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शशांक मिश्र भारती की ताज़ा कविताएँ

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एक-

मेरी अभिलाषा

मेरी अभिलाषा
आज से ही नहीं सदियों से
यही रही है कि-
शान्त- स्निग्ध बने वातावरण
समृद्धिता पाये समाज
हर्षोल्लासित हो मनुष्य
और
समस्त प्राणी जगत
जिसके लिए प्रतिफल कामना रही है मेरी
प्रकृति से
संघर्ष भी किया है प्रतिकूल परिस्थितियों से।
निश्चय ही
सफलता मिलेगी मुझे
अपनी उत्कण्ठाओं को पूर्ण करने में
अपनी वर्षा से संचित
स्वर्ण रश्मियों सी कली को पूर्ण बनाने में
अब तो-
उत्साहित हूं मैं भी
संकेत मिलने से सफलता के
जिनसे आ चुका है मुझसे नवीन उत्साह
समाज को स्वच्छ परिवेश,गति,
व दिशा प्रदान करने के लिए
प्रकृति द्वारा प्राप्त मानव शरीर की
सार्थकता सिद्ध करने के लिए।

 

 

दो-

हम आगे बढ़ेंगे

न हो साथ कोई चाहे हमारे
कदम चूमने को हम आगे बढ़ेंगे
पथ हो कण्टक या विघ्न बाधाएं
बन विजयी निष्कण्टक आगे दिखेंगे
रात्रि को भुला सुबह के राही बनेगें
जगने और जगाने के वाही बनेंगे
तमस की छाया धुन्ध को नष्टकर
आस का दीप जला उसके साही बनेंगे
एक बार कदम बढ़ गये जो आगे
सफलता के परचम स्वंयमेव गढ़ेंगे
भले ही साथ कोई न हो हमारे
परहित आलोकित हो दीप सा जलेंगे
पलनकर हर धर्म उसके राही बनेंगे
दया, सहिष्णुता के सुखद वाही जनेंगे
शत्रु कोई न अपना सब मैत्रीदायी रहेंगे
प्रतिपल और क्षण-क्षणकल्याण दायी बनेंगे
सत्य पथ चलनें में अकेले ही
अपने आत्मबल के साथ हम आगे बढ़ेंगे।

 

तीन-

प्राकृतिक परिवेश

कई दिनों के बाद
कालिमा के बीत जाने के बाद
आज खिली है धूप,
बादलों की गोद से छिटककर
पर्वतों की ओट से निकल कर
कर दिया वातावरण
एक दिन में ही उष्णतम
दिखला दी है प्रखरता।
विशेषता भी है यह यहां की
पल- पल में बदलना
कभी हल्की ठण्ड
तो कभी गरमी का पड़ना
प्रकृति सौंदर्य तो यहां का निराला है,
धूप हो या बादल
सभी ने निखारा है,
बादल आकर के यहां द्वार पर
क्षणभर में ही वर्षा कर जाते हैं,
दिन भर का न यहां टप-टप
और न कीचड़ ही
इसलिए प्रसन्नचित हूं मैं,
पर्वतों के बीच
बादलों के आगोश में,
परिजनों से दूर
प्राकृतिक परिवेश में।

 


चार-

नदी का निश्चय

देख रहा हूं मैं-
कुछ ही दूरी पर बैठा
एक कठोर चट्टान से
झर- झर कर निर्झर सी नदी
गहरी घाटी में बह रही नदी,
धारा है तीव्र
उफनती है यह
बहकर सिर्फ-
कहती है यह कि-
पथ है कण्टक
पर -
बहती है निष्कण्टक,
रोकें चाहें पथ पत्थर भी
पर बढ़ती हूं निरन्तर , अथक
अपने सुचित कर्म पथ की ओर ,
देखकर पर हितार्थ
ऊपर से नीचे को चलना
सोचता हूं मैं,
क्या नहीं अपना सकता है मनुष्य
आदर्श नदी मान सकता है
अपने कर्म पथ के लिए,
तेन त्यक्तेन भुन्जीथा के लिए
नदी व उसके कर्तव्य के प्रति
दृढ़ निश्चय को देखकर
उसका
अनुगमन कर
उसके पथ का सुचित अनुकरण कर।

 


पांच-

भेद
आज यदि मैं
चिन्ता और चिता का भेद
समझ पाता
तो शायद
इस भांति संघर्ष का युग
पुनः- पुनः मेरे चक्कर न लगाता
भ्रमित हो गया था मैं
और आज भी हूं भ्रमित ही,
निकलना चाहता हूं जितना ही
इस भ्रमजाल से
फंसता जा रहा है उतना ही मैं
इस मकड़जाल में।
कामना नहीं है कुछ भी मुझे
इस जगत से
मैं तो चाहता हूं कुछ देना
अपने पौरुष से इस जगत को
उसके जड़- चेतन को,
लेकिन-
चिन्ता और चिता का प्रश्न आते ही
रुकना पड़ता है मुझे
और मेरी कलमा के भी बंध जाते हैं कदम
बेंड़ियां अर्न्तद्वन्द की
सोचता हूं प्रत्येक क्षण
इनसे छुटकारे का उपाय
अपने संचित कर्मों का प्रारब्ध,
शायद-
कर सकूंगा कुछ
इन भेदों और विभेदों से परे हो
इस जगत के लिए,
अपने संघर्षशील जीवन से
इस देश व समाज के लिए
मानव प्रकृति और संस्कृति के लिए।

 


