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यात्रा संस्मरण : चीन में सात दिन - 6

- दिनेश कुमार माली

चीन में सात दिन

पिछले अध्याय से जारी...

छठवाँ अध्याय : छठवाँ दिन (25.08.14)

आज सुबह उठते ही,पता नहीं, क्यों भगवान बुद्ध की याद आने लगी। भारत के भगवान या चीन के भगवान? या फिर पूरे विश्व के? किस तरह भगवान बुद्ध की शिक्षाएँ भारत की सीमाओं को पारकर चीन में आई होगी। किस तरह उनकी शिक्षाओं का अनुवाद हुआ होगा? प्राकृत भाषा, मागधी, अर्द्ध प्राकृत अथवा पाली, जो भी भाषा प्रचलन में रही होगी, उसका चीनी में अनुवाद होना और वहाँ के जन-मानस तक पहुंचना कम बड़ी उपलब्धि नहीं रही होगी। ये ही सारी बातें सोच रहा था कि एक मित्र ने डॉ. सच्चिदानंद द्वारा अनूदित सु-तुंग-पो की एक कविता 'अंधा आदमी जिसने सूर्य खोजा' के माध्यम से चीनी कविता की प्रणाली, शैली और विधि की तरफ मेरा ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया।

 

''सूर्य कैसा होता है?''

अंधे आदमी ने जुलूस में नगाड़ा बजाते हुए आदमी से पूछा-

''चेंगीला की तरह''

अंधे आदमी ने चेंगीला बजाया

जब रात में मृत्यु की घोषणा करती

कांसे की घंटी बजी, उसने सोचा यह है सूर्य

''सूर्य कैसा होता है?''

अंधे आदमी ने जुलूस में मशाल थामे आदमी से पूछा

''मशाल की तरह''

अंधे आदमी ने मशाल छुई

शाम को जब किसी ने उसके चेहरे पर

गरम पानी उंडेल दिया, उसने सोचा यह है सूर्य

''सूर्य कैसा होता है?''

अगले दिन अंधे ने एक मछुआरे से पूछा

''समुद्र की तरह''

अंधा आदमी समुद्र में उतरा

मूँगे की चट्टानों ने उसके हाथ जलाये

समुद्री घोड़े उसे लेकर उड चले

वह समुद्र में परियों के किले में रहा

अंत में, शैवाल और सीपियों की फैलायी

खामोशी की सतह पर जब वह लेटा

उसने सोचा, अब मैं समझा, सूर्य कैसा होता है

लेकिन मैं नहीं दिखा सकता, उन्हे

जिनकी सिर्फ अपनी आँखें हैं।

जो समझा नहीं गया, वह समझाया जा सकता है

जो जाना है अनुभव से, कैसे बताया जा सकता है

आज भी वह अंधा आदमी, समुद्र सतह पर लेटा है।

जहाजियों के स्वागत के लिए।''

क्या चीन ने बुद्ध की शिक्षाएँ इसी तरह अनुभव की होगी ? रामायण,महाभारत में पढे अनेक मिथकों की तरह मेरे मन में कई चीनी मिथक-जगत की मिथ्याओं की ओर ध्यान जाने लगा। मैंने वहाँ के मिथक गत के बारे में यह पढ़ रखा था की आदि काल में स्वर्ग तथा धरती दोनों तक मनुष्य व देवताओं की एक जैसी पहुँच थी। एक छोटा देवता 'चियु' ने वहाँ के बड़े देवता 'शुग-ती' से मानव की सहायता से ताकत छिननी चाही। जब उसकी यह बगावत असफल हो गई तो मानव के लिए स्वर्ग व धरती के बीच एक रुकावट बना दी गई, लेकिन मानव के लिए ड्रेगन, बंदर तथा सूअर इस रुकावट से पार जा सकते थे। उन्हे जादूगर जानवर गिना गया। इसलिए चीनी मिथकों में हर नायक के साथ कोई ऐसा जानवर जरूर होता है। डॉ॰ देवदत्त पटनायक की पुस्तक "मिथक: हिन्दू आख्यानों को समझने का प्रयास" तथा "पशु" में में जीवन और मृत्यु,प्रकृति और संस्कृति,उत्कृष्टता और संभावना के विरोधाभासों के बीच जवाब हिन्दू प्रतिकों और रीति-रिवाजों की गुत्थियाँ सुलझाने का प्रयास किया है। कामधेनू, स्वर्ण-मृग, जामवंत, मनीकंठ, गिलहरी, मकरध्वज, वासुकी, वैनतेय गरुड आदि की कल्पना जिस तरह हिन्दू मिथोलोजी में की गई हैं,शायद उसी तरह मिथकों का चीनी साहित्य के ऊपर भी गहरा प्रभाव अवश्य रहा होगा। 

