्रजातंत्र का हिस्सा ही नही हूं और मेरी शिकायत को अमल में लाने के लिए कोई नहीं है.

9. न्यूज चैनल आजकल ध्वनि और द्वश्य प्रदूषण भी बहुत ज्यादा करते हैं. समाचारों को सही और स्पष्ट ना दिखा कर, जोरदार बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ 3-4 बार चलाकर उसे इच्छानुसार अधिक हृदयविदारक या उत्तेजक कर दिया जाता है.

10. समाचारों को साधारण तरीके से ना दिखा कर, कमाई के नाम पर अत्यधिक विजुअल इफेक्ट, कलर और फ्लैश का उपयोग किया जाता है. एक ही समय पर स्क्रीन पर चार अलग-अलग पटिृयों पर चार अलग-अलग समाचार प्रस्तुत किए जाते हैं और समाचार वक्ता उसी समय किसी और समाचार की व्याख्या करता है; जबकि दूसरी साइड पर दो अलग-अलग विज्ञापन चल रहे होते हैं. इस प्रकार आर्थिक कमाई का रोना रोकर व्यापक तौर से सामाजिक क्षमता की बर्बादी की जा रही है.

11. मीडिया को सामाजिक हित के लिए संविधान से विषेशाधिकार प्राप्त है. जब मीडिया की कमाई जनता के द्वारा होती है तब क्या समाज को मीडिया की कमाई से कोई रॉयल्टी नही मिलनी चाहिए? इनके पास जनसम्पर्क के लिए कोई टॉल फ्री नम्बर नहीं होता, जिस पर आधिकारिक तौर से कोई सूचना विस्तृत रूप में मांगी जा सके अथवा किसी पिछले दिन के समाचार का निशुल्क रिकार्ड मांगा जा सके.

12. एक और सरासर धोखेबाजी का काम जो समाचार मीडिया अधिक कमाई से मिथ्या दिखने वाले, लम्बे समय के विज्ञापन, विभिन्न समयों पर प्रसारित किए जाते है, जैसे- बाबा जी का लॉकेट, लॉटरी ड्रा, यौनवर्धक दवाइयां, आदि. ऐसा करते समय मीडिया के मालिक मूर्ख बन जाते हैं और

सावधानी के लिए पहले ही लिख देते हैं कि ‘उनकी जिम्मेदारी नही है’. क्या ऐसा लिख देने से कोई दोषमुक्त हो सकता है? ये खोजी चैनल ऐसे लोगों के पते, संपर्क और स्वयं अपनी भूमिका क्यों उजागर नही करते? शायद इन्हें भविष्य मे और अधिक कमाई की सम्भावना दिखे तो ये समाज को आग लगाने से भी नहीं चूकेंगे. दरसल यह हमारा ही दुर्र्भाग्य है कि आजादी के बाद हमारी न्याय व्यवस्था जल्दीबाजी में बनाई गई थी इसलिए न्याय की देवी अंधी रह गई. फलस्वरूप कितना भी अन्याय होता रहे बिना शिकायत के कार्यवाही नहीं होती.

13. प्रजातंत्र में क्या मीडिया अपने अधिकारों के कारण सर्वोपरी होता है? क्या हमारे जीवन भर की कमाई हमारा स्वाभिमान और प्रतिष्ठा मीडिया के थूकने के लिए है? जब हमारे देश में तत्काल न्याय देने की व्यवस्था नहीं है तब किसी न्यायिक आदेश के मिलने तक कम-से-कम व्यक्ति के सम्मान की रक्षा की व्यवस्था तो न्यायालय को करनी ही चाहिए, अन्यथा सम्मान कमाने की लालसा ही किसे रहेगी? मीडियाकर्मी क्या प्रजातंत्र में भगवान होते हैं जो कोई भी अनर्गल बात कर सकते हैं. उनके ऊपर कोई प्रतिक्रिया देना या टिप्पणी करना पाप है?

मीड़िया को सामाजिक समन्वय के लिए अपने वर्तमान प्रारूप में शीघ्र परिवर्तन करना पड़ेगा. हमारा समाज जिन परिवर्तनों की अपेक्षा समाचार मीडिया से करता है, वे इस प्रकार हैः-

1. मीडिया पर समाज और नागरिक के अधिकारों की सीमा स्पष्ट हो.

2. मीडिया की कमाई के स्र्रोत नियमित किये जाएं यथा इनका प्रसारण निःशुल्क होना चाहिए और इनकी कमाई केवल विज्ञापनों से होनी चाहिए जिसका समय भी निश्चित एवं नियमित होना चाहिये.

3. मीडिया का समाज से व्यापक परिचय और संबंध होना चाहिए, यथा कुल कितने समाचार चैनल और पत्र हैं, इनके नियामक कौन हैं, समाचार वाचक कौन हैं तथा उनकी उपलब्धियां क्या हैं, वे उसी प्रदेश के हैं या बाहर के, समाचार संकलित किए गए हैं या खरीदे गए हैं आदि.

4. सभी मीडिया सेंटर को अनिवार्य रूप से अपने

निर्बाध केन्द्रीय कॉल सेंटर का प्रबंध करना चाहिए जिस पर जनता द्वारा किसी भी सूचना के संबध में जानकारी और रिकार्ड मांगे और दिए जा सकें.