छः-
आज का मानव

आज का मानव
अपने स्वार्थों में इतना फंस चुका है
अपना करके हिंसा
आगे बढ़ रहा है
दिखता नहीं कुछ
निःशेष है अपनी इच्छाओं की पूर्ति
रहें स्थिर संतुलन प्राणी जगत
अथवा
मानवीय संस्कृति का
उसको चाहिए
मात्र अपनी इच्छाओं की पूर्ति।
जिसके लिए उसने अपने इष्ट मित्रों बन्धु बान्धवों
तक को
उपेक्षित सा बना दिया है।
किसी की क्या होगी प्रतिक्रिया
उसे नहीं आतुरता जानने की
और नहीं विकल उस कल्पना से
जो उसके द्वारा निरन्तर असन्तुलित
करने वाले क्रियाकलापों से उत्पन्न हो जायेगी।
काश!
ये मानव कुछ समझ पाता
पूर्ण तया सोने से पहले जाग पाता
अपने अस्तित्व के लिए
आवश्यक तत्वों का महत्व पहचान सकता
परि आवरण को यर्थाथ में
अपने अंर्तमन में उतार पाता।

 

सात-
अगली पीढ़ी इतिहास बनाती

युग बदला हम न हैं बदले
बोलो फिर क्या हैं बदले
आतंक हिंसा का वही ताण्डव
स्वार्थन्धता के गोरखधन्धे।
जो पहले थी पशुता कहाती
बन आतंक की छाया भाती।
गली मुहल्ले जल रहे सब
बाल युवा मचल रहे अब।
नेतृत्व की भी गोटियां सिंकती
वोट की खातिर नीतियां बिकतीं।
कैसा यह बदला युग है आया
घर-घर छायी काली छाया।
गांव जिन्हें शान्त कहते थे
अब राजनीति ने उसे गंवाया
अमृतमयी नदियों की धारा
बनी प्रदूषण की महाकारा।
आसमान भी रोता कब से
सच्चा मनुज सोता है जब से,
धरती -चांद सितारे जल रहे
स्वार्थ पूर्ति को प्रगति कह रहे।
मौलिकता अपनी भुला चुके सब
इन सबको पड़ेगा अब बदलना
यदि मिलती युग को प्रेरक बाती
अगली पीढ़ी इतिहास बनाती
बदलता युग जीव की थाती
सोने की चिड़िया धरा कहाती।

 

 

आठ-

अब समय आ गया है

आज पुन :जल उठे अनेक घर
चीत्कार कर उठे बच्चे,युवा और वृद्ध
सिमट गये लाशों में अनेक चेहरे
और
होने लगी पहचान
अपने पराये की
सेंकी गर्इ्रं रोटियां स्वार्थ की
विभिन्नताओं,जाति,धर्म और वर्ग की,
असहाय भारत माता
सब कुछ देखती रही
इन गिद्धों को ही सहोदरों को नोचते
उनके रक्त,मांस से अपने स्वार्थ की गोटियां सेंकते।
शायद-
कोई आगे बढ़ता इस पाशविकता को रोकता
दानवता का प्रत्युत्तर
मनुजता से देता
पर-
कौन आता तोड़कर अपनी सुप्तावस्था
अपने स्वदेश,धर्म, संस्कृति के पद्दलन को रोकने
कादम्ब, कंचन, कामिनी में डूबे लोगों को
मार्गदर्शन देने।
किन्तु -
अब समय आ गया है
हमें अपने अतीत की भूलों को स्मरण कर
अपना आत्म निरीक्षण करने का
पशुता, स्वार्थतासे रोते -बिलखते
बच्चों,युवाओं और वृद्धों के अश्रु धोने का,
जलती झोपड़ियों, भटकती आत्माओं के कदम
रोकने का
और अपने आपको पशुता से हटा
मनुजता में ले जाने का।

 


नौ-

संयुक्त परिवार एक सुखद अनुभव
संयुक्त परिवार एक ऐसी सीढ़ी है,
ज्ञान अनुभव पाती नयी पीढ़ी है।
मां-बाप के साथ दादा-दादी का प्यार,
नूतन स्वप्नों-कथाओं का संसार।
गांव बने आधार यह हैं,
शहरी समझते भार यह हैं।
देखने में किन्चित न महत्वशाली,
हृदय समाज का आज यह हैं।
मूल भारत अभी गांवों में बसता,
किसान और जवान गांव ही जनता।
महुए की सुगन्ध कहीं गाती कोयल,
भटका कहीं मन गांवों में रमता।
वट वृक्ष दादा कोंपल सा बच्चे,
टहनी मां-बाप अनुभव से अधकच्चे।
साथ रहना मिलना सदैव सुखकारी,
सभी के हितैशी बनते हैं सच्चे।

 


दसः-
भारत देश हमारा है!

राष्ट्र हमारा कितना प्यारा
सारे जग से न्यारा है,
गंगा-जमुना पावन नदिया
सागर का इसमें किनारा है,
उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम
अलग-अलग यहां वेश हैं
खाते-पीते बोलते अलग हैं
पर रहते हम सब एक हैं
देश का मुकुट हिमालय
उत्तर में प्रहरी सा दिखता है
दक्षिण-पश्चिम, पूरब-दक्षिण
बालकों सा सिन्धु मचलता है,
देवभूमि कहीं कर्मभूमि है
विश्वासघात की न हों बातें,
मानवता की बात छोड़िये
यहां पत्थर भी हैं पूजे जाते,
सदियों से गुन्जायमान यह
भारत देश हमारा है
जगदगुरु पद पर प्रतिष्ठित
हम सबको ही प्यारा है।।

 

       
20.08.2015
शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र.

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