 

इस तरह चीनी-दर्शन शास्त्र की मैं भारतीय दर्शन से तुलना करने लगा। चीन की पृष्ठभूमि में ऐसे क्या कारण रहे होंगे,जिसकी वजह से वहाँ के दर्शन के ऊपर कफ्यूशियस, बौद्ध-धर्म तथा माओ-ताओवाद का अधिक प्रभाव पड़ा। माओ की मार्क्सवादी क्रान्ति की सफलता के क्या कारण रहे होंगे? शायद वहाँ पहले से ही मानववाद की जड़ें मजबूत थीं। मानववाद चीन के अवचेतन में था। भारतीय दर्शन में भी पुरुष तथा प्रकृति का संकल्प पैदा हुआ था और तभी से ही मेरे मन में यह प्रश्न उभर रहा था कि 'चीन-यांग' के बीच भी एक द्वंदात्मक रिश्ता है। यह संकल्प अकार्यशीलता तथा कार्यशीलता, क्रिया व अक्रिया के साथ जुड़ा हुआ है। कई लोगों ने इसे प्रकृति व पुरुष के साथ भी जोड़ा है। औरत व मर्द दो धाराओं से भी जोड़ा। 'ताओवाद' भी 'चीन-यांग' फलसफा ही है।

 

बुद्ध ने चीन की संस्कृति को काफी प्रभावित किया। भारत के बुद्ध का चीन में होना इस बात का परिचायक है कि किसी जमाने में भारतीय संस्कृति ने अवश्य चीन को प्रभावित किया होगा अन्यथा शंघाई के म्यूजियम में बुद्ध की प्रतिमा नहीं रखी होती और न ही दीप,अगरबत्ती जलाकर पूजा आराधना की जाती। इंडिया की तरह यहां भी यूआन सिक्के चढ़ाए जाते हैं,साष्टांग दंडवत होकर प्रार्थना की जाती है। भगवान बुद्ध का पूरे चीन में जबरदस्त प्रभाव है। भगवान बुद्ध की शिक्षाएं यहां के जनमानस में आज भी ऊर्जा व प्रेरणा का काम करती हैं। चूंकि भगवान बुद्ध भारत के थे अत: भारतीय संस्कृति व सभ्यता के प्रति भी यहां के नागरिकों में विशिष्ट आदर है। चीनी यात्री ह्वेन सांग ने अपनी भारत यात्रा के बाद लिखित संस्मरणों में अनेक स्थानों पर भारतीय मूल्यों का चीन में प्रभाव होने की बात कही है। जेड बुद्ध मंदिर भी चीन के प्रमुख बौद्ध मंदिरों में से एक है। यहां सफेद जेड (विशिष्ट शैली का बहुमूल्य पत्थर) से बनी बुद्ध प्रतिमाएं हैं। एक प्रतिमा बैठी आकृति में और दूसरी लेटी हुई आकृति में हैं। अरुण कमल की कविता इस मंदिर को देखने के बाद

 

बुद्ध मंदिर में

केवल प्रार्थना है भगवन

कोई तृष्णा

कोई आकांक्षा नहीं

मुझे कुछ चाहिए नहीं प्रभों

इस काष्ठ आसन पर झुककर

अपनी सम्पूर्ण काया एक गांठ की तरह बांधता

तुम्हें अर्पित कर रहा प्रभु –

तुम्हारी जन्मभूमि से आया यह मोहबिद्ध प्राणी

देखता हूँ तुम्हारा भरा हुआ दान-पात्र

इतने सिक्के इतने युआन

मैं क्या डालूँ इस पात्र में प्रभु

रुपया डाल दूँ ?

मेरे पास एक नया नोट है पाँच का

स्वीकार करोगे बुद्ध?रुपया चलेगा चीन में ?

या केवल युआन ?

डॉलर तो हरगिज नहीं बुद्ध को!

