सोमवार, 3 अगस्त 2015

यात्रा संस्मरण : चीन में सात दिन - 5

- दिनेश कुमार माली

चीन में सात दिन

पिछले अध्याय से जारी...

पांचवा अध्याय: पांचवा दिन (24.08.14)

वेलकम, सृजनगाथा डॉट कॉम इन शंघाई! हार्दिक स्वागत आप सभी का। शंघाई मानो कह रहा हो हम सभी से। विश्व का एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र। नीना की जगह ले ली थी गाइड 'एलिस' ने। 'एलिस' का चीनी नाम कुछ और था नीना की तरह। टूर के प्रोग्राम के मुताबिक वह हमें वर्ल्ड फाइनेंशियल हब, सिल्क शॉप और मेगलेव ट्रेन दिखाने के लिए ले जा रही थी। शायद एलिस को भारत के पर्यटन स्थानों,रीति-रिवाजों,रहन-सहन के तरीकों,खान-पान की आदतों की अच्छी जानकारी थी। यह बाद में पता चला कि वह भारत में दो बार घूम आई थी। तभी तो उस बस में कितने आत्म-विश्वास के साथ चीन और भारत की तुलना कर थी वह,"शंघाई पहले मछुआरों का एक गाँव था, पर प्रथम अफ़ीम युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने इस स्थान पर अधिकार कर लिया और यहां विदेशियों के लिए एक स्वायत्तशासी क्षेत्र का निर्माण किया, जो 1930 तक अस्तित्व में रहा और जिसने इस मछुआरों के गाँव को उस समय के एक बड़े अन्तर-राष्ट्रीय नगर और वित्तीय केन्द्र बनने में सहायता की।

 

1949 में साम्यवादी अधिग्रहण के बाद उन्होंने विदेशी निवेश पर रोक लगा दी और अत्यधिक कर लगा दिया। 1992  से यहां आर्थिक सुधार लागू किए गए और कर में कमी की गई, जिससे शंघाई ने अन्य प्रमुख चीनी नगरों जिनका पहले विकास आरम्भ हो चुका था जैसे शेन्झेन और गुआंग्झोऊ को आर्थिक विकास में पछाड़ दिया। 1992 से ही यह महानगर प्रतिवर्ष 9-15% की दर से वृद्धि कर रहा है, पर तीव्र आर्थिक विकास के कारण इसे चीन के अन्य क्षेत्रों से आने वाले अप्रवासियों और सामाजिक असमानता की समस्या से इसे जूझना पड़ रहा है।इस महानगर को आधुनिक चीन का ध्वजारोहक नगर माना जाता है और यह चीन का एक प्रमुख सांस्कृतिक, व्यवसायिक, और औद्योगिक केन्द्र है। 2005 से ही शंघाई का बन्दरगाह विश्व का सर्वाधिक व्यस्त बन्दरगाह है। पूरे चीन और शेष दुनिया में भी इसे भविष्य के प्रमुख महानगर के रूप में माना जाता है।

 

आपके इंडिया में जहां लोग मंदिरों,मस्जिदों व गिरजाघरों में पूजा-अर्चना करते हैं, वैसा यहाँ बिलकुल नहीं है। चीन का कोई धर्म नहीं है। केवल एक ही धर्म है,पैसे कमाना और देश का विकास करना। आपके वहाँ धार्मिक स्थानों में जाने के लिए कोई शुल्क नहीं लगता,मगर यहाँ लगता है। यहाँ सरकारी म्यूजियमों में जाने के लिए कोई शुल्क नहीं लगता, आपके वहाँ लगता है। हैं न मूलभूत अंतर ? हमारे यहाँ,आपने बीजिंग से शंघाई तक देखा होगा,सब जगह औरतें काम करती हैं, मगर आपके वहाँ आदमी,जबकि आपकी औरतें हाऊसवाइफ। यहाँ पूरा व्यतिक्रम या तो आदमी-औरत दोनों काम करते हैं या फिर केवल औरत जबकि पति हाऊस-हसबेंड ।"

'हाऊस-हसबेंड' का नाम सुनते ही सारी बस खिलखिलाकर हंस पड़ी। कितनी विपरीत है चीन की संस्कृति! यह सच है, शंघाई जैसे शहर में अगर पति-पत्नी दोनों नहीं कमाएंगे तो जीवन जीना दूभर हो जाएगा।