5. समाचार चैनल और पत्र में किसी भी मिथ्या प्रचार की जिम्मेदारी स्वयं उस चैनल और पत्र की होनी चहिए.

6. नागरिकों द्वारा दी गई किसी भी ठोस सूचना को ना दिखाने का कारण देने की बाध्यता होनी चाहिए.

7. समाचार चैनलों पर ध्वनि तीव्रता के नियामक होने चाहिए.

8. समाचार चैनल मनोरंजन चैनल ना बनें, बल्कि खबरों को केवल खबर की तरह ही दिखाएं. खबरों पर रोचकता का मसाला लगाने का काम समाज पर ही छोड़ दें.

9. न्यूज एजेंसी को अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों को कभी नहीं भूलना चाहिए तथा बैकग्राउंड म्यूजिक और विजुअल इफेक्ट का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

10. किसी को भी हुए नुकसान की जिम्मेदारी न्यूज चैनल को लेनी पड़े और उसकी भरपाई भी करनी पड़े.

समाजवाद में जब हर वर्ग आत्मनिर्भर एवं मतलबी हो जाए, तो समाजवाद की अवधारणा मर जाती है और आपसी टकराव बढ़ जाते हैं. परस्पर निर्भरता समाजवाद की पहचान है. मीडिया सबसे अलग सर्वोपरि नहीं हो सकता. दिल्ली प्रदेश के 96 प्रतिशत समाज ने जिस नेतृत्व को स्वीकार किया था, उसी के काम में बाधा डालना, उसी के आदेशों का तिरस्कार करना, गलत संदेश का प्रचार करना- सामाजिक असहयोग के लक्षण नहीं तो और क्या है? आशा है कि भविष्य में मीडिया स्वयं को समाज का सेवक मानेगा और सम्मान देगा; अन्यथा इतने बडे एकजुट समाज के आदेश की ताकत सारी दुनिया देखेगी.

 

संपर्कः आर.जेड.बी.124-ए, गलीनं.-7,

गुरुद्वारा रोड़, महावीर एन्कलेव,

पालम, नई दिल्ली- 110045

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लंदन में जारी हुई ‘इश्क कोई न्यूज नहीं’

लंदनः ‘लप्रेस : फेसबुक फिक्शन श्रृंखला’ की दूसरी किताब ‘इश्क कोई न्यूज नहीं’ को पाठकों के बीच लाने की तैयारियां जब जोरों पर हैं, इसी बीच इसका प्रोमो लंदन में आयोजित एक कार्यशाला के उपरान्त अनौपचारिक रूप में लांच किया गया.

एसओएएस, लंदन विश्वविद्यालय, लंदन में 27-28 मई, 2015 को ‘हिंग्लिश’ को लेकर हुई दो दिवसीय कार्यशाला के समापन-सत्र के बाद ‘लप्रेस’ श्रृंखला की इस दूसरी कड़ी की प्रोमो पुस्तिका जारी तो की ही गई, साथ ही, इस कार्यक्रय में लप्रेककार विनीत कुामर ने दुनिया के अलग-अलग शैक्षणिक संस्थानों से आए लोगों के बीच लप्रेक लिखे जाने के पीछे की पूरी प्रक्रिया की विस्तार से चर्चा करते हुए अपनी पुस्तक की थीम को भी सामने रखा.

यह सच है कि जो न्यूज चैनल और मीडिया दुनिया भर की खबरों को अपनी जरूरत और मिजाज के हिसाब से पेश करता है, उसके माध्यम से ऐसी कई कहानियां, इमोशनल मोमेंट्स न्यूजरूम की चौखट नहीं लांघ पाते जो खुद मीडियाकर्मियों के बीच के होते हैं. इश्क और इमोशन के नाम पर मीडिया भले ही लव, सेक्स, धोखा से लेकर ऑनर किलिंग तक के मामले को लगातार प्रसारित करता रहे, लेकिन क्या सचमुच वह इश्क के इलाके में घुसने और रचनात्मक हस्तक्षेप का माद्दा रखता है. इसी परिप्रेक्ष्य के अंतर्गत प्रोमो में शामिल कुल पांच कहानियों में से तीन कहानियों का पाठ करते हुए लेखक ने लप्रेक लिखे जाने की इस पूरी प्रक्रिया की चर्चा की.

ट्रैफिक जाम, मैट्रो की खचाखच भीड़, डीटीसी बसों के इंतजार के बीच लिखी जानेवाली इन फेसबुक कहानियों के बारे में प्रो. फ्रेचेस्का ओरसिनी (हिन्दी और दक्षिण एशियाई साहित्य, एसओएएस, लंदन विश्वविद्यालय, लंदन) ने कहा कि इस तरह के लेखन से हिन्दी एक नए पाठक वर्ग के बीच पहुंच सकेगी और जो कहानियां अब तक सोशल मीडिया के भरोसे रह गई थीं, उनके हिन्दी पाठकों के बीच किताब की शक्ल में आने से विचार-विमर्श में नया आयाम जुड़ सकेगा.

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में अध्यापन कर रहे ऐश्वर्य पंडित ने कहा कि ये कहानियां बताती हैं कि हिन्दी में अलग तरह की सामग्री आने की गुंजाइश बनी हुई है और यह अच्छा ही है कि इस तरह से अलग-अलग रूपों में हिन्दी का विस्तार हो.

साभारः प्रकाशन समाचार, नई दिल्ली

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