 

यहां कुछ चीनी दैविक राजाओं की मूर्तियां भी दर्शनीय है। मंदिर दर्शन के बाद हम नॉनजिंग रोड पर गए,जहां बांस की कॉटन से तरह-तरह की घरेलू वस्तुएँ बनाई जाती है, जैसे टी-शर्ट,, टॉवल, रुमाल, फ्रॉक, स्कार्फ, टूथ-ब्रश, साबुन, कैंडी आदि। शो-रूम में वास्तुकला से संबन्धित कुछ चीजें भी रखी हुई थीं। सभी ने यथाशक्ति कुछ न कुछ खरीददारी अवश्य की।फिर दोपहर का भोजन और शंघाई म्यूजियम की ओर प्रस्थान। प्राचीन चीनी कला का सबसे बड़ा म्यूजियम। तरह-तरह के आर्टिफेक्ट। इस म्यूजियम में ग्यारह गैलेरी और तीन एक्जिबिशन हाल हैं। शंघाई म्यूजियम जहां अपनी और कलाओं के लिए प्रसिद्ध है चीन की कैलिग्राफी या हस्तलेखन की लिपियों का इतिहास भी यहीं संभाला हुआ है। यहाँ सबसे प्राचीन हस्तलिखित लिपि का जो नमूना पड़ा है, यह तीन हजार वर्ष पुराना है तथा यह लिपि जानवरों की हड्डियों तथा कछुकुम्मे की पीठ की हड्डी के ऊपर लिखी हुई है। एक अन्य हस्तलिखित लिपि ग्यारहवीं से सोलहवीं पूर्व ई. की है, जो कांसे के ऊपर है। इस प्रकार हस्तलिखित कई और नमूने वहाँ मौजूद हैं। कई ऐसी मोहरें हैं जो 221 पू. ई. की हैं, जब यहाँ 'शिन' शहंशाह थे जिन्होंने मोहरे की लिपि को बहुत सादा बनाया यह मोहरे बहुत सीधी-सादी व मजबूत हैं। इस प्रकार ऐसी हस्तलिखित लिपियों के नमूने भी पड़े हैं, जब इस लिपि को बड़ी तेजी के साथ लिखा जाने लगा। यह वह पड़ाव था जब पंक्ति की तरतीब का भी ख्याल रखा जाने लगा था। सातवीं से नौवीं शताब्दी तक इस लिपि में बहुत सुधार आए तथा इस समय में कई प्रसिद्ध लिपिकार भी सामने आए, जिनके नाम पर लिपि की व्यक्तिगत शैलियां प्रसिद्ध हुई। इस तरह इस अजायबघर में चीनी लिपि के अब तक के विकास को देखा जा सकता है। यह केवल लिपि के नमूने ही नहीं हैं, बल्कि इसमें कई प्राचीन कविताएँ तथा साहित्य के और नमूने भी लिखे गए हैं। कई लिखतें जो चीन के कई मंदिरों में लिखी गई हैं, उनकी नकल भी यहाँ संभाली हुई है।

 

चीन के पिछले समय में कांसे पर कला के बहुत नमूने बनाए जाते थे। वह जिम्मेदार नमूने इस अजायबघर में सुरक्षित हैं। चीन का लकड़ी का फर्नीचर पहले समय में दूर-दूर तक जाता था, क्योंकि इस फर्नीचर के ऊपर बहुत बारीक नक्काशी, खुदाई की कला की जाती थी जैसे हमारी कश्मीरी  कला में कढ़ाई व लकड़ी के ऊपर नक्काशी का काम होता है। चीन में इस फर्नीचर को 'मिंग' तथा 'चिंग' फर्नीचर कहा जाता है। यह फर्नीचर अनगिनत रूपों में इस अजायबघर में सुरक्षित हैं।