एलिस ने कहना जारी रखा," जैसा कि आप जानते होंगे,चीन में प्रतिवर्ष एक छोटा परिवर्तन और हर तीसरे साल एक बहुत बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है।यह चीन के गवर्नमेंट की पॉलिसी है। ... अब हम पहुँचने जा रहे है वर्ल्ड फाइनेंशियल हब के इर्द-गिर्द। जहां आप लिफ्ट से 423 मीटर की दूरी मात्र 47 सेकंड में तयकर चौरानवें मंजिल पर पहुँचकर शंघाई का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। यह इमारत सौ मंजिल की है,लगभग 474 मीटर ऊंची। अब आप उतरकर फोटोग्राफी का आनंद ले सकते है।"

बस एक बड़े गार्डन के पास जाकर रुक गई। हम सभी नीचे उतरकर आस-पास के सारे नजारों का अवलोकन करने लगे। पाइपनुमा काँच की बनी बिल्डिंग पर चींटी जैसे कुछ लोग मरम्मत का काम कर रहे थे। वे दूर से ऐसे दिखाई दे रहे थे,जैसे काले कपड़े पहने कुछ स्पाइडरमैन काँच की दीवारों पर अपने हाथ से धागा फेंककर मकडजाल बना रेंगते-रेंगते ऊपर की ओर बढ़ रहे हो। आस-पास की गगनचुंबी इमारतों के अरण्य का दृश्य बहुत ही मनोरम दिखाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था,चीनी लोगों ने शंघाई को स्वर्ग बनाने का ठान लिया हो। बचपन में मुझे कभी मुंबई,कोलकाता,चैन्ने और दिल्ली महानगर लगते थे,मगर शंघाई को देखने के बाद लगा अभी बहुत कुछ बाकी है।

 

सोचते-सोचते एक निमिष में हम पहुँच गए वर्ल्ड फाइनेंशियल हब की 94वीं फ्लोर पर। शंघाई नगर के पुडौंग जिले में स्थित एक गगनचुम्बी इमारत है यह। यह एक मिश्रित उपयोग की इमारत है जिसके भीतर होटल, कार्यालय, सम्मेलन कक्ष, प्रेक्षण डॅक, और शॉपिंग मॉल इत्यादि हैं। 14 सितंबर 2007 के दिन इस इमारत ने अपनी 492 मीटर की ऊँचाई प्राप्त कर ली थी और उस समय यह विश्व की दूसरी सबसे ऊँची इमारत थी। इस इमारत में कुल 101 तल हैं और यह अभी भी चीन की सबसे ऊँची इमारत है। यह इमारत 28 अगस्त 2008को दैनिक कामकाज के लिए खोल दी गई थी, और इसका प्रेक्षण डॅक दो दिन बाद खोला गया। अपने डिज़ाइन के लिए इस इमारत को बहुत सराहा गया है और वास्तुकारों द्वारा इसे वर्ष 2008 की सर्वश्रेष्ठ पूर्णनिर्मित इमारत स्वीकृत किया गया था । ..... कोई सुंदर सपने से कम नहीं। तकनीकी उत्कृष्टता का एक अनुपम उदाहरण। 'सती सावित्री' और 'डिवाइन लाइफ' के रचियता महर्षि अरविंद ने सही कहा था, इट इज अवर जर्नी फ्राम मेन टू सुपरमेन। मनुष्य हमेशा 'सुपरमेन' बनना चाहता है। चार्ल्स डार्विन के विकासशीलता का सिद्धान्त भी तो यही दर्शाता है। क्या चीन का यह विकास कम बड़ा जादू है ! काँच की दीवारों से दिखाई दे रहा है सारा शंघाई शहर,बहुत ही खूबसूरत! इधर ओल्ड शंघाई तो उधर न्यू शंघाई, बीच में हूयांगपू नदी मानो दो भाइयों की संपति का बंटवारा कर रही हो। न्यू शंघाई में तरह-तरह की स्थापत्य कला लिए अभ्रन्कष इमारतें। यही तो आभिजात्य और वैभव है वहाँ के निवासियों का। अगर विवेकानंद जिंदा होते तो शायद वह भी यह ही कहते, ये इमारतें चीन के लोगों का कर्मयोग है। कुशलता से किया हुआ कर्म ही तो योग है। "योग कर्मसु कौशलं"। हमारे सभी साथी अपना फोटो खींचने या खींचवाने में मग्न थे। अब समय हो चुका नीचे उतरने का। देखते-देखते एक घंटा कब व्यतीत हुआ ,पता भी नहीं चला

 

अब बस ने रुख किया सिल्क शॉप की तरफ। एलिस कह रही थी ,चीन में दो प्रकार के कोकून पाए जाते है, एक बड़ा तो दूसरा छोटा। जबकि आपके भारत में छोटे प्रकार का ही कोकून मिलता है। पता नहीं, हर बात में वह भारत से तुलना क्यों कर रही थी ? सिल्क की यह दूकान बहुत बड़ी थी, जहां रज़ाई,तकिये,ओढ़ने के वस्त्र तैयार किए जा रहे थे। रेशम बनाने की दूकान में पूरा डिमोन्स्ट्रेशन दिखाया गया। यहाँ पर जिन्हें जो-जो खरीदना था,ख़रीददारी की। अब हमारा कारवां चल पड़ा,लंच करने के लिए। मगर एलिस ने कहा, बेहतर होगा आप लंच से पहले मेगलेव ट्रेन की सवारी कर लेते । मेगलेव ट्रेन चलने का समय सन्निकट था।

मेगलेव ट्रेन का विस्तृत रूप होता है "मैगनैटिक लेवियशन" सिद्धान्त पर काम करने वाली ट्रेन। यह लोंगयांग रोड स्टेशन से पुडोंग इन्टरनेशनल एयरपोर्ट स्टेशन तक तीस किलोमीटर की दूरी मात्र आठ मिनट में तय करती है। फिलहाल यह पायलट प्रोजेक्ट है और 'नो प्रॉफ़िट नो लॉस' में चल रहा है। शंघाई सरकार इसे बंद करने के बारे में सोच रही है। सारे डिब्बों में स्पीड इंडिकेटर लगे हुए थे, अधिकतम स्पीड 431 किलोमीटर प्रति घंटा देखी गई,जबकि सापेक्ष गति 700 किलोमीटर प्रति घंटा। हैं न, अचरज की बात ? सेवाशंकर अग्रवाल ने तो एक वीडियो तैयार कर लिया। बाद में सबने उसे अपने अपने सोशल मीडिया ग्रुप पर अपलोड कर दिया। किसी ने कामेंट किया, जितनी ज्यादा गति ,उतनी ज्यादा प्रगति । तो किसी ने लिखा, सारे विकास की जड़ है टेक्नॉलॉजी का सही इस्तेमाल। गिनीज़ बुक में नाम रखने वाली अधिकतम स्पीड वाली मेगलेव ट्रेन में बैठना अपने आप में एक बहुत बड़ा गौरव था।

डॉ रंजना अरगड़े ने चुम्बकीय क्षेत्र में चलने वाली ट्रेन के बारे में जानना चाहा," कैसे चलती है यह ट्रेन ?"

 

" मेगलेव ट्रेन विद्युत चुंबकीय सिद्धांत पर चलती हैं। चुंबकीय प्रभाव के चलते ये पटरी से थोड़ा ऊपर होती हैं और इसी कारण इनकी रफ़्तार परंपरागत ट्रेनों से अधिक होती है। ब्रिटेन ने सबसे पहले मेगलेव ट्रेन विकसित की थी। फिलहाल दुनिया में सिर्फ़ चीनी शहर शंघाई में ही यात्री मेगलेव ट्रेन के सफर का आनंद उठा सकते हैं। " मैंने अपनी जानकारी के अनुसार उत्तर दिया ,

" शंघाई में मेगलेव ट्रेन का ट्रैक तैयार करने में 6 करोड़ 30 लाख डॉलर ख़र्च हुए हैं। जापान का कहना है कि वह वर्ष 2025 तक चुंबकीय प्रभाव से चलने वाली पहली 500 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ने वाली पहली ट्रेन का विकास करेगा, जो राजधानी टोक्यो और नागोया शहर के बीच दौड़ेगी। जबकि हकीकत यह है कि ब्रिटेन में ट्रेन संचालित करने वाले नेटवर्क रेल की फिलहाल वहाँ मेगलेव ट्रेन चलाने की योजना नहीं है। ब्रिटेन में कभी दुनिया की पहली व्यवसायिक मेगलेव ट्रेन चलती थी। वर्ष 1984 से 1995 के बीच यह ट्रेन यात्रियों को बर्मिंघम हवाई अड्डे से नजदीकी रेलवे स्टेशन तक ले जाती थी। लेकिन 11 साल के सफर में कई बार इसकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठे और आखिरकार इसे पारंपरिक व्यवस्था से बदल दिया गया। नेटवर्क रेल ने मेगलेव ट्रेन शुरू करने और इसके संचालन पर आने वाले ख़र्च को लेकर भी इसे फिर शुरू करने से इनकार किया है।" मेगलेव ट्रेन के बाद रेस्टोरेन्ट 'जी वाटर फ्रंट होटल' में भारतीय भोजन का रसास्वादन।

 

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

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