चीन की क्लासिकी कला में कपड़ों के नमूने तथा उन पर की गई कढ़ाई बहुत दूर-दूर तक प्रसिद्ध रही है, तथा प्राचीन समय में एशिया में इन कपड़ों का खूब व्यापार होता था। इस म्यूजियम  में वे सारे नमूने तो पड़े ही हैं, जिनके ऊपर भांति-भांति के ड्रेगन बड़ी बारीक कढ़ाई को विशेष कर राजशाही परिवार पसंद करते थे। इसी प्रकार पुराने चीनी बर्तन, आभूषण, मूर्तिकला को यहाँ विशेष तौर पर देखा जा सकता है। बुद्ध के पुराने बूत या अन्य बौद्ध मुद्राएँ तथा उन मुद्राओं में अंकित बौद्ध, जेड पत्थर से बनी अनेक प्रतिमाएँ तथा आभूषण, पुराने चीन की चित्रकला में अधिकतर फूलों तथा प्रकृति का चित्रण, चीन के अन्य राज्यों के राजाओं की शाही वस्तुएं, फर्नीचर लकड़ी पर किए खुदाई का काम आदि बहुत कुछ विस्तृत रूप से प्रदर्शित व यहाँ सुरक्षित पड़ा है, परंतु यह सब बातों की जानकारी के लिए यहाँ हमें किसी दुभाषिया की जरूरत न पड़ी।

 

म्यूजियम देखने के बाद हम चल पड़े हुयांगपू नदी में सैर करने के लिए। नदी के दोनों तरफ अभ्रांकष इमारतें और उन इमारतों पर रंग-बिरंगी झिलमिलाती रोशनियाँ। चीन यात्रा में ऑरियंट पर्ल टीवी टॉवर भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। इसे ‘फोटोग्राफिक ज्वेल’ भी कहा जाता है। पुडोंग पार्क में बना यह टॉवर यांगपू पुल से घिरा है। दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे दो ड्रेगन मोतियों से अठखेलियां कर रहे हों। 468 मीटर ऊंचा यह टॉवर विश्व का तीसरा सबसे ऊंचा टॉवर है। रात की रोशनी में इसकी आभा देखते ही बनती है। बहुत बड़े जहाज में हमारे साथ-साथ जगह-जगह के लोगों का जुटना। ऊपर में सतरवें एशियन खेलकूदों को प्रमोट करने के लिए दक्षिण कोरिया के छात्रों का एक दल जहाज के ऊपरी माले पर संगीत की धुन पर थिरक रहा था और उनके नृत्य में वे शामिल कर रहे थे हाथ पकड़-पकड़कर डॉ जय प्रकाश मानस जी को,डॉ सुधीर शर्मा जी को, मुमताज़ और गिरीश पंकज को बारी-बारी। हमारे ग्रुप की बच्ची स्मार्की पटनायक उन बच्चों के डांस का एक हिस्सा बन गई। जीवन में नृत्य है, जीवन में संगीत है। यद्यपि बरसात हो रही थी ,मगर इतनी चमकदार रोशनी चारों तरफ मानो चाँदनी रात हो। मुझे ओडिया भाषा के महान कवि मायाधर मानसिंह की प्रसिद्ध कविता 'महानदी में ज्योत्स्ना विहार' याद आनी लगी। हुयांगपू मेरे लिए महानदी बन गई और वह तटिनी "बाली-यात्रा" का प्रतीक।

 

पत्थर के घर में, अंधेरे में, रहने वाला मैं, जननी !
पता नहीं था, तुम्हारे अद्भुत रूप की लीला ,हे धरणी !
चांदनी रात में महानदी में चलाने से पहले  तरणी
आहा ! कितनी विपुल शोभा मेरी आँखों के सामने
कैसे करुँ मैं वर्णन मेरे आकर्षक अनुभव का  ?
चौंधिया गई मेरी आँखें इस धवल-चाँदनी में
बंद हो गया मेरा पराभव मुँह इस चपल-चाँदनी में
रजनी- वधू  सफेद चादर की तरह
फैला रही चाँदनी  दिगचक्र तक
नीचे धरती-तल की प्राकृतिक मधुरता
तुम्हारे संस्पर्श से और मधुर ।
आकाश के समान महानदी का जल
चंद्रिका चुंबन से धवल -चपल
तरल दर्पण जैसे बिछा दिया हो किसी ने
देखेंगे उसमे अपने बदन, नभ की सुहागिनें ।
दूरवाही नाविक का सुगम संगीत
छूता नदी का वक्ष अक्षत
चांदनी में नदी के पानी का किनारों से टकराना
मानो लाखों चांदी के फूलों का एक साथ खिल जाना
इस भव्य चित्रगृह में मैं एक दीन-हीन अतिथि
देख रहा हूँ मुग्ध होकर महिमा मंडित
सोचता हूँ , हो जाऊं विलीन इस चांदनी में
और पान करूँ अमृतरस का इस स्रोत में ।

 

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

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